Monday, October 18, 2021

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बिहार के चुनाव मेले में क्या नहीं है?

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बिहार एक राज्य जिसे 1970 के दशक में वीएस नायपॉल ने ‘वह स्थान जहां सभ्यता समाप्त होती है’ के रूप में वर्णित किया था, उसी बिहार में चुनाव मेला पूरी तरह से सज गया है। पहले चरण का चुनाव प्रचार आज बंद हो गया है। इस चुनाव मेले की बहुत सारी खास बातें हैं जिसमें से एक यह भी है कि बिहार के समोसे में आलू आज भी है लेकिन चुनाव मेले में लालू नहीं हैं जिस पर खास तौर से विश्लेषकों की नज़र रहती थी। लेकिन इस चुनाव मेले में अगर नेताओं द्वारा अब तक उछाले गए बयानों पर एक नज़र डालें तो देश की राजनीति की दशा और दिशा की जो तस्वीर उभर कर सामने आती है उससे बिहार में फिलहाल क्या नहीं होगा इस बात को समझने में आसानी होगी। 

औरंगाबाद में रैली को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्व में देश तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। बिहार के विकास के लिए एनडीए की सरकार बने यह जरूरी है। उन्होंने राजद को निशाने पर लेते हुए कहा कि नौकरी छीनने वाले लोग आज नौकरी देने की बात कर रहे हैं। वो कभी नौकरी नहीं देंगे। वाम दलों के गठबंधन में शामिल होने को उन्होंने विध्वंसक बताया। नड्डा यह नहीं बता रहे कि पिछले 15 सालों में नीतीश सरकार की क्या उपलब्धियां रहीं? उन्होंने कौन से कद्दू में तीर मारा? नहीं बताया। 

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने औरंगाबाद में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश में कुछ लोगों को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, धारा 370 हटने जैसी चीजों से दिक्कत हो रही है। यह भी कहा- मैं साफ कर दूं कि देश में दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेगा। हर जगह तिरंगा ही रहेगा। रविशंकर प्रसाद यह स्पष्ट नहीं करते कि बिहार के उन करोड़ों अप्रवासी मजदूरों को अपने घर वापसी में जिन कठिनाइयों और मुसीबतों का सामना करना पड़ा वह क्या धारा 370, राम मंदिर या दो निशान, दो प्रधान की वजह से करना पड़ा? 

जेपी नड्डा और अमित शाह।

सीएम नीतीश कुमार ने लखीसराय की अपनी रैली में कहा कि शराबबंदी के खिलाफ बिहार में माहौल बनाया जा रहा है। ऐसा करने वाले असल में खुद धंधेबाज हैं। धंधेबाज लोग ही इस कानून के खिलाफ माहौल बनाने में लगे हैं। शराब माफिया चाहते हैं कि किसी तरह उनकी सरकार को हटाया जाए। ज़ाहिर है निशाने पर लोजपा प्रमुख चिराग पासवान थे क्योंकि वह अपनी सभाओं में बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर नीतीश सरकार पर हमला साध रहे हैं। और जानना चाहते हैं कि बिहार में शराबबंदी की कभी समीक्षा क्यों नहीं की गई। क्या इन बातों का बिहार के भविष्य से कुछ लेना-देना है? समीक्षा ही करनी थी तो इसी तथ्य की कर लेते कि राज्य में 8400 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं जिनमें 5500 में एक भी माध्यमिक स्कूल क्यों नहीं है? अब चूहे शराब पी गए कि नहीं पी गए पर इस तरह का आरोपण-प्रत्यारोपण जवाबदेही के सवाल को पीछे धकेल देता है। 

लोकतन्त्र और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का जो साथ बताते हैं बिहार उससे अछूता नहीं है। केंद्र सरकार ने बिहार को सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपए भेजा है और जिसके तहत पाँच किमी की परिधि में कम से कम एक माध्यमिक स्कूल खोले जाने का लक्ष्य रखा था वह अभी कई किमी दूर क्यों है और वह पैसा कहाँ गया? भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी का दावा है मुझे मारने के लिए लालू ने करवाया पूजा-पाठ इसी वजह से कोरोना हो गया है। यह नहीं बता रहे कि करोना ने बिहार का कितना ‘मैला आँचल’ और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में कितने ‘बावन दास’ मारे गए?  

नीतीश कुमार या चिराग पासवान शराब के फायदे-नुकसान की बातों में क्या जनता को इसलिए उलझा रहे हैं कि कभी कोई यह न जान पाये कि बिहार में हर आठ मिनट में एक नवजात की मौत हो जाती है और हर पांच मिनट में एक शिशु की मौत हो जाती है। हर साल लगभग 28 लाख बच्चे बिहार में जन्म लेते हैं, लेकिन इनमें से लगभग 75,000 बच्चों की मौत पहले महीने के दौरान ही हो जाती है। इसकी वजह शराब नहीं है बल्कि भूख, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं का भाव है। 

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार जो भारत में तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है उसकी 10 करोड़ 40 लाख की आबादी का लगभग आधा (46 प्रतिशत) यानि 4 करोड़ 70 लाख बच्चे हैं, और यह भारत के किसी भी राज्य में बच्चों का उच्चतम अनुपात है। बिहार के बच्चों की जनसंख्या भारत की आबादी का 11 प्रतिशत है। बिहार में लगभग 88.7 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं जिसमें 33.74 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। बिहार में बच्चे कई अभावों का सामना करते हैं जिनके मुख्य कारण हैं – व्यापक रूप से फैली गरीबी, गहरी पैठ वाली सामाजिक-सांस्कृतिक, जातीय और लैंगिक असमानता खराब संस्थागत ढांचे, बुनियादी सेवाओं की कमी और बराबर होने वाली प्राकृतिक आपदाएं। समावेशी विकास तथा प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह राज्य भारत में सबसे निचले पायदान पर है। क्या तेजस्वी यादव और उनके गठबंधन के पास इन लोगों के लिए योजनाओं का कोई ठोस और कारगर ब्लू प्रिंट तैयार है?

तेजस्वी यादव ने वायदा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह दस लाख लोगों को रोजगार देंगे लेकिन यह रोजगार आएगा कहाँ से यह स्पष्ट नहीं है। अगर उन्हें नीतीश कुमार की तरह विश्व बैंक और योजना आयोग की योजनाओं के मुताबिक चलना है तो पक्की-चौड़ी सड़कों पर तो बल्ब हो सकता है और ज्यादा बड़े लग जाएँ लेकिन क्या उनका हेलिकॉप्टर देखने आए बच्चों को कोई ठोस तर्क दे पाएंगे कि आखिर क्यों निर्धन लोकतान्त्रिक देश अब तक गरीबी उन्मूलन नहीं कर पाये? 

दायें बाजू तमाम बाहुबली नेता और हत्या, बलात्कार जैसे मामलों में बंद अपराधियों की पत्नियाँ टिकट लिए खड़ी हैं और बाएँ बाजू वामपंथी नेता खड़े हैं जो कम से कम 100 विधानसभा क्षेत्रों के परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं तो दोनों के बीच में खड़े तेजस्वी इस केमिस्ट्री का रहस्य बेशक लोगों को न बताएं पर यह तो बताना ही चाहिए कि टिकट बांटते समय में उसके ध्यान में वह बेटी थी, जिसकी चिता को रात के अंधेरे में ‘सरकार’ ने आग लगा थी तो उसकी माँ ने पूछा था ‘क्या हमारा कसूर यह है कि हम दलित हैं? अगर गणित सिर्फ अधिकाधिक सीटें बटोर लेने भर का है तो फिर लोकतंत्र और गरीबी पर बात करना ही बेकार है।

साल 2000 से मुख्यमंत्री निवास से अंदर बाहर हो रहे और छह बार मुख्यमंत्री रह चुके ‘सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार के बारे में यह आम धारणा है कि ‘ईमानदार’ आदमी हैं। पर उन्होंने ‘ईमानदारी’ से कभी नहीं बताया कि विश्व बैंक की योजनाओं में ऐसा क्या है कि विकास की सड़कें जितनी चौड़ी होती हैं, सामाजिक-विषमता का आँगन उससे कई गुना ज्यादा चौड़ा क्यों हो जाता है? मंदिरों पर दीपमाला का रिकार्ड जब भी टूटता है करोड़ों घर और ज्यादा अंधेरे में क्यों डूब जाते हैं? भारत में लोकतन्त्र के पैरोकार जिसे ‘जातियों का राजनीतिकरण’ वह उनकी निगाह में ‘जातियों का अपराधीकरण’ क्यों नहीं है? किसी भी बहुजातीय समाज के भीतर नागरिक समाज की संरचना पर जातीय या साम्प्रदायिक हिंसा की अनुपस्थिति में उपस्थिति और चुनावी राजनीति कैसा असर डालती है? पाँच साल के इंतज़ार के बाद उठकर आई मुर्दा क़ौमों को यही बता देते कि जन राजनीति और कुलीन राजनीति में क्या फ़र्क़ होता है?

सुशासन बाबू नहीं बता पाएंगे। भारतीय लोकतन्त्र में ईमानदारी से पूछे गए सवालों का जवाब ‘ईमानदार’ नेता भी नहीं देते। बिदक जाते हैं। भोट नहीं देना है तो मत दो, जास्ती सवालबाजी करो। लोकतन्त्र के पतन या अन्त का कोई भी उदाहरण आप किसी के सामने रखें, यही जवाब मिलेगा कि जैसी जनता होती है वैसे ही उसके नेता होते हैं। जिनके कंधों पर प्रजा को नागरिक बनाने की जिम्मेवारी थी उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से सिर्फ सत्ता ही हाथ में ली थी वह ‘तोड़ो और राज करो’ का मंत्र और वह पूरा तंत्र हाथ में लिया था जिसमें 124(ए) जैसी धारा है जिसके तहत अंग्रेजों ने लोकमान्य तिलक और गांधी को सलाखों के पीछे किया और अब हमने अरुंधति रॉय, बिनायक सेन को इसी धारा के तहत उधेड़ा फिर सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा, प्रो साईबाबा से लेकर नताशा नरवाल, सफूरा जरगर, शरजील इमाम जैसे नौजवान कारकूनों को जेल में बंद कर रखा है। किसान आंदोलन में तो यह सवाल उठ रहा है लेकिन तानाशाही से जुड़ा यह सवाल बिहार चुनाव का हिस्सा नहीं है। किसी भी निश्चय पत्र या घोषणा पत्र में जेलों में बंद सामाजिक न्याय के योद्धाओं का कोई ज़िक्र नहीं है। 

अप्रवासी मजदूरों काजीकर आते ही सबसे पहले बिहार का नाम सामने आ जाता है। वहाँ के बच्चे-महिलाएं रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर क्यों हैं? विश्व बाज़ार खुल जाने के बाद भी विश्व गुरु क्यों थे? 1990 के बाद बिहार ने सिर्फ 3 फीसदी के वार्षिक दर से विकास किया था, जो उस अवधि में राष्ट्रीय औसत के आधे से थोड़ा ही बेहतर थी। 2005 तक बिहार में भारत के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे कम प्रति व्यक्ति वार्षिक आय थी- सिर्फ़ 10000 रुपए सालाना जो इथियोपिया जैसे युद्धग्रस्त अफ्रीकी देशों से भी कम थी। आज भी बिहार की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय झारखंड से भी कम है। इस चुनाव मेले में तो क्या यह बात बिहार को कभी नहीं बता पाएंगे कि बिहार में कल्याणकारी योजनाओं के तहत भुगतान की जाने वाली राशि तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में दी जाने वाली राशि से काफी कम क्यों है जबकि ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारा देने वाला उसके साथ है?     

प्रवासी मजदूर घर को लौटते हुए।

2019 के लोक सभा चुनावों के नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बड़े गर्व से कहा था कि लोकसभा चुनाव के प्रचार की खास बात यह थी कि किसी भी पार्टी ने धर्मनिरपेक्षता का नाम नहीं लिया। यह सच भी है। पिछले दिनों महाराष्ट्र के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को ‘सेकुलर’ होने की गाली की तरह सार्वजनिक रूप से जैसे फब्ती कसी उससे साबित होता है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की संघ की परियोजना अस्थाई रूप से ही सही, किसी हद तक कामयाब हो गयी है। इसी का नतीजा है कि इस बार भी वाम दलों को छोड़कर ‘सांप्रदायिकता’ या ‘अंधराष्ट्रवाद’ पर सबने आपराधिक चुप्पी साध रखी है।  

गैर हिन्दू प्रत्याशियों की संख्या में कमी इतनी तेजी से आ रही है कि ओवैसी जैसे व्यक्ति की भी प्रत्याशी और मुख्यमंत्री पद के लिए कोई हिन्दू चेहरा ज्यादा फायदे का सौदा दिखाई दे रहा है। कोई भी हिन्दुत्व विरोधी छवि के साथ सामने नहीं आना चाहता। जैसे शाहीन बाग को केजरीवाल ने देखकर भी अनदेखा कर दिया था अब बिहार चुनावों में भी कोई माथे पर ‘देशद्रोही’ की चेपी देखना नहीं चाहता। तभी तो देश के जाने-माने लेखकों-बुद्धिजीवियों को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की पक्षधर शक्तियों को समर्थन देने की अपील करनी पड़ रही है।

इन बदली हुई परिस्थितियों ने एक नई मंडी को जन्म दिया है जिसका निरंतर बड़ी तेजी से विस्तार होता जा रहा है। यह है ‘ईश्वर मंडी’। यहां सर्वशक्तिमान ईश्वर के नकाबपोश बिचौलिए हैं जो भक्ति का ढोंग करते हैं लेकिन उनके ढोंग पर नागरिकों की जबरदस्त आस्था है। जो आस्थावान नहीं हैं, वह ईश्वर से नहीं डरते इन बिचौलियों से डरते हैं क्योंकि वह नागरिकों को नाराज नहीं करना चाहते। यह बात बिहार के वोटरों को बताने वाला कोई नहीं है।   

भारत में भी नवउदारवादी जोर दे रहे हैं कि श्रमिकों को मिलने वाली रोजगार की सुरक्षा को खत्म किया जाए और न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान समाप्त हो। मालिक अपनी मर्जी से श्रमिकों को बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप और कानूनी व्यवधान के रखें और निकालें। नवउदारवादी शिक्षा और भोजन के अधिकार के खिलाफ हैं। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की जवाबदेही से भी विश्व बैंक की कठपुतलियाँ मुक्त होना चाहती हैं। कुल मिलाकर अनिश्चितता का वातावरण है और बिहार चुनाव भी उससे बाहर नहीं हैं। 

बिहार के चुनाव मेलों में ऐसा बहुत कुछ नहीं होता जो होना चाहिए, यही वजह है कि आंकड़ों से आकलन करने वाले रुचिर शर्मा जैसे वैश्विक चिंतक का यह मानना है कि ‘यह राज्य पिटे हुए शेयरों की तरह दिखता है: बेहद सस्ता, दिशाहीन लेकिन उसमें उठने की संभावना ज़रूर है’। 

यह ‘उठने की संभावना’ भी इस चुनाव मेले में नज़र नहीं आती।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)  

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