ईरान जंग : साम्राजयवाद -पूँजीवाद से टकराता मज़हब!

(भाग : 1) 

“सितारों से आगे जहां और भी हैं“

इक़बाल 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताज़ा चिंतन-विरोधी उवाच है ‘ दिमाग़ी नक्सल’.  दिमाग़ी नक्सल का सार  तत्व है ‘ प्रतिरोध की चेतना’.  सभ्यता- यात्रा में यह चेतना मानवजाति को हर प्रकार के अन्याय,विषमता, उत्पीड़न,साम्राज्यवाद -उपनिवेशवाद , दासता और तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती रही है आज इस्लामी ईरान इसका ‘ चेतना पुंज’ बना हुआ है। 

ईरान – अमेरिका  के बीच ज़ुबानी और शस्त्र, दोनों प्रकार की जंगें उग्र से उग्रतर होती जा रही हैं। पिछले करीब 6 महीनों से यह सिलसिला जारी है। दोनों ही देशों के नेतृत्व अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं; अमेरिका के शब्द – खिलंदड़े राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की डींगें अपने चरम पर हैं; ईरानी नेताओं की नज़र में ट्रम्प नाभरोसे काबिल हैं; जलडमरूमध्य की नाकाबंदी है; और लेबनान व ग़ज़ा में इजराइल की हिंसक हरकतें ज़ारी हैं, जंग का विस्तार होता जा रहा है। ईरान के निर्देश पर हूती भी जंग में शामिल हो गया है।

इसी के साथ जंग पर विराम के लिए मध्यस्थ वार्ताकार देशों (पाकिस्तान, क़तर और कुछ अन्य देश) की कोशिशें भी चल रही हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय तक पश्चिम एशिया पूरी तरह से ‘अशांत’ और तेल-गैस ऊर्जा महंगाई की ‘गिरफ़्त’ में हैं। पिछले एक अर्से में ईरान बनाम अमेरिका+इजराइल जंग के कई छोटे-बड़े चक्र हो चुके हैं। कब जंग-चक्रों पर निर्णायक रूप से विराम लगेगा और अंतिम विजेता कौन होगा, यह सब कुछ अनिश्चित है, क्योंकि ट्रम्प ईरान को ‘पाषाण युग’ में तब्दील करने के अपने मंसूबे का ऐलान  गत मार्च में पहले ही कर चुके हैं।

अमेरिका की सम्भावी शिक़स्त की स्थिति में वाचाल राष्ट्रपति विजय-प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक उतर  सकता है और 1945 की  हिरोशिमा+नागासाकी विभीषिका की पुनरावृति हो सकती है। वर्तमान परिदृश्य में इस संभावना की उपेक्षा नहीं की जा सकती। 

प्रस्तुत लेख का विषय जंग में ईरान या इजराइल की हार-जीत नहीं है। इस लेख का मूल विषय है नव साम्राज्यवादी व उपनिवेशवादी अमेरिका के साथ जंग में मज़हब और उसके नेतृत्व की ‘क्रांतिकारी भूमिका’। ईरान में 1979 में शिया समुदाय के सर्वोच्च धार्मिक नेता  अयातुल्ला रूहुल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में ‘इस्लामी  क्रांति’ हुई थी। उन्होंने वंशवादी शासक शाह मोहम्मद रेज़ा पहलवी के पश्चिम+अमेरिका परस्त शासन को उखाड़ फेंका था।

बेशक़, शाह के तख़्ता पलट में ईरान के वामपंथी संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन, चरम दक्षिणपंथी धार्मिक या मज़हबी क्रांति ने वामपंथी शक्तियों को हाशिये पर फेंक दिया। उन्हें निर्ममता के साथ कुचल दिया था। ईरान में मज़हबी शक्ति बनाम प्रगतिशील शक्ति पर स्वतंत्र चर्चा की दरकार है लेकिन, यह लेख ईरानी राजसत्ता पर धार्मिक नेतृत्व की भूमिका पर केंद्रित है।  तीन साल बाद इस्लामी क्रांति अपनी शासन-यात्रा की आधी सदी पूरी कर लेगी।

इस 27 साला यात्रा में इसने करीब 8 साल अपने पड़ोसी शिया देश इराक़ के साथ जंग में बिताये। इस जंग में करीब 8-10 लाख ईरानियों के प्राण गये थे, जिनकी शहादत को जिलाये रखने के लिए तेहरान में ‘युद्ध संग्रहालय‘ भी बना हुआ है। 1979 से ही ईरान की जनता अमेरिकी प्रतिबंधों को झेलती आ रही है। पिछले साल भी इजराइल-ईरान की झड़पें होती रही हैं। इस वर्ष भी ईरान 28 फरवरी से अमेरिका और उसके पिट्ठू देश इजराइल के संयुक्त हमलों का सामना करता आ रहा है।

पहले ही दिन दोनों देशों के संयुक्त हमले ने ईरान के शिखर धार्मिक नेतृत्व अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई की जीवनलीला का अंत कर दिया था। इस आक्रमण में ख़ामेनेई के साथ उनके परिवार के समीपी सदस्य भी मारे गए थे। सर्वोच्च धर्मगुरु की मृत्यु या हत्या के बाद उनके पुत्र मुज्तबा खामेनेई ने अपने पिता का स्थान लिया है। इस समय उनके ही नाम पर आदेश जारी किये जाते हैं। लेकिन, उन्हें सार्वजनिक रूप से अदृश्य रखा जाता है।

यहां तक कि वे कोम में अपने पिता के अंतिम संस्कार या ‘सुपर्दे खाक़’ के अवसर पर भी दिखाई नहीं दिये। सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें भूमिगत रखा जा रहा है। बावज़ूद इसके, उनके डोनाल्ड ट्रम्प के विरुद्ध समय-समय पर चिढ़ानेवाले बयान ज़ारी होते रहते हैं। बयानों से राष्ट्रपति ट्रम्प कुढ़ते रहते हैं। उनके अंट-शंट उवाच आते-रहते हैं। लेकिन, ईरान भी अपने फ़ौलादी सीने पर अमेरिकी मिसाइलों और बमबारी को झेलता चला आ रहा है। 

उसे अन्य मुस्लिम देशों (सऊदी अरब, इराक़, संयुक्त अरब अमीरात, जोर्डन, क़तर, सीरिया, कुवैत, बहरीन, मिस्र आदि) के समान अमेरिका-इजराइल के समक्ष ‘समर्पण’ नामंज़ूर है। ईरान का यह अडिग रुख पूंजीवादी पश्चिमी देशों+अमेरिका के लिए पहेली बना हुआ है। 

सभ्यताओं के इतिहास में धर्म या मज़हब या रिलिजन का रोल प्रायः प्रगतिशीलता के विरुद्ध प्रतिगामी व यथास्थिवादी रहा है। नई खोजों और नये आविष्कारों को अस्वीकार किया है। चर्च द्वारा हिंसात्मक अस्वीकृतियों से ईसाई देशों का मध्ययुग भरा हुआ है; पोप-पादरियों की ज़मात उभरती तर्कशीलता व वैज्ञानिकता को खारिज़ करती रही। इस्लामी देश भी पीछे नहीं हैं; समाज पर ख़लीफ़ाओं-इमामों-मुल्लाओं का शिकंजा कसा रहा है; ईश निंदा और फ़तवे के खौफ़ में समाज को रखा गया। 

कतिपय अपवादों को छोड़ कर हिन्दू धर्माचार्यों ने भी शूद्र वर्ग को धार्मिक समानता, वेद-पुराण ज्ञान, प्रतिभा, कौशल, शिक्षा, सवर्ण- नियंत्रित प्रौद्योगिकी आदि से वंचित रखा है; एकलव्य व शम्बूक ज्वलंत उदाहरण हैं; मनु स्मृति में निषेध व नियंत्रण व्यवस्था के कई साक्ष्य मिल जायेंगे।

विश्व के लगभग सभी प्रमुख धर्मों और धर्म ग्रंथों का जन्म कृषि युगीन सामाजिक व्यवस्था के आस-पास हुआ है। सामंती व्यवस्था में इनका विशेष संरक्षण व पोषण होता रहा है। धर्म-पुराण आधारित व्यवस्था का सामना औद्योगिक क्रांति से निर्मित समाज में नई सामाजिक+आर्थिक+राजनैतिक शक्तियों और अंतर्विरोधों से होता है। पूंजीवादी व्यवस्था के नियंता ईश्वर और धर्म को ‘उपयोगिता’ व ‘वस्तु’ में परिवर्तित कर देते हैं।

वे सत्ता प्राप्ति के शस्त्र बना दिये जाते हैं; ज्वलंत उदाहरण है भारत; 2014 में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के कारकों में प्रमुख कारक राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन भी रहा है। आज भी अर्द्धविकसित समाजों के संरचनात्मक परिवर्तनों में ईश्वर व धर्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आसानी से टूटती नहीं है कृषि युगीन मानसिक संरचना; आधुनिकता भी मध्य युगीनता की बैसाखियों पर सवार हो कर आती है। यही वजह थी कि 1995 के भारत में अफवाहों पर आधारित  ‘गणेश-दुग्धपान अभियान’  प्रभावशाली रफ़्तार से चलता रहा। शासक वर्ग  इस कृषि+मध्ययुगीन मानसिकता का जम कर इस्तेमाल करता आया है। लेकिन, ऐसा भी दौर आता है जब धर्म और धार्मिक नेतृत्व सत्ता से टकराता और समाज में हलचल पैदा करता है।

दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में चर्च ने प्रतिरोध की भूमिका निभाई थी; चरमपूंजीवादी अमेरिका से टक्कर ली थी। 1960 के दशक में लैटिन अमेरिकी कैथोलिकों ने शोषण-उत्पीड़न और आर्थिक विषमता के खिलाफ ‘ईसाई आंदोलन‘ चलाया था, जोकि समाज के वंचित वर्गों का पक्षधर था। यह आंदोलन ‘मुक्ति धर्मशास्त्र’ के रूप में काफी लोकप्रिय भी हुआ। यहां तक कि 1959 की क्यूबा क्रांति में भी इसके तत्व मौज़ूद थे।

पोप फ्रांसिस मुक्ति धर्मशास्त्र के लोकप्रिय समर्थक थे, हालांकि वेटिकन चर्च ने मुक्ति धर्मशास्त्र से प्रेरित ईसाई आंदोलन से अपनी दूरी बनाए  रखी थी। एक ऐसा भी समय आया जब अमेरिका ने वर्ल्ड कौंसिल ऑफ़ चर्चेस पर वामपंथी प्रभाव का आरोप लगाया था, मुक्ति धर्मशास्त्र का प्रभाव तेज़ी से फ़ैल रहा था। इसका प्रभाव ब्राज़ील के विश्व प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिक्षा शास्त्री पाउलो फ्रेरे की  पुस्तक ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पर दिखाई देता है।

जब समाज में राजसत्ता की ज्यादतियां, विषमता, अन्याय, उत्पीड़न, शोषण आदि बढ़ जाते हैं तब पुरोहितों या धार्मिक नेतृत्व का संवेदनशील वर्ग प्रतिरोध के लिए सामने आता है और सुधार के लिए आंदोलन भी करता है। ईरान में कुछ ऐसा ही घटा है। 

एक समय था जब ईरान का शिया धार्मिक नेतृत्व तत्कालीन सामंती शासकों का समर्थक था। इसका एक लम्बा इतिहास है। पर स्थितियां बदलती गईं और धार्मिक नेतृत्व को भी अपनी कार्यशैली में बदलाव करना पड़ा। ईरान में धार्मिक क्रांति की पहली थाप 1891 में सुनाई  देती है, जोकि 1979 में परवान चढ़ी। वरिष्ठ पत्रकार व लेखक मोहम्मद अनस के अनुसार कई विद्वानों ने पुरोहितों को क्रांतिकारी बनने के लिए प्रेरित किया था।

विशेषरूप से 20वीं सदी में प्रसिद्ध मोहम्मद इक़बाल और दार्शनिक डॉ. अली शरीअती ने धार्मिक नेताओं को क्रांतिकारी बनने की प्रेरणा दी।  फ़ारसी में इक़बाल के काव्य ने बहुत प्रभावित किया। इसके साथ ही इस्लाम के विद्धवान नेता अली, सलमान फ़ारसी, अबुज़र ग़फ़्फ़ारी और इमाम हुसैन ने भी पुरोहित वर्ग को प्रभावित किया और उसने तत्कालीन सामंती शासकों को भी चुनौती दी।

प्रगतिशील इस्लामी चिंतक चाहते थे कि सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो। समाज के स्थानीय नेतृत्व के हाथों में अधिकार आयें, ताकि जनता के साथ न्याय हो सके। क्रांतिकारी चिंतक चाहते थे कि धार्मिक नेता अपने ठिकानों से बाहर निकलें और जनता के साथ जुड़ें। डॉ. अली शरीअती ने परम्परावादी धार्मिक नेताओं का आह्वान किया कि वे ‘काला शियावाद’  से अपना पिंड छुड़ाएं और बदलाव लाने के लिए ‘लाल शियावाद’ को अपनाएं।

इसका सीधा अर्थ था कि धार्मिक नेताओं की ज़मात बदलाव के लिए अपना ख़ून बहाये, साम्राज्यवादी व उपनिवेशवादी हमलावरों और पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ मैदान में उतरें। इसी भावना से प्रेरित होकर शिया धार्मिक नेताओं ने अमेरिका व पश्चिम समर्थक ईरान के शाह के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी। जेलों में गये और गोलियां खाईं।

1979 की क्रांति के इसी ज़ज़्बे ने ईरान के शिया धार्मिक नेताओं व ईरान सरकार को पूंजीवादी और अमेरिका परस्त सऊदी अरब तथा अन्य इस्लामी देशों से दूर रखा; कुवैत, जोर्डन, क़तर, इराक़ जैसे देशों के शासकों को विश्वसनीय दोस्त नहीं बनाया। यही वजह है कि आज़ ईरान ने अमेरिका+इजराइल+पश्चिम+खाड़ी शाही शासकों की संयुक्त ताक़त के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी कर रखी है।”

(जारी)

(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं।)

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