Mon. Jan 27th, 2020

सत्ता प्रायोजित मॉब लिंचिंग के बीच दो साल पहले ही मंदी ने दे दी थी दस्तक

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प्रतीकात्मक ग्राफ।

दुनिया के कई आर्थिक पंडित दो साल पहले ही वैश्विक आर्थिक मंदी के बारे में घोषणा कर चुके हैं कि आने वाले डेढ़ से दो साल के बीच यह दस्तक दे सकती है।

अक्टूबर 2017 में एम्सटरडम में हुई एक कॉन्फ्रेंस में मैराथन एसेट मैनेजमेंट के प्रमुख ब्रूस रिचर्ड्स ने कहा था, “क्या हम एक बार फिर मंदी के दौर में जाने वाले हैं? यह इस साल तो नहीं होगा, मगर साल 2019 में यह काफी हद तक संभव नजर आ रहा है।”

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यह घोषणा तब हुई थी, जब हमारा देश सत्ता प्रायोजित राष्ट्रवाद के नशे में मदांध हो मॉब लिंचिंग में व्यस्त था, सत्ता प्रगतिशील व जनवादी ताकतों को कुचलने में और विपक्ष की नकेल कसने में व्यस्त थी, वहीं गोदी मीडिया मोदी स्तुति गान के बीच पाकिस्तान पर रोज कब्जा कर रहा था। हमारा मीडिया कभी भी इस भावी खतरे की ओर जरा भी इशारा नहीं किया।

फरवरी 2019 के दूसरे सप्ताह में दुबई में वर्ल्ड गवर्नमेंट शिखर सम्मेलन में बोलते हुए नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने आर्थिक नीतियां बनाने वालों के बीच तैयारियों की कमी का हवाला देते हुए कहा था कि ”2019 के अंत या फिर अगले साल वैश्विक मंदी आने की ‘काफी आशंका’ है।”

उन्होंने जोर देते हुए कहा था कि ”सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि मंदी आ जाए तो उसका प्रभावी तरह से जवाब देने में हम सक्षम नहीं होते हैं। हमारे पास कोई सुरक्षा तंत्र नहीं है। केंद्रीय बैंक के पास अक्सर बाजार के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए साधनों की कमी होती है। जोखिम के लिए हमारी तैयारी बहुत ही कम है।”

मतलब कि पूरा विश्व भावी आर्थिक मंदी की चिंता में था और हमारी राष्ट्रवादी सरकार और इसके लोग किसी और चिंता में व्यग्र थे। देखते-देखते मंदी ने जोरदार दस्तक दी और जुलाई के शुरुआत में आए आर्थिक आंकड़ों से इकॉनमी की रफ्तार धीमी पड़ने की पुष्टि हुई। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) से जून में राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से कम हो गया, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का प्रदर्शन पिछले साल जुलाई-सितंबर तिमाही के बाद सबसे खराब रहा। वहीं, मई में कोर सेक्टर ग्रोथ धीमी पड़ गई।

महीने तक एक लाख करोड़ से ऊपर बने रहने के बाद जून में जीएसटी से राजस्व घटकर 99,939 करोड़ रुपये रह गया। इससे पिछले महीने जीएसटी कलेक्शन 1,00,289 करोड़ रुपये था।

8 इंडस्ट्री वाले कोर सेक्टर का बुरा हाल रहा। इसका ग्रोथ मई में 5.1 प्रतिशत रही जो अप्रैल में  6.3 प्रतिशत थी।

बिक्री में आई गिरावट से निपटने के लिए कंपनियां न सिर्फ उत्पादन धीमा कर रही हैं, बल्कि कर्मचारियों की भी धुआंधार छंटनी कर रही हैं।

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑटोमोबाइल, कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स तथा डीलर्स पहले ही 3,50,000 कर्मचारियों की छंटनी कर चुका है।

जुलाई में यात्री वाहनों की बिक्री में गिरावट बीते दो दशक में सबसे अधिक रही है। वाहनों की बिक्री में गिरावट को कारण बताते हुए ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनियों द्वारा अपने कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। इसके अलावा, कई कंपनियों को अपनी फैक्ट्रियों को कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा है।

बताते चलें कि शोर में तब्दील हो चुकी इस आर्थिक मन्दी की आहट तक की हवा गोदी मीडिया के कानों तक नहीं पहुंच पायी है। इनकी पत्रकारिता के नए-नए प्रयोगों में परमाणु बम से कैसे बचें, 370 व 35ए के खत्म होने के लाभ, भूखों मरता पाकिस्तान मोदी के सामने लाचार, जैसे कई चीखू डिबेट से देश के आम दर्शक को मंदी के भावी कुप्रभाव की कोई खबर नहीं है।    

दूसरी तरफ ऑटोमोबाइल सेक्टर की मदर कम्पनियों से लेकर वेण्डर कम्पनियों तक में उत्पादन ठप्प पड़ा है। मारुति से लेकर होण्डा तक में शटडाउन चल रहा है, छोटे वर्कशॉप भी बन्द हो रहे हैं। देश-भर में ऑटोमोबाइल कम्पनियों के 300 से ज़्यादा शोरूम बन्द हो चुके हैं। क़रीब 52 हज़ार करोड़ रुपये मूल्य की 35 लाख अनबिकी कारें और दोपहिया वाहन पड़े सड़ रहे हैं। इसके कारण न सिर्फ़ ठेका मज़दूरों को काम से निकालने का नया दौर शुरू हो रहा है बल्कि पक्के मज़दूरों को भी कम्पनियों से निकालने की तैयारी हो रही है। 

इस मंदी के अन्य कारणों के पीछे ग़ैर-बैंकीय वित्तीय कम्पनियों (नॉन बैंकिंग फ़ाइनेंस कम्पनी, एनबीएफ़सी) का संकट भी बताया जाता है। जो कि मुख्यत: गाड़ियां, मकान और छोटे उद्यम को ॠण देता था। कारपोरेट घरानों द्वारा बैंकों से लिये गये कर्ज़ों को नहीं चुका पाने के कारण यह संकट गम्भीर रूप में सामने आया है। क्योंकि ग़ैर-बैंकीय वित्तीय कम्पनी (एनबीएफ़सी) जो म्युचअल फ़ण्ड, बैंक, बीमा कम्पनियों से ऋण लेकर ऊंची दरों पर वाहन, रियल स्टेट व अन्य उद्यमों के लिए ऋण देती हैं। अत: इन कम्पनियों के संकट में फंसने से, हर क्षेत्र में (इनसे ऋण लेने वालों और इनको ऋण देने वालों, दोनों में) संकट फैल रहा है।

इस मन्दी से गाड़ियां, मकान और छोटे उद्यम प्रभावित हुए हैं। नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (एनबीएफ़सी) की सालाना रिपोर्ट बताती है कि कर्ज़ लेने वाली कंपनियों की संख्या कम हो गई है। 20 प्रतिशत की गिरावट है। वहीं बैंक फ्रॉड की राशि पिछले साल की तुलना में 73.8 प्रतिशत बढ़ी हुई है। जहां 2017-18 में 41,167 करोड़ रू0 का फ्रॉड हुआ था, वहीं 2018-19 में बढ़कर 71,542 करोड़ हो गया है।  फ्रॉड के 6801 मामले दर्ज हुए हैं। जिसमें 90 प्रतिशत राशि सरकारी बैंकों की है।

कर्नाटक के सूक्ष्म, लघु व मध्यम (एमएसएमई) उद्योगों के संघ के अध्यक्ष ने मंदी को एक हकीकत बताते हुए कहा है कि अगर जल्दी नहीं कुछ हुआ तो 30 लाख लोगों की नौकरी जा सकती है।

रिपोर्ट बताती हैं कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की हालत भी ख़राब है। पांच साल में इसका कर्ज़ा 7 गुना बढ़ गया है। लाइव मिंट और मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने हाईवे के निर्माण पर रोक लगाने के लिए कहा है। मिंट की रिपोर्ट कहती है कि 17 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय ने एनएचएआई को लिखा है कि अनियोजित और अति विस्तार के कारण एनएचएआई पूरी तरह से फंस चुका है। हालत इतनी खराब है कि एनएचएआई  को सड़क संपत्ति प्रबंधन कंपनी में बदलने का सुझाव दिया गया है। जबकि पिछले पांच साल तक मोदी सरकार यही कहती रही कि तेज़ी से हाईवे का निर्माण हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार आधे अधूरे बने प्रोजेक्ट का उद्घाटन करते हुए विकास का ढोल पीट रहे थे। अब प्रधानमंत्री कार्यालय जो कह रहा है उससे साफ है कि एनएचआई ने अनियोजित एवं गैरजरूरी सड़क निर्माण किया है। जिसकी कोई जरूरत नहीं थी।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में बीते वर्ष की इसी अवधि की तुलना में कमज़ोर रहा है। जो आंकड़े जारी किये गए हैं उसके अनुसार बीते वित्तीय वर्ष की इसी तिमाही के दौरान जो विकास दर 8 प्रतिशत थी, वह अब 5 फ़ीसदी रह गई है, जबकि वह पिछले वित्तीय साल की आख़िरी तिमाही में 5.8 प्रतिशत थी।

अर्थशास्त्री विवेक कौल के अनुसार यह पिछली 25 तिमाहियों में सबसे धीमा तिमाही विकास रहा है।  यह मोदी सरकार के दौर की सबसे कम वृद्धि है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी हो रही है। ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है।

उनका मानना है कि उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास की दर कई साल में सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई है। देश मंदी की तरफ़ बढ़ रहा है।

एक तरफ जहां गोदी मीडिया को मंदी के पदचांप सुनने की फुरसत नहीं है, वहीं आम लोगों के बीच मंदी की आशंका कितनी गहरी है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बीते पांच सालों में गूगल के ट्रेंड में ‘Slowdown’ सर्च करने वाले लोगों की संख्या एक-दो फीसदी थी, जो अब 100 जा पहुंची है। यानी आम लोगों के जहन में मंदी का डर घर कर रहा और लोग अपनी जरूरतों को सीमित करने में प्रयासरत हैं। इस तरह से मंदी का प्रभाव बाजार पर पड़ने लगा है।

मंदी के दुष्प्रभाव में दूसरी जो सबसे अहम बात है वह यह है कि जब किसी एक कर्मचारी की छटनी होती है तो उससे करीब 10 परिवार प्रभावित होते हैं और बाजार पर इसका काफी बुरा असर होता है। ऐसी स्थिति से उबरने के लिए सरकार को काफी संजीदगी से काम करना होगा। इसके लिए मंदी के कारणों को जानना होगा, संबंधित आलोचनाओं पर सकारात्मक रूप से पहल करना होगा, न कि आलोचनाओं पर प्रतिक्रियावादी चरित्र अपनाना होगा।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार ने लिखा है। आप आजकल बोकारो में रहते हैं।)

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