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Monday, September 20, 2021

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6 दिसम्बर 1992, यानी न्याय का विध्वंस

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सरकारों के मुंह पर पुलिस का खून तो लगा ही हुआ था अब अदालतों का खून भी लग गया है। कहते हैं ब्रिटिश राज ने दुनिया भर में फैले अपने औपनिवेशिक साम्राज्य को चलाने के लिए उतना पुलिस की गोली-लाठी का सहारा नहीं लिया जितना अपनी अदालतों और कानूनों का। मोदी सरकार की छत्रछाया में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भी यही समीकरण फलीभूत हुआ है।   

इस हफ्ते, न्याय के नाम पर और भी काफी कुछ बेहद अफसोसजनक देखने को मिला है। सोचिये, ये दो सवाल जो आज सभी की जबान पर हैं, कानून-व्यवस्था के हैं या राजनीतिक?

जैसा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़रमाया, किसान क़ानूनों के विरोध में राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर ट्रैक्टर जलाने से क्या देश के किसान का अपमान हुआ है?

हाथरस, यूपी में बलात्कार-हत्या की दरिन्दगी का शिकार दलित लड़की के मृत शरीर को प्रशासन द्वारा निकट परिवार की अनुपस्थिति में जबरन रात के अँधेरे में जला देने से क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राम-राज्य का मान बढ़ा है कि उन्होंने चूँ तक नहीं की?

यानी, पीएम से सीएम तक की दिलचस्पी राजनीति करने में है, न कि स्वस्थ समाज व्यवस्था की दिशा में काम करने में या संवेदी क़ानून व्यवस्था स्थापित करने में।

उचित होगा कि 6 दिसंबर, 1992 की तारीख़ को भी अब सीधे न्याय के विध्वंस से जोड़ कर देखा जाए। भारत के सुप्रीम कोर्ट तक ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को गत नवम्बर में ही आपराधिक दुष्कृत्य कहा था और भारत सरकार की सीबीआई ने 28 वर्ष तक दिन के उजाले और शासन, प्रशासन, मीडिया और लाखों की उपस्थिति में हुए जघन्यतम अपराध का यह मुक़दमा चलाया था; 30 सितम्बर के फ़ैसले के बाद वह सब मात्र न्याय के शव को ढोना सिद्ध हुआ है।

अपने पुलिस जीवन के शुरुआती वर्षों में सुना किस्सा याद आ गया; इसे अमूमन हर पुलिस बैच ने सुना होगा। एक बेहद भ्रष्ट पुलिस अधिकारी ने दोस्तों में शर्त लगाकर किसी प्रभावशाली व्यक्ति से उसका काम करने के एवज में घूस ले ली। समय दिन के 12 बजे, स्थान शहर का मुख्य बाजार और आस पास की तमाम स्ट्रीट लाइट जली हुयीं। बाद में प्रभावशाली व्यक्ति ने अपना काम निकल जाने पर शिकायत दर्ज कराई। मुकदमे में आरोपी को इस आधार पर बाइज्जत बरी कर दिया गया कि घटनाक्रम अविश्वसनीय है, पुलिस अफसर इस तरह से घूस ले ही नहीं सकता।   

दरअसल, अयोध्या केस के तमाम अभियुक्तों को बरी कराने की क़वायद में मोदी सरकार की सीबीआई ने अपनी एक विशिष्ट जाँच एजेन्सी होने की प्रतिष्ठा उसी तरह धूल में मिला दी है जैसे इसी सरकार की एक अन्य जाँच एजेन्सी एनआईए ने समझौता केस में की थी। दोनों मामलों के ट्रायल में, मोदी सरकार का हिंदुत्व एजेंडा इन जाँच एजेंसियों पर हावी रहा। उन्होंने अदालती सुनवाई के दौरान जानबूझकर सबूत और गवाह बिगाड़े और सुनिश्चित किया कि आवश्यक साक्ष्य भी आधे-अधूरे ही पेश किए जाएँ। इन फ़ैसलों का सम्मान करने की हिम्मत जुटाने के लिए आपको मानसिक रूप से अंधा-बहरा-गूँगा बनना पड़ेगा!

सोनीपत, हरियाणा के बड़ोदा थाना क्षेत्र में 29 जून की रात गोहाना-जींद मार्ग पर दो गश्त पर निकले पुलिसकर्मी हत्या का शिकार बने। उनके शरीर पर चाकुओं के घाव थे; पुलिस ने अगली शाम तक एक आरोपी को जींद में मुठभेड़ दिखाकर मार गिराया। अब, मृतक आरोपी की मित्र लड़की का परिवार और तमाम महिला एक्टिविस्ट धरने पर हैं। उनके अनुसार, घटना के समय आरोपी अपनी मित्र के साथ था जब दोनों पुलिसकर्मी अचानक वहां धमक गए और लड़की को हवस का शिकार बनाना चाहा, जबकि आरोपी द्वारा उसे बचाने के क्रम में पुलिसकर्मी मारे गए।

पुलिस का संख्या बल बढ़ाने, उसे टेक्नॉलजी कुशल बनाने, साजो-सामान से लैस करने और शारीरिक रूप से फिट होने की बात अक्सर की जाती है लेकिन पुलिसकर्मी को संवेदी बनाने की नहीं। जबकि यह सवाल जितना आम नागरिक का है उतना ही स्वयं पुलिस का भी। ऐसे प्रकरण में न सिर्फ़ अधिकार में मदमस्त वे चंद पुलिसकर्मी शामिल हैं जो क़त्ल और बलात्कार को अपनी बपौती मानते हैं बल्कि कठघरे में समूची प्रशासन प्रणाली है जो इस आपराधिक गिरोहबंदी को बढ़ावा देती है। अदालतों के उत्तरोत्तर सरकारी तंत्र की भेड़-चाल में शामिल हो जाने और राजद्रोह, एनएसए, यूएपीए, एन्काउन्टर जैसे कानूनों की आड़ से स्वतंत्र भारत की सरकारें भी जनता के विरुद्ध औपनिवेशिक हथकंडे अपनाने में एक दूसरे से बढ़कर गुल खिला रही हैं।

हमेशा लगता था कि यह कोरा मुहावरा ही रहा होगा, सचमुच में ऐसा थोड़े न हुआ होगा। भला रोम जल रहा हो और वहाँ का सम्राट नीरो बांसुरी बजाए? कोई शासक, कैसा भी घटिया से घटिया शासन भी क्या न्याय के नाम पर ऐसा कर सकता है?  लेकिन इन कठिन दिनों में टीवी पर देखा कि इस रेकार्ड बेरोज़गारी, किसान रोष, मज़दूर शोषण, कोरोना आपदा के दौर में देश का प्रधानमंत्री सहजन की रेसिपी अपने नामी मुसाहिबों को उसी नीरो वाली तल्लीनता से बखान कर रहा था।

(विकास नायारण राय रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं। आप हैदराबाद पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

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