Wednesday, May 18, 2022

मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं है एग्जिट पोल का महत्व

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आम आदमी की राजनीति और आने वाली सरकार के प्रति बढ़ती जा रही रुचि के कारण अब मीडिया हाउसों के लिये एग्जिट पोल भी मतगणना के समान ही जरूरी हो गये हैं। इसीलिये मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल के नतीजे आने लगते हैं। चूंकि राजनीति में असंभव कुछ नहीं होता। इसका अंकगणित भी अलग ही होता है। इसलिये आज की तारीख में राजनीति का खेल सर्वाधिक रोमांचकारी हो गया है जिसके नतीजों का लोग अत्यंत बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसी बेसब्री की उपज एग्जिट पोल भी है। लेकिन विगत के अनुभवों से कहा जा सकता है कि चाहे आप एग्जिट पोल से अपना मनोविनोद कर लें, मगर इनके नतीजों से कतई आश्वस्त न हों, क्योंकि ये नतीजे चुनावी संभावनाओं की एक तस्वीर तो पेश कर सकते हैं मगर कई बार इनके अनुमान एकदम विपरीत भी रहे हैं। वैसे भी अनुमानों के घोड़े दौड़ाने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है और ज्यादातर के अनुमान एक दूसरे के विपरीत होते हैं।

आखिर किसका विश्वास करें ?

पांच राज्यों में हुये चुनावों में कम से 10 एंजेंसियों ने एग्जिट पोल किये हैं। इन सबके नतीजे अलग-अलग हैं और सभी ने अपने सर्वे के सटीक होने का दावा किया है। इनमें से आप किस पर विश्वास करें और और किस पर नहीं? मसलन पंजाब में एक सर्वे ने भाजपा को एक सीट दी है तो दूसरे ने 13 सीटें दी हैं। उत्तराखण्ड के बारे में पांच सर्वे भाजपा की सरकार तो उतने ही सर्वे कांग्रेस की सरकार बना रहे हैं। उत्तराखण्ड में एक सर्वे ने भाजपा को 45 सीटें तक दी हैं तो दूसरे ने अधिकतम् 32 सीटें दी हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को कोई 101 सीट दे रहा है तो किसी को 151 सीटें मिलने का अनुमान है। सर्वे ऐजेंसियों के इतने विपरीत अनुमान चुनावी तस्वीर साफ करने के बजाय और अधिक धुंधली कर रहे हैं। कभी-कभी कुछ ऐजेंसियों के सर्वे अवश्य सटीक निकले हैं, लेकिन अतीत में ऐसे कई उदाहरण भी हैं जब एग्जिट पोल मतदाताओं के मूड को भांपने में पूरी तरह विफल रहे हैं।

कुछ एग्जिट पोल सटीक भी रहे

1996 के लोकसभा चुनाव में सीएसडीएस के एग्जिट पोल ने खंडित जनादेश का संकेत दिया। जब चुनाव के नतीजे आए तो उन्हें बहुत सटीक पाया गया। यह वही चुनाव था जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसी तरह 1998 के लोकसभा चुनाव के दौरान ज्यादातर एग्जिट पोल के अनुमान सही थे। सभी एग्जिट पोल में, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास बहुमत के करीब 200 से अधिक सीटें होने की बात कही गई थी। इसकी तुलना में, कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 200 से कम सीटों का अनुमान था। नतीजे आने पर भाजपा को 252, कांग्रेस 166 और अन्य पार्टियों को 119 सीटें मिली थीं। लोकसभा के 2014 के चुनाव के दौरान अधिकतर एग्जिट पोलों के अनुमान सही थे। अधिकांश एग्जिट पोल में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सरकार बनाने के करीब बताया गया था। जब नतीजे आए तो भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला और एनडीए को 336 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा के 2019 के चुनाव के दौरान एग्जिट पोल के अनुमान ज्यादातर सही थे, लेकिन उससे पहले लगातार 2 आम चुनावों में एग्जिट पोल बुरी तरह असफल हुए थे।

एग्जिट पोलों की विफलता ने उठाया विश्वसनीयता का सवाल

एग्जिट पोलों की सफलता के कई उदाहरण हैं तो उनकी विफलता का भी लम्बा इतिहास है। एग्जिट पोल की सबसे बड़ी विफलता 2004 में थी। उस समय, अधिकांश एग्जिट पोलों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में वापस आने की भविष्यवाणी की गई थी। लेकिन परिणाम पूरी तरह से उलट गए थे। उस समय एनडीए को 200 सीटें भी नहीं मिल सकीं। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में ज्यादातर एग्जिट पोलों में कहा गया था कि यूपीए को एनडीए पर बढ़त मिलेगी, लेकिन किसी ने भविष्यवाणी नहीं की थी कि अकेले कांग्रेस 200 का आंकड़ा पार करेगी। जब परिणाम घोषित हुए तो अकेले कांग्रेस को 206 सीटें और यूपीए को 262 सीटें मिलीं। नतीजतन डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गये। जबकि बाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए को 189 सीटें ही मिलीं। उस साल केन्द्र में यूपीए सत्ता में लौटी जबकि एग्जिट पोल ने यूपीए के लिए सीटों के नुकसान की भविष्यवाणी की थी। हालांकि, यूपीए को सीटों की संख्या में भारी बढ़त हासिल हुई।

बिहार से लेकर बंगाल और कर्नाटक, सभी जगह चूक गये

इसी तरह, 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान, एग्जिट पोल सही अनुमान लगाने में पूरी तरह विफल साबित हुए। उस समय सभी एग्जिट पोलों में भाजपा की जदयू-राजद गठबंधन पर बढ़त दिखाई गयी थी लेकिन नतीजे उलट हुये। भाजपा 58 सीटों पर सिमट गई, जबकि जदयू-राजद गठबंधन ने 178 सीटों पर जीत हासिल की। छत्तीसगढ़ विधानसभा के 2018 में हुये चुनाव में में भी एग्जिट पोल चूक गये। बिहार विधानसभा के 2020 में हुये चुनाव में भी एग्जिट पोल धराशाही हो गये। नवीनतम् 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में भी ओपीनियन पोलों की तरह एक्जिट पोल एकदम सही साबित नहीं हुये। पिछले कर्नाटक राज्य के चुनावों में एग्जिट पोलों ने सत्तारूढ़ कांग्रेस की सत्ता बरकरार रखने की भविष्यवाणी की थी, जबकि, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई। लोकसभा के 2014 के चुनाव में भी ये सर्वे ज्यादा सटीक नहीं रहे। लोकसभा के 2019 के चुनाव में 10 एक्जिट पोल हुये जिनमें एनडीए को औसतन 304 सीटें दी गयीं जबकि उस समय अकेली भाजपा को ही 303 सीटें मिल गयीं।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी विश्वसनीय नहीं

अति उन्नत तकानाॅलाजी और संसाधनों से सुसज्जित पाश्चात्य ऐजेंसियां भी चुनावी सर्वेक्षणों में चूक करती रही हैं। वर्ष 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के साथ-साथ पोल्टर्स ने ब्रेक्सिट वोट को गलत पाया था। उस समय उन्होंने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की जीत की भविष्यवाणी की थी। चुनाव विशेषज्ञों ने ऑस्ट्रेलियाई संघीय चुनाव के दौरान ऑस्ट्रेलियाई लेबर पार्टी की जीत की भविष्यवाणी की थी, जबकि ऑस्ट्रेलिया की लिबरल पार्टी के स्कॉट मॉरिसन ने चुनावों में जीत हासिल कर सबको चौंका दिया।

फोन से हो रहे हैं एक्जिट पोल

कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी और पूरब से लेकर पश्चिम तक भारत में बहुत अधिक भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताएं हैं। इन्हीं विधिताओं के कारण भारत में राजनीतिक विविधताएं भी विद्यमान हैं। लोगों की समस्याएं, विकास की जरूरतों और सरकार से अपेक्षाओं में भी भारी विविधताएं है। इतनी विविधताओं के चलते थोड़े से नमूनों या टेलीफोन के आधार पर आंकलन करना आसान नहीं है। सर्वे का जो तरीका पीलीभीत या चण्डीगढ़ में हो वह उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले में नहीं हो सकता। एग्जिट पोल का मतलब ही मतदान केन्द्र से निकले मतदाता का मत जानना है। एक विधानसभा क्षेत्र में एक मतदान केन्द्र पर किया गया एक्जिट पोल उस क्षेत्र के सभी केन्द्रों का प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता। मसलन उत्तराखण्ड के 11,647 मतदान केन्द्रों में से केवल 4,504 केन्द्रों तक ही वाहन से पहुंचा जा सकता है। शेष 7,143 केन्द्रों तक पहुंचने के लिये मतदान पार्टियों को 1 किमी से लेकर 20 किमी तक पहाड़ी उतार चढ़ाव के कठिन रास्तों पर पैदल चलना पड़ा। इनमें 9 केन्द्रों की दूरी सड़क से 20 किमी तक और 38 की दूरी 7 किमी तक थी। कई केन्द्रों से पोलिंग पार्टियां दूसरे और तीसरे दिन तक लौटी हैं। सवाल उठता है कि सटीक अनुमानों का दावा करने वाली ऐजेंसियों के पोलस्टर क्या इन हजारों पैदल और दुर्गम मतदान केन्द्रों तक पोलिंग पार्टिंयों के साथ दो या तीन दिन पहले रवाना हो गये थे। अगर एक-एक पोलिंग पार्टी के साथ एक-एक सर्वेकर्ता था तो क्या उत्तराखण्ड के 7,143 पैदल केन्द्रों के लिये इतने ही सर्वेक्षक भेजे गये थे? चैनलों के प्रतिनिधि भी ज्यादा से ज्यादा ब्लाक मुख्यालय तक हो सकते हैं। जबकि एक ही ब्लाक में सौ से ज्यादा ग्रामीण मतदान केन्द्र थे और एक केन्द्र से दो या तीन गांव जुड़े थे। वास्तव में ज्यादातर सर्वे टेलीफोन से ही किये गये।

भारत में प्रणव ने शुरू किया था मतदाता सर्वेक्षण

चुनाव में एग्जिट पोल की शुरूआत कब और कहां हुयी, इसके बारे में अलग-अलग मत हैं। सामान्यतः माना जाता है कि ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल का चलन 1940 में शुरू हुआ। इसका चलन भारत में 1960 में शुरू हुआ। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने भारत में एग्जिट पोल शुरू किए। सन् 1980 में पत्रकार प्रणव रॉय ने मतदाताओं का रुख जानने के लिए पहला सर्वे किया था। इसे भारत में एग्जिट पोल की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। आज एक्जिट पोल लोकसभा और विधानसभा चुनावों का आवश्यक अंग बन गया है। कुछ का ध्येय समय से पूर्व वास्तविक स्थिति की झलक मतदाता को दिखाना है तो कुछ का आम आदमी की जिज्ञासा को एक्जिट पोल के माध्यम से कैश करना है। ओपीनियन पोलों पर प्रायोजित होने के भी आरोप लगते रहे हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत का लेख।)

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