नोटबंदी की याचिका चार साल से कहां धूल फांक रही है योर ऑनर!

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नोटबंदी के चार साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को दावा किया कि इससे काले धन को कम करने में मदद मिली है। कर जमा करने में वृद्धि हुई है और पारदर्शिता बढ़ी है। जब नोटबंदी इतनी अच्छी थी तो उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ क्यों नोटबंदी के मामले को न्यायिक फाइलों में दबाकर बैठी है। नोटबंदी के बाद के मामलों पर उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ सुनवाई करके अपना फैसल सुना चुकी है।

वर्ष 2016 से ही नोटबंदी का मामला उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है। उच्चतम न्यायालय ने मामले में आठ सवाल तय किए गए हैं। देश भर की अलग-अलग अदालतों में लंबित मामलों पर रोक लगा कर और सभी मामलों की सुनवाई अब खुद सुप्रीम कोर्ट करेगा।

पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इन सवालों पर फैसला करेगी, जिनमें क्या नोटबंदी का फैसला आरबीआई एक्ट 26 का उल्लंघन है? क्या नोटबंदी के 8 नवंबर और उसके बाद के नोटिफिकेशन असंवैधानिक हैं? क्या नोटबंदी संविधान के दिए समानता के अधिकार (अनुच्छे द 14) और व्यापार करने की आजादी (अनुच्छेहद 19) जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? क्या नोटबंदी के फैसले को बिना तैयारी के साथ लागू किया गया, जबकि न तो नई करेंसी का सही इंतजाम था और न ही देश भर में कैश पहुंचाने का? क्या बैंकों और एटीएम से पैसा निकालने की सीमा तय करना अधिकारों का हनन है? क्या जिला सहकारी बैंकों में पुराने नोट जमा करने और नए रुपये निकालने पर रोक सही नहीं है? क्या कोई भी राजनीतिक पार्टी जनहित के लिए याचिका डाल सकती है या नहीं? तथा क्या सरकार की आर्थिक नीतियों में सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकता है?

उच्चतम न्यायालय ने ज़िला सहकारी बैंकों को लेन-देन करने की इजाज़त देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने सरकार की इस दलील को माना था कि सहकारी बैंकों के पास खाताधारकों की पूरी जानकारी नहीं है और अगर ज़िला सहकारी बैंकों को पैसे जमा करने की इजाज़त दी गई तो बड़े लोगों का काला धन जमा होने लगेगा। कोर्ट ने हर हफ्ते 24 हज़ार रुपये निकालने की सीमा में बदलाव या उसे सख्ती से लागू करने का निर्देश देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने अस्पताल, मेडिकल स्टोर वगैरह में पुराने नोट लिए जाने की मियाद बढ़ाने से भी इंकार कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय का आदेश केंद्र सरकार के लिए संकट से बचने का रास्ता था। मामले की सुनवाई संवैधानिक सवालों पर करके संविधान पीठ को सौंपा गया था पर इसकी सुनवाई के लिए संविधान पीठ आज तक नहीं बनाई गई। यानी मामला ठंढे बस्ते में डाल दिया गया है। इसी तरह राजनितिक मामलों में जहां भाजपा सरकारों के पक्ष में मामले होते हैं वहां सुनवाई तुरंत हो जाती है पर जहां संवैधानिक औचित्य के सवाल उठते हैं, वहां मामले को लंबित रखकर उसे अकाल मौत मार दिया जाता है।

ताजा मामला मध्य प्रदेश का है, जहां उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस के 22 बागी विधायकों को अयोग्य करार देने के लिए स्पीकर को निर्देश दिए जाने की याचिका पर सुनवाई बंद कर दी है। ये सभी विधायक इस साल मार्च में इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे। कोर्ट ने कहा है कि मध्य प्रदेश के विधायकों की अयोग्यता का मामला अब निष्प्रभावी हो गया है, क्योंकि 10 नवंबर को उपचुनाव के नतीजे आने वाले हैं। कोर्ट ने कहा कि इस वजह से याचिका का निपटारा किया जाता है।

याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने इस पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के विधायकों की अयोग्यता का मामला निष्प्रभावी हो गया है, इसलिए भले ही याचिका पर सुनवाई बंद कर दी गई हो लेकिन कोर्ट में यह मामला लंबे समय तक लंबित रहा। सिब्बल ने कहा कि अदालत द्वारा अयोग्यता के मामलों को प्राथमिकता के साथ उठाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने नाराजगी जताई कि अन्य राज्यों तमिलनाडु, गोवा, कर्नाटक आदि में भी इस तरह के मामलों का यही हुआ क्योंकि वो उच्चतम न्यायालय में लंबे समय तक लंबित रहे।

कपिल सिब्बल ने अपील की है कि ऐसे मामलों की सुनवाई जल्दी होनी चाहिए और बार-बार सुनवाई नहीं टाली जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु का केस तो लगभग साढ़े तीन साल से लटका हुआ है। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा कि भविष्य में अदालत इस तरह के मामलों में तारीख आगे बढ़ाए जाने के अनुरोध पर विचार करते समय इस बात का ध्यान रखेगी।

गौरतलब है कि देश में ठीक चार साल पहले आज के ही दिन आधी रात से 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद कर दिया गया था। अचानक हुई नोटबंदी के कारण पूरे देश में हड़कंप मच गया था। नोटबंदी के करीब आधे घंटे बाद ही एटीएम मशीनों के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगना शुरू हो गई थीं। यह सिलसिला कई दिनों तक चला, लोग अपना जरूरी काम छोड़ कर बैंकों के बाहर ही डटे रहे। ऐसे वक्त में जहां एक तरफ मोदी सरकार ने इसे कालेधन पर बड़ा हमला बोला तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने इसे देश की अर्थव्यवस्था की बर्बादी बताया। कांग्रेस आज भी नोटबंदी के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर हमला बोल रही है। वहीं विपक्ष पर पलटवार करने के लिए बीजेपी के अलावा खुद पीएम मोदी भी मैदान में आ चुके हैं।

नोटबंदी के चार साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि इससे काले धन को कम करने में मदद मिली है, कर जमा करने में वृद्धि हुई है और पारदर्शिता बढ़ी है। मोदी ने आज ट्विटर पर नोटबंदी के अपनी सरकार के फैसले के लाभों को गिनाया।

दूसरी ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने वीडियो ट्वीट में कहा, ‘नोटबंदी पीएम की सोची समझी चाल थी, ताकि आम जनता के पैसे से ‘मोदी-मित्र’ पूंजीपतियों का लाखों करोड़ रुपये कर्ज माफ किया जा सके। गलतफहमी में मत रहिए- गलती हुई नहीं, जानबूझकर की गई थी। इस राष्ट्रीय त्रासदी के चार साल पर आप भी अपनी आवाज बुलंद कीजिए। चार साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कदम का मकसद अपने कुछ ‘उद्योगपति मित्रों’ की मदद करना था और इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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