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Categories: बीच बहस

कुष्ठ रोग दिवस पर विशेष: रोग उन्मूलन पर कम हो गया सरकार का जोर

जब ननकी काकी को कुष्ठ रोग हुआ, तो गांव में लोग उनके पास बैठने से कतराते थे। कुष्ठ रोग के कारण उनके हाथों की उंगलियां टेढ़ी हो गई थीं। गांव के बच्चों को सख्त हिदायत थी कि ननकी काकी के पास नहीं जाना है, बच्चों के पूछने पर उन्हें बताया जाता कि वो कोढ़न हैं। पूर्वांचल में कुष्ठ रोग को कोढ़न भी कहते हैं। गांवों में लोग इसे ईश्वर का श्राप मानते हैं, उनके अनुसार ये पूर्व जन्मों का फल है, जो इस जन्म में भुगतना पड़ रहा है। गांवों में ऐसे लोगों के साथ अछूतों की तरह का बर्ताव होता है। अछूत! जब कभी इस शब्द का जिक्र होता है, तो अंबेडकर का नाम जेहन में स्वत: ही कल्पित हो जाता है कि कैसे एक तबका जाति के आधार पर इतने वर्षों तक शोषित होता रहा है।

और अंबेडकर ने अछूतोद्धार के लिए कितने संघर्ष किए। मगर रोग के कारण किसी को अछूत घोषित करना, ये भी किसी प्रताड़ना से कम नहीं। ननकी काकी 90 साल की उम्र में चल बसीं। दुख हुआ कि उनके अंतिम समय में कोई उनके साथ नहीं था। उनके जाने के बाद जब कुष्ठ रोग के बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि कुष्ठ रोग एक संक्रामक बीमारी है, ये किसी को छूने, हाथ मिलाने या साथ उठने-बैठने से नहीं फैलता है।

कुष्ठ रोग को लेकर भारत के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग धारणाएं हैं। इन धारणाओं के पीछे है जागरूकता का अभाव। हालांकि सरकार द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए कई प्रयास भी किए जाते रहे हैं। इसके लिए भारत में हर वर्ष 30 जनवरी को गांधी जी की पुण्यतिथि पर कुष्ठ रोग दिवस भी मनाया जाता है। वहीं WHO द्वारा विश्व कुष्ठ रोग दिवस जनवरी के चौथे रविवार को मनाया जाता है। इनका उद्देश्य है कुष्ठ रोग का समूल उन्मूलन।

क्या है कुष्ठ रोग:

कुष्ठ रोग, जिसे अंग्रेजी भाषा में लेप्रोसी (leprosy) कहा जाता है। ये माइक्रो बैक्टीरियम लैप्री नामक जीवाणु के कारण फैलता है। यह एक दीर्घ कालीन बीमारी है, जिसके लक्षण आने में चार से पांच साल का वक्त लग जाता है। इसका इंफेक्शन मुख्यतया शरीर की नसों, हाथ-पैर, नाक की परत और ऊपरी श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है।

यह रोग दो रूपों में हो सकता है। पॉसिबैसिलरी और मल्टीबैसिलरी। पॉसिबैसिलरी रोग- अपेक्षाकृत कम घातक है। इसे त्वचा पर घावों, धब्बों से पहचाना जा सकता है। इसमें त्वचा की जो संवेदनायें हैं वो समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि मानवीय मेजबान की प्रतिरक्षित कोशिकाओं द्वारा आक्रमण किये जाने के कारण सतही नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। दूसरा है मल्टीबैसिलरी- ये बॉर्डर लाइन कुष्ठ रोग की तीव्रता का माध्यम है इसमें बड़े धब्बे जो पूरे अंग को प्रभावित करते हैं। यह अस्थिर होता है और अंत में लेप्रोमेट्स कुष्ठ रोग बन जाता है।

लक्षण:
कुष्ठ रोग की शुरुआती स्टेज को ट्यूबरक्लोसिस कहा जाता है। इस स्टेज में लेप्रो बैक्टीरिया (जीवाणु) शरीर के हाथ, पांव, मुंह या बाहर के खुले अंगों और उनकी साधारण तंत्रिकाओं को ज्यादा प्रभावित करता है। इसमें खून और ऑक्सीजन की पहुंच कम होने के कारण प्रभावित अंग सुन्न पड़ जाते हैं। धीरे-धीरे शरीर की त्वचा पर धब्बे आने लगते हैं और त्वचा का रंग पीला पड़ने लगता है। समय पर इलाज ना होने के कारण इसका प्रभाव अन्य अंगों की तरफ भी फैलता है। पैरों में होने पर तलवे सुन्न पड़ जाते हैं जिसकी वजह से चलने पर किसी प्रकार का कोई आभास नहीं होता और चोट लगने की संभावना बनी रहती है। कई बार चोट लगने पर इसका पता नहीं चलता और घाव गंभीर होकर नये आकार में परिवर्तित हो जाता है।

कैसे फैलता है ये रोग:

सांस के रास्ते संक्रामक व्यक्तियों के शरीर से बैक्टीरिया के बाहर निकलने का प्रमुख मार्ग है। जिस कारण बैक्टीरिया के शरीर में प्रवेश करने के बाद यह बैक्टीरिया तंत्रिका तंत्र और त्वचा में चला जाता है। जिससे नसों को नुकसान पहुंचता है जो बाद में स्थायी विकलांगता या कुष्ठ रोग का कारण बनता है।

राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम:

आजादी के समय में जब देश में कुष्ठ रोगियों की संख्या बढ़ रही थी। तब सरकार द्वारा साल 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया। जिसे 1982 से मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT दवा) की शुरुआत के बाद देश में कुष्ठ रोग उन्मूलन के उद्देश्य से वर्ष 1983 में इसे ‘राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम’ (NLEP) के रूप में बदल दिया गया। यह योजना 1993 तक चली, फिर विश्व बैंक की सहायता से 1993-94 से बढ़ाकर 2003-04 तक चलाया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य था, देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य से 2005 तक कुष्ठ रोग का उन्मूलन करना।

कुष्ठ रोग की बढ़ोतरी के कारण:

साल 2005 में भारत आधिकारिक तौर पर कुष्ठ रोग से मुक्त देश बन गया था। इसके पीछे का कारण था इसके आंकड़े। साल 2005 में राष्ट्रीय स्तर पर मरीजों की संख्या 10000 पर 0.72 थी, वहीं WHO के मानक के अनुसार रोग समाप्ति का अर्थ है 10,000 पर प्रति 1 प्रतिशत व्यक्ति।
भारत में कुष्ठ रोग उन्मूलन  की घोषणा के बाद सरकार के साथ-साथ स्वास्थ्य कर्मियों की तरफ से भी प्रयास कम होने लगे। जो साल 2005 से पहले तक तत्परता से इस केस को लेते थे और उनकी सहायता करते थे, वो धीरे धीरे कम होने लगी। संख्या में काफी बढ़ोत्तरी होती गई। आंकड़ों के अनुसार जहां वर्ष 2016-17 में भारत में कुष्ठ रोगों के 1,35,455 मामले आये। वहीं जब 2017 में 11 राज्यों की गणना की गई, तो 2 व्यक्ति प्रति 10,000 पाए गए।
WHO की रिपोर्ट के अनुसार हर साल दुनिया में कुष्ठ रोग के 2 लाख मामले सामने आते हैं, जिनमें करीब आधे से अधिक भारत में पाए जाते हैं। जो भारत के लिए चिंता का विषय है।

कुष्ठ रोग का इलाज:

कुष्ठ रोग का इलाज संभव है। अगर बच्चे में जन्म के समय बीसीजी का टीका लगाया जाये, तो इससे सुरक्षा मिल सकती है। साथ ही मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT दवा) ने कुष्ठ रोग की रोकथाम के लिए भी अहम भूमिका निभाई है। इस रोग की ख़ास बात ये है, अगर रोग का समय पर पता चल जाए तो उसका पूरा इलाज कराना चाहिए, इलाज को बीच में छोड़ना नहीं चाहिए। अगर रोगियों का समय रहते इलाज होगा, तो कुछ नाम मात्र के संक्रामक मामलों में कुछ दिनों में ही कमी आ जाएगी। क्योंकि कुष्ठ रोग के संक्रामक रोगी का इलाज शुरू होते ही, कुछ दिनों में उसकी संक्रामकता खत्म हो जाती है।

(उपेंद्र प्रताप आईआईएमसी के छात्र हैं।)

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This post was last modified on January 30, 2021 6:28 pm

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