Subscribe for notification

‘क माने कश्मीर लहूलुहान है’

कश्मीर लहूलुहान है। भारत समर्थक नेताओं सहित कश्मीर की आम अवाम संगीनों के साये में है। नागरिकों के अधिकार छीन लिए गए हैं। ऐसे दौर में शब्दों के जादूगर उदय प्रकाश की एक कविता चर्चा में है। कविता बचपन में सीखे गए क और क माने कलम, क माने कमल, क माने कबूतर से होते हुए क माने कश्मीर तक पहुंचाती है। जयपुर में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के तीन दिन के जलसे में उदय प्रकाश ने यह कविता सुनाकर कश्मीर के बारे में अपनी राय रखी। श्रोताओं ने इस कविता के साथ कवि के अभिव्यक्ति के तरीके को जमकर सराहा। सोशल मीडिया में भी यह कविता खूब चल रही है।

अपनी कविता में उदय प्रकाश क को उस बचपन में ले जाते हैं, जब बच्चे को यह लिखना सिखाया जा रहा होता है। कविता की शुरुआत होती है…
वह जब कभी बचपन था
वह जब कभी काठ की पाटी सरकण्डे या करील की
चाक़ू से छील-कांछ कर बनायी गयी क़लम थी
वह जब एक सोंधी पकी हुई मिट्टी की चुकड़िया थी
जिसमें दूध जैसी छुई मिट्टी का गाढ़ा घोल था।

कविता धीरे धीरे बड़ी होती है। उन दिनों की यादों ताजा करते हुए, जब मिट्टी की भुरकी में खड़िया का गाढ़ा घोल लिखने के लिए इस्तेमाल होता था। इस समय के फाउंटेन पेन या डॉट पेन की जगह नरकट या सरकंडे कलम होती थी। छोटा सा बच्चा गांव के बढ़ई की गढ़ी सुंदर चिकनी कालिख से रंगी और खाली शीशी से घोटकर चमकाई गई तख्ती पर क लिखना शुरू करता है। उस समय की सारी यादें जुटाते हुए कविता आगे बढ़ती है। कविता मम्मा, दाऊ, बुआ, फुआ-फूफा जैसे रिश्तों को याद दिलाती है। सरौतियां, पान की पतौखियां, मुँडेर के कौवे, आंगन की गौरैया भी आती हैं। कवि इन यादों के सहारे आगे बढ़ता है। याद करता है कि किस तरह से क से कबूतर सिखाया जाता था।

यहां से कवि विभिन्न विंबों में गुजरता है। शायद उसे नजर आता है नेहरू का वह दौर, जब वे शांति के संदेश के रूप में सफेद रंग के कबूतर उड़ाया करते थे। वह कबूतर अब कवि को लहूलुहान नजर आता है। वह खूनी हाथों में है, जो शांति संदेश भूल चुके है। शायद कबूतर पकड़े शासक को अब युद्ध, उन्माद, पाकिस्तान, एयरस्ट्राइक नजर आता है। वह उस कबूतर का पंख नोच डालता है।

‘क’

लिखे को सपने में देखता रहा

तभी मैंने देखा
एक बहुत बीमार-सा, किसी तपेदिक में कांपता, एक बूढ़ा कबूतर
जिसका रंग था दूध जैसा सफ़ेद जिसके पंख थे टूटे हुए
धीरे-धीरे किसी तरह रेंगता
नींद की ड्यौढी और जागने की चौखट के पार चला गया

अचानक किसी धमाके या किसी अजीब-सी चीख़ के बीच
टूट गयी मेरी नींद

सोने और जागने के अनगिनत वर्षों से लगातार लिखी जा रही
कविता में से चला गया था वह पंख टूटा सफ़ेद बूढ़ा कबूतर
धमाकों और चीख़ की दिशा में
नींद की ड्यौढी और जागरण के चौखट के पार

कवि का वह क छिन गया है, जो आगे बढ़ते, पढ़ाई करते, लिखते हुए तमाम सपनीली दुनिया दिखाता है। कवि को यह भी याद आता है कि बचपन में क माने कलम भी सिखाया गया था। कवि देखता है कि किस तरह से इस क के साथ कलम को भी रौंद डाला गया है। संभवतः कवि की कल्पना में सत्ता के प्रशंसक और पैरोकार नजर आते हैं। स्वतंत्र कलम खत्म कर दी गई दिखती है, जिसने क लिखना सिखाया था। कवि को नजर आता है जातियों और वर्णों में विभाजित समाज। वह समाज जो एक दूसरे को मार और काट डालने को तैयार है। वह समाज जो अपने ही लोगों को नीची जाति मानकर उसका शोषण करता है। उसे संभवतः सत्ता का पूरा पदानुक्रम नजर आता है कि समाज को जातियों और धर्मों में बांटकर हर जाति और धर्म का शासक उस क को मार देना चाहता है, जिससे बनी है कलम। वह स्वतंत्र कलम, जो वंचितों पीड़ितों के हक में लिखती है। कवि कहता है…

मैं डरा हुआ काल के कानों में बहुत धीरे से कहना चाहता हूँ

किसी भी वर्ण-विभाजित बर्बर समाज या समुदाय की भाषा की वर्णमाला के
पहले ही वर्ग का सबसे पहला व्यंजन
जब रटाया जायेगा
किसी प्राथमिक पाठशाला की पहली ही कक्षा के बच्चों को :

बोलो ‘क’ माने ‘कमल’
‘क’ माने ‘क़लम’
‘क’ माने ‘कबूतर’

बच्चे तो वही रटते और दोहराते हैं
जो सिखाता-पढ़ाता है उन्हें वेतन-भोगी शिक्षक

कविता यहीं नहीं ठहरती। वह सत्ता के खूनी पंजों को आगे बढ़ाती है। वह सत्ता, जिसने क माने कबूतर के सफेद पंख नोच डाले हैं। वह सत्ता, जिसने क माने कलम को खत्म कर दिया है। वह सत्ता, जिसने क को मार डाला है। वह सत्ता कश्मीर तक पहुंच गई है। क माने कश्मीर लहूलुहान है, जिसे इस समय किसी मध्य काल की किसी जीती गई रियासत की तरह रौंदा जा रहा है। और क माने कश्मीरी सहमे हुए हैं। उनके सामान्य नागरिक अधिकार भी छिन चुके हैं। और कवि कहता है…

लेकिन अगर कोई सुन सके
संसार भर और ब्रह्मांड भर के बच्चों की नींद
या स्वप्न या अंतरात्मा की आवाज़
तो सुनाई देगी एक अजीब सी गूँज
दसों दिशाओं में गूँजतीं उस गूँज की अनगिनत प्रतिध्वनियाँ

‘क’
माने
‘कश्मीर’ ।

(यह लेख सत्येंद्र पीएस लिखे हैं जो पेशे से पत्रकार हैं।)

This post was last modified on September 17, 2019 1:09 pm

Share
Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi