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Categories: बीच बहस

क्या बाड़ ही खाने लगा है बीजेपी का खेत? विशेष संदर्भ उत्तराखंड

कुर्सी पर रहते हुए अपनी आभा गँवाने वाले भगवा नेताओं की सूची में त्रिवेन्द्र सिंह रावत सबसे नया नाम है। संघ-बीजेपी भी उनके चार साल के कार्यकाल से बेहद नाख़ुश थे। उनकी नज़र में भी इनका रिपोर्ट कार्ड फिसड्डी ही था। तभी तो उन्हें साफ़ दिखने लगा कि त्रिवेन्द्र को हटाये बग़ैर उत्तराखंड में सत्ता के पतन को टाला नहीं जा सकता। हालाँकि, त्रिवेन्द्र के साथ कोई अनहोनी नहीं हुई। वो भी पार्टी में अपने सभी पूर्ववर्तियों की परम्परा को निभाते हुए अल्पायु को प्राप्त हुए। बीजेपी के लिए सबसे दुःखद है कि उसने साल 2000 में उत्तराखंड बनने के बाद से जिसे भी मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया वो सभी लचर और अलोकप्रिय प्रशासक तथा कमज़ोर राजनेता ही साबित हुए।

बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों नित्यानन्द स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चन्द्र खंडूरी और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की तरह त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी न तो मुख्यमंत्री बनने से पहले बड़े जनाधार वाले लोकप्रिय नेता थे और ना ही मुख्यमंत्री रहते ऐसी शख़्सियत बन पाये। दुर्भाग्यवश यही अयोग्यताएँ नये मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के पीछे भी खड़ी हैं। लिहाज़ा, यदि मौजूदा विधानसभा के आख़िरी साल में तीरथ सिंह रावत भी उत्तराखंड में बीजेपी की लुटिया डूबने से नहीं बचा सके तो किसी को ताज़्ज़ुब नहीं होना चाहिए। क्योंकि चार साल की ख़ामियों की भरपाई तीरथ सिंह एक साल में शायद ही कर पाएँ।

उत्तराखंड के सियासी घटनाक्रम को देखकर ये आसानी से समझा जा सकता है कि वहाँ बीजेपी की लोकप्रियता तेज़ी से गिरी है। इसीलिए मुख्यमंत्री बदलने का प्रयोग किया गया है। बीजेपी ने ऐसा ही प्रयोग 1998 में दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा को हटाकर सुषमा स्वराज की ताजपोशी करके भी किया था। लेकिन सुषमा भी पार्टी के पतन को नहीं सम्भाल सकीं। झारखंड में भी 2019 के विधानसभा चुनाव से काफ़ी पहले बीजेपी जान चुकी थी कि रघुवर दास की मिट्टी पलीद है। लेकिन वहाँ चेहरा नहीं बदला और सत्ता हाथ से चली गयी। कमोबेश यही हाल छत्तीसगढ़ में डॉ रमन सिंह का, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान का, राजस्थान में वसुन्धरा राजे का, महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस का और हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर का रहा।

गुजरात में भी विजय रुपानी का प्रदर्शन ख़राब ही था। गनीमत थी कि वहाँ मोदी-शाह की छवि ने उनकी नैय्या पार लगा दी। दोनों को गुजरातियों से अपने नाम पर वोट माँगना पड़ा। रुपानी और आनन्दी बेन पटेल के कामकाज की प्रदेश में कोई धाक नहीं थी। रुपानी की छवि अब भी जनाधार विहीन नेता वाली ही है। असम में सर्वानन्द सोनोवाल की परीक्षा अभी चालू है तो उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ का इम्तिहान अगले साल उत्तराखंड के तीरथ सिंह रावत के साथ ही होगा। त्रिपुरा में बिप्लब देब की छवि भी सिरफिरी बातें करने वाले नेता की है। गोवा के प्रमोद सावन्त और हिमाचल के जय राम ठाकुर भी अपने बूते तो बेजान ही हैं। इन दोनों को भी प्रदेश में सत्ता वापसी करवाने लायक नेता नहीं माना जाता। बिहार में भी बीजेपी सत्ता में भले है, लेकिन है तो पिछली सीट पर ही।

कुलमिलाकर, जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता क़ायम है, वहीं किसी भी भगवा मुख्यमंत्री की लोकप्रियता ऐसी नहीं है कि वो संघ के बेजोड़ कॉडर की ताकत का इस्तेमाल करके अपने राज्य में बीजेपी की सत्ता-वापसी करवा सके। अपनी उपलब्धियों की बदौलत किसी मुख्यमंत्री की सत्ता में वापसी बहुत मुश्किल दिखती है। इसकी सीधी सी वजह है कि ‘बरगद के नीचे कभी कोई और पेड़ नहीं पनपता!’

संघ और बीजेपी ने जाने-अनजाने में नरेन्द्र मोदी को बरगद जैसा बना डाला। उनमें देवत्व की स्थापना की। इससे केन्द्र की सत्ता तो पार्टी की मुट्ठी में बनी रही, लेकिन प्रादेशिक नेतृत्व कभी आत्मनिर्भर नहीं बन सका। प्रादेशिक क्षत्रपों की कोई धाक नहीं बन सकी। उल्टा वो मोदी-जीवी बनता चला गया। मनुष्य में देवत्व की स्थापना का ऐसा दुष्परिणाम होना स्वाभाविक है। भाषण, नारा, वादा, इरादा, शोर, तमाशा वग़ैरह में जब खोखलापन ज़्यादा होगा तो प्रादेशिक क्षत्रपों की छवि का ढोल जैसा बनना लाज़िमी है।

जब सत्ता के अच्छे कामों का सारा श्रेय ‘बरगद’ बटोर लेगा, जब बरगद के ही देवत्व का महिमामंडन होगा तो सरकार की नाकामियों का ठीकरा मोदी-जीवियों पर ही तो फूटेगा। छुटभइए नेता, सांसद, विधायक जब पार्टी की गिरती साख से आहत होंगे तो इन्हीं परजीवियों पर ही तो निशाना साधेंगे। देवता में अवगुण देखने को पहले ही पाप बताया जा चुका है। दरअसल, देवत्व का सबसे बड़ा दुर्गुण ये होता है कि उसे हर मर्ज़ की दवा या चमत्कार बताया है। हालाँकि, देवत्व के चमत्कार की सारी अवधारणा ही मिथक और आभासी होती है। ये तथ्य न सिर्फ़ भगवा ख़ानदान पर बल्कि काँग्रेस समेत सभी दलों पर लागू हैं।

दूसरा दिलचस्प तथ्य ये है कि मोदी एक ऐसे बल्लेबाज हैं जिस पर अकेले की बैटिंग करने का नशा सवार है। वो ओवर की आख़िरी गेंद पर अपना छोर बदल लेते हैं, और लगातार अकेले ही बैटिंग करना चाहते हैं। साथी बल्लेबाज तो कभी-कभार ही कोई गेंद खेल पाता है। बेचारा क्रीच पर तो लम्बे अरसे तक नज़र आता है, लेकिन रन नहीं बना पाता। उसका स्ट्राइक रेट लड़खड़ा जाता है। नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली या बल्लेबाजी की अदा ने सारे भगवा मुख्यमंत्रियों की दशा रन नहीं बना पाने वाले घटिया बल्लेबाज़ों जैसी बना दी है। इसीलिए नव-नियुक्त बल्लेबाज यानी मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत से भी उम्मीदें रखना ठीक नहीं।

तीसरा तथ्य ये है कि मोदी युग में पार्टी की सारी ब्रॉन्डिंग सिर्फ़ प्रधानमंत्री पर केन्द्रित रहती है। मेनस्ट्रीम मीडिया हो या बीजेपी का मीडिया सेल, सभी मिलकर सिर्फ़ उस देवत्व की स्तुति करते हैं तो मन्दिर के मुख्य मंडप में सर्वोच्च आसन पर विराजमान है। मन्दिर प्रांगण में ही मौजूद अन्य चंगू-मंगू देवताओं पर तो कोई फूल चढ़ाने वाला भी नहीं है। नरेन्द्र मोदी की ऐसी कार्यशैली का भी भारी ख़ामियाज़ा बीजेपी के मुख्यमंत्रियों को उठाना पड़ता है। इसे दुःखद पाने या सुखद, लेकिन है तो ऐसा ही।

तीरथ सिंह रावत अभी से ही चुनावी मोड में चले भी जाएँ तो भी एक साल के भीतर गढ़वाल-कुमाऊँ और तराई वाले उत्तराखंड की फ़िज़ा में बिखरे जन-असन्तोष और बीजेपी के प्रति पनपी नाराज़गी को वो मिटा नहीं पाएँगे। मुखौटा बदल लेने से यदि पहचान भी बदल जाती तो फिर बात ही कुछ होती। पहचान तो बीजेपी है, त्रिवेन्द्र या तीरथ तो सिर्फ़ मुखौटा ही हैं। रावत की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के प्रति उत्तराखंड में पनपी उस नकारात्मकता को मिटाना है जो बीते चार साल में त्रिवेन्द्र सिंह रावत और नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यशैली से पैदा हुआ है।

मुमकिन है कि नयी सरकार देवस्थान बोर्ड के गठन और गैरसैंण में बनी नयी कमिश्नरी वाले फ़ैसलों को वापस ले ले। लेकिन भ्रष्टाचार की छवि इसका बहुत दूर तक पीछा ज़रूर करेगी। विकास कार्यों में तेज़ी लाने की छवि बनाना भी बहुत मुश्किल है। राज्य सरकारों का काम जनता को ज़मीन पर फ़ौरन दिखने लगता है। इसीलिए साल भर में उस कलंक को धोकर दिखाना आसान नहीं है जिसे पाने में चार साल लगे हैं। इसी तरह, राज्य की निकम्मी अफ़सरशाही को निष्ठावान और ऊर्जावान बनाना भी हँसी-खेल नहीं है।

अलबत्ता, ये ज़रूर मान सकते हैं कि बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों से जुड़े असन्तुष्टों और काँग्रेस छोड़कर आये नेताओं की मठाधीशी से निपटने में तीरथ सिंह रावत का पुराना अनुभव अवश्य उपयोगी साबित हो सकता है। क्योंकि तीरथ सिंह रावत न सिर्फ़ संघ के प्रचारक रह चुके हैं, बल्कि उन्होंने प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी भी सम्भाली है। लेकिन यदि वो मुख्यमंत्री पद के दमदार दावेदार होने का माद्दा रखते तो पार्टी ने चार साल पहले त्रिवेन्द्र की जगह उन्हें ही क्यों नहीं चुना होता? लोकसभा सदस्य के रूप में यदि उनकी धाक उम्दा होती तो वो मोदी सरकार में कम से कम राज्यमंत्री तो होते। इसीलिए जिस ढंग से बीजेपी ने उन्हें दिल्ली से पैरा-ड्रॉप किया है, वो सबूत है पार्टी ने एक बार फिर मामूली विकल्प ही हाथ रखा।

(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 11, 2021 2:44 pm

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