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राम और सीता नहीं, फुले एवं सावित्रीबाई हैं आदर्श दंपति के प्रतीक

भारत में बहुजन-श्रमण परंपरा के पास आधुनिक भारत के निर्माण के लिए आवश्यक दर्शन, विचारधारा, ग्रंथ और नायक-नायिकाएं हैं। यह बात स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में भी पूरी तरह सच है। जहां वेदों से लेकर हिदुत्व के आधुनिक पैरोकार आरएसएस तक स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व एवं अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, उसे पुरूष की अनुगामिनी या छाया के रूप में ही देखते  हैं। इसके उलट बहुजन-श्रमण अनार्य परंपरा में स्त्री को हमेशा पुरूष के बराबर समान दर्जा प्राप्त रहा है। आधुनिक युग में इसके सबसे आदर्श प्रतीक फुले दंपति-सावित्रीबाई फुले और जोतीराव फुले हैं।

प्राचीन काल से स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते हों इस सन्दर्भ में भारत में दो अवधारणा रही हैं- ब्राह्मणवादी-मनुवादी आर्य अवधारणा और दलित-बहुजन श्रमण अनार्य अवधारणा। ब्राह्मणवादी-मनुवादी आर्य अवधारणा यह मानती है कि स्त्री पूर्णतया पुरुष के अधीन है। ब्राह्मणवादी-आर्य परंपरा के आदर्श दंपति राम और सीता हैं। सीता पूरी तरह राम की अनुगामिनी हैं। उनका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व और अस्तित्व नहीं हैं। रामचरित मानस के आधार पर सीता और राम के संबंधों को देखें तो स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होता है कि सीता राम की दासी जैसी हैं, राम की हर इच्छा को पूरा करना उनके जीवन का मुख्य ध्येय है।

यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता तुलसीदास ने बताई है। वे राम के कहे बिना राम के इच्छाओं को समझ जाती हैं और उसी के अनुकूल आचरण करती हैं। दलित-बहुजन परंपरा में आदर्श दंपति के प्रतीक फुले दंपति ( जोतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले) हैं। ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा तमाम शास्त्रों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गीता और वेदों व उनसे जुड़ी कथाओं, उपकथाओं, अंतर्कथाओं और मिथकों तक फैली हुई है। इन सभी का एक स्वर में कहना है कि स्त्री को स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य-स्मृति जैसे धर्मग्रंथों ने बार-बार यही दोहराया है कि ‘स्त्री आज़ादी से वंचित’ है अथवा ‘स्वतंत्रता के लिए अपात्र’ है। मनुस्मृति का स्पष्ट कहना है कि-

                      पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षित यौवने।

                      रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्रमर्हति।। (मनुस्मृति 9.3)

(अर्थात्- स्त्री जब कुमारिका होती है, तब पिता उसकी रक्षा करता है। युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में स्त्री की रक्षा पुत्र करता है। तात्पर्य यह है कि आयु के किसी भी पड़ाव पर स्त्री को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं है।)

यह बात मनु स्मृति तक सीमित नहीं है। हिन्दुओं के आदर्श महाकाव्य रामचरितमानस के रचयिता महाकवि तुलसीदास की दो टूक घोषणा है कि स्वतंत्र होते ही स्त्री बिगड़ जाती है-

    ‘महाबृष्टि चलि फूटि किआरी, जिमी सुतंत्र भए बिगरहिं नारी’

महाभारत में कहा गया है कि ‘पति चाहे बूढ़ा, बदसूरत, अमीर या ग़रीब हो; लेकिन, स्त्री की सृष्टि से वह उत्तम भूषण होता है। ग़रीब, कुरूप, निहायत बेवकूफ़, कोढ़ी जैसे पति की सेवा करने वाली स्त्री अक्षय लोक को प्राप्त करती है। मनुस्मृति का कहना है कि ‘पति चरित्रहीन, लम्पट, निर्गुणी क्यों न हो, साध्वी स्त्री देवता की तरह उसकी सेवा करे।’ वाल्मीकि रामायण में भी इस आशय का उल्लेख है। पराशर स्मृति में कहा गया है, ‘ग़रीब, बीमार और मूर्ख पति का जो पत्नी सम्मान नहीं करती है, वह मरणोपरांत सर्पिणी बनकर बारंबार विधवा होती है।’

हिन्दू धर्मग्रंथ और महाकाव्य ब्यौरे के साथ छोटे-से-छोटे कर्तव्यों की चर्चा करते हैं। इसमें स्त्रियों को खुलकर हंसने की मनाही तक शामिल है। डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ और ‘प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति’ में विस्तार से इसकी चर्चा की है कि ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा में स्त्रियों के लिए क्या स्थान है। आंबेडकर अपनी किताब ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ में हिन्दू संस्कृति और धर्मग्रंथों को हिन्दू नारी की अधोगति का कारण मानते हैं। साथ ही बौद्ध धर्म की उस परम्परा की चर्चा करते हैं, जिसमें स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त था। हिन्दू जीवन को संचालित करने वाली स्मृतियों में स्त्रियों के लिए दिये गये आदेशों का विस्तार से उल्लेख करते हैं। मनुस्मृति का पुरुषों के लिए आदेश है कि :-

अस्वतंत्रताः स्त्रियः पुरुषौः स्वैर्दिवानिशं।

विषयेषु च सज्ज्न्त्यः संस्थाप्यात्मनों वशे।।

(अर्थात- पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप में वश में करके रखना चाहिए।)

ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा शूद्रों की तरह स्त्रियों को भी शिक्षा के लिए अपात्र मानती है। महिलाओं को भी संपत्ति रखने का अधिकार नहीं देती। इस विचारधारा में स्त्री पुरुष के सुखों का साधन है। उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। लड़की पिता के लिए उसकी निजी वस्तु के समान है। वह उसे जिसको चाहे, सौंप सकता है। मनु का महिलाओं के लिए आदेश है कि वे आजीवन उसकी आज्ञा का पालन करेंगी, जिसे उसके पिता या भाई ने सौंप दिया है। यदि किसी महिला के पति की मृत्यु भी हो जाए, तो वह उससे अपने को अलग नहीं समझे।

यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता वानुमते पितुः।

तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत्।। 1

ब्राह्मणवादी परंपरा  का मजबूत स्तम्भ ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति है, जिसमें पिता जिसे चाहे अपनी पुत्री को सौंप सकता है; जिसे कन्यादान कहा जाता है। शर्त सिर्फ़ इतनी है कि वह लड़का उसकी जाति का होना चाहिए। ब्राह्मणवादी ग्रंथ जाति से बाहर शादी की अनुमति नहीं देते हैं। हाँ, विशेष परिस्थिति में सवर्ण जातियों के पुरुष शूद्रों-अतिशूद्रों की लड़कियों से शादी कर सकते हैं। लेकिन, किसी भी परिस्थिति में सवर्ण जाति की लड़की शूद्र-अतिशूद्र से शादी नहीं कर सकती है।

इस शादी में ब्राह्मण पुरोहित का होना आवश्यक है, जो शादी कराता है। यह शादी जन्म-जन्म का बंधन होती है, जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते हैं यानी तलाक़ नहीं ले सकते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों के स्त्री संबंधी इन विचारों को देखें तो पाते हैं कि इसकी आदर्श प्रतीक सीता हैं। वह राम के हर उचित अनुचित निर्देश-आदेश और व्यवहार का अनुगमन करती हैं।

ब्राह्मणवादी-मनुवादी परंपरा के उलट फुले दंपति ने स्त्री-पुरूष को जीवन के सभी क्षेत्रों में समान माना और इसका उदाहरण अपने जीवन से प्रस्तुत किया। उन्होंने जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं को समानता दिलाने के लिए अनथक प्रयास किया। उन्होंने नई विवाह पद्धति का आविष्कार किया। 24 सितंबर, 1873 को जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले  ने ‘सत्यशोधक समाज’ का गठन किया। सत्यशोधक समाज ने सत्यशोधक विवाह पद्धति की शुरुआत की। इस विवाह पद्धति में यह माना जाता था कि स्त्री और पुरुष जीवन के सभी क्षेत्रों में समान हैं।

उनके अधिकार एवं कर्तव्य समान हैं। किसी भी मामले में और किसी भी तरह से स्त्री पुरुष से दोयम दर्जे की नहीं है और न ही स्त्री जीवन के किसी मामले में पुरुष के अधीन है। वह पुरुष के जितनी ही स्वतंत्र है। फुले ने लिखा कि ‘स्त्री और पुरुष दोनों सारे मानवीय अधिकारों का उपभोग करने के पात्र हैं। फिर पुरुष के लिए अलग नियम और स्त्री के लिए अलग नियम क्यों? इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा ‘स्त्री शिक्षा के द्वार पुरुषों ने इसलिए बन्द कर रखे थे, ताकि वे मानवीय अधिकारों को समझ न पाएँ।’ उन्होंने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि जैसी स्वतंत्रता पुरुष लेता है, वैसी ही स्वतंत्रता स्त्री ले तो?

सत्यशोधक विवाह पद्धति का ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति के विपरीत यह मानना है कि कन्या पिता की या किसी अन्य की संपत्ति नहीं है, जिसे वह जिसे चाहे दान करे; जिसे ब्राह्मणवादी कन्यादान कहते हैं। सत्यशोधक विवाह पद्धति के तहत बिना लड़की की अनुमति के शादी नहीं हो सकती है। जब लड़की-लड़का दोनों सहमत हों, तभी शादी होगी। उन्होंने उन सभी ब्राह्मणवादी मंत्रों को ख़ारिज कर दिया, जो विवाह के दौरान पढ़े जाते थे और स्त्री को पुरुषों से दोयम दर्जे का ठहराते थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी संस्कृत भाषा के मंत्रों की जगह मराठी में नये मंत्रों की रचना की, जिन्हें वर-वधू आसानी से समझ सकें और जिसमें दोनों के समान अधिकारों और कर्तव्यों की चर्चा की गयी थी। इस विवाह पद्धति में पूर्णतया ब्राह्मण पुरोहित रूपी बिचौलिये को हटा दिया गया था।

फुले दंपति ने अपने जीवन के आधार पर यह आदर्श स्थापित किया कि पति-पत्नी का सम्बन्ध कैसे होना चाहिए। दोनों ने हर स्तर पर बराबरी का जीवन जीया। उस रूढ़िवादी दमनकारी परम्परा में सही और स्वतंत्र सोच वाले इस दंपति-युगल ने इस अवधारणा को तोड़ दिया कि स्त्री का काम सिर्फ़ घर संभालना, पति व उसके घर वालों की सेवा करना और बच्चे पैदा करना मात्र है। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि पुरुष सिर्फ़ बाहरी कार्य करेगा।

इसका पालन स्वयं जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने भी जीवनभर किया और व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन के संघर्षों में दोनों कन्धे-से-कन्धा मिलाकर चले। दोनों ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की; एक साथ मिलकर स्कूल स्थापित किये। दोनों एक साथ घर से बाहर निकाले गये। दोनों ने मिलकर विधवाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला। सत्यशोधक समाज की स्थापना दोनों ने मिलकर की। सत्यशोधक विवाह पद्धति के निर्माण में दोनों की भूमिका रही। अकाल पीड़ितों की मदद करने दोनों एक साथ निकले। और बिना किसी पर किसी तरह का संदेह किये अलग-अलग जगहों पर मानवसेवा के महान कार्य में पूरी तन्मयता से लगे रहे।

यानी जीवन में हर क्षण हर क़दम पर बराबरी की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का पालन करते हुए दोनों एक-दूसरे का साथ देते रहे। शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए दोनों ने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। दोनों पूरी तरह आधुनिक चेतना और मानवीय संवेदना से परिपूर्ण महान व्यक्तित्व के धनी थे। स्वतंत्रता, समता और सबके लिए न्याय, ये सब दोनों के जीवन के आदर्श थे। दोनों के सपने एक थे। दोनों का रास्ता एक था और दोनों की मंज़िल भी एक ही थी।

फुले दंपति जान चुके थे कि ब्राह्मणवाद-मनुवाद और इस सोच को क़ानून मानने-मनवाने वाले लोग प्यार, इंसानियत, समानता, सच्चाई, मानव कल्याण और इस देश की भलाई के सबसे बड़े दुश्मन हैं। यही कारण था कि ब्राह्मणवादी-मनुवादी सोच के लोगों ने उन्हें बेघर कराने से लेकर उन पर अनेक अत्याचार भी किये। लेकिन, उन्होंने किसी से कभी भी कोई भेदभाव नहीं किया। फुले दंपति की इंसानियत का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि जिस ब्राह्मण और सवर्ण समाज के लोगों ने उन पर अत्याचार किये, उसी समाज की प्रताड़ित महिलाओं, यहां तक कि पुरुषों को उन्होंने अन्याय और अत्याचार से बचाने में कोई संकोच या भेदभाव नहीं किया।

(डॉ. सिद्धार्थ वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 10, 2020 1:36 pm

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