सेहत के सजग प्रहरी विनय विश्वकर्मा

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नौरोजाबाद जिला उमरिया, मप्र के रहने वाले विनय विश्वकर्मा जब बारहवीं में अपने गाँव में पढ़ रहे थे तो उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वे अपने क्षेत्र के युवाओं के लिए आदर्श बनेंगे और वे बड़े वृहद समुदाय के लिए स्वास्थ्य जैसे पेंचीदा मसले पर काम करेंगे। जब वे बारहवीं में थे तो राष्ट्रीय युवा संगठन से जुड़े थे और संगठन के शिविरों में जाते थे बाद में उन्होंने बीएससी किया, बाद में एमएसडब्ल्यू भी किया और संगठन के कामों में हाथ बंटाने लगे, फिर उन्हें परिवार और अपने लिए रुपयों की जरुरत महसूस हुई तो वे काम करने के लिए उमरिया आये और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना आरम्भ किया। साथ-साथ संगठन का काम भी करने लगे।

उमरिया जैसे पिछड़े जिले के  आकाशकोट के 25 गाँवों में संगठन काम कर रहा था- शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में तो वे भी संगठन के भूपेन्द्र, अजमत और संतोष द्विवेदी के साथ गाँवों में जाने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने  पाया कि गाँवों में स्वास्थ्य की मूल समस्याओं और बीमारियों की पहचान से भी लोग वाकिफ नहीं हैं। काम के दौरान चार पांच बार उन्हें कुपोषित बच्चों को लेकर गनियारी जाना पड़ा जो बिलासपुर के पास स्थित है और बड़ा अस्पताल है, तो उन्होंने वहाँ लोगों से दोस्ती की और काम को समझा। उन्हें जन स्वास्थ्य अभियान के बारे में पता चला तो उन्होंने इस परियोजना में रुचि दिखाई। अनुपूर जिले के पुष्पराजगढ़ ब्लाक के 75 गाँवों में एक महती परियोजना की शुरुवात होने वाली थी।

जन स्वास्थ्य अभियान, गनियारी ने विनय के काम में रुचि और अनुभव के आधार पर काम के संयोजन का दायित्व सौंपा तो विनय ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और काम करने लगे। पहले वे परियोजना सहायक के रूप में जुड़े परन्तु डेढ़ वर्ष में उन्होंने पूरे इलाके में काम करके एक अलग पहचान बनाई और फिर डेढ़ साल के बाद उन्हें जन स्वास्थ्य अभियान में प्रमोट करके परियोजना में स्वास्थ्य हेड का दर्जा दे दिया गया। विनय आज इस परियोजना में काम कर रहे हैं। उनका मुख्य काम पूरे 75 गाँवों में आशाओं, एएनएम और बहु उद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की क्षमता वृद्धि करके सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करवाना है इसके लिए सभी स्तर पर प्रशिक्षण मोड्यूल बनाकर जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना, काम के दौरान उन्हें मदद करना, पूरे कार्यक्रम का सतत मूल्यांकन एवं अनुश्रवण करना है

विनय इस समय में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं दस उप स्वास्थ्य केन्द्रों को देखते हैं जो 75 गाँवों को कवर करते हैं, मुख्य रूप से ओपीडी, सुरक्षित प्रसव, ग्राम आरोग्य केंद्र, टीकाकरण, जननी परिवहन सेवाओं की देखरेख जैसे महत्वपूर्ण कार्य हैं। तीन “ए” यानी आशा, आंगनवाड़ी और एएनएम के सहयोग एवं संयोजन से वे पूरा काम करते हैं- इसके लिए इन तीनों को लगातार अपडेट रखना, इनका प्रशिक्षण करना और इन्हें सतत प्रेरित करते रहना सबसे बड़ी चुनौती है।

विनय के साथ 15 महिला कार्यकर्ता और 4 पुरुष कार्यकर्ता हैं जो इस काम में मदद करते हैं और इसके लिए उन्हें गनियारी के अस्पताल से सहयोग मिलता है। अस्पतालों के साथ गाँव की आंगनवाड़ी के साथ उन्होंने इसी ब्लॉक में 75 फुलवारी केंद्र भी खोले हैं जहां गर्भवती माताओं, धात्री महिलाओं, किशोरियों और 0 से 6 साल तक के बच्चों के लिए पोषाहार उपलब्ध कराया जाता है। जिसकी निगरानी भी उनके काम का हिस्सा है।

विनय कहते हैं क्षेत्र में सेवाओं की स्थिति बहुत ही खराब थी और घरों में प्रसव होना, बच्चों के साथ डिलीवरी में महिलाओं की मृत्यु होना नियति का एक हिस्सा था परन्तु हमने सरकारी तंत्र को एक्टिवेट करके और लोगों में जागरुकता बढ़ाकर काफी हद तक नियन्त्रण कर लिया है, मृत्यु  एक चमत्कार की भाँति कम हुई है और घरों में प्रसव अब लगभग ना के बराबर होते हैं। परन्तु सरकारी कर्मचारियों का रवैया  अभी जैसा चाहिए – वैसा बदला नहीं है और इसके लिए एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी क्योंकि जब तक हम या हमारी टीम वहाँ होती है वे काम करते हैं। हमारे हटने पर वे गायब हो जाते हैं हमारी कोशिश होती है कि हमारे फील्ड के साथी सदैव लोगों के साथ जुड़े रहें ताकि किसी भी प्रकार की आकस्मिक स्थिति में हम उनके साथ रहें और किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट ना हो। ग्राम आरोग्य केंद्र यदि अपनी संकल्पना के अनुसार काम करने लगे और वहां दवाओं की पूर्ति नियमित बनी रहे तो आधी से ज्यादा समस्याएं खत्म हो जायेंगी।

विनय कहते हैं पूरे इलाके में लगभग गोंड एवं बैगा आदिवासी की आबादी पचास हजार है और इन इलाकों में पानी, बिजली तथा पहुंच मार्ग की स्थाई समस्या है जिस पर भी काम करने की जरूरत है। हाल ही में कोविड के दौरान उनकी टीम को लगभग चौबीसों घंटे काम करना पड़ा है और अभी टीकाकरण को लेकर जो भ्रांतियां हैं उन्हें दूर करने में टीम लगी है। सेहत सखी के कार्यकर्ताओं को इन दिनों वे प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि गाँवों में अन्य संस्थाएं भी आयें और काम करें। शिक्षा की कमी से अभी काम करना बहुत मुश्किल है, आदिवासियों की परम्परा और उनके झाड़ फूंक तथा दवाईयां भी महत्वपूर्ण हैं इन्हें सहसा नकार नहीं सकते पर धीरे-धीरे ही परिवर्तन आयेगा।

“मै निराश नहीं हूँ पर आजादी के इतने वर्षों बाद भी संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद आदिवासी उपेक्षित हैं। यह दुखद है, हम लगे हैं और हमें विश्वास है कि हम जरूर कामयाब होंगे”, – विनय मुस्कुराते हुए कहते हैं।

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।)

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