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कश्मीरी पंडित: पीड़ा की प्रतिहिंसा यानि ‘हिंदू जेहाद’ की भावना में सुलगती एक कौम

पीड़ा की अनुभूति करुणा उपजाकर मनुष्य को मनुष्यतर बनाती है, लेकिन पीड़ा जब अपने एवज में प्रतिहिंसा चाहती है, बदला चाहती है तो वो मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीन लेती है। ऐसा ही नजारा 19 जनवरी को जंतर मंतर पर देखने को मिला। जब ‘होलोकॉस्ट-डे’ मनाने के लिए इकट्ठा हुए कश्मीरी पंडितों ने ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ जैसे नारे लगाए। इस कार्यक्रम को ‘कश्मीरी समिति दिल्ली’ द्वारा आयोजित किया गया था। वो 1991 से लगातार 19 जनवरी को मातम के रूप में मनाते आए हैं।

अखिल भारतीय हिंदू महासभा से कश्मीरी समिति दिल्ली की गलबहियां
गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को मानने वाले अखिल भारतीय हिंदू महासभा भी कश्मीरी पंडितों के कार्यक्रम में उनके साथ आया। इस बाबत जब ‘कश्मीरी समिति दिल्ली’ के लोगों से सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हिंदू हितैषी होने के नाते वो हमारी पीड़ा समझते हैं और इसी नाते वो हमारे साथ हमारे समर्थन में खड़े हैं। वहीं हिंदू महसभा के लोगों ने भी कहा कि हम सब हिंदू हैं और जहां हिंदू पीड़ित होगा हम खड़े होंगे।

बता दें कि कश्मीरी पंडित और अखिल भारतीय हिंदू महासभा दोनों संगठनों के लोग अपने सिर पर ‘हम नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करते हैं’ लिखी एक काली पट्टी बांधकर सीएए के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे थे।

शाहीन बाग़ प्रदर्शन के लिए उगला गया जहर
जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने आए कश्मीरी पंडित समुदाय के कई लोगों द्वारा शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ जमकर जहर उगला गया। उन्हें देश का दुश्मन और गद्दार बताया गया। देश के गद्दारों को गोली मारों सालों के जैसे नारे लगाए गए। इन भड़काऊ नारों के बाबत पूछने एक कश्मीरी पंडित रमेश कहते हैं, “इन नारों के जरिए हम अपने भीतर 30 साल से दबी पीड़ा और गुस्सा की अभिव्यक्ति कर रहे हैं। शाहीन बाग़ में जो लोग एनआरसी-सीए के खिलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं वो देश द्रोही हैं। वो लोग देश के संसद द्वारा पारित कानून का विरोध कर रहे हैं।”

कश्मीरी पंडित समुदाय की एक 20-22 वर्षीय लड़की हर-हर महादेव का जयकारा लगाकर कहती है, “कश्मीर में भारत का भगवा लहराएगा। ये सब मोदी-योगी और अमित शाह शैली में होगा। शाहीन बाग़ में बैठे लोगों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। वर्ना ये लोग एक दिन इस देश को ही खा जाएगें।” ताज्जुब की बात ये कि छोटे-छोटे बच्चे जिनकी पैदाइश नई सदी की है, जिनकी उम्र 10-12 वर्ष है, वो इस देश की मुस्लिम कौम के प्रति नफ़रत और घृणा से भरी बातें ही बोल रहे थे।

घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए अलग ‘होमलैंड’ की मांग
गुरुग्राम में रहने वाले बीएससी छात्र शिवेंन्दु कहते हैं, “केंद्र सरकार दूसरे देश के शरणार्थियों को तो बसाना चाहती है, लेकिन इस देश के शरणार्थियों की फिक्र उनको नहीं है। हमें हमारा हक़ चाहिए। हमारा भी पुनर्वास होना चाहिए। कश्मीर में अभी भय का माहौल है। हमें कश्मीर में शांति चाहिए।”

जीटीबी नगर के रहने वाले अंकुर सिंह कहते हैं, “कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास किया जाए। 1990 के कुसूरवारों को सजा दी जाए। वो कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का मसला भाजपा के घोषणा पत्र में भी शामिल था, सरकार जाने क्यों इस मसले पर देर कर रही है।” अंजना कहती हैं, “हम अपनी घर वापसी चाहते हैं। हम कश्मीरी पंडितों को मुसलमानों के साथ नहीं रहना है। हमें घाटी में एक अपना होमलैंड चाहिए, जहां पर सिर्फ़ कश्मीरी हिंदू हों। हमारा सेकुलरिज्म और भाईचारा जैसी वाहियात चीजों में विश्वास नहीं है। हमने 19 जनवरी 1990 को जो झेला है उसके बाद सेकुलरिज्म जैसी चीजों में हमारा विश्वास नहीं है।”

जुनैद, पहलू ख़ान से लेकर गुजरात जनसंहार तक को जस्टीफाई किया
एक कश्मीरी पंडित महिला ने कहा, “कश्मीर का मसला पूरी तरह से धर्म आधारित मसला है। जो लोग इसे धर्म आधारित मसला नहीं मानते वो लोग गद्दार हैं। हमें 1991 में धर्म के आधार पर ही कश्मीर से मार-काटकर खदेड़ दिया गया था। यदि धर्म आधारित मसला नहीं होता तो इस्लामिक दहशतगर्दों द्वारा सिर्फ़ कश्मीरी हिंदुओं को ही क्यों भगाया गया था।”

जंतर मंतर पर अपनी निर्वासन की पीड़ा को लेकर प्रोटेस्ट करने आए कश्मीरी पंडित किस हद तक सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से भरे हुए थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पहलू ख़ान और तबरेज आलम को चोर बताकर उनकी मॉब लिंचिंग को जस्टीफाई किया। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि लिंचिंग लिंचिंग चिल्लाने वाले लोगों को कश्मीरी पंडितों के साथ 19 जनवरी 1990 को हुई लिंचिंग क्यों नहीं दिखती। उन्होंने ये भी कहा कि गुजरात में मुस्लिमों के साथ जो कुछ हुआ वो गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में हुआ।

आरएसएस की भाषा बोलते कश्मीरी पंडित
आरएसएस हिंदुत्व की आड़ में वर्चस्ववादी ब्राह्मण समुदाय को सूट करने वाले ब्राह्मणवाद को पुनर्स्थापित करने के एजेंडे पर काम कर रहा है। कोई शक़ नहीं कि वर्चस्ववादी समुदाय का होने के नाते कश्मीरी पंडितों को आरएसएस के एजेंडे में अपना हित साधता दिखता है। यही कारण है कि हिंदू राष्ट्र के पक्ष में वो तमाम तर्क-कुतर्क जो आरएसएस देता रहा है हूबहू वही आपको कश्मीरी पंडितों के मंचों से भी सुनने को मिलता है।

कश्मीरी पंडित अपने को पीड़ित बताते हुए कब आपके विचार और चेतना को घर वापसी, लव जेहाद और इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्दों के मकड़जाल में कस लेता है पता ही नहीं चलता। आखिर कश्मीरी पंडितों की सभा में देश के मुसलमानों की जनसंख्या पर बात करने का क्या औचित्य बनता है? होलोकस्ट डे मनाते हुए मंच से ये बात कही जाती है कि आज देश में मुसलमान 24 प्रतिशत हैं तो हम कश्मीरी पंडितों का ये हाल है। जिस दिन ये 50 प्रतिशत या उससे ज़्यादा हो जाएंगे उस दिन ये मुसलमान इस देश से यहां के मूल निवासी हिंदुओं को ही निर्वासित कर देंगे। ये सारी बातें हिंदुओं को डराने के लिए अब तक आरएसएस और उसकी पोलिटिकल विंग भाजपा ही करती आई थी।

शाहीन बाग़ में माहौल खराब करने पहुंचे कश्मीरी पंडित
रविवार को काफी मात्रा में कश्मीरी पंडित शाहीन बाग़ पहुंचे और ‘कश्मीरी पंडितों को न्याय दो’ जैसे नारे लगाए। इस तरह जानबूझकर कश्मीरी पंडितों को उकसाकर शाहीन बाग़ में दंगा फैलाने के लिए भेजा गया। कश्मीरी पंडितों द्वारा शाहीन बाग़ में लगाए गए आक्रामक नारों के कारण प्रदर्शनकारियों और कश्मीरी पंडितों के बीच हाथापाई तक हो गई। ये सब नव नाजी विवेक अग्निहोत्री के एक सांप्रदायिक ट्वीट के बाद हुआ।

बता दें कि मोदी सरकार के पथ प्रदर्शक और आरएसएस के एजेंडे को फिल्म और कला के जरिए युवा पीढ़ी में स्थापित करने वाले नव नाजीवादी फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने 18 जनवरी को अपने ट्विटर एकाउंट पर लिखा, “कल शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी कश्मीरी हिंदू जीनोसाइड डे 19 जनवरी को सेलिब्रेट कर रहे हैं। सिर्फ़ कश्मीरी पंडितों को अपमानित करने के लिए। मैं सभी कश्मीरी हिंदुओं से आग्रह करता हूं कि वे शाहीन बाग़ पहुंचे और उन्हें सेलिब्रेट न करने दें। यदि आप उन्हें आज ऐसा करने देते हैं तो कल बहुत देर हो जाएगी।”

जबकि इसके जवाब में शाहीन बाग़ के ट्विटर हैंडल से लिखा गया कि कुछ अराजक तत्व वॉट्सअप मेसेज के जरिए भ्रामक बातें फैला रहे हैं। हम कश्मीरी पंडित भाइयों-बहनों के साथ खड़े हैं।

शाहीन बाग़ पहुंचे एक कश्मीरी हिंदू कार्यकर्ता सतीश महालदार ने कहा, “शाहीन बाग में सीएए को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों ने 4-5 दिन पहले ‘जश्न-ए-शाहीन’ कार्यक्रम के आयोजन की घोषणा की थी, जबकि इसी दिन यानि 19 जनवरी 1991 को कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। हम यहां शाहीन बाग़ ये सुनिश्चित करने आए हैं कि ये कार्यक्रम किसी भी कीमत पर न हो।”

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This post was last modified on January 20, 2020 12:10 pm

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