Sunday, May 22, 2022

ऑक्सफैम-2022 रिपोर्ट के साये में देश का बजट

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केंद्रीय बजट बनाने की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। इसी बीच ऑक्सफैम रिपोर्ट-2022 भी 17 जनवरी को हम सबके समक्ष आ गई है। इसकी रिपोर्ट  सरकार को उसकी असफलता का आइना दिखाती हुई प्रतीत हो रही है। वस्तुतः यह सरकार कि रीतियों, नीतियों, कार्यक्रमों कि उपलब्धिओं पर एक तीखा प्रहार कर रही है। क्या है सरकार के लिए इसका सन्देश और मायने। बजट में इसकी क्या हो परछाई, इसकी विवेचना करने कि जरूरत है। लेकिन इस पड़ताल को करने के पहले आइये हम जाने इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य, जिनके सामने आने  से तहलका मचा हुआ है ।

ऑक्सफैम कि रिपोर्ट ने बताया है कि 2021 में कोविड-19 के दौरान भारतीय समाज में गैर बराबरी तेजी से बढ़ी। कोरोना काल के इस समयावधि में जहाँ 84 प्रतिशत घरों की आमदनी तेजी से घटी, वहीं देश के 100 सबसे संपन्न परिवारों कि सम्पति बढ़ कर 57.3 लाख करोड़ रूपया हो गई। क्या यह स्तब्ध कर देने वाली रिपोर्ट नहीं है? यही नहीं रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश में 55.2 करोड़ लोगों कि जितनी कुल सम्पति है,उतनी सम्पति सिर्फ देश के 98 सबसे धनी एवं सम्पन्न व्यक्तियों की है। खरबपतियों की संख्या में भी 2021 के दौरान अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई। यह संख्या 102 से बढ़कर सन 2021 में 142 हो गई। हम सभी को यहाँ याद रखना चाहिए कि यह कोरोना काल रहा जिसमें सभी आर्थिक क्रियायें लगभग बंद या मंद सी पड़ी थीं। तो क्या था जिससे इनकी संख्या में तेजी से वृद्धि हुई? वह कौन सी जादू कि छड़ी थी जिसने इनकी संख्या भी बढ़ाया और इनकी सम्पति भी?

यह बात भी निकल कर सामने आई है कि देश के मात्र 10 व्यक्तियों के पास देश कि 57  प्रतिशत सम्पति थी। इसके विपरीत, 50 प्रतिशत सबसे गरीब जनसँख्या के पास मात्र 13 प्रतिशत ही देश की सम्पति थी। असमानता की ऐसी आंधी एवं  स्थिति न केवल सोचनीय वरन भयावह भी है और अनेक प्रश्न भी खड़ी करती है। यदि ऐसी गैर बराबरी ही होनी थी तो हमने लोकतंत्र एवं सरकार क्यों चुना ? सरकार क्या मात्र 142 परिवारों के लिए चल रही है? सरकारों के बजट का यदि यही परिणाम होना है तो बजट बनाने की आवश्यकता क्या है? ग्रोथ बढ़ाने का संकल्प केवल 142 लोगों के लिए रहा है तो 142 करोड़ जनसँख्या के लिए देश का क्या महत्व? यदि 10 ही लोगों के पास देश की 57 प्रतिशत सम्पत्ति है तो देश में सम्पत्ति कि असमानता के लिए ‘सामान्य वर्ग’ जिम्मेदार कैसे? ये सभी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं । तो क्या हैं इस विमर्श के निहितार्थ ? आइये इसकी विवेचना करें। क्या करने कि आवश्यकता है बजट में?

वस्तुतः पूरा विश्व ही ‘ग्रोथ’ बढ़ाने के पीछे पागल हुआ है। लेकिन इससे विकास की दौड़ में कुछ, मीलों आगे निकल जाते हैं और कुछ पीछे छूट जाते हैं और  उसी से समस्याओं की गंगा भी बहती है। मोदी सरकार भी ग्रोथ कि चकाचौंध के पीछे भागी जा रही है। उसके लिए ग्रोथ, गुरु मंत्र है। परन्तु उनके ग्रोथ का यज्ञ भी अपूर्ण और असफल सा रहा है। 2017-18 एवं उसके पश्चात यह विकास यात्रा जैसे थम सी गई है। पिछले दो वर्षों में तो ग्रोथ संकुचित-ऋणात्मक रही। ऑक्सफैम ने बता दिया है कि कोरोना काल में जो ग्रोथ भी हुआ वह केवल 142 खरबपतियों को समर्पित था। उन्हीं की उत्पत्ति एवं उन्हीं का पोषण हुआ। दूसरी तरफ, 142 करोड़ जनसँख्या उपेक्षित एवं भूख, गरीबी से बेहाल रही। पढ़ाई, दवाई, कमाई हासिये पर चली गई।केवल महंगाई ने बढ़ने में साथ दिया है। आम जनता पर दोहरी मार रही। एक तरफ उनकी नुमाइंदगी करती सरकार ने करों का बोझ डाला तो दूसरी तरफ खरबपतियों ने उन्हें निचोड़ा। जनता की जेब से पैसा निकालता गया। जेबें खाली होती गईं और खरबपतियों की जेबें भारी होती गईं।

कोरोना के विपत्ति काल में, धुप अँधेरी सुरंग से बाहर आने के लिए आम आदमी अपनी सरकार से कल्याण कारी कदम उठाने कि आशा लगाए रखी थी। लेकिन इसका उल्टा ही हुआ। ऑक्सफैम की रिपोर्ट से यह राजफाश हुआ कि आम जनता को आशा थी कि सरकार पढ़ाई, दवाई पर विशेष ध्यान देगी। परन्तु वस्तुतः स्वास्थ पर केंद्रीय सरकार के 2021-22 के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत कम राशि का प्रावधान किया। नेशनल सैंपल सर्वे ने पाया था कि देश में निजी अस्पतालों में चिकित्सा करवाने पर एक व्यक्ति को अपनी जेब से 62.67 प्रतिशत तक खर्च करना पड़ता है जबकि इसका वैश्विक औसत 18.12 प्रतिशत का है। भारत में स्वास्थ पर जीडीपी का केवल 1.2 से 1.6 प्रतिशत ही खर्च होता है। इसी भांति, पढ़ाई पर होने वाला खर्च जी.डी.पी के 3 प्रतिशत से कम रहता है। ऑक्सफैम कि रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कोरोना काल में इन दोनों मदों पर निजी खर्च में बेतहाशा वृद्धि हुई क्योंकि निजी क्षेत्र ने इन सुविधाओं को प्रदान करने पर भारी कीमत वसूली। 2021-22 में सामाजिक सुविधाओं पर केंद्रीय सरकार के होने वाले खर्चे में भी कमी हुई।

रोजगार का क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ और साथ ही लैंगिक असमानता भी बढ़ी। 2019 की तुलना में आज 1.3 करोड़ कम महिलायें काम कर रही हैं। 2020 में महिलाओं की आय समवेत रूप से 59.11 लाख करोड़ रुपये से घट गई। सरकार कुछ न कर सकी। 2020 में 4.6 करोड़ और भारतीय दरिद्रता की स्थिति में आ गए। यह संख्या, विश्व के नए गरीबों की आधी संख्या थी। सरकार इस बीच 80 करोड़ परिवारों को राशन बाट रही थी। ऐसा अब भी कर रही है। इसके अतिरिक्त कुछ और न कर सकी। एक बड़ी आबादी को जिन्दा रखने कि यह क्रिया कब तक चलती रहेगी, यह भी कहा नहीं जा सकता है। ऑक्सफैम ने खुलासा किया कि सरकार ने इस बीच दो कदम उठाए जिससे वस्तुतः गरीबी और गैर बराबरी में भारी वृद्धि हुई । एक तो अप्रत्यक्ष कर में वृद्धि, जिसकी मार गरीबों पर गंभीर पड़ती है और दूसरे कॉर्पोरेट टैक्स में भारी कमी जिससे कंपनी क्षेत्र को विशेष फायदा हुआ। इससे गैर बराबरी का विकराल रूप तो दिखना ही था। प्रश्न उठता है कि क्या खरबपतियों ने कोई गलत काम किया।

वस्तुतः आय और सम्पत्ति बढ़ाने का अधिकार तो सबको है। उन्होंने बढ़ाया तो गलत क्या किया? जब तक गलत तरीके से कमाई न की जाए वह जायज होती है। यह काम तो सरकार का है कि आय और सम्पत्ति के वितरण पर ध्यान दे। सरकार यहीं पर विफल रही। पिछले वर्ष भी ऑक्सफैम ने सुझाव दिया था कि सरकार,10 प्रतिशत सबसे अमीर जनता पर सम्पत्ति कर लगाए। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया । सरकार ने करों एवं सेस से गरीब आम जनता से पैसा वसूला। सरकार का भाव तो ऐसा था जैसे ‘मेरे तो केवल 142 गोपाल, दूसरो न कोई’। उन पर वेल्थ टैक्स नहीं लगा। लेकिन इन व्यंग्यों से यदि सरकार को बचना है तो सरकार क्या करे? ऑक्सफैम का कहना है कि सरकार को खरबपतियों पर अतिरिक्त टैक्स लगाना चाहिए। यदि टैक्स लगता है तो इसके तीन फायदे होंगे। एक तो, खरबपतियों को टैक्स देने के लिए  रास्ता मिलेगा। देश की समृद्धि बढ़ाने में उनका योगदान बढ़ेगा। दूसरे, सरकार  की आय में भारी वृद्धि होगी और तीसरे गरीब टैक्स की मार से बचेंगे। बजट में क्या ऐसा ही होगा-यह तो बजट ही बताएगा। इंतजार करिये।

(लेखक विमल शंकर सिंह, डीएवीपीजी कॉलेज, वाराणसी के अर्थशात्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे।)

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