Friday, March 1, 2024

पर्यावरण में हो रहे बदलाव का फसल उगाने के चलन पर पड़ रहा असर

नई दिल्ली। अभी हाल ही में दुनिया भर के देशों के शीर्ष प्रतिनिधि और राजनेता अबू धाबी में धरती को बचाने और पर्यावरण की चुनौतियों से निपटने के लिए इकठ्ठा हुए। लगभग 15 दिन की मशक्कत, आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक निष्कर्ष तक पहुंचने की काफी कवायद हुई। लेकिन, बहुत संतोषजनक हल तक पहुंचना मुश्किल बना रहा। रिन्यूएबल ऊर्जा संसाधनों के विकास को लेकर जरूर ही कुछ बेहतर रास्ता निकालने की कोशिशें हुईं। और इस दिशा में बढ़ने के लिए भारत के प्रतिनिधियों ने भी उत्साह दिखाया।

लेकिन, भारत के अंदर पर्यावरण को लेकर जो चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, उसे लेकर स्पष्ट चिंतन नहीं दिख रहा है। दिल्ली और एनसीआर के साथ-साथ इससे सटे राज्यों में प्रदूषण के बढ़ाव के कई कारक दिख रहे हैं, लेकिन इस पर कोई खास कदम उठाने की कमजोरियां साफ दिख रही हैं। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय काफी सक्रिय हुआ और एक के बाद एक हुई सुनवाइयों में इसने पंजाब में खेती के पैटर्न में ही बदलाव का रास्ता सुझा दिया।

इस दिसंबर में चले संसद सत्र में भाजपा सरकार के केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने बताया कि पर्यावरण में बदलाव के चलते सबसे अधिक प्रभावित फसलों में- चावल, गेहूं और मक्का हैं। यह खबर सामान्य नहीं थी। निश्चित ही फसल के पैटर्न में यह बदलाव सरकार की नीतियों की वजह से नहीं है। यह प्रकृति में आ रहे बदलाव का परिणाम है।

यह बदलाव निश्चित ही एक गंभीर मसला है और इस पर बहस होनी चाहिए थी और इस संदर्भ में उपयुक्त कदम उठाने को लेकर संसदीय समिति के गठन की ओर जाना चाहिए था। लेकिन, यह मसला भी संसद पर भाजपा के एकाधिकारवादी व्यवहार के चलते महज एक छोटी सी खबर बनकर रह गई।

राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने लोकसभा को बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय कृषि कल्याण मंत्रालय और भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव व खेती में इसके प्रभावों के संदर्भ में उपयुक्त खेती करने की एक परियोजना को लेकर शोध किया गया है। इस शोध के अनुसार यदि 2050 तक पर्यावरण परिवर्तन को लेकर उपयुक्त उपाय नहीं किये गये तो चावल की पैदावार में 2 से 20 प्रतिशत तक कमी आएगी और इसके अगले 30 साल में यह लगभग आधी हो जाएगी।

गेहूं उत्पादन में उपरोक्त समयावधि में 8.4 से लेकर 19.3 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और अगले 30 साल में यह 18.9 से लेकर 41 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसका असर मक्का उत्पादन पर भी पड़ सकता है और इसमें 2050 तक 10 से 19 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

यहां यह चिन्हित करना जरूरी है कि भारत में खेती की जिन योजनाओं को लागू किया गया है उसमें हरित क्रांति ही एक निर्णायक योजना रही है। यह भारत में 1960 के दशक में खेती की सिंचाई के साधनों और खेतों की उत्पादकता के आकलन के आधार बनायी गयी। इसी आकलन के आधार पर गेहूं, चावल, बाजरा, ज्वार, मक्का, सोयाबीन, कपास और मूंगफली आदि फसलों को उगाने के लिए हाइब्रिड बीज, रसायन, तकनीक आदि को प्रस्तुत किया गया। यही पैटर्न 1990 तक रहा है।

विभिन्न सरकारों ने इसमें समय-समय पर थोड़े-थोड़े सुधार और बदलाव किये। विश्व व्यापार संगठन के दबाव और संरचनागत सुधार योजनाओं ने निश्चय ही किसानी में बदलाव लाये और किसानों पर विश्व बाजार का दबाव बढ़ा दिया। 2000 के बाद किसानों पर इन बदलावों का असर एक संकट की तरह विकसित हुआ है। पर्यावरण में बदलाव सबसे अधिक सिंचाई की व्यवस्था पर असर डाल रहा है और इसकी वजह से रसायनों का प्रयोग भी पहले से अधिक बढ़ा है।

पर्यावरण बदलाव का असर किसानों को सिर्फ उत्पादकता के स्तर पर ही प्रभावित नहीं कर रहा, यह उसकी लागत को भी बढ़ा रहा है। इस संदर्भ में निश्चित ही एक व्यापक अध्ययन और इस संदर्भ में उचित नीतिगत निर्णय लेना चाहिए। यह सीधे तौर पर किसानी से जुड़ा मसला है और यह देश की अर्थव्यवस्था और एक व्यापक आबादी के हितों के साथ जुड़ा हुआ है।

राज्य मंत्री ने संसद को यह भी बताया कि भारत में पानी का सबसे बड़ा स्रोत नदियों का जल है। बड़े पैमाने पर रसायनों का प्रयोग, खासकर औद्योगिक अपशिष्ट को नदियों में बहाने की वजह से नदी के पानी की गुणवत्ता में लगातार कमी आ रही है। इस संदर्भ में निगरानी स्थल बनाये और विकसित किये जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि शहरों के वायु प्रदूषण को लेकर 131 शहरों में कार्यकारी योजना बनाई गई है और इसके लिए 9,631 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रायल के अनुसार ग्लोबल तापमान में वृद्धि से देश के विभिन्न हिस्सों में मौसम में बदलाव आ रहा है। उनके अनुसार मानव द्वारा पर्यावरण के खिलाफ किये जा रहे कार्यों के चलते कुछ जगहों पर भारी बारिश तो वहीं पर सूखा दिख रहा है। चक्रवातों में बढ़ोत्तरी को भी देखा जा सकता है।

यहां यह बताना जरूरी है कि पर्यावरण में आ रहे बदलाव के चलते पूरी दुनिया में सबसे अधिक प्रभावित दस देशों में भारत भी एक है। इस साल दिसम्बर के महीने में ही तमिलनाडु पहले समुद्री चक्रवात मिचौंग से तबाह हुआ और महज दो हफ्तों के भीतर समुद्री विक्षोभ से उठने वाली हवाओं से इसके निचले 5 जिलों में भयावह बारिश का प्रकोप देखा गया। शहरों से लेकर गांव तक इस बारिश और चक्रवाती बाढ़ और तूफान से बर्बादी से पट गये।

मंत्रालय के हवाले से कही गई बात में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे उन कारकों को स्पष्ट नहीं किया गया है और उसे महज मानव नाम दे दिया गया है। जबकि सीओपी की मीटिंगों और सीओपी-28 के प्रस्तावों को देखें, तो वहां स्पष्ट ही औद्योगिक संस्थानों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।

भारत में बड़े पैमाने पर सिर्फ औद्योगिक ही नहीं, संरचनागत विकास की वजह से भी प्रकृति की बर्बादियों को देखा जा सकता है। ये ऐसे बर्बादी भरे बदलाव हैं जिनका असर पर्यावरण पर निर्णायक हो रहा है।

(अंजनी कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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