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स्मृति शेष अशेष: 20 साल बाद भी नहीं उठा नेपाल के शाही हत्याकांड से पर्दा

·बाबु हाम्रो राजा लाय परिवार सहित मारियो कसैलाय जीवित छोरे न तिम्रो पनि राजा लाय मारियो तर तिम्रो राजाका संतान र रानी त जीवित छ। तर हामरा राजाका वंश सखाप पारियों

एक जून 2001 को रात्रि भोजन के दौरान नेपाल के राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या समेत पूरे राजपरिवार को गोलियों से भून देने की खबर मुझे देर रात मिल गई थी। लेकिन आम नेपाली नागरिको कों खबर सुबह होने पर ही रेडियो नेपाल और अन्य माध्यमों से मिली। हम नेपाल पर्यटन की हालत की रिपोर्टिंग के लिये मुम्बई से बरास्ता नई दिल्ली, काठमांडु पहुंचने के बाद शाही हत्याकांड के पांच दिन पहले से नेपाल में ही थे। दो जून की सुबह नेपाल के प्रमुख पर्यटन स्थल पोखरा से टैक्सी से काठमांडु लौटने के क्रम में चाय के एक ढाबा के पास टोकरी भर केला बेचने बैठी एक नेपाली बूढ़ी महिला का मुझसे कहे ये शब्द जेहन में आज भी गूंज जाते हैं। नेपाली देवनागरी लिपि में भी लिखी जाती है। बूढ़ी के कथन का भावार्थ स्पष्ट है। वह अपने राजा, रानी और राजपरिवार की हत्या से दुखित थी। पर उन्होंने ये जान मुझे सांत्वना दी कि हम भारत के हैं। उनके लिये भारत के दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी राजा ही थे, जिनकी 22 मई, 1991 को श्रीलंकाई आतंकियों ने तमिलनाडु में श्रीपेरम्बदूर के पास हत्या कर दी। बूढ़ी की सांत्वना थी राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और दोनों संतान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सलामत हैं।

हमारे लिये नेपाल अपना देश तो नहीं है। पर वह हमारे अपनों का देश है। हमारी सगी छोटी बहन, भारत के मैथिली भाषी हमारे गांव से नेपाल के सीमावर्ती तराई क्षेत्र में ब्याही हैं। वह सदगृहस्थ होने के साथ ही कवि और महिला अधिकारवादी राष्ट्रीय नेता भी हैं। उनकी कॉलेज शिक्षा मिथिला अंचल के गढ़, दरभंगा में हुई है। वह नेपाल के संसदीय चुनाव मैदान में भी बतौर उम्मीद्वार उतर चुकी हैं।

फर्स्ट ड्राफ्ट ऑफ हिस्ट्री

उस खूनी तख्तापलट के एक दिन बाद तक हम नेपाल में ही थे। तब नेपाल के अंतिम राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या समेत उनके सभी 9 परिजन की काठमांडु के 38 एकड़ में फैले विशाल ‘नारायणहिति पैलेस‘ में राजीव गांधी हत्याकांड की ही तरह के आपराधिक षड्यंत्र के तहत हत्या कर दी गई थी। हम तब, इन दिनों रिपब्लिक टीवी के एंकर, अर्णव गोस्वामी (अर्गो) के बतौर सहयात्री इंडियन एयरलाइंस की नेपाल-भारत फ्लाइट से काठमांडु से नई दिल्ली लौटे थे।

उस खूनी तख्तापलट का ‘लगभग प्रत्यक्षदर्शी ‘ होने के अपने संस्मरण लिखने का कारण ये है कि पत्रकारों की रिपोर्ट ही नहीं उनके वे संस्मरण भी दुनिया भर में हड़बड़ी के इतिहास लेखन के ड्राफ्ट माने जाते हैं जो व्यक्तिगत जीवन के होते हुए भी सार्वजनिक महत्व के होते हैं। इस पर वैश्विक बहस अमेरिकी अखबार ,वाशिंगटन पोस्ट के मालिक प्रकाशक, फिलिप ग्राहम (1915 –1963 ) के निधन के ऐन पहले अप्रैल 1963 में लंदन में उसके समुद्रपारीय संवाददाताओं की सभा में दिये ऐतिहासिक भाषण से सेटल हो गई थी। ‘ न्यूज इज ओनली फर्स्ट ड्राफ्ट ऑफ हिस्ट्री ‘ के उनके कथन का समर्थन पहले भी एलन बार्थ समेत कुछ विद्वानों और सम्पादकों ने किया था।

भारत के सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में महान क्रांतिकारी विचारक कार्ल मार्क्स द्वारा अमेरिकी अखबार, न्यूयॉर्क ट्रिब्यून को भेजे डिस्पैच इतिहास के प्रथम ड्राफ्ट ही थे जिसको महान विदुषी रोजा लग्जम्बर्ग द्वारा इंगित करने के उपरांत उस लड़ाई की 150 वीं वर्षगांठ पर रूसी प्रकाशक ‘प्रोग्रेस‘ ने पुस्तक रूप दे दिया।

आंखिन देखी, पढ़ी, कानन सुनी बातों के संस्मरण

सिर में गोली लगने के बाद प्रिंस दीपेंद्र 1 जून, 2001 की रात से अस्पताल में रहा। उसकी मौत तीन दिन बाद हुई। लेकिन पोस्टमार्टम नहीं किया गया। दीपेंद्र की मौत के बाद राजा बीरेंद्र के अनुज ज्ञानेंद्र नेपाल नरेश बने।

बैरी बियराक्लुने ने अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स के 8 नवम्बर, 2001 के अंक में शुक्रवार 1 जून, 2001 के शाही हत्याकांड के सामने आये सबसे पहले प्रत्यक्षदर्शी और राजा बीरेंद्र के अनुज के दामाद डॉक्टर राजीव शाह के हवाले से लिखा: शराब के नशे में धुत्त युवराज दीपेंद्र ने राजमहल के डायनिंग हाल के फर्श पर चारों तरफ रेंग कर अपनी माता (रानी एश्वर्या) और पिता ( राजा बीरेंद्र ) समेत राज-परिवार के सभी सदस्यों को गोलियों से भून डाला”। डाक्टर राजीव शाह ने बामुश्किल दो मिनट चले इस खूनी खेल का अपनी आंखों देखी रोंगटे खड़ा करने वाला वृतांत प्रेस कॉफ्रेंस में पेश किया। उसने सबसे पहले राजा बीरेंद्र को आग्नेयास्त्र से छलनी किया।

ऐश्वर्या का अंतिम संस्कार।

नेपाल की शाही सेना में डॉक्टर शाह ने बताया कि तब रात के करीब नौ बजे थे। मैंने गोलियां चलने की आवाज सुनी। मुझे लगा कोई यूं ही खेल रहा है। फिर चीख पुकार मची। एक आवाज गूंजी कि राजा को गोली मार दी गई, डाक्टर होने के नाते मैं राजा की तरफ दौड़ा। मैंने तुरंत अपना कोट उतार कर राजा के गले में बांध दिया जिससे भारी रक्तस्राव हो रहा था। राजा ने कहा कि उनके पेट में भी बहुत गोलियां लगी हैं। मैंने उन्हें डॉक्टर के नाते अपना पहला काम करने देने का निवेदन कर कहा फिलहाल सबसे जरूरी रक्तस्राव रोकना है।

बैरी बियराक्लुने की रिपोर्ट के अनुसार डॉ. राजीव शाह का अधिकृत वृतांत और उसके पहले के अनाधिकृत ब्योरे से कुछ नेपाली प्रजा को लगा होगा कि युवराज दीपेंद्र ने राजा, रानी समेत राज परिवार के 9 सदस्यों की हत्या कर दी। लेकिन बहुत सारे लोगों को इस वृतांत पर विश्वास नहीं है। ये शाही हत्याकांड, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी की हत्या की तरह के कई सवाल खड़े करता है और सदियों तक उसकी भांति भांति प्रकार के जवाब भी ढूंढ्ने की कोशिश करेगा। गणित शिक्षक भरत पुरी ने कहा: मुझे इस पर अभी भी विश्वास नहीं है। बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। कैसे कोई एक व्यक्ति अकेले इतने सारे लोगों को मार सकता है?

डॉ. राजीव शाह ने अपने वृतांत में युवराज दीपेंद्र को तो एकमेव दोषी ठहराया। लेकिन उनके चचेरे भाई (कजन), पारस की सराहना की है जो अधिकतर नेपाली लोगों की नज़र में पियक्कड़, अपनी आदतन बहुत तेज मोटर ड्राइविंग से लोगों को कुचलने वाला कुख्यात व्यक्ति है, डॉ. राजीव शाह ने काठमांडु के ही उस सैनिक अस्पताल में बुलाई अपनी प्रेस कॉफ्रेंस में किसी को भी कोई सवाल पूछने का मौका नहीं दिया जहाँ तब शाही महल में गोलीबारी में घायल चार लोगों का इलाज चल रहा था। डॉ. राजीव शाह के वृतांत के अनुसार पारस ने उस रात राजमहल में भारी रक्त पात के समय निह्स्वार्थ भाव से महिलाओं का सुरक्षा कवच बन उन्हें बचाया। आश्चर्य है पारस को खरोंच तक नहीं आई। उनका ये वृतांत जान कर राज महल के बाहर खड़े एक शोधार्थी रूपक अधिकारी ने कहा : ये सब युवराज दीपेंद्र ने नहीं बल्कि पारस ने ही किया होगा।

नया पेंच फंस गया

नेपाल के राजा बीरेंद्र और महारानी ऐश्वर्या समेत राज परिवार के सभी सदस्य की एक जून 2001 को काठमांडु के नरायणहिति पैलेस में गोलियों से भून कर जो नृशंस हत्या की गई थी उसके बारे में 15 मार्च 2009 को नया दावा सामने आया कि हत्या के बरस भर पहले इसकी योजना बनी थी। ये दावा पूर्ववर्ती विस्तारित राजपरिवार के पूर्व युवराज पारस ने किया जिससे ‘शाही महल हत्याकांड’ मामले में कयासबाजी और बढ़ गई। लेकिन पूर्व शाही परिवार के एक सहायक सौजन्य कुमार सुल्या जोशी ने पारस के इस दावे को फर्जी कहानी बताया और कहा कि उसे इसका समर्थन नहीं करने के कारण ही नौकरी से हटा दिया गया। जोशी तब युवराज दीपेंद्र के प्राइवेट सेक्रेट्री थे जब यह हत्याकांड हुआ था।

ये भी कयास लगे इस हत्याकांड के पीछे भारत की इंटेलिजेंस एजेंसियों का हाथ है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड‘ ने भी ये कयास सार्वजनिक तौर पर व्यक्त किया था। राजा बीरेंद्र की हत्या के नौ साल बाद पूर्व पैलेस मिलिट्री सेक्रेट्री जनरल बिबेक शाह ने एक किताब लिखी ‘माइले देखेको दरबार’ (राजमहल, जैसा मैंने देखा) और दावा किया कि निर्मम हत्याकांड के पीछे संभवतः भारत का हाथ था।

पेशे से पत्रकार रहे कृष्णा अबिरल ने रक्तकुंड उपन्यास लिखा। कृष्णा ने राजमहल की एक महिला कर्मचारी के साथ इंटरव्यू किए जो रानी की सेविका थी। उपन्यास में लिखा है दीपेंद्र के भेष में दो नकाबपोशों ने गोलियां बरसाईं। ये दो नकाबपोश कौन थे ? यह रहस्य अब तक सुलझा नहीं है।

इसके पहले नरायणहिति पैलेस के अधिकारियों ने हत्याकांड के लिये युवराज दीपेंद्र को एकमेव दोषी ठहरा ये कहा था कि उसने शराब और मादक पदार्थों के नशे में धुत्त होकर राजपरिवार का सफाया कर दिया और फिर आत्महत्या कर ली। लेकिन ज्यादातर नेपाली लोग राजमहल के अधिकारियों की बात सच नहीं मानते। उनको लगता है कि इस हत्याकांड के पीछे दिवंगत राजा बीरेंद्र के भाई ज्ञानेंद्र का हाथ है जो बाद में राजा बन गये।

शाह वंश

नेपाल में ‘एकीकृत‘ शाह वंश का राज सन 1768 से लेकर 28 मई 2008 तक रहा जब इस हिमालई देश के नये लोकतांत्रिक, सेक्युलर संविधान के तहत राजशाही का उन्मूलन कर दिया गया। इस वंश को मूल पहाड़ी नेपाली लोग गोरखा-शाही और गोरखा राजवंश भी कहते हैं जिसकी उत्पत्ति 1559 से 1768 तक कायम ‘चौबिसे ठकुरी‘ वंश से मानी जाती है।

पूर्व युवराज पारस

शाही हत्याकांड के बाद सिंगापुर चले गये पूर्व युवराज पारस ने एक अखबार से इंटरव्यू में दावा किया कि अपने पिता की हत्या करने के दीपेंद्र की कई वजहें थी। लेकिन बड़ा कारण ये था कि वह अपनी प्रेमिका से विवाह करने के आग्रह पर राजा बीरेंद्र से अनुमति नहीं मिलने के कारण कुपित थे। राजा ने उसे कह दिया था वो लड़की राज परिवार में शामिल होने योग्य नहीं है। दीपेंद्र के कुपित होने का एक कारण नेपाल शाही सेना के लिये उसके माध्यम से हथियार खरीद के सौदा को राजा से मंजूरी नहीं मिलना भी था।

राज परिवार कलह

प्रिंस दीपेंद्र को उसकी मां यानी नेपाल की रानी ऐश्वर्या ने विवाह की उस की इच्छा के बारे में बात करने के लिए बुलाया था। रानी ऐश्वर्या ने कहा कि वह खुद दुल्हन ढूंढ रही हैं। इस पर दीपेंद्र ने कहा वह अपनी मर्ज़ी की लड़की से विवाह करना चाहता है। ऐश्वर्या चौंक पड़ीं। फिर उस लड़की के बारे में पूछा। दीपेंद्र ने उस लड़की के बारे में बताया तो रानी ने नाराज़गी में दो टूक इंकार कर दिया और वहां से उठ कर चली गईं। इसके बाद दीपेंद्र ने अपनी प्रेमिका को फोन कर कुछ बात की। फिर उसने पूरे राजपरिवार को भून डाला।

दीपेंद्र को उसकी प्रेमिका के प्रति राज परिवार की सख्त मनाही का अनुमान नहीं था, उसने रानी मां को मनाने की ठान कर बाद में एक दिन उनके पास पहुंच फिर अपने प्रेम विवाह के बारे में बात शुरु कर दी। रानी ऐश्वर्या ने फिर इंकार कर कहा कि उन्होंने अब तो दुल्हन चुन भी ली है। इस बार दीपेंद्र आक्रोश में आ गया और ये कह कर वहां से चला गया कि वह विवाह देवयानी से ही करेगा।

कुछ वक्त बाद ऐश्वर्या ने बताया कि दुल्हन राजघराने की ही है और वह राजमाता रत्ना की बहन के परिवार की है। दुल्हन आएगी तो प्रतिष्ठित राजघराने से ही आयेगी। दीपेंद्र ने कहा कि देवयानी भी राजघराने की है तो ऐश्वर्या ने बड़ी नाराजगी में कहा कि वो लड़की शाही घराने में शामिल होने के बिल्कुल काबिल नहीं है। ऐश्वर्या ने साफ कह दिया कि देवयानी जिस सिंधिया खानदान से है, वो पुणे के पेशवाओं की नौकरी करते थे। इसलिए वो शाही खानदान के लायक नहीं हैं। लेकिन दीपेंद्र को आशा थी देवयानी से उसके विवाह की संभावना खत्म नहीं हुई है। दीपेंद्र और देवयानी का रिश्ता कायम था। दीपेंद्र ने भरोसा दिला रखा था कि शादी उसी से करेगा। दीपेंद्र, देवयानी से जल्द विवाह करना चाहता था। लेकिन उसकी दाल अपने माता पिता की मनाही के कारण नहीं गल रही थी।

इस बीच, दीपेंद्र ने अपने पिता से नेपाल की सुरक्षा के लिए हथियारों आदि की खरीद के लिये एक सौदे की बात की जिसे राजा बीरेंद्र ने नामंजूर कर दिया।

एक जून को दीपेंद्र ने शाम से ही शराब पीनी शुरु कर दी थी। वो बेकाबू हो गया था। वह सबके सामने माता पिता पर चीखने–चिल्लाने लगा। इस पर राजमहल के सहायक उसे वहां से उसके कक्ष में ले चले गये। अपने कमरे में पहुंच कर दीपेंद्र ने देवयानी से फोन पर बात की। फिर कहा कि वह सोने जा रहा है। इसके बाद, दीपेंद्र सैन्यकर्मी की तरह मारक हथियारों से लैस होकर अपने कमरे से निकला। उसने हॉल में पहुंच धड़ाधड़ गोलियां बरसा अपने माता-पिता समेत राजपरिवार के नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया। फिर खुद को भी गोली मार ली।

सीपी झा, काठमांडु एयरपोर्ट पर।

नेपाल के प्रतिष्ठित घराने के पशुपति शमशेर जंग बहादुर राणा और उषाराजे सिंधिया की बेटी देवयानी को खबर मिली तो वो अगले ही दिन नेपाल से भारत चली गईं। वह बाद में भारत की राजनीति में सक्रिय हुईं।

राजमहल नरसंहार के 8 साल बाद 2009 में तुल बहादुर शेरचन ने एक रिपोर्टर से बातचीत में दावा किया कि हत्याकांड उसने की थी। उस हत्याकांड के समय नेपाल के विदेश मंत्री रहे चक्र बासटोला का कहना था हत्याकांड के पीछे पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला को भी मारने की साज़िश थी। चक्र के मुताबिक कोईराला की कार पर हमला हुआ था। चक्र ने इसे एक बड़ी साज़िश करार दिया था।

युबराज घिमिरे का नाटक

भारत में यूएनआई और टेलीग्राफ के रिपोर्टर रह चुके नेपाली मूल के युबराज घिमिरे जून 2001 से पहले ही नेपाल लौट कर वहां के एक बड़े अंग्रेजी अखबार के लिये पत्रकारिता करने लगे थे। हम नेपाल पर्यटन उद्योग की हालत की रिपोर्टिंग के लिये मुम्बई से नई दिल्ली होते हुए काठमांडु पहुंचे थे। वहां अपनी बहन के घर के पास ही होटल में ठह्ररे थे। होटल में इसलिये भी ठहरे कि नेपाल में ब्याह के उपरांत वहां की नागरिकता पाकर सियासतदा भी हो चुकी छोटी बहन अपने घर में किसी को भी धूम्रपान नहीं करने देती है। बहरहाल , उसी होटल में नेपाल टूरिज्म बोर्ड ने हमारे सम्मान में एक शाम ड्रिंक्स और डिनर का आयोजन किया जिसमें आमंत्रित युबराज घिमिरे समेत कई नेपाली और भारतीय पत्रकार भी आये। हमारी युबराज घिमिरे से उनकी यूएनआई सेवाकाल से ही खूब पटती रही है। वो दरअसल, पटना मेडिकल कॉलेज में दक्षिण अशियाई देशों के लिये ‘कोलम्बो प्लान‘ के तहत नेपाली नागरिकों के लिये रिजर्व सीट पर एडमिशन के लिए आये थे। उसमें कुछ दिक्कत हुई तो वे अंग्रेजी में एक शिकायती-पत्र लिख उसे अखबारों तक प्रेषित कराने यूएनआई के पटना ब्यूरो ओफिस पहुंचे थे। वहां बैठे यूएनआई के लिजेंडरी पत्रकार डीएन झा और उनके मित्र, इंडिया टुडे के फरजंद अहमद (दोनो दिवंगत) ने वो शिकायती-पत्र पढ़ कर युबराज घिमिरे से डॉक्टर के बजाय पत्रकार बनने की सलाह दी। बाद में इंडिया टुडे और फिर यूएनआई में नियुक्त रिपोर्टर संजय झा और एनडीटीवी के मनीष कुमार के पिता डीएन झा की सलाह युबराज ने राजी-खुशी मान ली। शाही हत्याकांड के बाद युबराज घिमिरे से भेंट नहीं हो सकी ताकि नेपाल के अपने संस्मरण के तथ्य को क्रॉस चेक कर सकें।

बहरहाल नेपाल के ही इसी नाम युबराज घिमरे के एक नाट्यकर्मी ने शाही हत्याकांड के 9 बरस बाद 2018 में एक नाटक लिखा। नाटक का नाम रखा : ‘  जून एक, 2001’। युबराज ने ये नाटक कोपेन हेगन (डेनमार्क) में रंगमंच के प्रशिक्षण के दौरान लिखी। नाटक में शाही हत्याकांड की सरकारी जांच के नतीजे को नेपाली लोगों के बीच अमान्य दर्शाया गया है कि ये दीपेंद्र की करतूत थी। डेनमार्क में मंचित इस नाटक में बतौर हत्यारा इशारों में ज्ञानेंद्र को इंगित किया गया है जो अपने अग्रज बीरेंद्र के बाद कुछ अर्से के लिये नेपाल के राजा रहे।

ज्ञानेंद्र, शाही महल में एक जून 2011 के उस खूनी रात्रि भोज में शरीक नहीं हुए थे। उनके पुत्र पारस वहां थे पर उन्हें कोई खरोंच भी नहीं आई। डॉक्टर शाह को भी कुछ नहीं हुआ। उनका दावा है वह गोलीबारी थमने पर डाइनिंग हाल की खिड़की से नीचे गार्डन में कूद गये थे। पूरी गोलीबारी में शाही महल के सभी सुरक्षाकर्मी गायब रहे।

नेपाल की पृष्ठभूमि पर कुछेक फिल्म बना चुके दिवंगत फिल्मकार देव आनंद ने शाही हत्याकांड पर भी फिल्म बनाने की सोची थी। बाद में उन्होंने एक पत्रकार को इटरव्यू में कहा कि शाही परिवार से निजी ताल्लुकात होने के कारण किसी अप्रिय बात से बचने के लिये इस फिल्म का निर्माण रद्द कर दिया गया।

बहरहाल सम्भव है नेपाल के शाही हत्याकांड के बारे में पहले से लिखित कुछेक संस्मरण आदि के आधार पर बाद में ऐसी कोई कृति फिल्म, नाटक या पुस्तक रूप में सबके सामने आये जो कयासबाजी से परे और तथ्यपरक हो।

(चंद्र प्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं आप ने 26 वर्षों तक यूएनआई को कई वरिष्ठ पदों पर रहते हुए अपनी सेवाएं दी हैं।)

This post was last modified on June 1, 2021 5:14 pm

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