बीच बहस

समाजवादी पार्टी की दावेदारी, अभी रोड़े हैं इस राह में

केन्द्रीय सत्ता की चाबी और राजनीति का ताला जैसा उत्तर प्रदेश, चुनावी दंगल के करीब है। बिसात बिछाने और गठबन्धन बनाने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। ट्विटर से उलझन के बावजूद, ट्वीट के माध्यम से घात-प्रतिघात जारी है। सत्ता दल के अंदर मचे घमासान की हल्की-फुल्की धमक सुनाई दे रही है। मुख्य प्रतिपक्षी, समाजवादी पार्टी, मन ही मन गदगद है। उसका मानना है कि भाजपा की जनविरोधी सत्ता से उपजा जनाक्रोश, अंदर खाने गहरा है। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतजार है और शायद इसी गुरूर में वह व्यापक विपक्षी एका की संभावना के लिए प्रयास करती नहीं दिखती। ‘छोटे दल आएंगे नहीं तो जायेंगे कहां….और मुसलमान….उनके पास विकल्प क्या है?’, सलाहकारों की ठस राय, राजनैतिक गलियारों में सुनाई दे रही है।

बहन जी तो कह ही चुकी हैं, ‘वक्त जरूरत, जायेंगी भाजपा के साथ।’ इस आशंका से बहुजन हितों के प्रति प्रतिबद्ध लोगों का एक धड़ा उनसे छिटक रहा है और समाजवादी उन्हें अपने करीब पा रहे हैं। इन्हीं उत्साही बातों से समाजवादी पार्टी आश्वस्त है। यह आश्वस्ति उसे पटखनी भी दे सकती है क्योंकि 13 प्रतिशत जाटव बिरादरी अभी भी मायावती के साथ है। अगर सपा ने अतिपिछड़ों की फिर उपेक्षा की तो बात बिगड़ेगी। दूसरों के घरों में ताक-झांक कर, हौसला बुलन्द रखना और बात है, अपनी नीतियों में धार देना जरूरी बात है। जनसंवाद को बढ़ाना वक्त की जरूरत है वरना शह और मात में देर कहां लगती? 

बंगाल चुनाव के बाद मोदी जी की अपराजेयता का छद्म टूट चुका है। उनके पार्टी में अंदर और बाहर, खदबदाहट शुरू हो चुकी है। कांग्रेस की दिशाहीनता और सक्रिय कार्यकर्ताओं के अभाव से, विपक्षी भूमिका में समाजवादी पार्टी ही है मगर सपा प्रमुख अखिलेश यादव की अधिकारीनुमा छवि और ट्विटर पर सक्रियता, पिता मुलायम सिंह के जनसंपर्कों की संस्कृति से उन्हें अलग करती है। वह जमीनी संघर्षों से दूर का नाता रखते हैं जबकि उनके पास जुझारू और आक्रामक कार्यकर्ताओं की एक मजबूत जमात है। यह मजबूती कहीं-कहीं अराजक भी है और अनियंत्रित भी। अखिलेश यादव द्वारा तमाम ज्वलंत मुद्दों पर चुप्पी, कुछ जागरुक कार्यकर्ताओं को हताश किए हुए है।

अखिलेश यादव ने स्वयं को प्रगतिशील वैचारिकी, बहुजन विमर्शों और जनसंपर्कों से काट रखा है। मुलायम सिंह की एक खासियत यह थी कि वह, खांटी समाजवादी न होते हुए भी बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और विमर्शकारों से संपर्क साधे रखते थे। उन्हें तरजीह देते थे। लगातार दौरों और कार्यक्रमों में सुनने-सुनाने की प्रक्रिया में बहुत कुछ समझ लेते थे। दोस्तों के दोस्त बन, जमीनी यथार्थ पर पकड़ कायम रखते थे। अखिलेश यादव ने इस रास्ते को लगभग बंद कर दिया है। वह अपने कार्यकर्ताओं तक से संवाद कायम नहीं रखते। वह समाजवादी गोलबंदी में दलित, अतिपिछड़ों और मुसलमानों की अहम भूमिका को प्रमुखता से तरजीह नहीं देते। कुम्भ नहाने से लेकर परशुराम की मूर्तियों को जिलों में स्थापित करने में रुचि ज्यादा रखते हैं। उन्हें लगता है, भाजपा की नाकामियां, कोरोना की अव्यवस्था, लाशों की गंधाती जमीन, उनका रास्ता आसान कर देगी। 

बात तो सही है कि ऑक्सीजन बिन, तड़प कर मरे लोगों के परिजनों का मतिभ्रम एवं भक्तिभाव कुछ हद तक कम हुआ है मगर सहायता या अनुदान का चुनाव पूर्व खातों में पहुंचना, अशिक्षित और फटेहाल जनता को बदल देने में कारगर है।

मुलायम सिंह ने 1991 के आस पास अपने विचारों का खुलासा करते हुए कहा था- ‘डॉ. लोहिया और चरण सिंह, दो ही ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने मेरे विचार, जीवन और कर्म को सर्वाधिक प्रभावित किया।’ उन विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने समाजवादी पार्टी की नींव रखी मगर वह कितनी समाजवादी थी, इसके बारे में वह स्वयं लिखते हैं- ‘मुझे यह स्वीकार करने में भी संकोच नहीं है कि मेरी मौजूदा सरकार शुद्ध रूप से समाजवादियों की सरकार नहीं है।’(स्रोत-समाजवादी दर्शन और डा. लोहिया,’ लेखक-लक्ष्मीकान्त वर्मा)। वह दलितों, पिछड़ों और हर प्रकार के अल्पसंख्यकों की आकांक्षाओं को मूर्तरूप देने के पक्ष में थे मगर जल्द ही उनका समाजवाद, सामंती मनोवृत्ति में तब्दील हो गया। चौधरियों की जमात का बोलबाला बढ़ा। समाजवादी पार्टी में भाई, भतीजे, बेटा और बहुओं का पदार्पण हुआ।

एक विशाल पारिवारिक समाजवादी कुनबा तैयार हो गया, जिसने वर्षों से जूझते वरिष्ठ समाजवादियों को या तो किनारे लगा दिया या केवल सहयोगी की भूमिका में छोड़ा। कुछ महत्वाकांक्षी ठाकुर नेताओं ने बची-खुचे समाजवादी छद्म को हड़प लिया। ऐसे समय में अखिलेश यादव का आगमन हुआ, जो मात्र 38 साल में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। पुत्रमोह का वह दौर, पार्टी की बची-खुची लोकतांत्रिक छवि को निगल लिया। सरकार बनी और हाईवे पर दौड़ते ट्रकों पर यादव ट्रांसपोर्ट, यदुवंशी कैरियर, यादव रोड लाइन्स और यादव मोटर्स जैसे नाम प्रमुखता से दिखाई देने लगे। निजी वाहनों पर यदुवंशी नामों और पार्टी के झंडों की उपस्थिति, गैरकानूनी हूटरों के साथ, ठीक वैसी ही छवि प्रस्तुत कर रही थी, जैसे आज, कार के शीशों पर एंग्री हनुमान का चित्र या ब्राह्मण, राजपूत, गुज्जर आदि नामों से अपनी हनक दिखा रहे हैं। ऊपर से नीचे तक, उस अराजक माहौल में अतिपिछड़ों और दलितों की पुकार दबी रह गयी। इस वर्ग के अधिकारियों की घोर उपेक्षा हुई और यादव अधिकारियों के गुट की सत्ता पर पकड़, सवर्णों की तरह आक्रामक दिखाई देने लगी।

यह उत्तर प्रदेश और बिहार का दुर्भाग्य रहा, जहां पन्द्रह-सोलह वर्षों तक बहुजनों की सत्ता कायम रहने के बावजूद, अपनी काबिलियत से ऐसा कोई आदर्श नहीं स्थापित किया जा सका कि कहा जाए-‘देखो, वंचित समाज ने सत्ता पाकर अमुक बेहतर कार्य किए, जो अब तक नहीं हुए थे।’ ओबीसी और दलित वर्ग के मुख्यमंत्रियों ने अपनी जनपक्षधरता का लोहा मनवाना तो दूर, भ्रष्टाचार के दलदल से स्वयं को मुक्त न रखा। बहुजनों की मुक्ति के लिए सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य को सुदृढ़ और जनसुलभ कर मुक्तिकामी प्रयास किया जा सकता था, जिससे वंचित समाज आगे बढ़ता। वंचितों की सुरक्षा के लिए नीतिगत बन्दोबस्त किये जाते, जिनमें हर थाने पर कम से कम पचास प्रतिशत वंचित वर्ग के सिपाहियों की हिस्सेदारी होती। इससे वंचित समाज में सुरक्षा का भरोसा पैदा होता।

इन सरकारों को ब्रिटिश सत्ता से सीखना चाहिए था, जिसने वंचित समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए जहां एक ओर महार रेजिमेंट की शुरुआत की तो दूसरी ओर गांव के चैकीदारों के पदों पर 90 प्रतिशत वंचित समाज को तैनात किया।

समाजवादी पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता में बैठी भाजपा, दलितों और अतिपिछड़ों के वोट बैंक से ही सफलता पायी है। वह दलित-अतिपिछड़ों की हकमारी के बावजूद इनके नेताओं को साधे हुए है, तो वही काम समाजवादी पार्टी क्यों नहीं कर सकती? वह तो अतिपिछड़ों के करीब है? 

समाजवादी कार्यकर्ताओं की जो फौज है, वह समाजवादी पार्टी को यादव पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है। यह आरोप अकारण नहीं है। 1995 में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारणी में कुल 59 सदस्यों में से उच्च जातियों के 30.6 प्रतिशत, ओबीसी के कुल 42.4 प्रतिशत सदस्यों में से यादव जाति के 22 प्रतिशत और कुर्मी जाति के 1.7 प्रतिशत सदस्य थे। प्रदेश की कोइरी, मौर्य, शाक्य, सैनी जातियों में से कोई नहीं था जबकि गुज्जर, गड़ेरिया, बंजारा जाति को कुछ स्थान मिला था। (स्रोत-इण्डियाज साइलेंट रिवोल्यूशन, क्रिस्टॉफ जफरेल्ट, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयार्क, पृष्ठ 373)।

आजकल जिला पंचायत अध्यक्षों का चुनाव चल रहा है। इसमें लगभग पचास प्रतिशत उम्मीदवार केवल यादव समुदाय से हैं। जाहिर है इस कारण भी मौर्य, शाक्य, सैनी और कोइरी, जो संयुक्तरूप से 9 प्रतिशत के लगभग हैं और एक जाति के रूप में  स्थापित हो चुके हैं, सपा से दूरी बनाने की नीति पर चलते रहे हैं। ऊपर से परिवारवाद का आरोप भी अकारण नहीं है। शायद इन्हीं कमियों को केन्द्रीय प्रचार में शामिल करते हुए भाजपा ने दलितों और अतिपिछड़ों को अपने पाले में करने में सफलता पायी। यह अवसर उसे सपा ने ही उपलब्ध कराया।

प्रदेश में यादवों की संख्या मात्र 9 प्रतिशत है। गैर यादव पिछड़ा समुदाय (कुर्मी, लोध, गड़ेरिया, कहार, केवट, निषाद आदि) लगभग 12 प्रतिशत और अतिपिछड़ा समुदाय (लगभग 70 जातियां, जिनमें कोइरी, मौर्य, शाक्य, सैनी, राजभर आदि मुख्य हैं) 20 प्रतिशत हैं। दलितों में जाटव 13 प्रतिशत, अन्य दलित 8 प्रतिशत और मुसलमान 19 प्रतिशत के लगभग हैं।

यह जो गैरयादव पिछड़ा या अतिपिछड़ा वर्ग है, इसी को भुनाने के लिए भाजपा ने ओबीसी आरक्षण को तीन श्रेणियों में बांटने और उसे सदा-सदा के लिए विभाजित करने का दांव खेला है। इतिहास गवाह है कि वर्णवादी संस्कृति के पैरोकार कभी भी दलित और पिछड़ों के हितैषी नहीं हो सकते, सिवाय लॉलीपॉप थमाने के।

इसलिए मेरा मानना है कि आज अखिलेश यादव द्वारा, गैर यादव पिछड़े वर्ग को यह अहसास दिलाना होगा कि समाजवादी पार्टी में सभी के हित सुरक्षित होंगे। दलित और अतिपिछड़ों के वोटों का बिखराव रोकने के लिए यादव कार्यकर्ताओं के अराजक व्यवहार को नियंत्रित करना होगा। जैसा कि अभी 5 जून को औरैया के जिला बदर, धर्मेंन्द्र यादव ने जेल से निकलकर गैर कानूनी तरीके से वाहनों पर हूटर लगाकर जलूस निकाला। आखिर इसकी जरूरत क्या थी?

सपा को यह याद रखना होगा कि मनुवाद का बड़ा खतरा झेलते अशिक्षित पिछड़े या दलित, यादवों को सबक सिखाने के भ्रम में बड़ा जाखिम उठा लेते हैं। पड़ोसी में ईर्ष्याभाव इतना ज्यादा होता है कि वह पड़ोसी के अहित के लिए, अपने स्थाई दुश्मन को गले लगा लेता है। यह अकारण भी नहीं है। नदियों के किनारे बसने वाले केवट, मल्लाह या निषाद जातियों की प्रताड़ना, या दलितों के प्रति हिंसा, उच्च जातियों से ज्यादा यादवों के हाथों हुआ है।

समाजवादी चौधरियों के सामंती मनोवृत्तियों से मेल के कारण ही राजपूतों का झुकाव, सपा की ओर हुआ। अमर सिंह के पदापर्ण के साथ सैफई यादव परिवार में तीन राजपूत बहुएं आयीं। माफियाओं ने वहां जगह बनायी और आजीवन कारावास की सजा को मेडिकल कॉलेजों में मेहमान की तरह गुजारा। जैसे ही प्रदेश में भाजपा सरकार बनी, राजपूत वोट बैंक पूरी तरह से सपा से छिटक कर भाजपा में चला गया। राजपूत नेता-नीरज शेखर, मयंकेश्वर शरण सिंह, राजकिशोर सिंह, बृजभूषण सिंह, राजा अरिदमन सिंह, कीर्तिवर्धन सिंह, आनंद सिंह, अक्षय प्रताप सिंह और यशवंत सिंह, चाचा-भतीजे विवाद के दौर में अलग हो गए। शायद इस कमी को दूर करने के लिए अखिलेश यादव ने ब्राह्मण वोटों को आकर्षित करने का ख्वाब बुना। आध्यात्मिक गोटियां बिछाईं।

सरकार बनने पर हर जिले में परशुराम की मूर्ति लगाने की बात की। इस बेतुकी घोषणा और यादव परिवार की आध्यात्मवादी रुझानों से कोई लाभ मिलने से रहा। यह वैचारिक घालमेल ही यादव परिवार को वंचित समाज की मुक्तिकामी चेतना से वंचित रखा है। वैसे राजनीति का यह दर्शन, लोहिया में भी मिलता है जहां वह कहते हैं-‘आध्यात्मिकता और भौतिकता, दोनों की सही समझदारी विकसित होगी, तब इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की क्षमता प्राप्त हो सकेगी।’  समझदारी के इसी घालमेल के कारण सपा आध्यात्मिक गिरफ्त में है और बहुजन वैचारिकी में कमजोर है।

वर्तमान समय में तमाम नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद, अखिलेश यादव के पक्ष में बहुत कुछ सकारात्मक भी है। पहला तो यही कि उनके चाचा से संबंध सुधर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल एक बेहतर विकल्प दे सकती है और चन्द्रशेखर की पार्टी, आजाद समाज पार्टी के साथ आ जाते हैं तो निश्चय ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम-दलित वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा को नुकसान पहुंचायेगा। किसान आंदोलन ने मुजफ्फरनगर दंगों की साम्प्रदायिक जमीन को पाट दिया है। मुस्लिम समाज के प्रति अखिलेश का ठंडापन, तभी खिसकेगा जब ओबैसी का पदापर्ण होगा या उनकी जाति बिरादरी का कोई और उम्मीदवार सामने होगा। बड़ा खतरा, औबैसी की पार्टी, ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन ही है। 

राह में रोड़े तो हैं, मगर गेंद समाजवादी पार्टी के पाले में है। सत्ता की सीढ़ी अतिपिछड़ों, दलितों और मुसलमानों की जमीन पर खड़ी होनी है। उस जमीन पर मजबूती से पांव रखने की जरूरत है। अतिपिछड़ों और दलितों के कुछ कद्दावर नेताओं को अपने पाले में लाने, उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने की जरूरत है। तभी सत्ता की दावेदारी कामयाब होगी, अन्यथा अभी रोड़े हैं इस राह में।  

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा साहित्यकार एवं इतिहासकार हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।) 

This post was last modified on June 12, 2021 2:12 pm

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