लाल झंडे ने दी है किसान आंदोलन को स्थिरता

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वामपंथियों को आँख मूँदकर गाली देने वाले आजकल के कथित सत्ता के चाटुकार पत्रकारों, लेखकों, सम्पादकों, भाँड़ मीडिया के एंकरों और कथित साहित्यकारों को भारत के वर्तमान समय में सत्तासीन पूँजीपतिपरस्त सरकार के दंगाई, फॉसिस्ट, जनविरोधी, कार्पोरेट हितैषी कर्णधारों की दुर्नीतियों से इस देश की बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य आदि की वर्तमान हालात पर भी एक बार जरूर दृष्टिपात कर लेना चाहिए, जहाँ मोदी जैसे कथित सबसे काबिल हिंदू हृदय सम्राट के प्रधानमंत्रित्वकाल में इस देश की जीडीपी ऋणात्मक मतलब माइनस में 24 अंक के नरक में जा चुकी है। बेरोजगारी दर पिछले 40 साल में सबसे सर्वोच्च दर पर है, हजारों नवजात बच्चे कुपोषण और ऑक्सीजन के अभाव में मर रहे हैं, लाखों प्राइमरी स्कूलों, जूनियर हाईस्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थानों के भवन पर्याप्त देखरेख और मरम्मत के अभाव में गिर रहे हैं, ढह रहे हैं, वहाँ शिक्षकों की बेहद कमी है।

आदि-आदि बहुत से उदाहरण हैं, जिन्हें इन सत्ता के चाटुकार पत्रकारों, लेखकों, सम्पादकों, भाँड़ मीडिया के एंकरों और कथित साहित्यकारों के सबसे प्रिय शासन व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था की मुँह फाड़-फाड़कर अपनी दयनीय दशा पर बिलख रहे हैं। उक्त वर्णित सत्ता के चाटुकार पत्रकारों, लेखकों, सम्पादकों और भांड़ मीडिया के एंकरों और कथित साहित्यकारों को अगर वामपंथ का ठीक से ज्ञान न हो, तो पहले उसे ठीक से पढ़ लें, आपकी जानकारी के लिए बताया जाना बहुत जरूरी है कि शोषण-आधारित पूँजीवादी कुव्यवस्था के विपरीत एकमात्र वामपंथी व्यवस्था में ही केवल यह व्यवस्था है, जिसमें राज्य के हर व्यक्ति को भोजन, कपड़े और मकान तथा रोजगार आदि मनुष्य की न्यनतम् आवश्यकताओं का मौलिक अधिकार है।

इसलिए इन सत्ता के चाटुकार पत्रकारों, लेखकों, सम्पादकों, भाँड़ मीडिया के एंकरों और कथित साहित्यकारों आप सभी लोग सम्पादक शिरोमणि शहीद स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी जी के इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले प्रतिष्ठित समाचार पत्र प्रताप, कानपुर के दैदिप्यमान सम्पादकत्व और उसमें स्थाई स्तंभ लिखने वाले प्रातः स्मरणीय शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह को भी अपने मनमस्तिष्क और दिल दिमाग में याद रखिए, जो इस समाचार पत्र में तत्कालीन उस समय की इस देश के किसानों और मजदूरों के दयनीय हालत पर और उनके हक के लिए लेख लिखने के लिए कभी सूर्य अस्त न होने वाले का मिथ्या दंभ पाले ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के खिलाफ सीना तानकर खड़े हो गए, जेल चले गए, लेकिन उस ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के सामने कभी भी नहीं झुके।

सत्तारूढ़ सरकार के सामने दुम हिलाना कतई पत्रकारिता नहीं है, वह तो चाटुकारों, भाँड़ों व चारण कवियों के निम्नकोटि के कृत्य हैं, किसी भी देश का लोकतंत्र तभी स्वस्थ्य माना जाता है, जब उस देश की समस्त जनता, किसानों, मजदूरों और आम जनता का जीवन सुखी, समृद्ध और खुशहाली से भरपूर हो, केवल चंद पूँजीपतियों का हित संरक्षण करने वाले सत्ता के कर्णधार की दुर्नीतियों का समर्थन करना पत्रकारिता ही नहीं है। स्वस्थ्य और निर्भीक पत्रकारिता के लिए यह ध्यान रखा जाना अत्यावश्यक है। इसलिए हे सत्ता के चाटुकार पत्रकारों, लेखकों, सम्पादकों, भाँड़ मीडिया के एंकरों और कथित साहित्यकारों वर्तमान समय में पिछले 73 सालों से शोषित, पीड़ित, मरते-खपते करोड़ों अन्नदाताओं का यह स्वस्फूर्त किसान आंदोलन अंतहीन शोषण के खिलाफ उठा एक सर्वथा न्यायोचित, मानवीय, तथ्यपरक, तर्कसंगत आंदोलन है, इसलिए इसको वैचारिक, शारीरिक व सैद्धांतिक समर्थन देना इस देश के हर उस व्यक्ति, साहित्यकार, लेखक, मजदूर, किसान, विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर का नैतिक दायित्व बनता है।

ध्यान रखें आज दिल्ली की सत्ता पर कायम फॉसिस्ट, क्रूर, अशिष्ट, अमानवीय, असहिष्णु, अहंकारी व अधिनायक मनोवृत्ति के निजाम के खिलाफ लामबंद लाखों-करोड़ों इस देश के अन्नदाता दिसम्बर की इस भयंकरतम् ठंड और बारिश तथा भीषण गर्मी में केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपितु इस पूरे देश, पूरे राष्ट्रराज्य और इसमें निवास करने वाले अरबों आमजन, गरीबों, मजदूरों, कम आय वाले, किसानों, बेरोजगारों आदि सभी के लिए लड़ रहे हैं, इसलिए उक्तवर्णित सभी लोगों से यह विनम्र निवेदन है कि वे सरकार भाँड़, गोदी व चमची मीडिया के दुष्प्रचार से न बहकें, गंभीर चिंतन करें और सोचें कि किसानों या अन्नदाताओं की हार हम, आप, सभी की हार है, इस लोकतंत्र की हार है, उन शहीद क्रांतिकारियों की हार है, जो हँसते-हँसते ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों के खिलाफ लड़ते हुए फाँसी के फंदों पर झूल गये।

वर्तमान समय में भारत पर बैठे सत्ता के कर्णधार उन्हीं ब्रिटिश साम्राज्यवादियों, शोषकों की नाजायज औलाद हैं, जो उन्हीं के शोषण, क्रूरता और दमन के रास्ते पर चल रहे हैं, इसलिए इन ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों के नाजायज औलादों और नवसाम्राज्यवादियों की सत्ता को उखाड़ फेंकने में तन-मन-धन से पूर्ण सहयोग करें, इस बात को अपने दिल-दिमाग में ठीक से बैठा लें कि अब नहीं तो कभी नहीं। राष्ट्र केवल दो-चार पूँजीपतियों के हित संरक्षण से नहीं बनता है, अपितु इसके फैक्ट्रियों में काम करने वाले करोड़ों मजदूरों, खेतों में अन्न उगाने वाले करोड़ों किसानों या अन्नदाताओं व अन्य सैकड़ों तरह के श्रमजीवी लोगों आदि के अथक मेहनत व कठिन श्रम से उसका निर्माण होता है। दलालों, ट्रेडरों, बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स, पूँजीवादी मानसिकता के कथित अर्थशास्त्री इस देश, इस राष्ट्र का निर्माण कतई नहीं करते, अतः उक्तवर्णित किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों का ही इस राष्ट्र पर सही हक है, क्योंकि वे ही इसके निर्माता भी हैं।

(लेखक: निर्मल कुमार शर्मा, पर्यावरणविद और स्वतंत्र लेखक हैं और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद है।)

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