Wednesday, December 7, 2022

गांधी की दांडी यात्रा-12: गांधी के नमक कानून तोड़ने के साथ ही बौखला गयी ब्रिटिश सत्ता

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5 अप्रैल 1930 को, गांधी और उनके सत्याग्रही सहयात्री, दांडी गांव पहुंच गए थे। दांडी में, उनका स्वागत करने के लिए, सरोजिनी नायडू, वहां पहले ही, पहुंच चुकी थीं। सरोजिनी नायडू (13 फरवरी 1879 – 2 मार्च 1949) का जन्म भारत के हैदराबाद नगर में हुआ था। इनके पिता, अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक नामी विद्वान तथा सरोजनी नायडू की माँ, कवयित्री थीं और बांग्ला में कविताएं लिखती थीं। सरोजनी नायडू, 1895 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए, इंग्लैंड गईं, पढ़ाई के साथ-साथ, कविताएँ भी लिखीं, गोल्डन थ्रैशोल्ड, बर्ड ऑफ टाइम तथा ब्रोकन विंग उनके कविता संग्रह प्रकाशित हुए। साल, 1898 में सरोजिनी का विवाह डॉ॰ गोविंदराजुलू नायडू से हुआ। 1914 में इंग्लैंड में वे पहली बार गाँधीजी से मिलीं और उनके विचारों से प्रभावित होकर देश के लिए समर्पित हो गयीं। 

उन्होंने अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया, उनका नेतृत्व किया और जेल भी गयीं। उनके भाषण, जनता के हृदय को झकझोर देते थे। वे बहुभाषाविद थीं और अपना भाषण अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला या गुजराती में देती थीं। वर्ष 1925 में, कानपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की, वे अध्यक्षा बनीं और साल 1932 में भारत की प्रतिनिधि बनकर, दक्षिण अफ्रीका भी गईं। आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश की पहली राज्यपाल बनीं। 2 मार्च 1949 को, उनका देहांत हो गया। सरोजनी नायडू, उन वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं में थीं जिन्होंने, गांधी जी के नमक सत्याग्रह की सफलता और उसके प्रभाव पर संदेह जताया था। अब वे, नमक सत्याग्रह के पहले ही, इस महान घटना के चश्मदीद के रूप में, दांडी पहुंच गई है। 

5 अप्रैल 1930 की रात को, गांधी ने अपनी तेल मालिश कराई और, निश्चिंतता से, अच्छी तरह सो गए। हमेशा की तरह, अगली सुबह वह साढ़े चार बजे, सोकर उठे, और नित्य क्रिया से निवृत्त होकर, प्रार्थना सभा में उपस्थित हुए और नमक कानून, तोड़ने वाली टोली के साथ, उनका नेतृत्व करते हुए, सागर तट की ओर चल दिए। सागर तट पर जनता की भीड़ उमड़ी पड़ी थी। महात्मा गांधी की जय, के नारे लग रहे थे, और सरकारी अधिकारियों का दल, दूर खड़ा यह दृश्य देख रहा था। उन्हें, न तो इस सत्याग्रह को रोकने का निर्देश दिया गया था, और न ही उन्हें, यह पता था कि, नमक कानून तोड़ देने के बाद, क्या कार्यवाही करनी है। देशी विदेशी अखबारों के फोटोग्राफर और, रिपोर्टर, अपनी आंखों के सामने, इतिहास बनता देख रहे थे।

गांधी ने, ‘महात्मा गांधी की जय’ के गगनभेदी घोष के बीच, सागर के पानी में प्रवेश किया। वे, एक छोटे से गड्ढे में पड़ी प्राकृतिक नमक के ढेलों को लेने के लिए, आगे बढ़ रहे थे। किनारे पर सागर का नमकीन पानी, कहीं कहीं प्राकृतिक गड्ढों में इकट्ठा हो और सूख कर नमक के ढेलों में बदल जाता है। उन्हें, शोधित कर, बेहतर नमक बनाया जाता है। गांधी ऐसे ही एक नमक के ढेलों से भरे गड्ढे को ढूंढ रहे थे। अन्य लोग भी उनके साथ-साथ ऐसे ही नमक के गड्ढों की खोज कर रहे थे। गांधी ने एक गड्ढा देखा, झुके और उसमें पड़े हुए नमक के ढेलों को उठाया और उसे उछाल दिया। इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी सरोजिनी नायडू, गांधी जी के साथ ही थी। उन्होंने, गांधी को संबोधित करते हुए, जोर से नारा लगाया, ‘(नमक) कानून तोड़ने वाले की जय हो।’ सरोजनी नायडू का यह घोष, दुनिया भर में, वहां उपस्थित रिपोर्टरों ने, फ्लैश कर दिया। 

घटना को कवर करने वाले पत्रकार, एक दूसरे को आगे पीछे करते हुए गांधी जी के पास पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। सरोजनी नायडू ने इसका बहुत सुंदर विवरण दिया है। सरोजनी नायडू अपने से जुड़ी राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख भी, अपनी बेटी, पद्मजा को लिखे पत्रों में करती रहती थीं। उनके पत्र, न केवल, महात्मा गांधी और कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं, और कांग्रेस की गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, बल्कि उनसे तत्कालीन बड़े नेताओं के निजी जीवन के बारे में भी, बहुत कुछ जानकारी मिलती है।

सरोजनी नायडू, गांधी जी के निकट थीं तो वे, मुहम्मद अली जिन्ना के भी बहुत करीबी थीं। उनकी पुत्री, पद्मजा, जिन्ना की पत्नी रत्ती की बहुत अच्छी दोस्त थीं। ‘मिस्टर एंड मिसेज जिन्ना’ के नाम से लिखी गई, शीला रेड्डी की पुस्तक में, सरोजनी नायडू के पत्रों के उद्धरण से, तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों की बहुत सी रोचक जानकारी मिलती है। इसी तरह, सरोजनी नायडू ने, नमक सत्याग्रह के बारे में भी, 6 अप्रैल 1930 की घटना का बहुत रोचक और तथ्यात्मक विवरण, पद्मजा नायडू को भेजे अपने पत्रों में किया है। 

सरोजनी नायडू लिखती हैं, “कानून तोड़ने वाला, यह दुबला पतला सा शख्स, अपने कमरे में चुपचाप, मौन होकर बैठा है। (गांधी, नमक कानून तोड़ने के बाद वापस, जहां रुके थे, वहां आ गए थे) जो यंग इंडिया (गांधी जी का अखबार) के लिए अपने विजय लेख (सत्याग्रह की सफलता) लिखने में जुटा हुआ है। मैं एक विशाल कमरे की खुली खिड़की के पास, एक सख्त बेंच पर आराम से बैठी हुई हूं, जिसमें समुद्री हवा के आने के लिए छः खिड़कियां खुली हुई हैं। जहां तक मेरी नजर जाती है, वहां हजारों तीर्थयात्रियों की भीड़ है, जो कल से मछुआरों के इस निर्जन और अत्यंत आदिम गांव में, आ कर डेरा जमाए हैं। काश तुम यहाँ होती। (यह बात वे अपनी बेटी पद्मजा के लिए कह रही हैं), हालाँकि तुम यहाँ ज़िंदा भी नहीं पहुँच पाती। नवसारी से, यहां (दांडी का) तक का रास्ता भयावह है, और यहां कोई भी व्यक्ति, नमक के दलदल में, पांव रखे बिना, एक गज भी नहीं चल सकता है! और खाना ! कल, कुत्तों के खाने से भी बुरा हाल, यहां खाने का था। लेकिन आज से, वालंटियरों के पास जो राशन है, उसके अलावा कुछ नहीं है। वह भी, चना और कुछ गुड़ ! हालाँकि, मेरे पास एक विशाल शयनकक्ष और एक साफ-सुथरा स्नानघर है। यह ईश्वर की कृपा है।”

दांडी में दुनिया भर के अनेक महत्वपूर्ण अखबारों के रिपोर्टर आए हुए थे। सबको इस बात की जल्दबाजी थी, कि, वे जितनी जल्दी हो सके इस घटना के चित्र और खबरें अपने अपने अखबारों तक, पहुंचा सकें। गांधी एक वैश्विक व्यक्तित्व बन चुके थे। दांडी के नमक सत्याग्रह को कवर करने आए ज्यादातर युवा पत्रकार, इस घटना को लेकर उत्तेजित थे और उनके सवालों का जवाब सरोजनी नायडू दे रही थीं। गांधी से वे, मिलना और उनका वक्तव्य सुनना चाहते थे। सत्याग्रह के बाद, देश भर में इसकी क्या प्रतिक्रिया होती है और फिर सरकार, क्या करती है, यह सब सवाल पत्रकारों के दिमाग में उमड़ रहे थे। पर उस छोटे से, अचानक चर्चित हो गए गांव, दांडी से समाचार संप्रेषित करने के लिये, पास में ही स्थित, एक गांव, जलालपुर में, केवल एक छोटा सा पोस्ट ऑफिस और तार घर था।

तार ही समाचार भेजे जाने का एकमात्र माध्यम था। वहां मुश्किल से, 7 व्यक्ति ही नियुक्त थे जो भारी संख्या में भेजे जाने वाले टेलीग्राम को लेकर परेशान थे। हालांकि इस घटना की व्यापक रिपोर्टिंग को देखते हुए, बंबई के पोस्ट मास्टर जनरल ने, पर्याप्त स्टाफ भी अहमदाबाद और बंबई से भेज दिया था। गांधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ने के बाद, जलालपुर के तारघर से, कम से कम 700 तार, बाहर, भेजे गए थे। असाधारण रूप से भारी इस तार यातायात को सुगमता से निपटाने के लिए बंबई के पोस्टमास्टर जनरल, बेवूर जो एक भारतीय थे, द्वारा बहुत कुशलता से सुगम बनाया गया था। हालांकि, पोस्ट मास्टर जनरल के इस कृत्य से, वायसरॉय, बाद में, बहुत नाराज भी हुए। 

पत्र में, सरोजनी नायडू ने लिखना जारी रखा, “बॉम्बे प्रेसीडेंसी के पोस्ट मास्टर जनरल, जिन्होंने जलालपुर डाक और तारघर में नियुक्त कुछ कर्मचारियों को, अचानक आ पड़े, काम के बोझ को, आसान बनाने के लिए, कई सिग्नलमैन भेजे थे, से लगातार, इस सत्याग्रह के बारे में, निरंतर और विस्तार से, अद्यावधिक खबरें मांगी जा रही थीं।  7 अप्रैल को ही,  गांधी द्वारा नमक कानून तोड़ने के एक दिन बाद ही, भारत सरकार द्वारा एक नाराजगी भरा पत्र बॉम्बे (गवर्नर को) भेजा गया था। यह पत्र, पोस्ट मास्टर जनरल के ऊपर वायसरॉय की नाराजगी से जुड़ा था। पत्र में लिखा था, क्या यह एक गलती नहीं थी, कि, गांधी के इस सत्याग्रह को इतने प्रचार का अवसर दिया जाता ?”

वायसरॉय की नाराजगी थी कि, “जलालपुर डाक तार घर में टेलीग्राम भेजने के लिये इतनी सुविधा यानी अतिरिक्त कर्मचारी वहां तैनात करने की ज़रूरत क्या थी? सुविधाजनक रूप से यह सत्याग्रह प्रचारित हो जाय, यही तो, निस्संदेह, मिस्टर गांधी और उनके अनुयायी चाहते हैं ? सरकार ने, गांधी की दांडी यात्रा के, शुरुआती दौर में बनने वाली फिल्मों पर भी प्रतिबंध लगा दिया था ताकि इस घटना का बहुत प्रचार न हो सके। पर अब, डाक तार विभाग की एक गलती से, प्रेस संवाददाताओं ने यात्रा की सफलता के अत्यधिक रुप से दुनियाभर में प्रचारित कर दिया।”

आगे सरोजनी नायडू ने लिखा, “पोस्टमास्टर जनरल, बेवूर नाम का एक भारतीय है, को कोई पछतावा (जलालपुर तारघर पर अतिरिक्त स्टाफ भेजने के निर्णय को लेकर) नहीं था। पोस्ट मास्टर जनरल ने, शिमला जहां वायसरॉय थे, को बताया कि, ‘उनका विभाग, ‘अधिकृत संवाददाताओं द्वारा पेशकश किए जाने पर प्रेस तार यातायात को (भेजने के लिये) मना नहीं कर सकता था। हम इसके (टेलीग्राम भेजने के) लिए,  उनसे पैसे लेते हैं और संदेश भेजना हमारा कर्तव्य है।’ अगर पीएमजी, बेवूर ने, (जलालपुर तारघर पर) अतिरिक्त सिग्नलमैन नहीं भेजे होते, तो ‘गंभीर शिकायतें होतीं और शायद तब मुझको (पोस्ट मास्टर जनरल बेवूर को) यह स्पष्ट करने के लिए बुलाया जाता कि, मैंने प्रत्याशित तार यातायात से निपटने के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए’। उन्होंने (पीएमजी बेवूर ने) स्पष्ट रूप से कहा कि, गांधी के साथ आने वाले पत्रकार ‘अंग्रेजी प्रेस सहित सभी प्रकार के समाचार पत्रों’ से संबंधित हैं।”

एक तरफ तो सरकार ने, प्रारम्भ में, नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा को गंभीरता से नहीं लिया। बॉम्बे के गवर्नर द्वारा, दिल्ली को, बार बार यह रिपोर्ट, कि ‘गुजरात ही नहीं बम्बई प्रेसिडेंसी सहित देश भर में, इस सत्याग्रह का व्यापक असर पड़ेगा’, भेजे जाने के बाद भी, वायसरॉय की तरफ से, न तो सविनय अवज्ञा आंदोलन को रोकने या गांधी जी को गिरफ्तार करने, जैसा कोई कदम नहीं उठाया गया और जब सत्याग्रह सम्पन्न हो गया और, दुनिया भर में यह खबर फैल गई तो, वायसरॉय की सारी नाराज़गी, डाक तार विभाग पर आ गई।

कराची के एक ब्रिटिश राज समर्थक अखबार भी, डाक तार विभाग पर दोषारोपण करते हुए, इस बात से नाराज था कि ‘आम जनता की सुविधा और उन्नति के लिए एक ‘अच्छी और सौम्य’ सरकार (ब्रिटिश सरकार) द्वारा निर्माण की गई सुविधाओं’ का इस्तेमाल गांधी द्वारा ‘लंबे समय तक, ‘इस महान देश मे’ अपने जहर को फैलाने के लिए’ किया जाना चाहिए था?’ अखबार आगे तीखी शब्दावली में टिप्पणी करते हुए लिखता है, “गांधी ने, खुद एक बार रेलवे और टेलीग्राफ को आधुनिकता की कलाकृतियों के रूप में खारिज कर दिया था, और यह भी कहा था कि, भारत इनके बिना भी जी सकता है। और अब, जिस सरकार का उन्होंने (गांधी ने) विरोध किया था, ‘अपने विनाशकारी अभियानों को आगे बढ़ाने के लिए’ उन तकनीकों का ही उपयोग किया, जिसे उन्होंने (एक समय) बेकार मान लिया था।’

वायसरॉय लॉर्ड इरविन, गांधी जी की गिरफ्तारी को लेकर शुरू से ही, भ्रम के शिकार रहे, जबकि बॉम्बे के गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स, गांधी जी को, यात्रा के प्रारंभ में ही गिरफ्तार करने के पक्ष में थे। लॉर्ड इरविन की प्राथमिकता, गांधी की गिरफ्तारी को तब तक के लिए, स्थगित करने के पक्ष में थी, जब तक कि असेम्बली का सत्र समापन नहीं हो जाता। वायसरॉय यह नहीं चाहते थे, गांधी की गिरफ्तारी को लेकर असेम्बली में कोई तमाशा खड़ा हो जाय। ज्ञातव्य है कि, तब असेंबली का सत्र चल रहा था। वाइसरॉय, चाहते थे कि, असेम्बली के सत्रावसान के बाद, गांधी जी को कभी भी गिरफ्तार कर लिया जाय। गांधी जी को, गिरफ्तार करने की अनुमति के लिये, जब बॉम्बे के गवर्नर सर फ्रेडरिक साइक्स, वायसरॉय लॉर्ड इरविन से मिलने आये तो, इरविन ने, साइक्स को असेम्बली के सत्रावसान तक गिरफ्तारी न करने की सलाह दी और यह भी निर्देश दिया कि, यदि गांधी की दांडी यात्रा के दौरान स्थिति तेजी से बिगड़ती है तो, उन्हें (वाइसरॉय को) तत्काल सूचना दी जाय।’ 

लेकिन गांधी को तब तक गिरफ्तार नहीं किया गया, जब तक कि वे दांडी नहीं पहुंच गए। बॉम्बे प्रेसिडेंसी के गवर्नर सामने, दिक्कत यह थी कि, गांधी का पूरा सविनय अवज्ञा आंदोलन, उनके मूल सिद्धांतों, अहिंसा पर टिका था। किसी कानून का उल्लंघन हो भी नहीं रहा था, यहां तक कि, नमक कानून का भी नहीं। 6 अप्रैल की सुबह साढ़े छः बजे तक तो नमक कानून तोड़ा भी नहीं जा सका था। गांधी, ग्रामीण इलाकों में, गांव गांव को जोड़ने वाली सड़कों पर जा रहे थे, सभाएं कर रहे थे। सभाओं में भी वे जो कह रहे थे, उनसे किसी दंडनीय कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा था। लोगों से वे, एकजुट रहने, अन्याय न सहन करने, आज़ादी के लिये संघर्ष करने, सरकारी नौकरियों या मुखिया के पद से इस्तीफा देने की बात कर रहे थे।

इसी के साथ साथ वे, लोगों से, अस्पृश्यता की मानसिकता छोड़ने, साफ सफाई से रहने, चरखा कातने और स्वावलम्बन, स्वदेशी आदि की भी बातें करते थे। लोगों को अहिंसा की बात समझाते थे। अब अगर, सरकार गांधी को गिरफ्तार भी करती तो, कैसे करती और किन कानूनों में करती? साथ ही सरकार को, यह भी आशंका थी कि, कहीं नमक कानून तोड़ने से पहले ही, की गई गांधी की गिरफ्तारी पर कोई, देशव्यापी प्रतिक्रिया न हो जाय। सरकार की यह आशंका गलत भी नहीं थी। 

बंबई के गवर्नर फ्रेडरिक साईक्स और वाइसरॉय लॉर्ड इरविन के बीच जो पत्राचार, नमक सत्याग्रह के दौरान चल रहा था, उसमे केंद्र और बंबई सरकार के बीच मतभेद स्पष्ट दिख रहे थे। लेकिन, सरकार का इरादा इस समय, गांधी को छेड़ने का नहीं था क्योंकि, वह केवल, राजद्रोह का प्रचार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने किसी ऐसे आपराधिक कृत्य में भाग नहीं लिया था, जो राजद्रोहात्मक हो। सरकार की योजना थी कि, गांधी और उनकी गतिविधियों को नज़रअंदाज किया जाय और, उन्हें खुद ही, ‘उपहास का पात्र बन कर अप्रासंगिक हो जाने दिया जाय।’ गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स ने अपनी आत्मकथा में दांडी यात्रा और गांधी की गिरफ्तारी पर ब्रिटिश सरकार के असमंजस का उल्लेख किया है। ज्योत्स्ना तिवारी की किताब, साबरमती टू दांडी में, साइक्स की आत्मकथा का उल्लेख है। यह किताब सेवाग्राम आश्रम से प्रकाशित है और सेवाग्राम आश्रम की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। साइक्स की आत्मकथा में इस घटना के बारे में, उल्लेख है, 

” दोनों, कैरा के कलेक्टर, मास्टर और उत्तरी डिवीजन के कमिश्नर गैरेट, इस यात्रा को, पूरी तरह से बंद करा देने के लिए उत्सुक थे। शुरू से ही उन्हें (कलेक्टर, कैरा और कमिश्नर नॉर्थ डिवीजन, जिसमें यात्रा मार्ग पड़ता था) लगता था कि गांधी को बहुत अधिक ढील दी जा रही है और उन्हें खुद को हास्यास्पद बनाने की अनुमति देने की नीति, एक भ्रम पर आधारित है।” 

निश्चित ही कलेक्टर, और कमिश्नर, को जमीनी हकीकत अधिक अच्छी तरह अवगत होगी। उनके खुफिया सूचना तंत्र और अन्य संपर्क सूत्र, दिन प्रतिदिन दांडी यात्रा की लोकप्रियता और उसके प्रभाव को, अपनी रिपोर्टों के माध्यम से, उन्हें अवगत कराते होंगे। गवर्नर का भी विचार, जिले के कलेक्टर और डिविजनल कमिश्नर की रिपोर्ट और मशविरे के आधार पर ही बना होगा। 

ज्योत्स्ना तिवारी की उपरोक्त किताब में, गवर्नर साइक्स को उद्धरित करते हुए लिखा गया है, “हालांकि मैं (गवर्नर साइक्स) व्यक्तिगत रूप से यात्रा के प्रचार, प्रभाव के बारे में असहज था। लेकिन, यह आवश्यक था कि हम, केंद्र सरकार की इच्छा के अनुरूप कार्य करें। मैंने तदनुसार उन अधिकारियों (कलेक्टर और कमिश्नर) को गोपनीय आदेश जारी किए, जिनके जिलों से गांधी और उनके अनुयायियों को गुजरना था। मैंने बताया कि, भारत सरकार की राय में, सामान्य कानून, (गांधी की दांडी) यात्रा में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता है, बशर्ते कि वह शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा हो।

हालांकि नमक बनाना अवैध था, फिर भी, (नमक कानून के उल्लंघन का) यह अपराध इतना छोटा था कि, गंभीरता से, संज्ञान लेने योग्य भी नहीं था। गांधी की असामयिक गिरफ्तारी, उन्हें केवल, एक शानदार शहादत देगी, जो वे चाहते थे, और इसके अलावा, संभवतः उनके अनुयायियों के बीच हिंसा भी भड़क सकती थी। कारावास की अधिकतम अवधि, जिसके लिए, गांधी को, उनकी यात्रा के दौरान, गिरफ्तार किया जाएगा, यदि हम वास्तव में अपराध होने तक, उन्हें (गांधी को) गिरफ्तार करते हैं, तो, उससे बहुत कम होगा।” 

सर फ्रेडरिक साइक्स, बॉम्बे प्रेसिडेंसी के, 1928 से 1931 तक गवर्नर रहे हैं। गांधी की दांडी यात्रा से जुड़े, सारे दस्तावेज, ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। साइक्स और इरविन के बीच गांधी की गिरफ्तारी को लेकर मतभेदों पर, 26 मार्च 2017 को, गांधी स्ट्रेटेजी फ़ॉर सक्सेस – यूज मोर दैन वन स्ट्रेटेजी, शीर्षक से,मार्क के एंगलर और पॉल एंगलर ने एक शोध प्रबंध लिखा है जो, रेसिलिएन्स (Resilience.com) की वेबसाइट पर उपलब्ध है। उन्होंने, गवर्नर फ्रेडरिक साइक्स को उद्धृत करते हुए लिखा,

“बॉम्बे के गवर्नर सर फ्रेडरिक साइक्स ने मई 1930 में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा: “अब इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना आवश्यक है कि हम कमोबेश खुले विद्रोह का सामना कर रहे हैं … और यह कि यह सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से एक समूह (कांग्रेस पार्टी) द्वारा समर्थित है। जनसंख्या का बहुत बड़ा वर्ग गांधी के साथ है। हमारे पास, व्यवहारिक रूप से खुले तौर पर, कोई सक्रिय मित्र नहीं है। ” एक पुलिस सुपरिटेंडेंट ने, अपने जिले में इन हालात का वर्णन, इस प्रकार किया, “जिले के एक बड़े हिस्से में, लगभग युद्ध की स्थिति है।”

नमक कानून तोड़े जाने का क्या असर, देश में हुआ, यह हम अगले भाग में पढ़ेंगे, पर नमक कानून पर, जिस तरह से, इस सविनय अवज्ञा आंदोलन को, ब्रिटिश सरकार ने, विशेषरूप से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने, देखा और वे, एक ऊहापोह की स्थिति में रहे, इसे लेकर, ब्रिटेन के अखबारों और गांधी विरोधी और प्रबल साम्राज्यवादियों में, लॉर्ड इरविन के खिलाफ गंभीर विपरीत प्रतिक्रिया हुई। 

निकट और दूर के पर्यवेक्षक, इन हालातों पर, पल पल की खबर रखने वाले, इस घटना का क्या और कितना प्रभाव पड़ेगा, इसे, वे समझ सकते थे। इंग्लैंड में, विंस्टन चर्चिल, जो उस समय संसद के कंजरवेटिव दल के सदस्य थे, ने साम्राज्य की ठीक से रक्षा करने में अपनी सरकार की अक्षमता के रूप में, इस सत्याग्रह के प्रति, भारत सरकार के प्रशासनिक निर्णय को देखा और अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भारत में नियुक्त, अनेक ब्रिटिश अधिकारी भी, लॉर्ड इरविन के, सत्याग्रह के बारे में, ढुलमुल रवैए से, व्यथित थे। साल 1930 के अंत तक, भारत का जनमानस बदलने लगा था। इस सत्याग्रह ने, लोगों को, ब्रिटिश गुलामी से मुक्त होने के लिए झकझोर दिया। इसका कारण केवल, गांधी के राजनीतिक आंदोलन, चंपारण, खिलाफत और असहयोग ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव के वे आंदोलन भी थे, जो अस्पृश्यता के विरोध और स्वदेशी, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के लिए, चरखा और खादी से जुड़े थे। नमक सत्याग्रह के बाद, स्वाधीनता संग्राम में, जो जन जागरण हुआ, उसमें, सामाजिक आंदोलन की भागीदारी को, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। 

ब्रिटिश राज के खिलाफ, बड़े पैमाने पर, गांधी का, असहयोग अभियान पूरे देश में फैल गया था। इसी शोध पत्र में लिखा है, 

“गांधी और उनके धार्मिक समुदाय के लगभग 80 अनुयायियों ने खनिज पर ब्रिटिश एकाधिकार का विरोध करते हुए नमक मार्च निकाला था। अभियान के पूरा होने पर, 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 29,000 एक समय में, गर्व के साथ जेलों में थे। उनके रैंकों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई सबसे प्रमुख व्यक्ति थे, जिनमें वे, राजनेता भी शामिल थे, जो कभी अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई का समर्थन करने के लिए अनिच्छुक रहा करते थे। भारतीय, न केवल अवैध रूप से नमक का उत्पादन कर रहे थे, बल्कि, सरकारी नमक उत्पादन और उनकी धुलाई की, नाकाबंदी भी कर रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे, सत्याग्रहियों को रोकने और जेल भेजने का प्रयास बढ़ता गया, गांधी के अभियान ने, अलग अलग, रणनीति की एक समृद्ध श्रृंखला अपनानी शुरू कर दी। सैकड़ों, हजारों की संख्या में, ग्रामीणों ने, भूमि और लकड़ी के करों का, भुगतान करने से इनकार कर दिया। सिविल सेवकों ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। गुजरात के एक जिले में, (यह सूरत के संदर्भ में है) एक तिहाई स्थानीय अधिकारियों ने घोषणा की कि वे अपने पद छोड़ देंगे, और कार्यकर्ताओं ने भारत में ब्रिटिश आयात का संगठित बहिष्कार शुरू कर दिया।” एक इतिहासकार के शब्दों में, “कलकत्ता, भागलपुर, दिल्ली, अमृतसर और बॉम्बे सहित प्रमुख कपड़ा केंद्र, “[हड़तालों], धरना और व्यवसायियों द्वारा किए गए स्वतःबंद के परिणामस्वरूप 1930 के अधिकांश भाग के लिए एक स्पष्ट ठहराव पर आ गए।  “

– क्रमशः 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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