Friday, March 1, 2024

क्या कह रहे हैं विधानसभा चुनाव के नतीजे?

पांच राज्यों में हुए चुनाव परिणामों ने फिर से बहसों के लिए दरवाजे खोल दिये हैं। अलग-अलग दायरे के राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों के बीच इनकी समीक्षा भी कई आयामों से की जाने लगी है। आश्चर्यजनक रूप से इन चुनावों में तीन मुख्य हिंदी प्रदेशों में भाजपा की जीत के मायने तलाशे जा रहे हैं। यह कहा जाने जाने लगा है कि मोदी की गारंटी और अमित शाह की रणनीति ने जनता पर कारगर रूप से असर बरकरार रखा है। क्षेत्रीय नेताओं को दरकिनार कर मोदी-शाह ने यह चुनाव अपने नेतृत्व में लड़ा, यह सच है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में तो भाजपा नेतृत्व के तमाम आपसी अन्तर्विरोधों के बावजूद उसने कैसे अप्रत्याशित परिणाम हासिल किए ?

यह गंभीर समीक्षा की मांग करता है। क्या जनता ने कांग्रेस सरकारों द्वारा लायी गयी जनहित की बेहतरीन योजनाओं पर हिंदुत्व को तरजीह दी? अथवा क्या हिंदी पट्टी में अभी भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण ही मुख्य प्रवृत्ति बनी हुई है? या यूं कहें कि क्या कांग्रेस ने भाजपा के बरख़िलाफ़ जनहित के जिन मुद्दों को इसकी काट के बतौर पेश किया उसे जनता ने वाकई नकार दिया है? अथवा क्या इन चुनावों को आगामी लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाए? और क्या इन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी लोकसभा चुनावों की जीत का परिचायक समझा जाए ? क्या राजस्थान में जनता ने पांच साल में सत्ता बदलाव के ढर्रे पर चल कर कांग्रेस के खिलाफ भाजपा को जनादेश दिया? छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में एंटी इनकंबेंसी का असर था तो वह मध्यप्रदेश में क्यों नहीं दिखा?

आदि जैसे बहुतेरे प्रश्नों के इर्द-गिर्द इन पांच प्रदेशों के चुनावों की समीक्षा की बहसें केंद्रित रहने वाली हैं। 

यहां हम उपरोक्त प्रश्नों के साथ-साथ इसके कुछ अन्य आयामों पर बात करेंगे जो इस परिदृश्य के कुछ नए पहलुओं को उद्घाटित करेंगी। 

छत्तीसगढ़: जहां भूपेश बघेल एक लोकप्रिय चेहरे के साथ सरकार चला रहे थे और उनकी कई योजनाएं जनता को सीधे लाभान्वित कर रही थीं। यहां पार्टी और सरकार दोनों ही आश्वस्त थे कि यह कांग्रेस का एक मॉडल राज्य है और यहां उनकी सरकार पुनः बनने जा रही है। नेतृत्व के इस प्रस्थान बिंदु से अति आत्मविश्वास विकसित होना स्वाभाविक था जिसने अनचाहे तरीके से ही जमीनी स्तर पर जुझारू चुनाव लड़ने की उसकी गुंजाइश को कम कर दिया और संगठन की सीमित ताकत को भी आत्ममुग्ध बना दिया। सीमित इसलिए कि अभी भी कांग्रेस का संगठन जमीनी स्तर पर अप्रभावी है और नेतृत्व के आभामंडल के सहारे वैतरणी पार करने में ज्यादा भरोसा रखता है ।

वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने बिना शोर-गुल मचाये इस आदिवासी बाहुल्य प्रदेश में संगठन और संघ के सहारे जमीनी स्तर पर काम किया। उसने भूपेश बघेल सरकार की उपलब्धियों और उसके आकर्षक चुनावी वादों की सही-गलत काट जनता के समक्ष पेश की। भाजपा ने देखा कि हिंदुत्व की चाशनी से सिर्फ बात नहीं बनने वाली है , तो उसने कांग्रेस के चुनावी वादों के पीछे से कमोबेश वैसे ही मिलते-जुलते वादे दोहराए। यह काम उसने मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी किया। मतलब साफ था कि भाजपा ने समझ लिया कि निचले स्तर पर चुनाव में हिंदुत्व का एजेंडा पर्याप्त नहीं था और कांग्रेस के लोकप्रिय चुनावी वादों का जनता पर ज्यादा प्रभाव था, इसलिए उसने भी लगभग वही वादे किए और चुनावी मैदान मार लिया। 

ये चुनाव परिणाम इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि भाजपा को अब सिर्फ हिंदुत्व के सहारे सत्ता हासिल नहीं होने वाली। उसे जनता के सवालों पर बात करनी पड़ेगी और जनहित की योजनाओं का पैकेज भी पेश करना पड़ेगा चाहे वह जुमला ही क्यों न हो ।

मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार के खिलाफ अच्छा-खासा जनाक्रोश व्याप्त था और कांग्रेस जनता में सत्ता बदलाव की इस चाहत को अपनी सही रणनीति से अपने पक्ष में कर  सकती थी। लेकिन यहां भी बदलाव की इस जनाकांक्षा को कांग्रेस नेतृत्व ने जैसे अपनी जीत की गारंटी मान लिया। हालांकि पार्टी के अंदर प्रदेश में कोई खास गुटबाजी नहीं थी और कमलनाथ के नेतृत्व की सर्वस्वीकार्यता भी थी। हां! उनकी कार्यप्रणाली को लेकर दबी जुबान से आलोचनाएं यदा-कदा प्रकाश में आती रहीं। यहां पर कांग्रेस ने अपने संगठन को जमीनी बनाने के लिए ब्लाकों के नीचे मण्डलम और सेक्टरों में कुछ कवायद ज़रूर की लेकिन यह व्यवहारिक रूप से पार्टी में संगठन में बस कुछ पद प्राप्त करने तक सीमित रहा। इस कवायद की सहज कोई जमीनी गतिविधि तो कत्तई नहीं दिखी और न ही नेतृत्व ने उसको उतना महत्वपूर्ण समझा।

मध्यप्रदेश के विंध्य और कुछ हद तक बुंदेलखंड रीजन में 2018 में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा था। उसे इन क्षेत्रों को ठीक करने के साथ-साथ बाकी के परिक्षेत्रों में अपनी सांगठनिक मजबूती कायम करने के पर्याप्त मौके थे, जो उसने नहीं किया।

वहीं भाजपा ने यहां भी अपने तमाम आपसी अन्तर्विरोधों के बावजूद जमीनी स्तर पर संगठन के माध्यम से अपनी गतिविधियां जारी रखी और जनता को एकपक्षीय तरीके से अपने हक़ में मोड़ा, क्योंकि वहां जमीनी लेबल पर कोई प्रतिद्वंदी ही उसे नहीं मिला। यही वह कड़ी है जहां से भाजपा अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद विपक्ष पर भारी पड़ती है।

इसके साथ अन्य पहलू भी उसको बढ़त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं जो उसके नेतृत्व ने रणनीतिक रूप से उनके हक में बना रखी है। उसके पास धन -संसाधनों की तो कोई कमी है नहीं, ऊपर से उसके पास अपना भोंपू मीडिया है जो उसे इस बढ़त को कायम रखने में अपनी अलग सहयोगी भूमिका निभाता रहा है ।

यही हाल कमोबेश राजस्थान में भी देखने को मिला। वहां भी भाजपा प्रदेश नेतृत्व में बिखराव होने के बाद भी अच्छी जीत हासिल कर सकी। यहां अशोक गहलोत की लोकप्रिय कांग्रेस सरकार होने के बावजूद जनता ने भाजपा को प्राथमिकता दी। कांग्रेस के लिए यह जनादेश सीधा सन्देश है कि सिर्फ सही मुद्दे उठाना अथवा जनहित की योजनाएं लागू करके चुनाव नहीं जीते जा सकते। उसके लिए उसे जमीन पर निचले स्तर तक  सच्चे मायनों में सक्रिय और जुझारु सांगठनिक ढांचा कायम करना होगा ।

इन चुनावों ने एक चीज तो साफ कर दी है भाजपा सिर्फ अपने हिंदुत्व कार्ड के भरोसे अब चुनाव नहीं जीत सकती। उसे अब जनहित के मुद्दों पर कम से कम बात करने पर मजबूर होना पड़ा है।

भाजपा की कमजोर स्थिति के बावजूद तेलंगाना में कांग्रेस का प्रदर्शन हिंदी पट्टी से अलग रहा। वहां के सामाजिक समीकरण और राजनैतिक ध्रुवीकरण जैसे भी थे लेकिन उसकी लड़ाई किसी जमीनी कैडर बेस्ड पार्टी से नहीं थी। केसीआर सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस ने सघन अभियान संचालित कर लोकप्रिय चुनावी वादों पर अपनी जीत सुनिश्चित की।

यहां हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि कांग्रेस के अंदर आज भी संगठन को लेकर स्पष्ट सोच का तथा उसे प्राथमिक मानने का अभाव बना हुआ है। पार्टी के बहुतेरे वरिष्ठ नेता यह कहते पाए जाते हैं कि कांग्रेस एक ‘मास’ पार्टी रही है और इसलिए उसे कैडर बेस्ड पार्टी बनने की जरूरत नहीं है। यह बात एक हद तक सच हुआ करती थी जब राष्ट्रीय आंदोलन के बाद आज़ादी के उपरांत वही एकमात्र मुख्यधारा की पार्टी बनी रही थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने खास कर हिंदी पट्टी में मंडल और कमंडल के दौर में नई राजनीतिक शक्तियों के उदय होने तथा कांग्रेस के जनाधार के विघटित हो जाने के बाद भी अपनी रणनीति नहीं बदली।

उन्हें अभी भी पार्टी नेतृत्व की, या यूं कहें कि गांधी परिवार की जन लोकप्रियता से उमड़ती भीड़ को अपने आप वोट में बदल जाने की उम्मीद बनी रही जिसमें यदा-कदा उसे सफलता भी हाथ लग गई। उसने समय-समय पर संगठन को लेकर कुछ औपचारिक चिंताएं भी ज़रूर व्यक्त कीं लेकिन वास्तव में यह महज खाना-पूरी तक ही सीमित रहीं ।

इसी से जुड़ा दूसरा पहलू भी है कि उसके पार्टी रैंक एंड फाइल में राजनैतिक मुद्दों की स्पष्टता का गहरा अभाव दिखता है। कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता फ्री इलेक्ट्रॉन की तरह मनमौजी हैं। यह भी देखने को मिलता है कि उसके कई क्षत्रप नेतृत्व को अपरोक्ष चुनौती देते दिखते हैं। राहुल गांधी जिन संघर्षों में उतरे हैं और उनसे जूझ रहे हैं, वे जिन मुद्दों के माध्यम से राजनैतिक ध्रुवीकरण के प्रयास कर रहे हैं, उसे निचले स्तर तक ले जाने का जो एकमात्र तंत्र संगठन और उसके नेता हो सकते हैं , जो दिग्भ्रमित हैं ।

आज मोदी सत्ता और उसकी क्रोनी कैपिटालिस्टों से खुलेआम यारी, विभाजन और हिंसा की उसकी खुली राजनीति के खिलाफ और जाति जनगणना जैसे असरकारक मुद्दों पर जिस मुखरता से राहुल गांधी मैदान में उतरे हैं। उसमें पार्टी कतारें, अन्य नेता और सांगठनिक इकाइयां कितनी मुखर और आक्रामक हैं? यह हम सब अच्छी तरह देख सकते हैं। क्या इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों और जो कुछ भी उसका संगठन है उसने उन मुद्दों पर जिन्हें राहुल गांधी महीनों से उठाते आ रहे हैं और जूझ रहे हैं, क्या जनता के बीच ले जा सके और उसे प्रशिक्षित करने का प्रयास किया?

हमें इसका उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा और इसी उत्तर में बेहतर वस्तुगत परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का कारण भी छुपा है। परिस्थितियों के अनुकूल होने के बावजूद भी उसके पास सब्जेक्टिव रेस्पॉन्स देने वाली जमीनी फोर्स नहीं है।

वास्तव में राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से देश की जनता के हितों के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सबसे निर्णायक संघर्ष किया है और आवाज उठाई है। उन्होंने पार्टी को सही मुद्दों और सही वैचारिक सवालों के दायरे में ला खड़ा किया है। उनके इन संघर्षों ने हिंदी भाषी राज्यों में उनकी लोकप्रियता और नेतृत्व को प्रतिष्ठित किया है लेकिन क्या यह पर्याप्त है? नहीं! 

इसके लिए कांग्रेस को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने, पार्टी के अंदर अराजकता की हद तक असीमित जनवाद को नियंत्रित करने और केन्द्रीयता को सुदृढ़ बनाने, जमीनी स्तर पर संगठन निर्मित करने और उसे दोयम दर्जे से बाहर निकाल कर प्राथमिक ताकत बनाना होगा। हमारी समझ यही कहती है कि ऐसा नहीं होने की दशा में कोई तीर तुक्के से तो लग सकता है लेकिन तीरंदाजी का हुनर नहीं आ सकता, जो सतत विजय सुनिश्चित कर सके।

(क्रांति शुक्ल वर्ल्ड विजन फाउंडेशन के निदेशक और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं।)

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