द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के हाथ में साम्राज्यवादी दुनिया का नेतृत्व आया।साम्राज्यवादी अमेरिका की विस्तारवादी भूमिका को लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, यूरोप तक में जिन लोगों ने देखा है। उन्हें पता है कि साम्राज्यवादी ताकतों के पास हजारों हाथ पैर मुंह और भाषा बोली होती है। वे कब किस रूप में कहां प्रकट होंगे। इसका पूर्व अनुमान लगाना थोड़ा कठिन है। इसलिए गणतंत्र वादी नेपाल में हुए जेन-जेड के विद्रोह को रैखिक ढंग से नहीं देखना चाहिए। नेपाल में जो कुछ घटित हो रहा है। उससे आह्लादित और प्रफुल्लित होने वाले लोग कौन हैं। उनका वर्ग चरित्र और स्वार्थ क्या है। इस पर संजीदा हो तार्किक ढंग से सोचने की जरूरत है।
ताज़ा हालात यह है की सेना ने सत्ता संभाल ली है। जेन जेड की आन लाइन मीटिंग में 800 एनजीओ के प्रतिनिधियों सहित नागरिक समाज को मिलाकर 5 हजार लोगों के भाग लेने की खबरें आ रही हैं। इस मीटिंग में प्रधानमंत्री पद के लिए पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की का नाम प्रस्तावित हुआ है। (लिखे जाने तक संविधान को दरकिनार करते हुए वे प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुकी हैं और संसद भंग कर दी गई है)। आंदोलनकारियों का एक गुट सुशीला कार्की का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि उन्हें भारत समर्थक माना जाता है। घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। युवा आंदोलनकारियों के विदेशी फंडिंग से बने एनजीओ के झीने नकाब में ढके गैर-राजनीतिक चेहरे अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।
हम भारत के लोग देश में 2013 में गैर राजनीतिक कठपुतलियों को आगे कर चलाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का स्वाद आहिस्ता -आहिस्ता चख रहे हैं।
इसलिए नेपाल के जन विद्रोह को लेकर लोकतांत्रिक ताकतों को अति उत्साह में आने की जरूरत नहीं है। क्योंकि पूंजीवादी साम्राज्यवादी सभ्यता मानव समाज के अब तक के ज्ञात इतिहास की सबसे धूर्त क्रूर शातिर सभ्यता है। जो वैज्ञानिक तकनीकी विकास से हासिल महान उपलब्धियों से लैस है। जो हमारे घर के किचन से लेकर मस्तिष्क, स्वभाव तथा जीवन शैली तक को सूक्ष्म और जटिल तंत्र द्वारा नियंत्रित करने की ताकत रखती है। यहां जो जैसा दिखता है।
वह वैसा नहीं भी हो सकता है। उसके अंदर परत-दर-परत अनेक तरह की जटिल संरचनाएं हो सकती हैं। आज का मनुष्य आधुनिक राष्ट्र राज्य के हाथ में आई दानवीय शक्ति के कारण वस्तु या उपभोक्ता बनकर रह गया है। खंडित विचार दृष्टि विहीन मनुष्य को पूंजी की ताकतें जब चाहे जैसे और जिस रूप में इस्तेमाल करने में सक्षम हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के 80 वर्षों में दुनिया ने अनेकों क्रांतियों प्रतिक्रांतियों को देखा है। इसलिए विश्व लोकतांत्रिक संघर्षों के ज्ञान कोष विद्रोहों और प्रतिक्रांतियों के अनुभवों से भरे पड़े हैं। आज के विश्व के भविष्य के लिए नेपाल में हुए उथल-पुथल को वस्तुनिष्ठ होकर सिलसिलेवार विश्लेषित करने की जरूरत है।
8 सितंबर की सुबह नेपाल में अन्य दिनों की तरह से आई। लेकिन शाम होते-होते नेपाल पूरी तरह से उलट-पलट चुका था। इसके पहले नेपाल में सब कुछ सामान्य सा लगता था। सतह के नीचे पल रहे ज्वालामुखी की आहट कहीं से भी सुनाई दे रही थी। इस बीच दो बड़ी घटनाएं हुई थीं। ऐसा लगता है कि जिनके संकेत पढ़ने में एमाले और नेपाली कांग्रेस की संयुक्त सरकार असफल रही।
एक- भूतपूर्व राजा ज्ञानेंद्र कुछ दिन पहले काठमांडू लौटे थे। मार्च में राजशाही की वापसी की मांग को लेकर प्रदर्शन और आंदोलन हुए। उस समय काठमांडू की रैली में हिंसा भड़क उठी थी। भारत में हिंदुत्व राष्ट्रवादियों की सफलता से उत्साहित होकर नेपाल की हिंदुत्ववादी राजशाही समर्थक ताकतें यदा कदा राजशाही की वापसी और गणतंत्र के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं। लेकिन उन्हें 17 वर्षों से ऐसा अवसर नहीं मिल पा रहा था। जब वे जन समर्थन के बल पर बड़ा उलट फेर कर सकें।
दूसरा- शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) की मीटिंग 1 और 2 सितंबर को चीन में हुई। जिसमें 28 देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने भाग लिया था। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली भी एससीओ समिट में मौजूद थे। पश्चिमी मीडिया में एससीओ को पश्चिम यानी अमेरिका विरोधी गुट कहा जाने लगा। 3 सितंबर को जापानी साम्राज्यवाद के खिलाफ चीनी जनता के प्रतिरोध युद्ध में हुई विजय की 80वीं वर्षगांठ पर आयोजित सैन्य परेड को लेकर एक नैरेटिव पश्चिमी मीडिया में गढ़ा गया ।”
चीन का अमेरिका को संदेश। “अमेरिकी बादशाहत को चुनौती। एससीओ देशों के सम्मेलन और विजय दिवस की परेड को अमेरिका और यूरोप के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के रूप में दिखाया गया। जिस पर ट्रंप की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पुतिन और मोदी की उपस्थिति पर यह कहते हुए चिंता व्यक्त की कि इन नेताओं ने अपने को चीन के हाथ में सौंप दिया है।
SCO समिट के ठीक बाद नेपाल में जन विद्रोह हुआ। इसे ट्रंप के आक्रामक मेगा प्लान की सफलता के बतौर देखने की जरूरत नहीं है। इस तरह की ऐतिहासिक घटनाएं सिर्फ षड्यंत्र का परिणाम नहीं होतीं। बल्कि उनकी जडे़ं उस समाज के भीतर मौजूद अंतर विरोधों में गहराई से धंसी होती हैं। नेपाल में गहरा आर्थिक संकट था। महंगाई बढ़ी हुई है। 15 से 30 आयु वर्ग के युवाओं में मेंबेरोजगारी 23% है। जो 3 करोड़ की आबादी में लगभग 66 से 70 लाख के बीच बैठते हैं।
भ्रष्टाचार से आमजन त्रस्त था। समाज के इलीट क्लास की अश्लील जीवन शैली ने आक्रोश को तेज कर दिया था। यह एक गरीब मुल्क की जनता के साथ छल था। जिसने अकूत बलिदान देकर राजशाही को नेपाल से उखाड़ फेंका था। पिछले 17 वर्षों में 14 सरकारों का आना जाना जोड़-तोड़ गैर उसूली समझौते सहयोग ने नेपाली जनता की लोकतांत्रिक चेतना की धार को कुंद कर दिया था।
जिस क्रांतिकारी आंदोलन ने हिमालय की गोद में बसे एक पिछड़े मुल्क में दुनिया की अग्रिम लोकतांत्रिक चेतना वाले क्रांतिकारी नौजवानों नागरिकों की फौज तैयार की थी। त्याग और बलिदान की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया था। सामंती राजशाही संस्कृति और परंपरा की बेड़ियों में जकड़े हुई कृषि प्रधान देश को लोकतांत्रिक चेतना से लैस कर राणा शाही के दैवीय आभामंडल को ध्वस्त कर नेपाल को क्रांतिकारी अंतर्वस्तु वाले लोकतांत्रिक गणराज्य में रूपांतरित कर दक्षिण एशियाई देशों की अग्रिम कतार में खड़ा कर दिया था। उस देश और समाज में गैर राजनीतिक प्लेटफार्म के आवाहन पर इस तरह का उलट फेर होना चकित करने वाला है।
नेपाल में राणा शाही के खिलाफ चले नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन की सफलताएं अपार हैं। जड़ हिंदुत्व राजशाही को उखाड़कर पिछड़े मुल्क में गणतांत्रिक संविधान की रचना करना सभी समुदायों व वर्गों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी की गारंटी देना और पिछड़ी जन जातियों एथेनिक समूहों कमजोर वर्गों दलितों को संवैधानिक संरक्षण के द्वारा सामाजिक समानता के पायदान पर लाकर खड़ा कर देना। इन दलों और आंदोलनों की महान उपलब्धियां हैं।
यह सब सिर्फ एक दिन में नहीं हुआ था। 1950 के बाद से ही नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के झंडे तले हजारों बुद्धिजीवी सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता मजदूर किसान नौजवान और छात्रों ने जेल की यातनाओं और घर परिवार की तबाही झेलते हुए भी राजशाही के साथ मोर्चा लिया था। जिन लोगों ने 80 और 90 के दशक में नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन की बढ़ती अग्रगति को देखा है। वे जानते हैं कि कैसे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, नेकपा माले और फ़िर नेकपा( एमाले), नेकपा माओवादी ने जन आंदोलन और जन युद्ध द्वारा 2008 तक आते-आते राजशाही को उखाड़ फेंका।
मैं पिछले 47 वर्षों से नेपाल के कम्युनिस्ट साथियों के साथ संपर्क में रहा हूं। अनेक मौकों पर उनसे तीखी वैचारिक बहसें और राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान होते रहे हैं। अखिल भारतीय नेपाली प्रवासी संघ के सम्मेलनों में शिरकत करने का मौका मिला है। कई बार तो उनके आयोजन के लिए जगह दिलाने से लेकर अन्य व्यवस्थाएं करने में सहयोग करना पड़ा है। इसलिए बहुत नजदीक रहते हुए मुझे नेपाली कामरेडों के विचार व्यवहार और उन्नत कम्युनिस्ट चेतना से सीखने का मौका मिला है।
मेरी शुरू से समझ रही है कि नेपाल के कम्युनिस्टों की मार्क्सवाद-लेनिनवाद की समझ भारत के कम्युनिस्टों की तुलना में ज्यादा गहरी है। यही कारण है कि भारत और चीन जैसे दो विशाल देशों के मध्य स्थित एक पहाड़ी देश में कम्युनिस्ट पार्टियां आंदोलन को उच्चतम मंजिल तक ले जाने में कामयाब रहीं।
दुनिया ने नेपाल के कम्युनिस्टों के बहादुराना संघर्ष को देखा है। विश्व को पता है कि पिछड़े देश नेपाल के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने कठिन राजनीतिक संघर्षों के द्वारा जनता की राजनीतिक चेतना को ऊंचाई पर पहुंचा दिया था। नेपाली जन-गण ने लोकतांत्रिक संघर्षों से लेकर हथियारबंद संघर्षों के उच्चतम क्रांतिकारी मॉडल नेपाल की धरती में विकसित होते हुए देखा है। जहां मनुष्यता अपनी समस्त जिजीविषा प्रतिभा क्षमता रचनात्मकता और गरिमा के साथ नए तरह का इतिहास रचने में कामयाब हुई और राजशाही को जाना पड़ा।
इसलिए जेन- जेड के आवाहन पर हुए तख्तापलट के चरित्र का आकलन करना गंभीर सवाल है ।
जेन जेड (जनरेशन जीरो) नेपाल की वह पीढ़ी है। जो 1997 में शुरू हुए जनयुद्ध के बाद पैदा हुई और पली बढ़ी है। इसलिए उसे राजशाही विरोधी संघर्ष और लोकतंत्र बहाली के लिए दी गई कुर्बानियों का एहसास कम है। यह युवाओं की ऐसी पीढ़ी है जो सामाजिक संबंधों की रागात्मकता से कटी और फेसबुक ट्विटर इंस्टाग्राम व्हाट्सप्प यूट्यूब कॉलीन दौर की बाजारवादी मूल्य द्वारा ऊपर से आरोपित चेतना से संचालित है। जेन जेड ने 97 से 2010 तक के बीच की युवा पीढ़ी को आंदोलन में शामिल होने का आवाहन किया था। उनका कहना था कि 27 साल से ऊपर के लोग इस आंदोलन में शामिल न हों। जेन जेड ने अपने आंदोलन को गैर राजनीतिक कहा। यह एक रहस्य है जिसे बिना भेदे साम्राज्यवादी पूंजी की भूमिका का खुलासा नहीं किया जा सकता।
इस आंदोलन के तात्कालिक कारणों में बताया जा रहा है कि ओली सरकार में 26 ऐप यानी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को बंद कर दिया था। आंदोलन के समर्थकों के अनुसार यही वह माध्यम है। जिससे नेपाली युवा अपने सगे संबंधियों दोस्तों मित्रों और समाज से कनेक्ट होते हैं। अधिकतर नेपाली युवा विदेश में हैं। इन प्लेटफॉर्मों के बंद होने से उनके संबंध अपने परिवारों रिश्तेदारों दोस्तों मित्रों से कट गए। एक तो वे अमानवीय स्थिति में विदेशों में काम करते हैं। दूसरे अपने घर परिवार से कट जाने की पीड़ा से छटपटा रहे थे। दूसरा आरोप है कि सोशल प्लेटफॉर्म को बंद करना नागरिकों के अभिव्यक्त की स्वतंत्रता पर हमला था।
चूंकि यही वह प्लेटफॉर्म हैं। जहां से सरकार के भ्रष्टाचार बेरोजगारी महंगाई पर सवाल उठाए जा रहे थे। तीसरा सवाल था राजनीतिक दलों का भ्रष्टाचार। नेताओं के बच्चों की अय्याशी भरी जिंदगी । जिसे नेपकिड नैप बेबी कहा गया। नेपाल में आर्थिक असमानता चरम पर है। अमीर-गरीब की खाई चौड़ी हो रही है। गरीब देश में नेताओं की अय्याशी भरी जिंदगी ने आंदोलन को जन्म दिया। इस तरह के कुछ ठोस तर्क दिए जा रहे थे।
जेन जेड ने 8 तारीख को सोशल साइट बंद करने के खिलाफ प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। सरकार ने कार्यक्रम के लिए अनुमति दे रखी थी। इस कार्यक्रम में छात्रों नौजवानों से भाग लेने की अपील की गई थी। उनसे आग्रह किया गया था कि वे स्कूल यूनिफॉर्म में शामिल हों। जेन जेड के नेताओं का कहना है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण और अहिंसक था। इसमें कुछ अराजक तत्व घुस आये। वे संसद भवन में घुस कर तोड़फोड़ करने लगे। शाम 7 बजे के बाद पुलिस ने गोली चलाई। जिसमें 19 छात्र मारे गए। एक 12 साल का स्कूली बच्चा मारा गया। जो स्कूल के यूनीफार्म में था। प्रदर्शन का आयोजक ” हामी नेपाली” नमक एनजीओ के प्रमुख सुदन गुरुंग थे। इस एनजीओ को कई अमेरिकी और विदेशी कंपनियों से फंडिंग होती रही है।
नेपाल में हजारों एनजीओ हैं। जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए काम करते हैं ।आम तौर पर वहां सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता किसी न किसी एनजीओ से जुड़े हैं। जो विदेशी फंडिंग पर निर्भर है। बहुचर्चित काठमांडू शहर के मेयर बालेंद्र शाह भी ऐसे ही एक एनजीओ से जुड़े हैं। (भारत में झुग्गी झोपड़ियां शहरी इलाकों और समाज के विभिन्न तबकों सहित आदिवासियों जनजातियों में भी सैकड़ों एनजीओ फैले हुए हैं)।
एक बात विशेष रूप से ध्यान देने की है। आगजनी और हिंसा करने वालों के निशाने पर लोकतांत्रिक संस्थाएं थीं। उन पर चुन-चुन कर हमला हुआ। जैसे संसद राष्ट्रपति भवन उच्च न्यायालय ,पुलिस मुख्यालय सहित सरकारी कार्यालय और संस्थान।इसके साथ प्रधानमंत्री कार्यालय आवास व मंत्रियों पर शारीरिक हमले उनके आवास निजी घर, वर्तमान भूतपूर्व मंत्रियों प्रधानमंत्रियों के घर चुन चुन कर आग के हवाले किये गये। गृह मंत्री विदेश मंत्री वित्त मंत्री जैसे कई को बुरी तरह से पीटा गया और नंगा घुमाया गया। उनकी हत्या करने की कोशिश की गई।
इसके अलावा माओवादी नेता प्रचंड भूतपूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल बाबूराम भट्टराई, झालानाथ खनाल (की पत्नी “जो फिजिक्स की प्रोफेसर रह चुकी थीं” ( उनकी जलाकर हत्या कर दी गई )आदि पर चुन चुन कर हमला हुआ। (प्रसंग वश झालानाथ खनाल 89-90 के लोकतंत्र बहाली आंदोलन के समय लखनऊ आए थे। (उनके साथ एमाले के एक वरिष्ठ नेता भी थे। जो महासचिव कामरेड मदन भंडारी के साथ एक संदिग्ध दुर्घटना में मारे गए। उस समय दोनों कामरेड हमारे संगठन के ऑफिस में जमीन पर सोते थे।)
नेपाली कांग्रेस के नेता पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा उनकी पत्नी और निवास तथा काठमांडू और उसके बाहर विभिन्न शहरों में नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के ऑफिस जलाए गए। काठमांडू घाटी, चितवन भरतपुर पोखरा ललित पुर सहित अनेक जगहों पर आगजनी हिंसा की घटनाएं हुई हैं। 18 जेलें तोड़ी गयीं। अपराधियों को मुक्त कर दिया गया। अब तक 51 लोगों के मारे जाने की खबर है। हिंसा आगजनी से कितना नुकसान हुआ है। इसका आकलन शांति बहाली के बाद ही हो सकेगा।
लेकिन एक बात निर्विवाद है कि आंदोलनकारियों के निशाने पर लोकतंत्र बहाली आंदोलन की वे सभी ताकतें थीं। जिन्होंने राजशाही को हटाकर नेपाल में लोकशाही कायम करने में योगदान दिया था। प्रधानमंत्री केपी ओली के बारे में भारत सहित अन्य मीडिया में ब्राह्मण-ब्राह्मण करके शोर मचाया जा रहा है।
वह राजशाही के खिलाफ संघर्ष के योद्धा हैं। जो डेढ़ दशक तक जेल में रह चुके हैं । कारपोरेट नियंत्रित मीडिया नेपाल में राजनीतिक भ्रष्टाचार अपराध भाई भतीजावाद नेपो किड या नेपो बेबी जैसे विशेषणों का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ घृणा अभियान के तहत कर रहा है। जबकि 8 तारीख के पहले इस तरह की खबरें सुनाई नहीं देती थीं।
सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका के नेतृत्व में विश्व साम्राज्यवाद ने एक मुकम्मिल संरचनात्मक ढांचा तैयार किया है। जिससे लोकतंत्र और न्यायपूर्ण समाज के लिए चल रहे संघर्ष को कमजोर किया जा सके और सार्वभौम राष्ट्र निर्माण की जनता की स्वतंत्र प्रक्रिया बाधित हो। इसके लिए जहां अमेरिका में सीआईए, एफबीआई, पेंटागन हैं। वहीं नाटो सीटो सेंटो जैसे सैन्य गुट। यूएनओ के तहत आईएएमफ विश्व बैंक डब्ल्यूटोओ जैसी संस्थाएं। ये सभी संस्थाएं अमेरिकी खेमे के हथियार हैं। जो उस बड़े प्रोजेक्ट का अंग हैं। जिन्हें विकासशील और पिछड़े मुल्कों में अमेरिकी हितों के लिए खड़ा किया गया है।
इसका सबसे सटीक उदाहरण अगस्त 1953 में ईरान की मो, मोसादेय सरकार है। जिसने ईरानी तेल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय लिया था। सीआईए और यूके एफ16 ने ईरान में चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करा दिया और शाह पहलवी को ईरान का तख्त सौंप दिया। जो अमेरिकी खेमे से जुड़े थे। उस समय भी भ्रष्टाचार और तानाशाही के आरोप लगे थे।
एक बात ध्यान रखना चाहिए कि दुनिया में 90% सूचनाएं अमेरिकी यूरोपीय स्रोतों से आती हैं। दो-तीन अमेरिकी और यूरोपीय एजेंसियों का विश्व मीडिया पर नियंत्रण है। इसलिए विरोधी सरकारों को भ्रष्ट लोकतंत्र विरोधी प्रचारित कर जनता से अलगाव में डालने के लिए अमेरिकी खेमा मीडिया का प्रयोग करता है। हमने इराक से लेकर लीबिया सीरिया तक में इसे देखा है। सद्दाम हुसैन को विश्व की शांति के लिए खतरा कहा गया था। आज उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग और अफ्रीका में उभरते हुए राष्ट्रवादी इब्राहिम तरोरे के बारे में विश्व मीडिया में आने वाली खबरें इसकी गवाह हैं।
लैटिन अमेरिका सीआईए के लिए आखेट स्थल है।जहां चुनी हुई सरकारें हमेशा अमेरिकी निशाने पर होती हैं। सितंबर 1973 में चिली में साल्वाडोर अलेंदे की वामपंथी सरकार चुनकर आई। उसने अपने देश के गरीबों के हित में नीतियां बनाना शुरू की। परिणाम हुआ कि सरकार को लोकतंत्र विरोधी भ्रष्ट और तानाशाह बताकर सैन्य तख्तापलट कराया गया। जिसमें राष्ट्रपति अलेंदे सहित मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य और प्रगतिशील बुद्धिजीवी लेखक कलाकार व हजारों कम्युनिस्ट कार्य कर्ता मारे गए। अल साल्वाडोर निकारागुआ में भी यही प्रक्रिया दोहराई गई थी। वेनेजुएला विश्व का गवाह है। हम अपने पड़ोसी देश इंडोनेशिया में 1967 में चुनी हुई वामपंथी सरकार को गिराकर दशियों लाख कम्युनिस्ट कार्य कर्ताओं की हत्या को कैसे भूल सकते हैं।
पूंजीवादी सभ्यता पूंजी संचय पर टिकी है और पूंजी निर्माण मानव श्रम की लूट पर।जिसका एकमात्र उद्देश्य जनता के श्रम को निचोड़ कर मुनाफा कूटना है। इस सभ्यता के नाभि में भ्रष्टाचार का अमृत भरा है ।जिस क्षण यह अमृत सूख जाएगा । उसी क्षण मनुष्य के श्रम की लूट पर टिकी यह सभ्यता स्वत: मुरझा जाएगी।
यहां सवाल सिर्फ यह है कि जहां वामपंथी पूंजीवादी सरकारों का नेतृत्व करते हैं। तो उनके समक्ष व्यवस्थागत अंतर विरोध को हल करने का सवाल मौजूद होता है ।नेपाल के कम्युनिस्टों को भी इस सवाल से रूबरू होना पड़ा था। निश्चय ही नेपाल की विशिष्ट परिस्थितियों में उन्होंने इस अंतर विरोध को हल करने का प्रयास किया होगा। ऐसा लगता है कि राजशाही के समय से चली आ रही सामंती और साम्राज्यवादी पूंजी के गठजोड़ से बनी जटिल व्यवस्था के मकड़ जाल को तोड़ पाने में कामयाब नहीं हुए। जिसका परिणाम हुआ कि उनकी क्रांतिकारी ऊर्जा चुक गई।
जहां वे राजशाही को हटाकर एक गणतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था बनाने में कामयाब हो गए थे। वही अर्धसामंती और अर्ध पूंजीवादी ढांचा पर निर्णायक चोट नहीं कर सके। वह सरकार चलाने की जोड़-तोड़ क जटिल प्रक्रिया में उलझ कर खुद ही पूंजीवाद के जाल में फंस गए और अपनी क्रांतिकारी परिवर्तनकारी ऊर्जा खो बैठे। एक बात और ध्यान देना चाहिए कि राज्य का चरित्र निश्चय ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पार्टियों को प्रभावित करता है । जो वस्तु स्थिति के बदलाव के साथ मैक्रो लेबल पर सांस्कृतिक वैचारिक और व्यवहारिक प्रभाव डालता है। इसलिए क्रांतिकारी पार्टी को विकास की प्रत्येक अवस्था में होने वाले परिवर्तनों पर नजर रखनी पड़ती है।
राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति में होने वाले विकास को साम्राज्यवादी ताकतें बखूबी समझती हैं। उनकी निगाहें इस बदलाव पर रहती हैं। ज्यों ही क्रांतिकारियों का जनता से अलगाव शुरू होता है। वे पलटवार करती हैं। आज नेपाल की वामपंथी सरकार इसी पटवार का शिकार है। उम्मीद है कि अपनी सफलताओं और कमजोरियों से नेपाल के लोकतांत्रिक और वामपंथी सीख लेंगे और नेपाल के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षा को नए परिवेश में संबोधित करने में सक्षम होंगे।
सुशीला कार्की के नेतृत्व में गठित सरकार के पास भ्रष्टाचार नेपोटिज्म बेरोजगारी बढ़ती गरीबी असमानता आर्थिक संकट का समाधान नहीं है। हो भी नहीं सकता। इसलिए नेपाल के लोकतांत्रिक प्रगतिशील जन गण को इस विषम परिस्थिति का धैर्य पूर्वक सामना करना होगा और साम्राज्यवादी ताकतों के नेतृत्व में नेपाल के लोकतंत्र पर हुए हमले का पुरजोर प्रतिवाद करते हुए नए सिरे से संगठित होना होगा। नेपाल के लोकतांत्रिक जनगण ने राजशाही के खिलाफ 80 वर्षों से चल रहे संघर्षों में अनेक उतार- चढ़ाव देखा है और उनका सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। इसलिए इस संकट से भी बाहर निकल जाएंगे।
यह फेसबुक ट्विटर यूट्यूब मेटा व्हाट्सएप आदि युग है। वे समूची दुनिया के क्रियाकलाप व्यापार व्यवहार विचार को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। वे उदारीकरण के बाद पैदा हुई नई पीढ़ी के संपूर्ण व्यवहार पर नजर रखती हैं। जनरेशन जीरो नामक जिस पीढ़ी की चर्चा हो रही है। वह इसी आईटी क्रांति की उपज है। नेपाल में 1997 से 2014 के बीच के जिस युवा पीढ़ी का आंदोलन के लिए आवाहन किया गया था। उसका निर्माण पूंजीवादी सभ्यता के पतन काल में हुआ है। जिसे हम 1991 के बाद बनी उदारीकृत दुनिया कहते हैं ।
इस पीढ़ी के सामाजिक सरोकार मानवीय संवेदना उपभोक्तावादी और बाजारवादी मूल्य से निर्मित हैं। ये विखंडित नागरिक चेतना के स्वाभाविक प्रतिनिधि हैं। इसलिए इस वर्ग की चेतना के अंतर विरोध को समझना चाहिए। यह पीढ़ी ज्ञान नहीं सूचना और डाटा से लैस है ।इनके लिए मनुष्य एक संख्या है। संस्थाएं निर्जीव इमारतें और संसद न्यायपालिका सार्वजनिक संस्थानों को जला देना मात्र एक सूचना है। मानवीय वेदना इसके विवेक और हृदय को द्रवित नहीं करती ।
यह पीढ़ी अस्मिता की खोज करते हुए उदंड हिंसक और संहारक बन गई है। इसलिए साम्राज्यवादियों के लिए इनको शिकार बना लेना बहुत आसान है ।आज नेपाल सहित भारतीय उपमहाद्वीप में इस तरह की युवा पीढ़ी के चारों तरफ जो चीज दिखाई दे रही है । वह धर्म जाति यूनीवादी राष्ट्रवाद का ध्वजा धारण कर सुपारी किलर या आत्महंता बन जाती है। इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं के विध्वंस का जश्न मनाना इसके आत्म अलगाव का प्रतीक है। इस युवा शक्ति के बल पर कोई राष्ट्र आगे प्रगति नहीं कर सकता। सुशीला कार्की के हाथ में साम्राज्यवादी प्रोजेक्ट के तहत मिली सत्ता की अगुवाई करते हुए देखना दिलचस्प होगा।
अंतिम बात 14 से 27 साल के युवाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए यूनिफॉर्म सहित आमंत्रित करना एक डिजाइन का हिस्सा लगता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का विध्वंसक होना और पुलिस द्वारा गोली चलाकर 20 लोगों को मारना। उसमें यूनिफॉर्म पहने हुए 12 वर्ष के बच्चे की मौत को आगे कर नागरिक संवेदना को उत्तेजित कर हिंसक बना देना ।शायद इस डिजाइन का सबसे सुव्यवस्थित पार्ट था। सेना का अंतिम समय चुप रहना और अंत में केपी ओली को पद त्याग के लिए दबाव बनाना। स्क्रिप्ट का दूसरा पार्ट था। संसद न्यायपालिका राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय को जलता हुआ देखती रही। वह तभी सक्रिय हुई जब प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया ।
(श्रीलंका बांग्लादेश मैं हुए विद्रोह को नेपाल के तख्ता पलट के साथ जोड़कर देखने से यथार्थ स्पष्ट नहीं होगा।)
मुझे आश्चर्य है कि विश्व के सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रेटजिक पॉइंट (चीन के बगल में) हिमालय की पहाड़ियों के मध्य बसे नेपाल में चुनी हुई वामपंथी सरकारों को 17 वर्षों तक कैसे काम करने दिया गया। आगे दमन सघन होगा। एक-एक करके कम्युनिस्ट नेताओं से लोकतंत्र बहाली और राजशाही हटाने के अपराध का हिसाब चुकता किया जाएगा । आज केपी ओली के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर इसका संकेत दे दिया गया है। लेकिन इतिहास का सबक तो यही है कि दमन और प्रतिरोध के बीच ही तो कम्युनिस्ट आंदोलन को नया जीवन मिला है।
(जयप्रकाश नारायण वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)