लुटती रही महिलाओं की आबरू, बीजेपी नेताओं को बचाने में लगी रही मोदी सरकार

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नई दिल्ली। दिल्ली के निर्भया कांड से समूचे देश में महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर जैसी एकजुटता तैयार हुई थी, उसको आधार बनाते हुए भाजपा ने नारा दिया था, “बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार।” 10 मार्च, 2014 को यूट्यूब पर जारी वीडियो में एक मां शहर में अपने ऑफिस जाती अपनी बेटी की फ़िक्र में दिन-रात घुलते हुए तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के बारे में सवाल खड़े करती है कि, “आखिर कर क्या रही है ये सरकार?” 

नतीजा साफ़ था। पहली ही बार पीएम पद की दावेदारी करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामादोर दास मोदी के खाते में पूर्ण बहुमत की सरकार आ जाती है। पिछले दो दशक से भी अधिक अर्से से कई सरकारें आईं और गईं, पर किसी को पूर्ण बहुमत हासिल न हो सका था। नरेंद्र मोदी सरकार के पास अगले पांच वर्षों में महिलाओं के सशक्तीकरण करने से लेकर उनके पक्ष में आवश्यक कानून बनाने का जनादेश हासिल था। 

पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह सरकार के समय ही देश में निर्भया कानून और पीड़ित महिलाओं को सहयोग देने के लिए अलग से कोष का निर्माण किया जा चुका था। देश में पहली बार महिला सुरक्षा, न्याय को लेकर राष्ट्रीय सहमति का निर्माण हो चुका था। लेकिन अगले 10 वर्ष महिला आबादी के लिए कितने खौफनाक गुजरे, और पिछले 67 वर्षों में पुरुष-महिला समानता, मर्दवादी सोच के खिलाफ समाज ने जो कुछ हासिल किया था, उससे हम कितना पीछे जा चुके हैं, इसका ठीक-ठीक अंदाजा लगाना कठिन है।

देश तब स्तब्ध रह गया जब उसने देखा कि नारी सम्मान और सुरक्षा की बात करने वाली भाजपा के लिए महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का कोई अर्थ ही नहीं, क्योंकि इसके खुद के नेता, विधायक और सांसदों के खिलाफ मामले दर्ज होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही थी। जिन-जिन रेप पीड़िताओं और परिवारों ने इसकी शिकायत पुलिस-प्रशासन से की, उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। उनके ऊपर तमाम तरह के दबाव, झूठी गिरफ्तारी और उनको समाज में बदनाम करने की साजिशें रची गयीं। 

इन सबका परिणाम यह हुआ कि समाज में बलात्कार, यौन उत्पीड़न और महिलाओं की हत्या की घटनाएं कम होने के बजाय तेजी से बढ़ती चली गयीं। समाज में मौजूद महिला विरोधी ताकतों के हौसले बुलंद होते चले गये, विशेषकर भाजपा या आरएसएस के आनुषांगिक संगठनों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए अब कानून-व्यवस्था एक मजाक का विषय बनकर रह गया था। 

आज जब “बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार” नारे के 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं, तो एक नजर देखने की कोशिश हो कि निर्भया कांड के बाद देश ने जिस दल को बड़ी उम्मीदों के साथ एक नहीं दो-दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका दिया, उस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कैसे उस विश्वास को तार-तार करने का काम किया। 

हद तो यह है कि भाजपा ने पिछले 10 वर्षों के दौरान अपने किसी भी रेप के आरोपी विधायक या सासंद को पार्टी या संसद की सदस्यता से बर्खास्त नहीं किया है। सिर्फ उन्हीं सदस्यों की पार्टी सदस्यता खारिज की गई, जिन्हें कोर्ट ने अपराधी करार दिया। उससे पहले कई मौकों पर देखने को मिला है कि राज्य पुलिस या पार्टी ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर रेप पीड़िता और उसके सगे-संबंधियों को बदनाम करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 

2017 का उन्नाव रेप केस:

इस मामले में 4 जून 2017 को एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ उन्नाव के बाहुबली विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने बलात्कार किया था। पीड़िता का परिवार और सेंगर परिवार संबंधी थे। लड़की को नौकरी का झांसा दिलाकर विधायक के पास ले जाया गया था। इस केस में सत्ता और बाहुबल का जैसा जघन्य रूप देश को देखने को मिला, उसकी दूसरी मिसाल शायद ही कोई हो। 22 जून को पुलिस ने पीड़िता का बयान तो दर्ज कर लिया, लेकिन आरोपी को नामित नहीं किया। मामला सुर्ख़ियों में आ चुका था, और आम लोगों के साथ-साथ विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरा, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। रसूखदार विधायक की क्षेत्र में तूती बोलती थी। उल्टा 5 अप्रैल, 2018 को पीड़िता के पिता को उस समय न्यायिक हिरासत में ले लिया गया, जब सेंगर के गुर्गे और भाई अतुल सेंगर ने उन पर जानलेवा हमला किया। यह सारी कोशिश इसलिए की गई थी ताकि परिवार केस वापस ले ले। इस घटना ने निर्णायक मोड़ तब लिया जब लड़की ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास में आत्मदाह करने का प्रयास किया।

पीड़िता का आरोप था कि पुलिस-प्रशासन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। इसके अगले ही दिन घायल पिता की अस्पताल में मौत हो जाती है। इसके बाद जाकर यूपी पुलिस हरकत में आती है और अतुल सेंगर को हिरासत में लिया जाता है, और छह पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जाता है। आखिरकार 13 अप्रैल, 2018 को सीबीआई मामले की पूछताछ के लिए कुलदीप सेंगर को समन करती है, और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर हिरासत का रास्ता खुलता है।

कुलदीप सेंगर की गिरफ्तारी अपने आप में एक भागीरथ यत्न था, क्योंकि सारा मामला ही सत्ता की ताकत से जुड़ा था। मानो कुलदीप सेंगर नहीं बल्कि भाजपा सरकार को सजा दी जा रही हो। यह वह दौर है, जिसमें भाजपा के खिलाफ कोई बयान देना और समाचारपत्रों में उसका प्रकाशन ही अक्षम्य अपराध की श्रेणी में मान लेने की परंपरा बन चुकी है।

इसीलिए जेल की सींखचों में कैद कुलदीप सेंगर का कहर अभी इस पीड़ित परिवार को झेलना बाकी था। बलात्कार पीड़िता के चाचा ने भी इस मामले में परिवार का बखूबी साथ दिया था, या कहें इस मामले को स्थानीय स्तर से सुर्ख़ियों में लाने के लिए दिन-रात भागदौड़ की थी। लिहाजा उन्हें ही 18 साल पुराने एक गोलीकांड मामले में फंसाकर 21 नवंबर 2018 को जेल की सींखचों के पीछे भिजवा दिया गया। इसी केस के सिलसिले में 28 जुलाई 2019 को जीप से सफर कर रही रेप पीड़िता और उसके रिश्तेदार की गाड़ी को एक ट्रक टक्कर मार जाता है, जिसमें पीड़िता तो बाल-बाल बच गई, लेकिन उसे भी गंभीर चोटें आईं पर दुर्भाग्य से दोनों रिश्तेदार इस दुर्घटना में मारे गये।

बाद में पता चला कि पीड़िता ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में मदद की गुहार लगाई थी, जिससे सेंगर पक्ष बेहद नाराज था। यह घटना बताती है कि उत्तर प्रदेश में महिला सम्मान की क्या दशा है? अपने लिए न्याय हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश में किसी महिला को न सिर्फ अपनी जान से हाथ धोने के लिए तैयार रहना होगा, बल्कि उसके प्रियजनों की मौत से भी इंकार नहीं किया जा सकता

2020 हाथरस रेप और मर्डर मामला:

इस मामले में हालांकि किसी राजनेता की संलिप्तता नहीं है, लेकिन मामले को दबाने के लिए जिस प्रकार से स्थानीय पुलिस प्रशासन और सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारियों की भूमिका रही है, उससे पता चलता है कि यूपी सरकार ने इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया था। यह एक 19 वर्षीय दलित लड़की की कहानी है, जिसके साथ 14 सितंबर 2020 को चार ऊंची जाति के पुरुषों ने गैंग रेप ही नहीं किया, बल्कि गला घोंटकर मारने की जी-तोड़ कोशिश भी की थी। लड़की खेत में काम के लिए गई हुई थी, जब संदीप, रामू, लव कुश और रवि (सभी ठाकुर जाति) ने पीड़िता को दुपट्टे से घसीटकर यह दुष्कर्म किया। गले में फंसे दुपट्टे की वजह से पीड़िता के स्पाइनल कोर्ड को गहरा नुकसान हुआ, और उसकी जुबान तक कट गई।

घटना के 6 दिन बाद जाकर पुलिस ने शिकायत दर्ज की, और इसके दो दिन बाद पीड़िता ने अपने साथ बलात्कार होने की बात कही। लेकिन गंभीर रूप से घायल होने की वजह से उसे पहले अलीगढ़ और बाद में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन घटना के 10 दिन बाद तक आरोपियों में से किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई। 29 सितंबर, 2020 को पीड़िता के प्राण पखेरू उड़ चले थे। मामले ने तूल तब पकड़ा जब यूपी पुलिस ने पीड़िता के शव को परिवारवालों को सौंपने के बजाय पेट्रोल छिड़ककर जला डाला। परिवार का आरोप था कि उन्हें उनके घर में बंद कर पुलिस ने यह काम किया था। लेकिन एडीजी (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने इस बारे में कहा कि इसके लिए परिवार से मंजूरी ले ली गई थी।

राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश और प्रदर्शन के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जबरन दाह-संस्कार के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अपनी टिप्पणी में कहा, “29 सितंबर, 2020 को पीड़िता की मौत से लेकर दाह-संस्कार की घटनाओं के बारे में जैसा कथित तौर पर आरोप लग रहा है, उसने हमारे विवेक को झकझोर कर रख दिया है।” इस केस में आगरा पुलिस, हाथरस जिलाधिकारी, और यूपी सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने मामले को “फेक न्यूज़” बताकर दबाने का प्रयास किया। बाद में यूपी पुलिस ने दावा किया कि फोरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार सैंपल में कोई वीर्य ही नहीं पाया गया, और पूरे मामले को “जातिगत तनाव” बढ़ाने के तौर पर पेश किया गया।

इसी मामले से केरल के एक पत्रकार सिद्दीक कप्पन को उत्तर प्रदेश सरकार ने यूएपीए जैसी आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जेल में ठूंस दिया था। योगी सरकार का तो यहां तक दावा था कि यह सब उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय साजिश की जा रही है। लेकिन राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की मौजूदगी और आम लोगों के दबाव का ही नतीजा रहा कि चारों अपराधियों को अंततः गिरफ्तार करना पड़ा। 

स्वामी चिन्मयानंद की करतूत:

भाजपा के खजाने में एक और नेता हैं, स्वामी चिन्मयान्द, जिनका असली नाम था कृष्ण पाल सिंह। लेकिन राजनीति में धर्म का छौंका लग जाने से कोई भी अपराधी और बाहुबली कितना अभेद्य हो सकता है, इसे हम भाजपा के कई स्थापित नेताओं से आसानी से समझ सकते हैं। स्वामी चिन्मयानन्द तो वाजपेई सरकार में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रह चुके हैं।

भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री के साथ-साथ जिस व्यक्ति को स्वामी की उपाधि हासिल हो और जिसके पास अनेकों शिक्षण संस्थानों का मालिकाना हो, ऐसे व्यक्ति का रसूख उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य में कितना अधिक हो सकता है, यह आसानी से समझा जा सकता है। अगस्त 2019 में उनके ही लॉ कालेज से एलएलएम की पढ़ाई करने और उनके बनाये छात्रावास में रहने वाली एक 23 वर्षीय छात्रा ने स्वामी के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था, जिसके बाद उस लड़की का कोई अता-पता नहीं चल सका। इस वीडियो में बताया गया था कि स्वामी ने उस लड़की को अपने आवास में बुलाकर उसकी बाथरूम में नहाते हुए तस्वीर दिखाकर, सेक्स की मांग की थी। मीडिया के जरिये यह खबर जब देश-विदेश में सुर्खियां बनने लगीं, तब जाकर सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद लड़की की खोज खबर की गई।

अपनी गिरफ्तारी से पहले चिन्मयानन्द दावा कर रहे थे कि लड़की उनसे 5 करोड़ रूपये की उगाही करने के वास्ते उन्हें झूठ-मूठ बदनाम कर रही है। लेकिन एसआईटी के तहत हिरासत में रखे जाने के बाद एसआईटी चीफ नवीन अरोरा के मुताबिक पूछताछ में स्वामी चिन्मयानन्द ने इस बात को स्वीकारा है कि वे उस लड़की से मसाज कराते थे। 2 जुलाई, 2020 के हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक जब एसआईटी की हिरासत में चिन्मयानन्द से पूछताछ की गई थी, तो उन्होंने अपने कृत्य पर पछतावा जताते हुए बयान दिया था कि, “मैं अपने किये हुए कृत्य पर शर्मिंदा हूँ।” लेकिन मार्च 2021 तक स्वामी चिन्मयानन्द के खिलाफ गवाही देने वाले सभी साक्ष्य अपने बयान से मुकर जाते हैं, और अदालत को स्वामी चिन्मयानन्द को बरी करने का आदेश पारित करना पड़ता है। 

बीएचयू कांड में बीजेपी कार्यकर्ताओं की संलिप्तता:

पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को पंडित मदन मोहन मालवीय ने आजादी से पहले ही एक नायाब तोहफा दिया था। उसका नाम है बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। पिछले वर्ष बीएचयू के भीतर एक मेडिकल छात्रा के साथ गैंग रेप की घटना में वाराणसी भाजपा आईटी सेल के पदाधिकारी पकड़े जाते हैं। इसमें कुणाल पांडेय संयोजक, बीजेपी आईटी सेल महानगर, सक्षम पटेल सह-संयोजक, आनंद उर्फ़ अभिषेक चौहान कार्यसमिति के सदस्य पद पर कार्यरत थे। विडंबना यह है कि ये सभी अभियुक्त बलात्कार की घटना को अंजाम देने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत की तैयारियों में लगे हुए थे।

तीन माह बाद ये वापस आते हैं, और वाराणसी की पुलिस इन्हें बड़े ही गोपनीय अंदाज में हिरासत में लेकर मामले को रफा-दफा कर देती है। पीएम मोदी ने इस घटना पर एक शब्द नहीं कहा है, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त उन्हें रह-रहकर संदेशखाली याद आ रहा है। 

पुष्कर धामी के माथे का कलंक:

उत्तराखंड का अंकिता भंडारी रेप और हत्या मामला: उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए उदार पूंजी के विद्रूप विकास की यह पहली चेतावनी मानी जा रही है। 19 वर्षीय अंकिता भंडारी, पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से गांव की लड़की की कहानी है, जिसने संभवतः अपने जीवन में पहली बार ही आधुनिक जीवनशैली और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम किया।

ऋषिकेश के वंतारा रिसोर्ट में 28 अगस्त, 2022 को उसे 10,000 रूपये मासिक पर रिसेप्शनिस्ट का काम मिलता है और इसके 20 दिन बाद ही 18 सितंबर 2022 के दिन उसकी मौत हो जाती है। इस रिसोर्ट के मालिक पुलकित आर्या, असल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता और उत्तराखंड ओबीसी आयोग के उपाध्यक्ष विनोद आर्या के सुपुत्र हैं। 

कठुआ रेप और निर्मम हत्याकांड:

इस मामले में एक 8 साल की मासूम आसिफा के साथ हैवानियत की सारी सीमाएं पार कर दी गई थीं। मुस्लिम बकरवाल परिवार की इस बच्ची के साथ जघन्य बलात्कार में एक मंदिर का इस्तेमाल किया गया, जिसका मुख्य पुजारी और बेटे सहित कुल 8 लोगों को आरोपी बनाया गया, जिसमें 4 पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जम्मू में भाजपा-संघ से जुड़े लोगों ने ‘हिंदू एकता मंच’ बनाकर बलात्कारियों के समर्थन में रैली तक निकाली। देश में यह शर्मनाक घटना पहली बार देखने को मिली, जिसने सारे देश को सकते की स्थिति में ला दिया।

धर्म की आड़ लेकर बलात्कारियों को बचाने की इस मुहिम के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर रोष देखने को मिला। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुट्रेस तक ने भारत में हुई इस भयावह घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था, “यह घटना बेहद भयावह है और दोषियों पर उचित कार्रवाई को सुनिश्चित किया जाये।” आखिरकार 13 अप्रैल 2018 को पीएम नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट तक को इस घटना का संज्ञान लेना पड़ा और कहना पड़ा कि इस मामले में न्याय को सुनिश्चित किया जायेगा।

उत्तराखंड की अंकिता भंडारी रेप और हत्या मामला:

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए उदार पूंजी के विद्रूप विकास की यह पहली चेतावनी मानी जा रही है। 19 वर्षीय अंकिता भंडारी, पौड़ी गढ़वाल जिले एक एक छोटे से गांव की लड़की की कहानी है, जिसने संभवतः अपने जीवन में पहली बार ही आधुनिक जीवनशैली और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम किया। ऋषिकेश के वंतारा रिसोर्ट में 28 अगस्त 2022 को उसे 10,000 रूपये मासिक पर रिसेप्शनिस्ट का काम मिलता है और इसके 20 दिन बाद ही 18 सितंबर 2022 के दिन उसकी मौत हो जाती है। इस रिसोर्ट के मालिक पुलकित आर्या, असल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता और उत्तराखंड ओबीसी आयोग के उपाध्यक्ष विनोद आर्या के सुपुत्र थे। 

आरोप है कि अंकिता भंडारी, जिसे रिसोर्ट में ही रहने के लिए एक कमरा मिला हुआ था, से पुलिकत आर्या एक वीआईपी मेहमान से पैसे के बदले में सेक्स के लिए दबाव बना रहे थे, जिसका अंकिता ने विरोध किया था। इस हत्याकांड ने उत्तराखंड को अंदर तक हिला दिया था, नतीजे में ऋषिकेश, हरिद्वार और देहरादून ही नहीं समूचे पहाड़ में जगह-जगह ‘अंकिता को न्याय दो’ के बैनर तले सड़कों पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।

तब भाजपा के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक को अंकिता भंडारी के माता-पिता के सामने जाकर आश्वस्त करना पड़ा था कि अंकिता मामले पर सरकार पूरी तरह से उनके पक्ष में है। लेकिन जैसे ही मामला ठंडा पड़ा, मामले को तूल देने वाले स्थानीय पत्रकार आशुतोष नेगी, जिन्होंने उस वीआइपी गेस्ट का नाम सार्वजनिक करना शुरू कर दिया था, को ही एससी-एसटी एक्ट के तहत जेल में डालकर धामी सरकार पूरे मामले को रफा-दफा करने से बाज नहीं आ रही है। 

न्याय से वंचित महिला पहलवान:

भाजपा के बाहुबली सासंद और अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती संघ के 12 वर्षों से अध्यक्ष रह चुके बृज भूषण शरण सिंह के बारे में ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है। अभी बस यही कहना पर्याप्त होगा कि भारत ही नहीं ओलिंपिक संघ तक में भारत को अपयश दिला चुके सज्जन को 2024 के आम चुनाव का टिकट दिया जाये या नहीं, पीएम नरेंद्र मोदी के लिए तय कर पाना सबसे कठिन चुनौती बना हुआ है। सवाल 2024 में सत्ता पर कब्जा करने का है, और बृज भूषण यूपी की 3-4 लोकसभा क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं। ऐसे में नारी सम्मान कब-कहां उड़न-छू हो जाता है, यह बात सत्ता-पिपासुओं से बेहतर कोई नहीं जानता। 

मणिपुर में महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार:

मणिपुर हिंसा की आग में अभी तक जिस एक घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, वह था कुकी समुदाय की दो महिलाओं को भीड़ द्वारा निर्वस्त्र घुमाने का वीडियो। इसमें से एक के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या की बात सामने आई, और दूसरी महिला एक भारतीय सेना के जवान की पत्नी थी। देश में महिला सम्मान की बात तो एक जुमला हो चुका है, लेकिन कारगिल युद्ध में भारत की रक्षा में अपनी जान की बाजी लगा चुके एक जवान की पत्नी के साथ ऐसी घटना हो जाने के बावजूद, मणिपुर में स्थिति जस की तस बनी हुई है। राज्य और केन्द्र दोनों में भाजपा की डबल इंजन सरकार बरकरार है, और लगता नहीं कि ऐसी अनेक कहानियों को तब तक कोई न्याय मिल सकेगा, जब तक केंद्र में मोदी सरकार है।   

ये वे प्रमुख घटनाएं हैं जो भाजपा नेता, बहुसंख्यक हिंदुत्ववादी भीड़ की मानसिकता और महिलाओं विशेषकर वंचित समाज के साथ दबंग उच्च जाति की स्वेच्छाचारी प्रवृति को पूरी तरह से समर्थन देने वाली निरंकुश सत्ता की एक झलक देती है। भाजपा के शासनकाल में महिलाओं की स्थिति का वर्णन दो-चार लेखों में नहीं किया जा सकता है। इसलिए यहां पर हम कुछ नामों का जिक्र करेंगे। 

  • 2002 गुजरात नरसंहार के दौरान, सामूहिक बलात्कार की शिकार बिलकिस बानो मामले में आरोपियों को गुजरात सरकार के द्वारा 15 अगस्त, 2022 को आम माफ़ीनामा और जेल से बाहर आने पर फूल मालाओं से स्वागत-सत्कार की घटना ने साबित कर दिया कि गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला में दूसरे धर्म की महिलाओं के लिए किस कदर जहर घुला हुआ है। हत्यारों और बलात्कार के दोषियों का फूल माला के साथ स्वागत, समूचे राज्य को बीमार घोषित कराने की ओर ले जाता है, वह भी तब जब भाजपा ने देश के कई राज्यों के लिए गुजरात को आदर्श घोषित कर रखा हो। 
  • गुजरात के सूरत में एक 11 साल की लड़की के साथ बर्बर बलात्कार और हत्या, जिसमें उस नन्ही जान के प्राइवेट पार्ट सहित 86 जख्म के निशान मिले थे।
  • तमिलनाडु की भाजपा नेत्री और मशहूर एक्ट्रेस, गायत्री रघुराम ने भाजपा के बारे में यह कहते हुए अपना इस्तीफा दिया है कि भाजपा संगठन के भीतर महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। 
  • महाराष्ट्र में 4 सितंबर 2018 को एक भाजपा विधायक का वीडियो वायरल हुआ जिसमें युवाओं को संबोधित करते हुए वो घोषणा करते हैं कि अगर तुम किसी लड़की से प्यार करते हो, और शादी करना चाहते हो तो अपने पिता के साथ मेरे पास आना। मैं उसका अपहरण कर तुम्हारी उससे शादी करा दूंगा। इतना ही नहीं वायरल वीडियो में विधायक महोदय ने बड़े गर्व के साथ अपना मोबाइल नंबर तक शेयर किया था।
  • 2018 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ ने बिहार के शेल्टर होम को लेकर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट के बाद शेल्टर होम चलाने वालों के साथ-साथ बिहार में जेडीयू-बीजेपी राज के कथित सुशासन की खबर पहली बार देश को पता चली। करीब 40 बच्चियों के साथ महीनों तक बलात्कार करने वालों में बड़े-बड़े नेता और अधिकारियों की संलिप्तता को तत्कालीन बाल कल्याण मंत्री मंजू वर्मा और उनके पति चन्द्रशेखर वर्मा तक सीमित कर दिया गया, और बाद में संस्थान के मुखिया ब्रजेश ठाकुर सहित 19 लोगों को पोक्सो अदालत के माध्यम से सजा मुकर्रर कर दी गई। मजे की बात है कि अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी मंजू वर्मा को जेडीयू से 2020 में एक बार फिर से चुनाव लड़ने का मौका दिया गया, लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया था।
  • 15 अक्टूबर 2020 को यूपी के चित्रकूट जिले में 15 वर्षीय दलित लड़की का उसके गाँव के तीन लडकों ने गैंग रेप किया। पिता ने सामाजिक लोकलाज की खातिर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई, और लड़की घर में ही घुटती रही और एक दिन आत्महत्या कर ली। इसी प्रकार प्रतापगढ़ में  एक अन्य लड़की के साथ छेड़छाड़ की घटना पर पुलिस में शिकायत के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो लड़की ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी।
  • मई 2018 की घटना है जब उत्तर प्रदेश की एक महिला वकील ने एक प्रेस कांफ्रेंस में रोते हुए भाजपा नेता सतीश शर्मा पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। 
  • टाइम्स ऑफ इंडिया ने वर्ष 2022-23 में गुजरात राज्य में महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओं का ब्यौरा देते हुए बताया था कि राज्य में प्रतिदिन 6 बलात्कार की घटनाएं होती हैं। अकेले अहमदाबाद में वर्ष 2022-23 में 371 महिलाओं को बलात्कार का शिकार होना पड़ा था। राज्य में कुल 2,209 बलात्कार और 32 गैंग रेप के मामले इस वर्ष दर्ज किये गये थे। 
  • मार्च 2024 के प्रथम सप्ताह के दौरान उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में एक रेप पीड़िता के पिता ने आत्महत्या कर ली। इसकी वजह यह थी कि कानपुर के घाटमपुर इलाके में एक ईंट भट्टे के मालिक और उसके गुर्गों ने उनकी बेटी और भतीजी के साथ गैंग रेप की घटना को अंजाम दिया था। घटना के कुछ दिन बाद दोनों बेटियों ने आत्महत्या कर ली थी।  
  • हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद बलात्कार और हत्या के आरोपी बाबा राम रहीम की हर चुनाव से पहले पैरोल पर बाहर आने की घटना पर विराम लग गया है। इससे पहले भाजपा हर चुनाव से पहले उसे पैरोल पर छोड़ देती थी। एक दर्जन से अधिक बार पैरोल पर छूटने वाले बाबा को 50 दिनों तक जेल के बाहर रहने की इजाजत देने वाले राजनेता महिलाओं के सम्मान की कितनी चिंता करते हैं, आप स्वंय अंदाजा लगा सकते हैं। 
  • यूपी से ही सोनभद्र के भाजपा विधायक रामदुलार गौंड पर 2014 से एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगा था। जब दिसंबर 2023 में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया, तब जाकर भाजपा को उनसे नाता तोड़ने की जरूरत महसूस हुई।
  • उत्तराखंड के चंपावत से भजपा नेता कमल रावत को 31 दिसंबर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इन साहब पर पोक्सो के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालांकि इस मामले में भाजपा ने गिरफ्तारी से पहले ही उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

पिछले 10 वर्षों में नारी सम्मान की धज्जियां इतनी बार इतने बड़े पैमाने पर उड़ाई गई हैं कि उसका कोई अंत नजर नहीं आता। महिलाओं के खिलाफ यौन हमलों और बलात्कार की घटनाएं मोदी युग से पहले भी बहुतायत में थीं। लेकिन मामला उजागर होने पर सत्तारूढ़ दल को शर्मिंदगी का अहसास रहता था। उसे लगता था कि वह अगले चुनाव में किस मुंह से जाये। इसकी तुलना मोदी युग में युगांतकारी बदलाव यही आया है कि अब बलात्कार के आरोपी को सिर्फ इस बात का ख्याल रखना है कि स्थानीय सत्ता संतुलन पर उसके पांव कितनी मजबूती से जमे हैं और अगले चुनाव में वह अपनी जाति के बीच कितना प्रभावी दिख सकता है?

(रविंद्र पटवाल लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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