अप्रैल 2025 में जब अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक भारत आए तो धमकी देकर गए कि आखिर “भारत अमेरिका से मक्का का एक भी दाना क्यों नहीं खरीदता?” उनकी इस शिकायत को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने भारत पर 16 पन्नों की शिकायतें के तौर पर शामिल किया। जिसमें भारत के किसानों के लिए एमएसपी जैसी जरूरी व्यवस्था को फ्री मार्केट में रुकावट बताया गया था।
करीब दस महीनों की कूटनीतिक आपाधापी के बाद अब यह साफ दिख रहा है कि भारत–अमेरिका ट्रेड डील उन्हीं शर्तों की दिशा में आगे बढ़ी है, जिन्हें अमेरिका लंबे समय से उठाता रहा है।
दरअसल अमेरिका को अपना 4500 करोड़ का व्यापार घाटा पूरा करना है। चीन के साथ व्यापारिक तनाव और जीएम फसलों से जुड़े नीतिगत बदलावों ने उसके लिए नए बाजार खोजना जरूरी बना दिया है। पहले अमेरिका बड़े पैमाने पर सोयाबीन और अन्य कृषि उत्पाद चीन को निर्यात करता था, लेकिन अब रास्ता धीरे-धीरे बंद होने लगा है ‘चीन में जीएम कॉटन का एरिया कम हुआ, नॉन जीएम सोया इंपोर्ट के लिए अमेरिका को ठुकरा बाकी देशों से डील की’ इसलिए अमेरिका को एक नए बाजार की तलाश थी, जो भारत के रूप में मिल गया है।
अब वो भारत को सोयाबीन, कपास, बादाम, अखरोट, वॉशिंगटन सेब और मक्का बेचने की तैयारी में है।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका में ट्रंप द्वारा लगाए गए “रेसिप्रोकल टैरिफ” को वहां के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। संभावना है कि अदालत इन्हें असंवैधानिक बता दे। कहा जा रहा है कि कोर्ट फैसला देने में समय ले रहा है, ताकि ट्रंप इन टैरिफ को आपसी समझौते वाले शुल्क में बदल सकें। लेकिन भारत इस जाल में फंस गया। अगर भारत ने 18% रेसिप्रोकल टैरिफ मान लिए, तो भले ही अमेरिका की अदालत उन्हें गैर-कानूनी करार दे दे, भारत पर वो शुल्क लागू रह सकते हैं।
भारत सरकार ने अमेरिका के साथ जो डील की है उसमें पिछले दरवाजे से वो सभी प्रयास किए गये हैं जिन्हें अब तक विदेश में व्यापार करने वाले फैंसलों में सुरखित रखा जाता था। बड़ी ही चतुराई से मोदी सरकार ने जीएम फसलों को लाने की जी हजूरी दे दी है। डील में शामिल अमेरिकी उत्पाद जो भारत आएंगे उसमें डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स शामिल है, अब नाम से अजीब लग सकता है। लेकिन यह देश में सीधे तौर पर जेनेटिकली मोडिफाइड मक्का को देश में लाने का प्रयास है।
अमेरिका में उगाया जाने वाला ज्यादातर मक्का जीएम यानी आनुवंशिक रूप से बदला हुआ होता है। चूंकि वहां बनने वाले एथेनॉल का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा मक्का से तैयार होता है, इसलिए वहां से निर्यात होने वाला अधिकतर डीडीजीएस भी मक्का से बना होता है, जिसे कॉर्न-डीडीजीएस कहा जाता है।
अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े एथेनॉल उत्पादकों में से एक है, इसलिए वहां डीडीजीएस का उत्पादन भी बहुत ज्यादा होता है और इसे कई देशों को निर्यात किया जाता है। भारत में अगर डीडीजीएस के आयात को अनुमति दी जाती है, तो इसका सीधा मतलब होगा कि अमेरिकी डीडीजीएस सस्ती कीमत पर भारतीय बाजार में पहुंचेगा। ऐसे में सबसे पहले असर भारतीय मक्का किसानों पर पड़ेगा, क्योंकि उन्हें अपनी उपज कम दाम पर बेचनी पड़ सकती है।
इसके साथ ही देश के पशु-चारा उद्योग पर भी दबाव बढ़ेगा। भारत में पहले से ही डीडीजीएस की पर्याप्त आपूर्ति मौजूद है। ऐसे में आयात बढ़ने से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति हो सकती है। इसका असर सोयामील जैसे ऑयलमील की मांग पर पड़ सकता है। मांग कमजोर होने पर तिलहन फसलों की कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
हैरानी की बात यह है कि भारत में मक्का की लगभग एक प्रतिशत भी खरीद एमएसपी पर नहीं होती। यानी किसान जो मक्का उगाता है, उसे लगभग पूरी तरह खुले बाजार के भरोसे बेचना पड़ता है। वहां कीमतें मांग और सप्लाई पर निर्भर करती हैं, और अक्सर किसान को तय न्यूनतम दाम का लाभ नहीं मिल पाता।
अब अमेरिका चाहता है कि भारत जीएम (आनुवंशिक रूप से बदला हुआ) मक्का और उससे जुड़े एथेनॉल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे। अगर ऐसा होता है, तो अनुमान है कि इससे अमेरिका को करीब 2,550 करोड़ रुपये का फायदा होगा।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस फायदे की कीमत कौन चुकाएगा? एक तरफ भारतीय मक्का किसानों को एमएसपी का मजबूत सहारा नहीं मिलता, और दूसरी तरफ उन्हें विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी।
इसके अलावा, जीएम मक्का को लेकर पर्यावरण और जमीन की उर्वरता पर संभावित प्रभावों को लेकर भी बहस चलती रही है। इसलिए यह मुद्दा केवल बाजार या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि और पर्यावरण नीति से भी जुड़ा हुआ है।
चिंता इस बात को लेकर भी है कि इस डील में शामिल “अतिरिक्त उत्पादों” की सूची पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसमें जीएम सोयाबीन तेल, मक्का, डेयरी या पोल्ट्री उत्पाद जैसे सामान भी शामिल हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें साफ तौर पर बाहर नहीं रखा गया है।
आंकड़ों के अनुसार, देश में सोयाबीन का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में होता है, इसके बावजूद सोया तेल का आयात लगातार बढ़ता गया है। इसका सीधा असर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे सोयाबीन उत्पादक राज्यों के किसानों पर पड़ रहा है। पिछले लगभग दस वर्षों से सोयाबीन के दाम 6,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास ही अटके हुए हैं और उससे ऊपर नहीं जा पाए हैं।
अगर सरकारी खरीद की बात करें, तो वर्ष 2024-25 में सरकार ने कुल उत्पादन का केवल 0.49 प्रतिशत सोयाबीन ही एमएसपी पर खरीदा। इसका मतलब यह है कि लगभग 99.5 प्रतिशत किसानों को अपनी फसल खुले बाजार में बेचनी पड़ी, जहां वे अक्सर बिचौलियों और व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं।
भारत सरकार द्वारा MSP पर खरीद फसलों का प्रतिशत (2024-25)
ऐसे में अगर अमेरिका अपना सस्ता सोयाबीन भारतीय बाजार में उतार देता है, तो पहले से ही कम दाम और बढ़ती लागत से जूझ रहे किसानों की स्थिति और कठिन हो सकती है। जब बाजार में सस्ता आयातित माल आएगा, तो घरेलू किसानों को अपनी फसल और कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है।
अमेरिका का सोयाबीन बाजार लगभग 60 बिलियन डॉलर, यानी करीब 5 लाख करोड़ रुपये का है। इतना बड़ा बाजार होने के कारण वह अपने उत्पादों के लिए नए खरीदार ढूंढ रहा है, और भारत उसके लिए एक बड़ा संभावित बाजार माना जा रहा है।
पहले से ही दाम गिरने की वजह से कई किसान सोयाबीन और मूंगफली की खेती छोड़कर मक्का और धान उगाने लगे हैं। यानी किसान अपनी फसल बदलने को मजबूर हैं। दूसरी तरफ सरकार कहती है कि तिलहन का उत्पादन बढ़ाना है और आयात कम करना है। जमीन पर हकीकत कुछ और दिख रही है।
अब जरा तुलना देखिए। अमेरिका अपने किसान को हर साल औसतन करीब 26 लाख रुपये तक की सब्सिडी देता है। वहीं भारत में किसानों को साल भर में सिर्फ 6 हजार रुपये प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तौर पर मदद मिलती है। ऐसे में अगर अमेरिका भारत पर दबाव डालकर टैरिफ कम करवाए और अपना बाजार यहां खोल दे, तो मुकाबला बराबरी का कैसे होगा? एक तरफ करोड़ों की मदद पाने वाला किसान, और दूसरी तरफ लागत निकालने के लिए जूझता भारतीय किसान।
अमेरिका अपने किसानों को “पूरी कृषि शृंखला” में मदद करता है, जिसका अर्थ है। किसान को बीज, खाद, सिंचाई, मशीन, फसल बीमा — सबमें मदद मिलती है। अगर फसल कम हो जाए या बाजार में दाम गिर जाएं, तो सरकार सीधे पैसे देकर नुकसान की भरपाई करती है। इतना ही नहीं, अमेरिका अपने किसानों की उपज विदेशों में बेचने में भी मदद करता है। वहां रिसर्च, नई तकनीक और आधुनिक खेती के लिए वैज्ञानिक सहयोग भी मिलता है। यानी किसान अकेला नहीं छोड़ा जाता।
अब भारत की हालत देखिए। यहां मदद टुकड़ों में मिलती है और वह भी हर किसान तक नहीं पहुंचती। बीज और खाद पर कुछ सब्सिडी जरूर है, लेकिन फसल कटने के बाद भंडारण, प्रोसेसिंग और सही दाम पर बिक्री की मजबूत व्यवस्था नहीं है। एमएसपी का फायदा भी सभी किसानों को नहीं मिलता। फसल बीमा की योजनाएं कई बार कागज़ी प्रक्रियाओं में उलझ जाती हैं।
बाजार तक पहुंच भी बड़ी समस्या है। कई किसानों को अपनी उपज कम दाम में बेचनी पड़ती है, क्योंकि मंडी या सरकारी खरीद केंद्र दूर होते हैं। ऊपर से केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं कई बार आपस में तालमेल नहीं बिठा पातीं या ठीक से लागू नहीं हो पातीं।
इसी तरह भारत में लगभग 98 लाख किसान कपास की खेती से जुड़े हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि सरकार कपास की खरीद एमएसपी पर लगभग नहीं करती। यानी किसानों को अपनी फसल बाजार के भरोसे ही बेचनी पड़ती है।
पिछले कुछ सालों में कपास का उत्पादन भी घटा है। 2017-18 के मुकाबले 2023-24 में करीब 9.18 मिलियन क्विंटल कम पैदावार हुई। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका इस स्थिति को एक मौके की तरह देख रहा है और भारतीय बाजार में अपने कपास की एंट्री बढ़ाना चाहता है।
भारत की कॉटन और टेक्सटाइल इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। यह न सिर्फ लाखों लोगों को रोजगार देती है, बल्कि निर्यात में भी बड़ा योगदान करती है। देश की जीडीपी में इसका करीब 2 प्रतिशत हिस्सा है। वैश्विक स्तर पर भारत करीब 25 प्रतिशत कॉटन उत्पादन में योगदान देता है।
अब बांग्लादेश का उदाहरण देखिए। पहले वह जितना कपास आयात करता था, उसमें से करीब 11 प्रतिशत अमेरिका से आता था। लेकिन कीमतों के अंतर और ब्राज़ील, भारत तथा अफ्रीकी देशों से सस्ता कॉटन मिलने के कारण यह हिस्सा घटकर करीब 6 प्रतिशत रह गया है। यानी बांग्लादेश अब पहले की तुलना में कम अमेरिकी कपास खरीद रहा है।
हालिया व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत ने करीब 6.44 अरब डॉलर का कपास निर्यात किया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बांग्लादेश को गया। भारत के कुल कपास निर्यात का लगभग 40–42 प्रतिशत हिस्सा अकेले बांग्लादेश को भेजा गया। लेकिन अब अमेरिका -बांग्लादेश ट्रेड डील ने समीकरण बदल दिए हैं। अगर बांग्लादेश अमेरिका से कच्चा कपास खरीदेगा, तो उसे अमेरिका में कपड़ों के निर्यात पर जीरो टैरिफ देना होगा। ऐसे में क्या बांग्लादेश अब भारतीय कपास खरीदेगा? गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और राजस्थान के कपास किसानों के भविष्य का क्या होगा?
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने के फैसले को भारतीय टेक्सटाइल उद्योग ने शुरुआत में बड़ी राहत के रूप में देखा। यह दर पाकिस्तान (19 प्रतिशत), वियतनाम (20 प्रतिशत) और चीन (30 प्रतिशत) जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कम है। हालांकि, अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते की बारीक शर्तों ने भारतीय निर्यातकों और कपास व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका ने बांग्लादेश को कुछ टेक्सटाइल उत्पादों पर शून्य ड्यूटी की सुविधा दी है, बशर्ते वे उत्पाद अमेरिकी कपास या अमेरिकी मैन-मेड फाइबर से बने हों। यह प्रावधान भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को कमजोर कर सकता है, क्योंकि भारतीय निर्यातकों को अभी भी 18 प्रतिशत ड्यूटी चुकानी होगी।
इसका असर कपास व्यापार पर भी पड़ सकता है। बांग्लादेश दुनिया का सबसे बड़ा कपास आयातक है और लंबे समय तक भारतीय कपास का प्रमुख खरीदार रहा है। कुछ वर्ष पहले तक भारत के कुल कपास निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत बांग्लादेश जाता था। लेकिन यदि बांग्लादेश अमेरिकी कपास के उपयोग को बढ़ाता है ताकि उसे शून्य ड्यूटी का लाभ मिले, तो भारतीय कपास की मांग घट सकती है।
खैर “विश्वगुरु” बनने की ऊँची-ऊँची डींगें तो बहुत हाँकी गईं, लेकिन इस अहम डील पर अब तक प्रधानमंत्री मोदी का मौन रहना और डील पर कोई साफ़ बयान सामने न आना उनके दावों की पोल तो खोलता ही है।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं)