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Monday, September 20, 2021

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आख़िर वित्तमंत्री क्यों नहीं जानतीं कि देश में कितने हैं प्रवासी मज़दूर?

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सरकारें जब जनता के आक्रोश से डरने लगती हैं तब तरह-तरह के भ्रम फैलाती हैं। इन्हें अब साफ़ दिख रहा है कि कोरोना संकट से जुड़ी उसकी रणनीतियाँ औंधे मुँह गिर चुकी हैं। समाज के विशाल तबके तक सरकारी दावों और इरादों का ज़मीनी सच बेपर्दा होकर पहुँच रहा है। इसीलिए, अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने और जनता को बरगलाने के लिए वित्तमंत्री जैसे सर्वोच्च स्तर से रोज़ाना नये-नये भ्रम फैलाये जा रहे हैं। ऐसे झूठ की बदौलत प्रवासी मज़दूरों की संख्या और उनकी तकलीफ़ों को कमतर करके पेश किया जा रहा है। इसी तरह, श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने और लॉकडाउन को सफल बताने से जुड़े दावे में बहुत भ्रामक हैं। 

14 मई को जब वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन प्रवासी मज़दूरों के लिए कोरोना राहत पैकेज़ का ब्यौरा दे रही थीं, तब उन्हें अनुमान था कि देश में प्रवासी मज़दूरों की क्या तादाद है? लेकिन लगातार पाँच दिनों तक पैकेज़ों का पिटारा खोलने के बावजूद वित्तमंत्री के ख़ज़ाने से जब राहत के नाम पर 21 में से सिर्फ़ 2 लाख करोड़ रुपये ही निकले तो बड़ी छीछालेदर होने लगी, क्योंकि पैकेज़ में 19 लाख करोड़ रुपये तो सिर्फ़ तरह-तरह के कर्ज़ों का फंड था। मज़े की बात ये भी रही कि ये छीछालेदर मेनस्ट्रीम मीडिया या विपक्षी नेताओं के ज़रिये नहीं बल्कि सोशल मीडिया की बदौलत जनता जनार्दन में फैलती चली गयी।

हालात जब ‘काटो तो ख़ून नहीं’ वाले हो गये तो 20 मई को वित्तमंत्री के मीडिया मैनेज़रों ने एक के बाद एक, कई मीडिया संस्थानों को बुलाकर उन्हें अलग-अलग इंटरव्यू देने की बौछार कर दी। अब तक प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा को लेकर देश भर से तमाम ऐसी ख़बरें आने लगी थीं जो किसी का भी दिल-दहला दें। लिहाज़ा, डैमेज़ कंट्रोल के लिए वित्तमंत्री ने सरकार के चिर-परिचित हथकंडे का इस्तेमाल किया कि ‘जब फँस जाओ तो झूठ फैलाओ’। लिहाज़ा, वित्तमंत्री कहने लगीं कि “मैं किसी को दोष नहीं देना चाहती, लेकिन बताइए कि प्रवासी मज़दूरों से सम्बन्धित कोई आँकड़ा देश में है क्या? कहां है? बग़ैर आँकड़ों के सरकार ये कैसे तय कर सकती है कि उसे किन-किन लोगों तक मदद पहुँचानी है?”

वित्तमंत्री का ये बयान यदि सच होता कि किसी को जितनी हमदर्दी पैदल सड़क नाप रहे प्रवासियों से होती, शायद उतनी ही सरकार की लाचारी के प्रति भी होती। लेकिन वित्तमंत्री सच नहीं बता रही थीं। प्रवासी मज़दूरों की संख्या या ‘डाटाबेस’ को लेकर वो देश को ग़ुमराह कर रही थीं क्योंकि जनता में अपनी सरकारों के प्रति आक्रोश बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। ये दिनों-दिन विस्फोटक होता जा रहा है। अब तो सभी को दिख रहा है कि लॉकडाउन का रास्ता चुनते वक़्त सरकार ने प्रवासी मज़दूरों पर गिरने वाली आफ़त का कोई आकलन ही नहीं किया। इसीलिए ‘लॉकडाउन 2.0’ की मियाद के पूरा होते-होते हालात सरकारों की मुट्ठी से बाहर निकलने लगे।

चिलचिलाती धूप में पैदल सड़कें नापने के लिए मज़बूर हुए लाखों प्रवासी मज़दूरों ने अपने हुक़्मरानों को सीधा फ़ीडबैक दिया कि सरकारी व्यवस्था से उनका भरोसा उठ चुका है। वो कमाई-धमाई के बग़ैर परदेस में भूखे नहीं मरना चाहते। इसलिए उन्हें उनके घरों को लौटने दिया जाए। इस पृष्ठभूमि के साथ रुख़ करते हैं उस बुनियादी सवाल की ओर कि आख़िर देश में कितने प्रवासी मज़दूर हैं? सही जवाब के लिए सबसे पहले वित्त मंत्री के ही 14 मई वाले पैकेज़ का रुख़ करते हैं। उस दिन वित्त मंत्री ने कहा था कि ‘प्रवासी मज़दूरों के पास चाहे राशन कार्ड हो या नहीं हो, लेकिन उन्हें दो महीने का राशन मुफ़्त दिया जाएगा। इसके तहत, 5 किलो चावल या गेहूँ और एक किलो चना प्रति परिवार प्रति माह दिया जाएगा। इसके लिए 8 लाख टन अनाज और 50,000 टन चना आवंटित होगा। इस काम पर 3,500 करोड़ रुपये खर्च होंगे।’

अब सवाल ये है कि ये ‘8 लाख टन, 50,000 टन और 3,500 करोड़ रुपये’ वाले आँकड़े आये कहाँ से? इन्हीं आँकड़ों में ही वित्तमंत्री की ग़लतबयानी छिपी हुई है। क्योंकि 5 किलो अनाज प्रति परिवार, दो महीने में बाँटने पर लाभान्वित परिवारों की संख्या का हिसाब बहुत सीधा है। प्रति परिवार 10 किलो अनाज और 2 किलो चना का मुफ़्त वितरण। इस दर से 1 टन (1000 किलोग्राम) अनाज 100 लोगों में बँटेगा तो 8 लाख टन के लाभार्थी 8 करोड़ परिवार होंगे। इसी तरह, 500 प्रवासी मज़दूरों के परिवारों के बीच जब 1 टन चना बँटेगा तो 50,000 टन चना के लाभार्थी 2.5 करोड़ परिवार होंगे।

साफ़ है कि 2.5 करोड़ नसीब वाले प्रवासी मज़दूरों के परिवारों को तो अनाज के साथ चना भी मिलेगा। लेकिन बाक़ी बचे 5.5 करोड़ परिवारों को सिर्फ़ अनाज से गुज़ारा करना पड़ेगा। उन्हें चना नहीं मिल पाएगा। मुमकिन है कि वित्त मंत्री और उनके अफ़सरों को पूर्वाभास हो गया हो कि ढाई करोड़ के बाद बाक़ी बचे 5.5 करोड़ प्रवासी मज़दूर मुफ़्त वाला सरकारी चना लेने से इनकार कर देंगे। वर्ना, इनका ख़्याल क्यों नहीं रखा गया होता? बहरहाल, अभी सवाल ये नहीं है कि किसे अनाज और चना मिला, किसे सिर्फ़ अनाज मिला और किसे मुफ़्त चना-अनाज के नाम पर सिर्फ़ ठेंगा ही हाथ लगा? अभी तो बात प्रवासी मज़दूरों की संख्या की है।

उपरोक्त हिसाब-किताब से इतना तो पक्का है कि 14 मई को वित्तमंत्री जानती थीं कि देश में कम से कम 8 करोड़ ऐसे प्रवासी मज़दूर तो हैं ही जिन्हें मुफ़्त अनाज वाली मदद की ज़रूरत है। मुमकिन है कि सरकार ने मान लिया होगा कि जो प्रवासी मज़दूर 8 करोड़ के अलावा होंगे, वो इतने ‘सम्पन्न’ हैं कि कोरोना संकट के दौरान भी या तो अपने बूते जी लेंगे या फिर सरकारी राशन की ‘मुफ़्तख़ोरी’ करने से पहले ही अपने गाँवों की ओर लौटने लगेंगे। अब सवाल है कि ऐसे तथाकथित सम्पन्न प्रवासी मज़दूरों की संख्या क्या होगी? वित्तमंत्री भले ही डाटाबेस की दुहाई देकर ऐसे सम्पन्न प्रवासियों से नज़रें फेर लें, लेकिन सरकार के पास इसका अनुमान भी मौजूद है। इसके भी आँकड़े ‘निकम्मी कांग्रेस’ के ज़माने के नहीं, बल्कि मोदी सरकार के ही ज़माने के हैं। 

2016-17 में केन्द्रीय बजट के पेश होने से एक दिन पहले लोकसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में एक अध्याय है – India on the Move and Churning: New Evidence. इसमें 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमणियम ने लिखा था कि देश में कुल श्रम-शक्ति 48.2 करोड़ लोगों की है। इसमें से हर तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। उनका अनुमान था कि 2016 तक ये संख्या 50 करोड़ को ज़रूर पार कर गयी होगी। इस तरह, यदि हम ये मान भी लें कि कोरोना की दस्तक से पहले भले ही भारत बेरोज़गारी के 45 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ चुका था, तो ये अनुमान ग़लत नहीं होगा कि अभी देश में तक़रीबन 17 करोड़ प्रवासी मज़दूर तो होंगे ही। 

इसी सर्वे में सुब्रमणियम कहते हैं कि प्रवासी मज़दूरों की संख्या कुल कामगारों के 17 से 29 फ़ीसदी के बीच हो सकती है। इसका औसत 24 फ़ीसदी बैठता है। यानी, इस हिसाब से भी कुल 50 करोड़ कामगारों में से 12 करोड़ तो प्रवासी मज़दूर होंगे ही। लेकिन यदि कोई चाहे तो यही मानता रहे कि 2016 की नोटबन्दी के बाद से लगातार गहराती गयी आर्थिक मन्दी के बावजूद 2020 आते-आते 12 करोड़ में से 4 करोड़ प्रवासी मज़दूर अपेक्षाकृत सम्पन्न समझे जाने मध्यम वर्ग में पहुँच गये। इसीलिए, वित्तमंत्री ने 8 करोड़ प्रवासी मज़दूरों के परिवारों को ही मुफ़्त अनाज पाने का लाभार्थी मानने की सोची।

ज़ाहिर है, यदि वित्तमंत्री 8 करोड़ की फ़िक्र कर सकती हैं तो उन्हें 12 करोड़ के लिए मुफ़्त राशन का एलान करने में भला क्या दिक्कत होती? बस, इस राहत के फंड को 3,500 करोड़ की जगह 5,250 करोड़ रुपये तो ही करना पड़ता। इतने से इज़ाफ़े का इन्तज़ाम 21 लाख करोड़ के ‘मेगा पैकेज़’ में क्यों नहीं हो जाता? कमोबेश, यही बातें सीतारमन ने अपने इंटरव्यू में कहीं। ये सही है कि 2016 में निर्मला सीतारमन भले ही देश की वित्त मंत्री नहीं थीं, लेकिन उस वक़्त वो उद्योग और वाणिज्य जैसे बेहद अहम मंत्रालय को सम्भाल रही थीं। 2017 में वो रक्षा मंत्री भी बनीं। हालाँकि, न जाने किन खूबियों को देखते हुए ‘फोर्ब्स’ पत्रिका ने 2019 में उन्हें ‘दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं’ की सूची में 34वें स्थान पर रखा था।

मोदी-2 सरकार में निर्मला सीतारमन ने प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन के पड़ोस में स्थित नॉर्थ ब्लॉक में अरुण जेटली की विरासत सम्भाली। अब तक वो दो बड़े मंत्रालयों का अनुभव बटोर चुकी थीं। वित्त मंत्रालय के प्रभार के लिए शायद उनकी वो शिक्षा भी काम आयी जो उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज़ एंड प्लानिंग’ से मास्टर्स और एमफिल के दौरान पायी थी। वहीं ‘भारत-यूरोप व्यापार’ विषय पर पीएचडी के लिए वो नामित भी हुईं लेकिन रिसर्च हुई नहीं क्योंकि वो पति के साथ लंदन में जा बसीं। वहाँ उन्होंने प्राइस वाटरहाउस कूपर्स में सीनियर मैनेज़र की नौकरी भी की।

अब रुख़ करें इस बात पर कि प्रवासी मज़दूरों का जैसा ‘प्रमाणिक’ डाटाबेस वित्तमंत्री चाहती हैं, आख़िर वो मोदी सरकार के पास है क्यों नहीं? हम जानते हैं कि मोदी सरकार ने सैकड़ों बेकार और पुराने क़ानूनों को ख़त्म करके दिखाया है। लेकिन ‘Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979’ को तो मोरारजी देसाई वाली उस जनता पार्टी की सरकार ने बनाया था, जिसमें अटल जी विदेश मंत्री और आडवाणी जी सूचना और प्रसारण मंत्री थे। इस क़ानून को 11 जून 1979 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। लेकिन इसे 01 जून 1987 को लागू किया राजीव गाँधी की सरकार ने।

माना कि काँग्रेस की सरकारें निकम्मी थीं, लेकिन 1987 से लेकर अब तक के 37 वर्षों में वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव, वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे कितनी सरकारें आकर चली गयीं, किसी ने भी संसद के क़ानून के मुताबिक प्रवासी मज़दूरों का वैसा डाटाबेस बनाने की कोशिश क्यों नहीं की, जिससे वित्तमंत्री को आज झुंझलाहट नहीं होती? उन्हें मंत्री पद की शपथ को तोड़ते हुए झूठ नहीं बोलना पड़ता। माना कि 2014 से पहले तक देश ‘निकम्मा काल’ में रहा। लेकिन बीते छह की कर्मठता में तो कोई कसर नहीं हो सकती। फिर भी प्रवासी मज़दूरों का डाटाबेस क्यों नहीं बना? यहाँ तक कि 2016 वाला आर्थिक सर्वेक्षण भी चार साल पुराना है। फिर भी डाटाबेस अभी तक क्यों नदारद है?

किसकी मज़ाल है कि वो वित्त मंत्री से ऐसे बुनियादी प्रति-प्रश्न कर सके? पत्रकारों के वश का भले ही ना हो, लेकिन सांसदों ने संसद में सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत ज़रूर दिखायी। अभी ‘जनता कर्फ्यू’ के अगले दिन 23 मार्च को केन्द्रीय श्रम राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सन्तोष गंगवार ने सांसदों को बताया कि ‘सरकार के पास प्रवासी मज़दूरों की संख्या को लेकर न तो कोई अनुमान है और ना ही 1979 के बाद से अभी तक मज़दूरों के आवास, सेहत और सुरक्षा को लेकर कोई अध्ययन ही किया गया है।’

इसी दिन एक अन्य प्रश्न के जवाब में सन्तोष गंगवार बताते हैं कि ‘Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979 को प्रभावी बनाने के लिए देश में केन्द्रीय मुख्य श्रम आयुक्त के नेतृत्व में एक सुगठित तंत्र मौजूद है। इसके बावजूद प्रवासी मज़दूरों की दशा से सम्बन्धित कोई आँकड़ा इसलिए सरकार के पास नहीं है क्योंकि ये मज़दूर कभी यहाँ तो कभी वहाँ आते-जाते रहते हैं।’ इसी जवाब में आगे श्रम मंत्री उन्हीं आँकड़ों को दोहराते भी हैं, जिनका ज़िक्र 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में किया गया है।

साफ़ है कि वित्तमंत्री और श्रम मंत्री दोनों ही विरोधाभासी बाते कर रहे हैं। ये ऐसी झूठी बहानेबाज़ियाँ हैं जिनका मक़सद पारदर्शिता का शासन देना नहीं बल्कि तथ्यों को छिपाकर जनता को बरगलाने का है। तभी तो सरकार अपने इन्हीं लिखित जवाबों में संसद को बताती है कि ‘1979 के उपरोक्त क़ानून के मुताबिक़, मज़दूरों को न्यूनतम वेतन, आवागमन भत्ता, पुनर्स्थापन भत्ता, निवास, चिकित्सा सुविधाएँ और सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाया जाता है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (PM-SYM) के तहत असंगठित क्षेत्र के वृद्ध मज़दूरों को ‘योग्यतानुसार’ पेंशन भी दी जाती है।’

ऐसे दावों का सच ही प्रवासी मज़दूरों की आपबीती है। वैसे, इत्तफ़ाकन ऐसी तमाम हवा-हवाई बातें भी अब बेमानी हो चुकी हैं क्योंकि देश के छह बड़े राज्यों – मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और गोवा ने तीन साल के लिए तमाम श्रम क़ानूनों को स्थगित करने की अधिसूचना को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेज दिया है। ज़ाहिर है कि ज़मीन पर तो सिर्फ़ इतना दिख रहा है कि सरकारों ने प्रवासी मज़दूरों पर जितना रहम खाया है, उससे कहीं ज़्यादा सितम किया है। अब आप चाहें तो सरकारों की वाहवाही करते रहें।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

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