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Categories: बीच बहस

नॉर्थ ईस्ट डायरी: नगा शांति वार्ता के रास्ते में अलग ध्वज और संविधान बना हुआ है गतिरोध

एक तरफ भारत सरकार जल्द से जल्द नगा शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए दबाव बना रही है, दूसरी तरफ नगा विद्रोही संगठन अलग ध्वज और अलग संविधान के प्रावधान के बिना किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। डिमापुर में हेब्रोन शिविर में आयोजित एनएससीएन-आईएम की एक संयुक्त परिषद की बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि एनएससीएन-आईएम की एक अलग ध्वज और संविधान की स्थायी मांग को केंद्र के साथ चल रही नगा शांति वार्ता के अंतिम समझौते का हिस्सा बनाने की जरूरत है।

एक बयान में एनएससीएन-आईएम ने कहा, “संयुक्त परिषद ने सर्वसम्मति से एनएससीएन-आईएम के रुख को दोहराने का संकल्प लिया कि नगा राष्ट्रीय ध्वज और येहज़बो (संविधान) को भारत-नगा राजनीतिक समाधान का एक हिस्सा बनाना चाहिए ताकि नगा समझौते को सम्मानजनक और स्वीकार्य योग्य बनाया जा सके। इसके अलावा बैठक में यह भी संकल्प लिया गया कि भारत सरकार और एनएससीएन को 2015 के तीसरे ऐतिहासिक फ्रेम वर्क समझौते के आधार पर एक अंतिम समझौता करना चाहिए।”

पिछले साल वार्ता में एक गतिरोध आ गया था जब आईएम एक अलग ध्वज और संविधान की मांग पर अड़ गया था। नगालैंड के गवर्नर और केंद्र के वार्ताकार आरएन रवि द्वारा आयोजित वार्ता 31 अक्टूबर को उस समय समाप्त हो गई थी जब वार्ताकार और विद्रोही समूह के बीच संबंध बिगड़ गए थे। इस साल जून में कड़वाहट और बढ़ी जब रवि ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर बताया था कि राज्य में समानांतर सरकारें भूमिगत समूहों द्वारा चलाए जा रही हैं और लोगों से जबरन वसूली हो रही है।

अनौपचारिक बातचीत पिछले महीने फिर से शुरू हुई, जिसमें आईएम के वरिष्ठ नेता आईबी के वरिष्ठ अधिकारियों से बात करने के लिए दिल्ली पहुंचे। एनएससीएन-आईएम ने दावा किया कि वार्ता सुचारू रूप से चल रही है। नगालैंड में मसले के शीघ्र समाधान की मांग नागरिक समाज संगठनों और जनजातीय प्रमुख कर रहे हैं। इन सभी निकायों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नगा मसले पर एक अलग झंडे और संविधान के बिना एक अंतिम समझौता जनता को स्वीकार्य नहीं है। एनएनपीजी के बैनर तले केंद्र से बात कर रहे नगालैंड के सात विद्रोही समूह भी यह बात मान रहे हैं।

भारत सरकार, एनएनपीजी और अपने स्वयं के नागरिक समाज के बढ़ते दबाव के बीच आईएम ने अपना पुराना रुख दोहराया है और कहा है कि “सम्मानजनक समाधान” तब तक स्वीकार्य नहीं है जब तक कि उसकी मांगें पूरी नहीं होती हैं।

नगा शांति वार्ता के जरिये औपनिवेशिक शासन के समय से चले आ रहे विवादों को निपटाने की कोशिश हो रही है। नगा एकल जनजाति नहीं है, बल्कि एक जातीय समुदाय है, जिसमें कई जनजातियाँ शामिल हैं, जो नगालैंड और उसके पड़ोस में रहते हैं। नगा समूहों की एक प्रमुख मांग ग्रेटर नगालिम की रही है जो न केवल नगालैंड राज्य बल्कि पड़ोसी राज्यों के हिस्सों और यहां तक कि म्यांमार के राज्यों को भी कवर कर सके।

1826 में अंग्रेजों ने असम पर अधिकार कर लिया था, जिसमें बाद में उन्होंने नगा हिल्स जिला बनाया और अपनी सीमाओं का विस्तार किया। ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ नगा राष्ट्रवाद का जोर आजादी के बाद भी जारी रहा और नगालैंड राज्य बनने के बाद भी। इस तरह अनसुलझे मुद्दों ने दशकों के विद्रोह को जन्म दिया, जिसने नागरिकों सहित हजारों लोगों की जान ले ली।

नगा प्रतिरोध का सबसे पुराना संकेत नगा क्लब के गठन के साथ 1918 का है। 1929 में क्लब ने साईमन कमीशन को “प्राचीन काल की तरह स्व शासन निर्धारित करने के लिए खुद को अकेला छोड़ने के लिए” कहा था।

1946 में ए जेड फिज़ो ने नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) का गठन किया, जिसने 14 अगस्त, 1947 को नगा स्वतंत्रता की घोषणा की और फिर 1951 में एक जनमत संग्रह कराने का दावा किया, जिसमें भारी बहुमत ने एक स्वतंत्र राज्य का समर्थन किया।

1950 के दशक के प्रारंभ में एनएनसी ने हथियार उठा लिए और भूमिगत हो गया। एनएनसी 1975 में विभाजित हो गई। अलग हुआ समूह एनएससीएन कहलाया, जो बाद के वर्षों में फिर विभाजित हो गया। 1988 में विभाजित हो गया। 1988 में एनएससीएन(आई-एम) और एनएससीएन (खापलांग) अस्तित्व में आए।

2015 से चल रहे वार्ता समझौते से पहले नगा समूहों और केंद्र के बीच दो अन्य समझौते हुए। 1975 में शिलांग में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए जिसमें एनएनसी नेतृत्व ने हथियार छोड़ने पर सहमति व्यक्त की। इसाक चिशी स्वू, थुइंगलेंग मुइवा और एस एस खापलांग सहित कई एनएनसी नेताओं ने समझौते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और एनएससीएन बनाने के लिए अलग हो गए। 1988 में एक और विभाजन हुआ, जिसमें खापलांग ने एनएससीएन (के) का गठन किया, जबकि इसाक और मुइवा ने एनएससीएन (आई-एम) का नेतृत्व किया।

एनएससीएन (आई-एम) चीफ मुइवा, दिल्ली में। फाइल फोटो।

1997 में एनएससीएन (आईएम) ने 1997 में सरकार के साथ एक युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए। प्रमुख समझौता यह था कि एनएससीएन (आईएम) के खिलाफ कोई उग्रवाद विरोधी आक्रमण नहीं होगा, जो बदले में भारतीय सेना पर हमला नहीं करेगा।

अगस्त 2015 में केंद्र ने एनएससीएन (आईएम) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत में “सबसे पुराने उग्रवाद” को निपटाने के लिए एक “ऐतिहासिक समझौता” के रूप में वर्णित किया। इसने चल रही शांति वार्ता के लिए मंच तैयार किया। 2017 में नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स के बैनर के तहत छह अन्य नगा सशस्त्र संगठन बातचीत में शामिल हुए।

सरकार ने अभी तक फ्रेमवर्क समझौते का सार्वजनिक रूप से विवरण नहीं दिया है। समझौते के बाद सरकार ने एक प्रेस बयान में कहा था: “भारत सरकार ने नगाओं के अद्वितीय इतिहास, संस्कृति और स्थिति और उनकी भावनाओं और आकांक्षाओं को मान्यता दी है। एनएससीएन (आईएम) ने भारतीय राजनीतिक प्रणाली और शासन को समझा और उसकी सराहना की है।”

(दिनकर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और सेंटिनल के संपादक रह चुके हैं।)

This post was last modified on September 27, 2020 1:26 pm

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