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Categories: बीच बहस

क्या विनोद दुआ ‘राष्ट्र के लिए खतरा’ हैं?

आदरणीय विनोद दुआ पत्रकारिता जगत के भीष्म पितामह हैं। देश और पत्रकारिता के लिए उनका समर्पण, उनकी निष्ठा, उनका त्याग बेशकीमती रहा है। दुआ जी के साथ मैंने सहारा समय और न्यूज वर्ल्ड इंडिया में काम किया है। विनोद दुआ और प्रभात डबराल जी ने सहारा समय में नौकरी देने के लिए मेरा इंटरव्यू लिया था।

दुआ जी के साथ व्यक्तिगत ताल्लुक का जिक्र इसलिए कि उनका जीवन पत्रकारिता में रच-बस जाने का रहा है जिसका साक्षी मैं खुद रहा हूं। यह जानकर हैरान हूं कि ‘विनोद दुआ देश के लिए खतरा’ हैं। अगर ऐसा है तो हम सब देश के लिए खतरा हैं। अपने पितामह भीष्म के लिए यह दुर्योधन वाली सोच देश का भला नहीं कर सकती।

जिन सज्जन ने विनोद दुआ जी को देश के लिए खतरा बताते हुए एफआईआर दर्ज करायी है, संयोगवश वह भी टीवी चैनलों पर मेरे पैन लिस्ट साथी हैं- बीजेपी के प्रवक्ता और नेता नवीन कुमार। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दें ताकि वे सूरज को रोशनी दिखाने से बाज आएं। नवीन कुमार की शिकायत में विनोद दुआ जी की पत्रकारिता पर जो अंगुलियां उठायी गयी हैं उन पर नजर डालना भी जरूरी लगता है-

– दिल्ली दंगे पर ‘गलत’ रिपोर्टिंग।

– पीएम, गृहमंत्री और कपिल मिश्रा को दिल्ली दंगे के लिए जिम्मेदार ठहराना।

– ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने पर ‘घटिया’ टिप्पणी

– सीएए-एनआरसी के आंदोलन की ‘गलत’ रिपोर्टिंग।

शिकायत नवीन कुमार की ज़रूर है लेकिन वास्तव में यह सत्ता प्रतिष्ठान की सोच है। यह सत्ता प्रतिष्ठान चला रहे दुर्योधनों की सोच है जो उस पितामह की निष्ठा पर भी संदेह कर लेता है जिसकी जिन्दगी का मकसद ही राज सिंहासन की सुरक्षा होता है।

लोकतंत्र के स्तम्भ कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि पत्रकारिता भी तब अपनी जिम्मेदारी निभाती नहीं दिख रही थी जब राजधानी दिल्ली दंगों में झुलस रही थी। लोगों की जान बचाने से ज्यादा प्राथमिकता अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को दी जा रही थी। दिल्ली पुलिस तीन दिन तक हाथ पर हाथ डाले बैठी रही। दिल्ली दंगाइयों के हवाले रही। दिल्ली पुलिस की इस कर्तव्य विमूढ़ता के कारण एक अफसर और हेड कांस्टेबल को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कई बड़े अफसर घायल भी हुए।

ऐसे समय में आवाज़ उठाने का साहस विनोद दुआ जैसे पत्रकार ही कर सकते थे। उन्होंने सच को सच कहने का साहस दिखाया। प्रधानमंत्री की चुप्पी, गृहमंत्री की निष्क्रियता और पुलिस की भूमिका को सामने रखा। दंगे से पहले की राजनीतिक पृष्ठभूमि को भी बताया। अनुराग ठाकुर जैसे मंत्री के गैर जिम्मेदाराना भाषण पर वे बोले। कपिल मिश्रा के निरंकुश नारे और पुलिस की लापरवाह मौजूदगी को सामने रखा। और, भी बहुत कुछ जो एक पत्रकार के लिए देश के सामने लाना जरूरी था।

सत्ता प्रतिष्ठान की नजर में यह रिपोर्टिंग अगर गलत है तो इसका मतलब यह है कि बाकी लोग जो रिपोर्टिंग कर रहे थे, वही सही है- सत्ता से जुड़े लोगों की भूमिका की पर्देदारी और दूसरी बातों पर फोकस। देश ने प्रशासन को सरकारी हुक्म का गुलाम रहते देखा है इसलिए उस पर आश्चर्य नहीं होता। मगर, देश ने पत्रकारिता को इस कदर सरकारी हुक्म का गुलाम होते नहीं देखा है जो आज दिख रहा है।

किसी घटना को देखने के तरीके से आप एक पत्रकार से सहमत या असहमत हो सकते हैं। आपको अदालत का दरवाजा खटखटाने का भी अधिकार है। मगर, विनोद दुआ जैसे पत्रकारिता के भीष्म पितामह को ‘देश के लिए खतरा’ बताने का अधिकार किसी के पास कैसे हो सकता है? यह काम अदालत का है जो आज बीजेपी के नेता करने लगे हैं।

आप सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हैं? बात क्यों नहीं करते? सरकार के पास क्यों नहीं जाते? सड़क जाम करने से दूसरों को तकलीफ होती है। आप जाएं, सरकार से बात करें और सड़क जाम खत्म कर जनता को मुश्किलों से निजात दिलाएं। इसे ही देशहित की पत्रकारिता का नाम दिया जाता है! मानो सरकार के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत सड़क जाम करने के लिए हुई हो! और, उसका अंत जाम से पैदा हुई मुश्किलों से निजात दिलाते ही हो जाता हो।

जेएनयू परिसर में छात्र संघ के नेताओं के साथ मारपीट करने वालों को आज तक नहीं पकड़ा जा सका। उल्टे उन नेताओं पर ही अन्य मामलों में मुकदमे ठोक दिए गये। जो पीड़ित छात्र है उसका अतीत खंगालना, पुराने किसी कुख्यात करार दिए गए मामलों से उन्हें जोड़ना और फिर यह मान लेना कि ऐसे लोगों के पास न्याय मांगने का अधिकार नहीं होता। यही आज देशहित की पत्रकारिता बन गयी है। विनोद दुआ जैसे पत्रकार इस दुर्योधनी पत्रकारिता को चुनौती देते हैं। वे जेएनयू में निर्दोष छात्र नेताओं की पिटाई की आवाज को बुलंद करते हैं। क्या इसीलिए वे देश के लिए खतरा हैं?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस घुसकर लाइब्रेरी में छात्र-छात्राओं से बर्बरता करती है। उस बर्बरता के शिकार छात्र-छात्राओं को न कोई राहत मिलती है, न कोई मरहम लगाता है। कोई मुआवजा तक नहीं मिलता। उल्टे उन छात्रों को जो न्याय मांगने में सक्रिय दिखते हैं उन्हें दिल्ली दंगे और दूसरे मामलों फंसा दिया जाता है। विनोद दुआ इन छात्रों के लिए न बोलें, तो वह देशहित में है। बोलें, तो देश के लिए वे ‘खतरा’ बन जाते हैं।

निश्चित रूप से पाठकों के मन में यह सवाल उठेगा कि जेएनयू में एबीवीपी के छात्रों पर हमले जो वास्तव में छात्र संघ नेताओं पर हुए हमले से पहले की घटना थी, जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी कैम्पस से छात्रों की पत्थरबाजी, अमानतुल्लाह खान की उकसावे वाली नारेबाजी, दिल्ली दंगे में ताहिर हुसैन जैसे लोगों के बारे में विनोद दुआ जैसे पत्रकार क्या चुप रह जाते हैं? नहीं, वे चुप नहीं होते। उन्हें बोलने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इन मामलों में सत्ता प्रतिष्ठान, उनकी पार्टी, उनकी पुलिस, उनके लोग पहले से इतना बोल रहे होते हैं कि इस आवाज के बजाए उस आवाज को बताना जरूरी हो जाता है जो इस शोर में दबा दिया जाता है।

अगर विनोद दुआ भी वही बोलेंगे जो दिल्ली पुलिस बोलती है, जेएनयू प्रशासन और दिल्ली सरकार बोलती है तो पीड़ित वर्ग के बारे में कौन बोलेगा? विनोद दुआ राष्ट्रधर्म निभा रहे हैं मगर राजधर्म नहीं निभा पा रही सरकार इस राष्ट्रधर्म की पवित्रता को नहीं जान पाती है। सत्ताधारी दल इस राष्ट्रधर्म से डरती है। इसलिए विनोद दुआ जैसे पत्रकार को ही राष्ट्र के लिए खतरा के तौर पर देखने लग जाती है।

विनोद दुआ महज एक पत्रकार नहीं हैं, पत्रकारिता की धारा हैं। इस धारा का प्रवाह बने रहना चाहिए। जिस दिन यह प्रवाह रुक जाएगा, पत्रकारिता की गंगा का जल अशुद्ध हो जाएगा, अपवित्र हो जाएगा। एक बात और, इस प्रवाह पर बांध लगाने के नतीजे कभी अच्छे नहीं होंगे और यह भी उतना ही निश्चित है कि गंगा का प्रवाह कोई रोक नहीं सकता।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल उन्हें टीवी चैनलों के विभिन्न पैनलों में बहस करते देखा सकता है।)

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