Monday, August 8, 2022

बजट 2022: क्रिप्टो (Crypto) के सामने घुटने टेकने को क्यों मज़बूर हुई सरकार?

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तमाम छटपटाहट के बावजूद, आख़िरकार, भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को भी क्रिप्टो करेंसी (Crypto currency) के आगे नतमस्तक होना ही पड़ा। इतिहास गवाह है कि टेक्नोलॉज़ी के आगे बड़े से बड़े शूरमा या सल्तनत को भी घुटने टेकने पड़े हैं। सरकार ने तो अब सिर्फ़ ‘भागते भूत की लंगोटी’ से सन्तोष करने का रास्ता चुना है। बजट-2022 के ज़रिये केन्द्र सरकार भले ही इस बात को लेकर गदगद हो कि उसने क्रिप्टो करेंसी की कमाई पर 30% इनकम टैक्स और 1% TDS (tax deducted as source) लगाकर उसे अपने आगोश में ले लिया है, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही है।

RBI ने क्यों लिया CBDC का फ़ैसला?

अब सवाल ये है कि बीते कई साल से बारम्बार लोगों को क्रिप्टो करेंसी से दूर रहने की सलाह देने वाली केन्द्र सरकार और इसकी मौद्रिक नीति के कर्णधार RBI को आख़िरकार अपनी ख़ुद की क्रिप्टो करेंसी लाने का फ़ैसला क्यों लेना ही पड़ा? सरकार ने इसे ‘डिज़टल मनी’ (digital money) कहा है और इसे CBDC (Central Bank Digital Currency) का नाम दिया है। इसके लिए भी आभाषी दुनिया (virtual world) की उसी तकनीक का सहारा लिया जाएगा जिसे blockchain technology कहा गया है और जिसके ज़रिये ही दुनिया भर में अनेक बढ़िया या घटिया ग़ैर-सरकारी क्रिप्टो करेंसी का कारोबार हो रहा है।

सरकार भी अब ‘ग़लत’ में हिस्सेदार बनेगी

पूरे प्रसंग में सबसे दिलचस्प बात ये है कि सरकार ने ऐसा कोई जादुई चिराग़ नहीं ढूँढ़ा है जिससे कल तक जो ‘ग़लत’ था वो अब ‘सही’ हो जाएगा। बल्कि सरकार तो अब ख़ुद भा ‘ग़लत’ काम को यथासम्भव ‘सही’ ढंग से करने की कोशिश करेगी। या फिर, ज़्यादा से ज़्यादा ये होगा कि अब सरकार भी ‘ग़लत’ में हिस्सेदार बन जाएगी। निवेशक के प्रति किसी ज़िम्मेदारी को निभाये बग़ैर सरकार ‘धन्धे’ की कमाई में बन्दरबाँट करना चाहती है। इसके लिए सरकार एक ओर तो निजी क्रिप्टो करेंसी को ‘ग़लत’ मानती रहेगी लेकिन दूसरी ओर इससे होने वाले कमाई पर टैक्स लगाकर उसे दूहने की कोशिश करेगी।

गोल्ड बॉन्ड जैसा होगा CBDC

इसे यूँ समझिए कि तस्करी एक ग़ैरक़ानूनी धन्धा है, लेकिन सरकार चाहती है कि तस्करी की कमाई पर उसे राजस्व मिल जाए। तकनीकी रूप से जिस कमाई पर सरकार को टैक्स चुका दिया जाए वो नाजायज़ नहीं रह जाती। दरअसल, केन्द्र सरकार ने तय किया है कि इस साल RBI भी अपनी क्रिप्टो करेंसी ‘CBDC’ को निवेशकों के लिए बाज़ार में उतारेगी। जनता इसमें वैसे ही अपना पैसा लगा सकेगी जैसे कि गोल्ड बॉन्ड या स्वर्ण प्रतिभूतियों में लगाया जाता है। अलबत्ता, गोल्ड बॉन्ड के मामले में सरकारें गारंटी देती हैं कि जिस दिन हम इसे भुनाना चाहेंगे, उस दिन के सोने के बाज़ार भाव से हमें भुगतान किया जाएगा। फिर चाहे हम सोना लें या रुपया। लेकिन CBDC के मामले में ऐसा कुछ भी हो पाना नामुमकिन होगा।

CBDC में होगी विनिमय की ताक़त

भले ही कोई मुद्रा या करेंसी को सम्पत्ति के रूप में जमा करके रखे, लेकिन इसका मुख्य उपयोग विनिमय के लिए होता है। यानी, हम किसी को मुद्रा देकर कोई चीज़ ख़रीद सकते हैं और वो व्यक्ति भी मुद्रा देकर ही ख़रीदारी कर सकता है। मुद्रा की बदौलत सब कुछ ख़रीदने-बेचने का अन्तहीन सिलसिला चलता रहता है। जबकि CBDC एक ऐसी क्रिप्टो करेंसी होगी जिसमें लोग अपना पैसा रख सकेंगे और इससे विनिमय भी हो सकेगा। अलबत्ता, विनिमय के वक़्त सरकार को 1% TDS चुकाना होगा। लेकिन जब कभी CBDC को रुपये के लिए बेचा जाएगा तब उसे ख़रीदने और बेचने के दरम्यान जो मुनाफ़ा होगा उस पर सरकार 30 प्रतिशत आयकर लेगी।

CBDC को मिलेगा Asset का दर्ज़ा

ज़ाहिर है, इस तरह CBDC एक ऐसी क्रिप्टो करेंसी होगी जो आभाषी तो बनी रहेगी लेकिन इससे विनिमय हो सकेगा। सरकार इसे सम्पत्ति (asset) की तरह भी देखेगी। अब चूँकि CBDC की कर्ताधर्ता ख़ुद RBI या केन्द्र सरकार होगी इसीलिए यही रेगुलेटर की भूमिका भी निभाएगी और निवेशकों को उनकी रक़म के सुरक्षित होने का भरोसा भी देगी। ये मौजूदा शेयर बाज़ार के शेयरों का ज़रा परिष्कृत (improvised) रूप है, क्योंकि शेयर बाज़ार में एक शेयर से सीधे-सीधे दूसरा शेयर नहीं ख़रीद सकते। इसके लिए हम जिन शेयरों को बेचते हैं उसकी रक़म हमें रुपयों के रूप में चुकायी जाती है। फिर इन रुपयों से हम दूसरा या नया शेयर ख़रीदते हैं। शेयर बाज़ार में निवेशक के साथ कोई गड़बड़ी नहीं हो, इसलिए सेबी (Security and Exchange Bank of India) उस पर रेगुलेशन की ज़िम्मेदारी है।

क्रिप्टो करेंसी का रेगुलेटर कोई नहीं

सम्प्रभु देश की सरकारें जैसे सारे वित्तीय कारोबार में चौकीदार और रेगुलेटर की भूमिका निभाती हैं, वैसा दुनिया भर में तहलका मचा रही निजी क्रिप्टो करेंसीज़ के मामले में सम्भव नहीं है। क्योंकि digital technology में virtual world एक ऐसा मंच है जहाँ अभी तक किसी भी सरकार का क्षेत्राधिकार (jurisdiction) नहीं है। इनके मामले में कम से कम तब तक तो सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं जब तक कि उन्हें ये नहीं मालूम हो कि क्रिप्टो करेंसी की आभाषी दुनिया का बेताज बादशाह हमारी भौतिक और सांसारिक दुनिया में कहाँ मौजूद है? अब तक तो कोई इस रहस्य को खोल नहीं पाया। आगे का पता नहीं।

बग़ैर सुरक्षा दिये टैक्स लेगी सरकार

अब सवाल ये है कि जब भारत सरकार ऐसी निजी क्रिप्टो करेंसी से होने वाली कमाई पर 30% आयकर वसूलेगी तो फिर निवेशक को सुरक्षा देने का अपना दायित्व वो कैसे निभाएगी? सरकार को तो पता ही नहीं कि उसे जिससे निवेशकों को सुरक्षित बनाना है वो भला है कौन, कहाँ रहता है? हाँ, इतना ज़रूर है कि सरकार ये जान सकती है यदि किसी व्यक्ति ने एक लाख रुपये किसी निजी क्रिप्टो करेंसी में लगाए हैं और कल को इस करेंसी को बेचने से उसे यदि दो लाख रुपये मिलते हैं तो ज़ाहिर है कि उसे एक लाख की कमाई हुई। इस दो लाख को जब वो शख़्स अपने बैंक में डालेगा तो सरकार की शर्त होगी कि 30% इनकम टैक्स भरो और अपनी पूँजी को 2 लाख नहीं बल्कि 1.7 लाख रुपये समझो। वर्ना, इनकम टैक्स विभाग तुम्हें छोड़ेगा नहीं। आज नहीं तो कल टैक्स वसूल लिया जाएगा। बाक़ी जो छीछालेदर होगी सो अलग।

हवाला और टैक्स हैवन जैसी है क्रिप्टो करेंसी

लेकिन जैसे सरकारें लाख कोशिश करके भी हवाला लेन-देन पर पुख़्ता रोक नहीं लगा पातीं, जैसे टैक्स हैवन (tax heavens) में काला धन जमा होने को नहीं रोक पातीं, वैसे ही क्रिप्टो करेंसी की आभाषी दुनिया तक भी क़ानून के लम्बे हाथों का पहुँचना बेहद मुश्किल है। ज़्यादा से ज़्यादा सरकार ये कहकर ही अपनी क्रिप्टो करेंसी CBDC की मार्केटिंग कर सकती है कि इसमें निवेश सुरक्षित रहने की गारंटी है। जबकि निजी क्रिप्टो करेंसी के मामले में ऐसा नहीं हो सकता। ज़ाहिर सी बात है कि सरकारी खेल में यदि जोख़िम कम होगा तो कमाई भी कम ही रहेगी। जबकि प्राइवेट क्रिप्टो करेंसी के मामले में लोग भले ही लुट जाएँ, डूब जाएँ, तबाह हो जाएँ, लेकिन ज़्यादा कमाई या लालच के चक्कर में वो वहाँ जाएँगे ही।

क्रिप्टो में भारतीयों ने लगाये 45,000 करोड़

ख़ुद रिज़र्व बैंक का अनुमान है कि निजी क्रिप्टो करेंसी में भारतीयों ने अब तक 45 हज़ार करोड़ रुपये लगा रखे हैं। सरकार चाहती है कि इस विशाल फंड में से सारा नहीं तो ज़्यादा से ज़्यादा बड़ा हिस्सा उसके पास आ जाए। CBDC के बारे में बस, इतनी सी बात ही ‘सही’ है। बाक़ी जो ‘ग़लत’ है वो तो बदस्तूर बना ही रहने वाला है। फ़िलहाल, इस बिगड़ैल और बेलग़ाम घोड़े की सवारी करने की तरक़ीब किसी के पास नहीं है। तक़रीबन वैसे ही जैसे साहूकारी भले ही क़ानूनन ज़ुर्म हो, भले ही बैंकिंग सेक्टर को इसका विकल्प बनाने की कोशिशें हुई हैं लेकिन ये जगज़ाहिर है कि साहूकारी अब भी क़ायम है और ऊँचे ब्याज़ पर कर्ज़ देने और लेने का गोरखधन्धा भी कभी मन्दा नहीं पड़ा। क्रिप्टो करेंसी भी इसी धन्धे का सबसे नया सदस्य है।

(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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