सच बहुत कड़वा होता है, सुन लीजिये…
सरकार किसकी है इस पर मत सोचिये। कोई दूध का धुला नहीं है। मेरा किसी दल से राग द्वेष नहीं। मनुष्यता थोड़ी बची है, जो देखता हूं लिख देता हूं।
भारत मे इंसाफ का मयार यानि मापदंड यह है कि अगर मुलजिम हिन्दू है तो अपराध साबित होने तक कानून के पंजा ए गिरफ्त से आज़ाद वह आराम से खुली हवा में जमानत लेकर जीता है, हत्यारा-बलात्कारी है तब भी जमानत मिलने में कोई परेशानी नहीं। बशर्ते उसने हत्या या बलात्कार मुस्लिम के साथ किया हो। गुजरात का बाबू बजरंगी सामने घूम रहा है। माया कोडनानी बरी हो गयी।
बाकी का 20 से 30 साल बाद जब फैसला आता है तब तक मुलजिम परलोक सिधार चुका होता है या पैर कब्र में लटके होते हैं। जबकि अगर मुलजिम मुसलमान है तो आरोप लगते ही उसे उठा लिया जाता है, मीडिया ट्रायल शुरू हो जाता है। मीडिया आतंकवादी, देशद्रोही चिल्ला-चिल्लाकर साबित कर चुकी होती है। और बतौर मुलजिम उसे तमाम तरह के रिमांड और इन्वेस्टिगेशन के नाम पर जब तक फैसला नहीं आता तब तक जेल में सड़ने को मजबूर कर दिया जाता है। शरजील इमाम जेल में सड़ रहा है।
यह दोहरा रवैय्या बिल्कुल खुला हुआ है, यह मैं आज से नहीं कांग्रेस के जमाने से देख रहा हूं।
यह मुल्क उस निसार अहमद को भूल गया होगा शायद, जिसकी जिंदगी के 23 कीमती साल उसे जेल में गुजारने को मजबूर किया गया, आखिर में कोर्ट ने बाइज्ज़त बरी किया, लेकिन क्या कोई वह 23 साल उन्हें वापस कर सका?
क्या यही इंसाफ का मयार यानि मापदंड है ?
9 साल जेल में गुज़ार चुके अब्दुल वाहिद शेख इस दंश को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। अब्दुल को 2006 में मुंबई में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के बाद गिरफ्तार किया गया था। वो उस समय एक स्कूल में पढ़ाते थे।
गिरफ्तारी के बाद अब्दुल 9 सालों तक जेल में रहे। 2015 में उन्हें बेगुनाह करार देकर बाइज्ज़त बरी कर दिया गया। अब्दुल ने अपनी आपबीती पर एक किताब लिखी है। किताब का नाम है ‘बेगुनाह कैदी’। अब्दुल ने इस किताब में अपने साथ हुई बेशुमार ज़्यादतियों का खाका खींचा है। सिस्टम अपने पर आए तो किस हद तक जा सकता है इसका दहलाने वाला दस्तावेज़ है ये किताब। अगर सच में देश में इंसाफ़ के चरित्र को देखना चाहते हैं तो मनुष्य बनकर जरूर पढ़ें। हिंदू-मुस्लिम नहीं।
अब्दुल बताते हैं कि नार्को टेस्ट में उन्हें इंजेक्शन लगाया जाता और जब उनका अपने ऊपर काबू नहीं रहता तब उनसे पूछा गया कि पांच के बाद कौन अंक आता है, जवाबन उन्होंने कहा-छह।
जब रिकॉर्डिंग की सीडी आयी तब वह डॉक्टर्ड की हुई थी।
सवाल बदल कर यह हो चुका था कि ” तुम्हारे घर में कितने पाकिस्तानी आये थे, और सीडी रिकॉर्डिंग में अब्दुल जवाबन वही कह रहे थे छह।
ऐसे ही अब्दुल बताते हैं कि उनके दोस्त से पूछा गया कि टीवी किससे चलता है, दोस्त ने कहा रिमोट से।
लेकिन रिकॉर्डिंग में सवाल बदल दिया गया और सवाल था कि बम विस्फोट कैसे किया था, जवाब वही था “रिमोट से”।
इतनी भीषण मक्कारी और पशे पुश्त (पीठ पीछे) खंजर घोंपने का काम बदस्तूर जारी रहा।
इस पशुता के लिए अगर आप प्रशासन को गुनहगार मानते हैं तो ज़रा ठहरिए।
अब्दुल ने अपनी किताब में एटीएस ऑफिसर विनोद भट्ट को लेकर भी कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। बकौल अब्दुल, विनोद भट्ट जानते थे कि पकड़े गए सभी लोग बेगुनाह हैं। उन्होंने कसम खाई थी कि वो सबको बचा लेंगे, विनोद भट्ट कहते थे कि उन पर दबाव है कि इन सारे सस्पेक्ट पर इल्ज़ाम साबित करो, लेकिन विनोद ने अब्दुल से कहा कि वह सभी बेगुनाहों को बचा लेगा भले उसकी जान चली जाए। कुछ ही दिनों बाद उनकी रहस्यमयी हालत में मौत हो गई। उनकी लाश रेलवे ट्रैक पर पाई गई।
अगर मैं लिख दूंगा कि जब ये घटनाएं हुईं तब गृह मंत्रालय पर कांग्रेस का कब्ज़ा था। मेरे ऐसा लिखते ही कुछ मुर्दा ज़हन लोग इस घोर निंदात्मक कुकर्म पर सोचने के बजाए कॉग्रेस की तरफदारी करने लग जाएंगे और बीजेपी जीत जाएगी का चिर परिचित डर दिखाया जाएगा।
चूंकि चाहे हुकूमत हार्ड हिंदुत्व की रही हो या सॉफ्ट की, लेकिन नाम देखकर जुल्म का जो बदस्तूर सिलसिला जारी है यह राजनीतिक एजेंडा नहीं है बल्कि इस मुल्क का सौतेला रवैय्या है, और साम्प्रदायिकता को सियासत ने खूब हवा दी है।
और मुसलमान अपने मुसलमान होने की कीमत चुका रहा है।
बहराइच के खैरवा बाज़ार और अम्बुआ में हुई साम्प्रदायिक घटना के बाद 87 नामजद एक जगह और 200 अन्य दूसरी जगह 47 नामज़द बाकी अन्य,
और इस एकतरफा कार्रवाई में FIR सिर्फ मुसलमानों के ही नाम है एक नाम भी आपको दूसरे समुदाय का नहीं मिलेगा।
देश बहुत संक्रमण काल से गुजर रहा है..
इस देश में सांप्रदायिक घृणा का ये आलम है कि मनुष्य अब कोई रह ही नहीं गया है। सब हिंदू-मुसलमान हो गये हैं बाकी 5 किलो राशन पर पलने वाले लोग हैं।
लोकतंत्र गाली बनकर रह गया है।
(यह लेख सिंह बीएचयू के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)
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