बीच बहस

यह एआईएमआईएम और भाजपा की जुगलबंदी है!

तमिलनाडु में भी विधानसभा चुनाव लड़ा था, असदुद्दीन ओवैसी के ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन ने। अभी हाल ही में, पश्चिम बंगाल के चुनावों के साथ। 100-50 सीटें तो कतई नहीं, जितना वह उत्तर प्रदेश के चुनावों में लड़ने की घोषणा कर रहे हैं। सात नहीं, जितने प्रत्याशी उन्होंने अभी बंगाल के चुनावों में उतारे थे, 20 भी नहीं, जितने पर उन्होंने पिछले साल के अंत में सम्पन्न बिहार विधानसभा के चुनावों में दावेदारी की थी। आश्चर्य कि ए.आई.एम.आई.एम. ने अभी तमिलनाडु में भी 3 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किये थे। शायद पहली बार। कर्नाटक और केरल में तो वह भी कभी नहीं।

आश्चर्य इसलिये कि कुछ ही समय बीता होगा, एक तमिल भाषी रिश्तेदार ने मुझसे शिकायत की थी कि अगर तेलुगू, कन्नड़, मलयालम जैसी किसी भाषा में मेरी गति होती, तो उनकी तमिल जुबान भी मेरे लिये उतनी अबूझ नहीं होती। वह एक छोटे वैवाहिक कार्यक्रम में मिले थे और उन्होंने यह बात तब कही, जब मैंने कहा था कि हम हिन्दी वाले टटोलकर और आधा-सीधा ही सही, बंगला, उड़िया लोगों की बातें समझ लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि असमी निहायत अलग जुबान है और उसे समझना हम हिन्दी वालों के लिये शायद सुगम न हो, वैसे ही जैसे द्रविड़ियन भाषा-परिवार की किसी भी एक भाषा से वाकफियत शेष तीन भाषाएं बोलने वालों की बातें समझ पाना उतना दुष्कर न रहने दे। आश्चर्य यह भी कि द्रविड़ भाषा-परिवार की जो भाषा सर्वाधिक बोली जाती है, उस तेलुगू के एक मकबूल सियासतदां ने 2023 में कर्नाटक में विधानसभा का चुनाव लड़ने की घोषणा जरुर की है, लेकिन अब तक उनकी पार्टी ने न तो कर्नाटक में कोई चुनाव लड़ा है, न केरल में। इसके बावजूद कि कर्नाटक में मुस्लिम आबादी करीब 13 प्रतिशत है और केरल में तो इससे भी लगभग दोगुना।

मुस्लिम आबादी का यह सवाल महत्वपूर्ण इसलिये है कि ए.आई.एम.आई.एम. तेलंगाना में पुराने हैदराबाद के अपने सुरक्षित गढ़ से निकला तो सीधे महाराष्ट्र पहुंचा, इत्तफाक कि ठीक उसी साल जब मोदी-शाह की नयी ‘अल्पसंख्यक-मुक्त राजनीति’ का आगाज हो रहा था। कहते तो यहां तक है कि बिहार के अल्पसंख्यक-बहुल सीमांचल में चुनावी तैयारियां ओवैसी ने 2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ ही शुरु कर दी थी और अकारण नहीं था कि 2015 के चुनावों में न सही, अक्तूबर 2019 में किशनगंज विधानसभा सीट के उपचुनाव में ए.आई.एम.आई.एम. कमरुल हुदा को जिताकर सदन में भेजने में कामयाब भी हो गया था।

विधानसभा चुनावों में जरुर रानीगंज की एक सीट को छोड़ शेष पांचों विधानसभा क्षेत्रों में उसके प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा सके थे, लेकिन याद रखना चाहिये कि तब भाजपा के खिलाफ एकजुट नीतीश-लालू-कांग्रेस के समर में ओवैसी अकेले थे। वैसे ही जैसे लोकसभा चुनावों और केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के केवल चार महीने बाद महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों में वह अकेले थे। उनकी पार्टी ने 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा के लिये केवल 24 सीटों पर अपने दम पर उम्मीदवार उतारे, 0.9 प्रतिशत वोट पाये, दो सीटों पर भाजपा और शिवसेना को हरा कर तेलंगाना से बाहर अपना पहला विजय अभियान भी शुरु किया।

दिलचस्प यह कि अपने तेलंगाना (पहले आंध्र प्रदेश)  से दूर एक दूसरे प्रदेश में ए.आई.एम.आई.एम. ने औरंगाबाद और बायकुला के जिन दो क्षेत्रों में जीत का पहला स्वाद चखा, वहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20 और 18 प्रतिशत थी और नांदेड दक्षिण और भिवंडी पश्चिम की जो दो सीटें जीतने में भाजपा-शिवसेना की मदद कर उसने नफा-नुकसान बराबर कर दिया, वहां मुसलमान वोटर 17 फीसदी। तो ओवैसी की चुनावी लड़ाई मुख्यतः अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में रही – बिहार में सीमांचल और मिथिलांचल, महाराष्ट्र में अल्पसंख्यकों की 14 से 25 फीसदी तक की आबादी वाला कोंकण, खानदेश, मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ, निशाना भी आम तौर पर बी.जे.पी.-एन.डी.ए. विरोधी दलों पर। यह महज इत्तफाक नहीं है कि पिछले साल के अंत में बिहार विधानसभा के चुनावों में अपने पर्फामेंस से उत्साहित असदुद्दीन ओवैसी ने बनारस के अपने पहले दौरे में हवाईअड्डे पर उतरते ही संवाददाताओं से किसी की शिकायत की थी, तो अखिलेश यादव की। कहा था, ‘‘अखिलेश सरकार के दौरान 2012 से 2017 तक उन्हें 28 बार यू.पी. आने की इजाजत नहीं दी गयी और 12 बार राज्य में घुसने से रोका गया।’’ उन्होंने कृतज्ञता भी जतायी थी कि ‘वह यहां आ सके तो इसलिये कि योगी सरकार ने अनुमति दी’।

यह कृतज्ञता दो तरफा है, एक तरह की जुगलबंदी। जैसे मशहूर शायर फहमीदा रियाज़ की एक नज्म में इस्लामी पाकिस्तान में ‘मूर्खता और घामड़पन में सदी बिता चुके लोग’ आखिरकार वही सब हम भारतवासियों के द्वार पहुंचने पर हमें बधाई देते नहीं थकते। गोदी मीडिया यह जानता है। खासकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक चुनावों के वक्त की कवरेज देख लें तो पता चल जायेगा कि मोदी, योगी, शाह, नड्डा जैसे नेताओं की रैलियों-सभाओं के अलावा जिन पर सबसे ज्यादा तवज्जो रहती है, वह ओवैसी जैसे नेता ही होते हैं। अगर कुछ राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार मानते हैं कि ओवैसी की उपस्थिति चाहे जितनी कमजोर हो, उनका होना आक्रामक हिन्दुत्व की मोदी ब्रांड राजनीति और सब कुछ छोड़कर मोदी, उनकी सरकार और उनकी, अमित शाह की पार्टी की चरण-रज में लहालोट गोदी मीडिया के लिये इतना मजबूत होता है कि जैसे चुनाव में बस भाजपा है और ओवैसी हैं, तो यह कोई हवाई मामला नहीं है।

यह केवल तब नहीं होता, जब चुनाव महाराष्ट्र विधानसभा का हो, 2019 का, जहां ओवैसी और उनके सहयोगी प्रकाश अम्बेडकर की बहुजन विकास अघाड़ी जीतते तो एक भी सीट नहीं हैं, लेकिन कम से कम 35 सीटों पर कांग्रेस-एन.सी.पी.को हरा देते हैं। यह केवल साल भर बाद बिहार में नहीं होता, जहां ओवैसी जीतते तो केवल 5 सीटें हैं, लेकिन 15 सीटों पर राजद-कांग्रेस को हरा देते हैं। यह तब भी होता है, जब अभी मार्च-अप्रैल में चुनाव बंगाल में होते हैं और 30 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों वाले राज्य में ए.आई.एम.आई.एम. को वोट मिलते हैं केवल 0.02 प्रतिशत।

ओवैसी होते हैं तो मॉब लिंचिंग से लव-जिहाद और सी.ए.ए. और दंगों की शक्ल में नियोजित संहार झेल रहे अल्पसंख्यकों के पास अल्पसंख्यक-शून्यता का आह्वान कर रही आक्रामक हिन्दू राजनीति को उसी भाषा में तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे रहा एक वाचाल खैर-ख्वाह होता है, गोदी मीडिया इस छवि को करोड़ों घरों तक पहुंचा रहा होता है और एक खामोश रिवर्स-पोलराइजेशन की रेसिपी तैयार हो रही होती है। यह कहना अब गैर-जरुरी है कि हर चुनाव में हमारी सीमाओं के भीतर पाकिस्तान के टेरर हमलों, भारत की उस पर जवाबी कार्रवाई से लेकर बलात धर्म-परिवर्तन, हिंदू आबादी के जबरिया विस्थापन और ऐसी दूसरी चीजें धार्मिक आधारों पर ध्रुवीकरण की इसी रणनीति के अन्य तेल-मसाले और इनग्रेडियेंट्स ही तो हैं। आखिर बालाकोट हमलों से तीन दिन पहले 23 फरवरी 2019 की रात, 10 बजे अर्णब गोस्वामी और ‘बार्क’ के पूर्व सी.ई.ओ. पार्थो दासगुप्ता के उस ‘ह्वाट्स-ऐप चैट’ के पाठ तो आपकी नजरों से भी गुजरे ही होंगे, जिसमें अर्णब ‘पाकिस्तान के खिलाफ इस बार नार्मल स्ट्राइक से भी बड़ा होने’ का रहस्योद्घाटन करते हैं और चहकते हैं, ‘‘इट इज गुड फॉर बिग मैन इन दिस सीजन, ही विल स्वीप पोल्स देन’’।

तो लब्बोलुबाव यह कि किसी भी प्रदेश में भाजपा और उसकी अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को चुनौती देने वाली मुख्य पार्टी या अलायंस से बाहर के छोटे दल, ए.आई.एम.आई.एम. का उपजीव्य है और यह 2014 के महाराष्ट्र, 2015 के बिहार एक्सपेरिमेंट का सबक है। अक्टूबर 2019 में प्रकाश अम्बेडकर की बी.वी.ए. के साथ गठबंधन और नवम्बर 2020 में बसपा, उपेन्द्र कुशवाहा की आर.एल.एस.पी., देवेन्दर प्रसाद के एस.जे.पी. डेमोक्रेटिक जैसे छोटे दलों के साथ ग्रैंड सेकुलर डेमाक्रेटिक फ्रंट के गठन ने उनका असर कैसे कई गुना बढ़ा दिया – सीटें जीतने के संदर्भ में नहीं, बल्कि बी.जे.पी.-एन.डी.ए. की राह रोक लेने के नजरिये से – यह सर्वज्ञात इतिहास है। उत्तर प्रदेश इसी का दुहराव होगा, अंतिम नतीजों में नहीं, इरादों में।

ओमप्रकाश राजभर, अपना दल के कृष्णा पटेल धड़े, बाबू सिंह कुशवाहा के जन अधिकार मंच सहित कई छोटे दलों के भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल होकर ओवैसी ने इसका साफ संकेत भी दे दिया है। यह छोटी जातियों और मुसलमानों के वोटों को विपक्षी खेमे से दूर रखकर सत्ता हासिल करने का भाजपायी फार्मूला है। और उत्तर प्रदेश निस्संदेह पश्चिम बंगाल नहीं है, जहां 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता वाली चुनिंदा 7 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के बाद भी ए.आई.एम.आई.एम. 0.02 फीसदी वोटों पर सिमट जाता है। यह केरल भी नहीं है, जहां 27 फीसदी मुस्लिम और 18 फीसदी इसाई वोटर परम्परागत तौर पर माकपा के नेतृत्व वाले एल.डी.एफ. या कांग्रेस की अगुवाई वाले यू.डी.एफ. को ही वोट करते रहे हैं और किसी तीसरी ताकत के लिये राज्य में गुंजाइश ही नगण्य है।

मुहम्मद अली जिन्ना की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में जब आजाद इस्लामी राष्ट्र का प्रस्ताव पारित किया था, तब वह विनायक दामोदर सावरकर की मदद ही कर रहे थे। आप कहते रहिये कि जिन्ना से तीन साल पहले, 1937 में  सावरकर पर हिन्दू महासभा के कर्णावती अधिवेशन में ‘भारत के एक एकीकृत और समरुप राष्ट्र होने के विपरीत इसमें मुख्यतः एक हिन्दू और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र होने की घोषणा’ करने की बात गलत है, उनकी पूरी बात से एक वाक्य को संदर्भ से काटकर पेश किये जाने’ का उदाहरण है, सच यह है कि बाबा साहब अम्बेडकर साफ कह चुके हैं कि भारत के एक राष्ट्र या दो राष्ट्र होने को लेकर सावरकर और जिन्ना के बीच कोई मतभेद नहीं था, बल्कि देश में दो राष्ट्र होने के सिद्धांत पर दोनों में गजब की सहमति थी। बस भरोसा करना चाहिये कि प्रत्यक्षतः धर्म की राजनीति के दो विपरीत ध्रुवान्तों पर खड़े दो धुरन्धरों की यह विचारधारात्मक सहमति ही थी और इसमें व्यवसायिक हितों के क्षरण के किन्हीं अन्य भयों या लोभ-लाभ के दूसरे हेतुओं से एक या दूसरे के राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का आरोप शायद ही कोई लगा सके।

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 12, 2021 1:19 pm

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