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झारखंड में मरनेगा कर्मियों की हड़ताल से मजदूरों के सामने नया संकट

झारखंड राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ के आह्वान पर मनरेगा कर्मियों की 27 जुलाई से अपनी 5 सूत्री मांगों को लेकर अनिश्चित कालीन राज्यव्यापी हड़ताल जारी है। इसके चलते इस कोरोना काल में मनरेगा मजदूरों की कठिनाइयां बढ़ गई हैं।

आप को बता दें कि संघ ने 12 जून, 2020 और 17, जून, 2020 को इस सिलसिले में ज्ञापन दिया था। जिसके बाद 19 जून को मनरेगा आयुक्त से मनरेगा कर्मचारी संघ की वार्ता तो हुई मगर वह विफल हो गयी। आखिर में मनरेगा कर्मचारी संघ ने 27 जुलाई से अनिश्चित कालीन राज्यव्यापी हड़ताल पर जाने का निर्णय ले लिया। ऐसे में अगर सरकार द्वारा उक्त हड़ताल पर कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई तो सबसे ज्यादा राज्य के मनरेगा मजदूर ही प्रभावित होंगे।

उल्लेखनीय है कि विगत 4 महीनों से अन्य विभागों तथा निजी क्षेत्रों में विनिर्माण कार्य बन्द होने से श्रमिकों को मिलने वाला काम और मजदूरी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूर रोजगार की एक नई उम्मीद के साथ मनरेगा योजनाओं की ओर रुख करने लगे थे। ऐसे में ज्यों ही सरकार ने 20 अप्रैल से मनरेगा योजनाओं में कुछेक सुरक्षा मानकों के साथ काम कराने संबंधी अधिसूचना जारी की, तभी बड़े पैमाने पर मनरेगा योजनाओं में मजदूरी करने के लिए मजदूर निकल पड़े थे।

एक आंकड़े के अनुसार राज्य के 6 लाख 85 हजार 595 परिवारों ने मई महीने में विभिन्न योजनाओं में मजदूरी की। जून महीने में यह सख्या बढ़कर 10 लाख 71 हजार 551 हो गई। इस जुलाई महीने में भी 9 लाख 40 हजार 840 परिवार कार्यरत हैं। अप्रैल से जुलाई तक कार्य करने वालों में 1 लाख 24 हजार 890 दलितों और 3 लाख 32 हजार 214 आदिवासियों के परिवार रहे हैं। गौरतलब है कि कुल 3.25 करोड़ कार्य दिवस में से 1.32 करोड़ कार्य दिवस का पैसा महिलाओं को मिला। जो कुल मानव दिवस का 41 प्रतिशत है।

संघ ने अपनी मांग में कहा है कि झारखण्ड राज्य में कार्यरत सभी मनरेगा कर्मियों की सेवा को स्थाई किया जाए। स्थाई किये जाने की तिथि तक पद एवं कोटि के अनुरूप ग्रेड पे के साथ वेतनमान दिया जाए। मनरेगा कर्मियों को 25 लाख का जीवन बीमा एवं 5 लाख का स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिया जाए तथा मृत मनरेगा कर्मियों के परिवार को 25 लाख का मुआवजा एवं परिवार के सदस्य को अनुकम्पा के आधार पर सरकारी नौकरी दी जाए। मनरेगा कर्मियों को भी मातृत्व / पितृत्व अवकाश, अर्जित अवकाश, चिकित्सा अवकाश आदि का प्रावधान किया जाए।

उनकी तीसरी माँग है कि अनियमितता के आरोप में मनरेगा कर्मियों को सीधे बर्खास्त करने के बजाए सरकारी कर्मचारियों की तरह कार्रवाई की जाए तथा अभी तक बर्खास्त कर्मियों को बिना शर्त सेवा में वापस लिया जाए। चौथी मांग है कि मनरेगा कर्मियों को सीमित उप समाहर्ता की परीक्षा में बैठने का अवसर दिया जाए तथा राज्य के समस्त नियुक्तियों में मनरेगा कर्मचारियों को उम्र सीमा में सेवाकाल की अवधि के बराबर छूट एवं रिक्त पदों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। आखरी मांग है कि बिहार की तर्ज पर मनरेगा को स्वतंत्र इकाई घोषित करते हुए मनरेगा कर्मियों को उसके क्रियान्वयन की सम्पूर्ण जिम्मेवारी दी जाए।

इस बाबत झारखण्ड नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज तथा भोजन का अधिकार अभियान के संयोजक अशर्फी नन्द प्रसाद अपने संयुक्त बयान में कहा कि ”विडंबना यह है कि राज्य में मनरेगा कर्मियों के 1499 पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। कई प्रखंडों में प्रखण्ड कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। एक-एक ग्राम रोजगार सेवक 2-2 पंचायतों की जिम्मेवारी निभा रहे हैं। सरकार की इस कदर उदासीनता की वजह से मनरेगा कर्मी कई दफा अत्यंत दबाव में कार्य करते हैं। दूसरी तरफ इन अनुबंध कर्मियों का मानदेय भी न्यूनतम साढ़े सात हजार से लेकर 20 हजार के बीच है।

अतः सरकार की जवाबदेही है कि इनकी जायज माँगों पर तत्काल गंभीरता पूर्वक सकारात्मक पहल करे। दूसरी तरफ हड़ताली मनरेगा कर्मियों से भी यह अपील है कि इस आर्थिक आपातकाल के कठिन दौर में खुद के जीविकोपार्जन सुरक्षा के साथ ही 52 लाख पंजीकृत मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए हड़ताल खत्म कर काम में वापस आ जाना चाहिए। लगभग 5 हजार कर्मियों के हितों के लिए लाखों मजदूर परिवारों और राज्य वासियों की अनदेखी नहीं किया जाना चाहिए।”

दूसरी तरफ 28 जुलाई को लगातार दूसरे दिन राज्य भर के पांच हजार से अधिक मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर डटे रहने से, मनरेगा का काम पूरी तरह ठप हो गया है। सामान्य दिनों में पूरे झारखंड में 7 लाख तक मजदूर कार्यरत रहते थे, किंतु यह आंकड़ा 2 दिनों में खिसक कर 3 लाख पर आ गया है। आने वाले दिनों में प्रतिदिन यह आंकड़ा 70 हजार से 1 लाख तक प्रतिदिन घटने का अनुमान है। वहीं पिछले दो दिनों में राज्य भर में किसी भी मजदूर को काम नहीं दिया गया है। यद्यपि कि सरकार के अधिकारियों के आदेश पर वैकल्पिक तौर पर मनरेगा में काम करने के लिए अन्य विभागों के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रतिनियुक्त किया गया है, लेकिन किसी भी पैरामीटर में अपेक्षाकृत प्रगति नहीं हुई है।

मनरेगा कर्मियों ने साफ तौर पर कहा कि बिना मांगे पूरी हुए हड़ताल से वापस नहीं लौटेंगे।

इस बाबत झारखंड राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिरुद्ध पांडेय ने कहा कि ”मनरेगा कर्मियों को सरकार ने बार-बार ठगने का काम किया है पिछले 13 वर्षों से राज्य भर के मनरेगा कर्मी अपनी मांगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कभी ₹1000 तो कभी ₹500 मानदेय बढ़ाकर ठग लिया जाता है। इस बार राज्य भर के मनरेगा कर्मियों ने कमर कस लिया है। हम लोग स्थायीकरण और वेतनमान से नीचे किसी भी बात पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।”

वहीं संघ के प्रदेश महासचिव मो० इम्तियाज ने कहा कि ”पिछले कुछ महीनों में हमारे एक दर्जन से अधिक साथियों को बेवजह बर्खास्त कर दिया गया है। आधा दर्जन साथी कार्य बोझ एवं दबाव के कारण हाइपरटेंशन एवं ब्रेन हैमरेज से मर गए। एक दर्जन से अधिक साथी दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। 25 से भी अधिक साथी कोरोना पॉजिटिव हो गए। लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। यही कारण है कि राज्य भर के मनरेगा साथियों में भयंकर आक्रोश है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 29, 2020 5:32 pm

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