क़ासिम सुलेमानी ने बना दिया है ईरान को अभेद्य क़िला

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कासिम सुलेमानी।

क़ासिम सुलेमानी ने ईरान को कितनी ताक़त दी है, यह जानने के लिए इतना ही काफ़ी है कि उनकी अन्त्येष्टि के फौरन बाद इराक़ में अमेरिका के सबसे बड़े और सुरक्षित माने जाने वाले अड्डे पर ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला कर दिया। पिछले 22 साल से ईरान के सबसे प्रभावशाली सैनिक समूह के प्रमुख मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की अमेरिकी ड्रॉन ने पिछली 3 जनवरी को हत्या कर दी। वह ईरान के दूसरे सबसे ताक़तवर इंसान थे। देश के सुप्रीम लीडर आयतल्लाह ख़ामनेई साहब के बाद वह दूसरे सबसे ताक़तवर इंसान माने जाते थे। राष्ट्रपति की भी ज़मीनी शक्ति इनके बाद ही मानी जाती रही है।

साल 1998 से लगातार ईरान के सबसे ताक़तवर इस्लामी रिवॉल्यूशनरी गारद यानी आईआरजीसी की कुद्स फोर्स के वह सर्वेसर्वा थे। ईरान में इस गारद को इसलिए बहुत सम्मान है क्योंकि यह उन ज़मीनी मिलिशिया का समूह था जिसने सत्तर के दशक में भ्रष्ट शाह पहलवी की सत्ता को उखाड़ फेंकने में इमाम ख़ुमैनी की मदद की थी। बाद में जैसे ही ख़ुमैनी ने सत्ता संभाली और इराक़ ने ईरान पर चढ़ाई की, इसी गारद ने देश के लोगों को मिलिट्री ट्रेनिंग दी और देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुलेमानी सिर्फ अमेरिका नहीं बल्कि इज़राइल और सऊदी अरब समेत क्षेत्र के सभी आतंकवादी गिरोहों की आंख का कांटा बन चुके थे। उन्होंने हाल ही में सीरिया में व्याप्त दुर्दान्त आतंकवादी संगठन इस्लामी स्टेट को समाप्त करने में ईरान के साथ हिज़बुल्लाह, सीरियाई सेना और रूस के साथ एक बेहतर गठजोड़ स्थापित कर इसे उखाड़ फेंकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। साल 2014-15 में इराक़ में आईएसआईएस और कुर्द ताक़तों से लड़ने में भी उन्होंने इराक़ की मदद की थी।

अमेरिका और इज़राइल के क्षेत्र में इतने व्यापक हितों को नुक़सान पहुचाने वाले क़ासिम सुलेमानी नि:संदेह अमेरिका और इज़राइल ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिम के लिए खलनायक थे। लेकिन अपने देश ईरान में सुलेमानी को लोग बहुत चाहते रहे हैं। उन्होंने तालिबान से लड़ने में अमेरिका की मदद की और लेबनानियों को इज़राइली ज़ुल्म से निजात दिलाने के लिए हिज़्बुल्लाह की भी मदद की। इतने कारण काफी थे कि अमेरिका ने सुलेमानी को ‘आतंकवादी’ घोषित कर दिया था। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपी संगठन ने भी उन पर निजी प्रतिबंध लगा रखे थे। इस पर भी वह ईरान की जनता नहीं बल्कि लेबनान, सीरिया, इराक़, बहरीन और यमन में एक बड़ी जनसंख्या के लिए हीरो का दर्जा रखते थे।

मात्र 20 साल की उम्र में ईरान की प्रतिष्ठित सेना बटालियन 41वीं थारल्लाह डिवीज़न के वह कमांडर चुन लिए गए। उन्होंने देश के लिए कई मोर्चों पर युद्ध में भी हिस्सा लिया। क़ासिम सुलेमानी को भारत का भी दोस्त माना जाता रहा है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सफाए के लिए किए जा रहे अभियान से भारत को भी लाभ मिला है।

क़ासिम सुलेमानी की हत्या और तदफीन के बाद इराक़ में अमेरिका के बेस पर किए गए हमले में ईरान ने 80 सैनिकों को मार गिराने का दावा किया है जबकि अमेरिका ने इससे इनकार किया है। सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ जुल्फिकार’ हासिल करने वाले इस देशप्रेमी सैनिक ने एक मामूली सैनिक से रिवॉल्यूशनरी गारद की कुद्स फोर्स के प्रमुख पद तक जगह बनाने में बहुत मेहनत और देशप्रेम का सुबूत दिया है। साल 2006 में जब लेबनान और इजराइल के बीच युद्ध हुआ तो इज़राइल यह जंग हार गया।

इस जंग में दक्षिणी लेबनान ने इजराइल के कब्जाशुदा अपनी तमाम भूमि को आज़ाद करवा लिया। पिछले ही साल प्रकाशित एक इंटरव्यू में क़ासिम सुलेमानी ने यह माना था कि जब लेबनान और इजराइल में जंग चल रही थी, वह वर्ष 2006 में लेबनान में थे। इस युद्ध में इजराइल को भारी नुक़सान हुआ था और लेबनान के इज़राइली अधिकृत भूभाग को आज़ाद करवाने में लेबनान सेना के साथ हिज़बुल्लाह ने बहुत मदद की थी। हिज़्बुल्लाह के लिए क़ासिम सुलेमानी एक बहुत दयालु नेता थे।

साल 2014 में न्यूयॉर्क टाइम्स में ‘द शेडो कमांडर’ में अमेरिकी ख़ुफिया सीआईए के एक पूर्व कर्मचारी के हवाले से क़ासिम सुलेमानी को पश्चिम एशिया का सबसे शक्तिशाली सैनिक बताया गया था। इराक में कुद्स फोर्स के कमांडर के रूप में उन्होंने इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल-मालिकी के चुनाव का समर्थन करते हुए इराक़ की आंतरिक राजनीति को भी बहुत गहराई से प्रभावित किया था।

यह सत्य है कि क़ासिम सुलेमानी ईरान की क्षेत्रीय सत्ता के पक्षधर थे और अनायास ही शिया बहुल होने के नाते झोली में आ गिरे इराक़ को यह शक्तिशाली योद्धा आसानी से छोड़ तो नहीं सकता था। ज़ाहिर है इराक़ के रास्ते सरहदी सीरिया, सऊदी अरब और कुवैत को किसी भी रूप में प्रभावित करने में ईरान को बहुत बड़ी शक्ति बनाने में क़ासिम सुलेमानी का अहम किरदार है। ईरान को ऐसा देशप्रेमी मुश्किल से मिलेगा लेकिन जिस शक्ति के साथ उन्होंने देश को स्थापित कर दिया है, वहाँ से ईरान को कोई ख़तरा नहीं है।

(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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