Sat. Jan 25th, 2020

शाहीन बाग ग्राउंड रिपोर्ट-2: “प्रधानमंत्री देश की रक्षा करते हैं और ये दंगा फैला रहा है”

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महसूल बानो।

शाहीन बाग (नई दिल्ली)। हम जिसे लोकतंत्र कहते हैं दरअसल वो राजशाही को लपकने की हरदम कोशिश में है। जिसके गले ये सच अटके उसे एक बार शाहीन बाग़ ज़रूर जाना चाहिये। सरल भाषा में आपको पता चलेगा कि असली लोकतंत्र कितना सरल है। आप अगर सचमुच चाय वाले होते मोदी जी तो आप भी लोकतंत्र को उतनी ही आसानी से समझ जाते जितनी आसानी से आपको ये आठवीं पास टेलर समझाएंगी। वो तड़प आपके सीने में भी होती जो दिल को चीरती हुई  इन्हें बार-बार शाहीन बाग़ खींच लाती है। आप ज़रा भी संविधान को तवज्जो देते तो शाहीन बाग़ की ये औरतें हाड़ तोड़ ठंड में ठिठुरती हुई यूं रोड पर बैठने को मजबूर न होतीं।

वीना: क्या आप यहीं शाहीन बाग़ से हैं?

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महसूल बानो:  ना, मैं तो समोसा चौक खादर से आई हूं। वैसे हूं मुजफ्फर नगर की।

वीना: आज ही आईं हैं यहां पर?

महसूल बानो:  नहीं मैं पहले भी आई हूं।

वीना: किस लिए आईं हैं?

महसूल बानो: यहां पर जो औरतें बैठी हैं इनके साथ हूं। मोदी ने जो ये काला कानून निकाला है ना इसके खि़लाफ़ आई हूं मैं।

वीना: कौन सा काला कानून?

ये जो नागरिकता इसने निकाली है कि ग़रीब, हिंदू-मुसलमान चले जाएंगे यहां से।

वीना: वो कह रहे हैं कानून नहीं समझ रहे आप लोग। यहां के मुसलमानों को डरने की ज़रूरत नहीं है।

महसूल बानो: अच्छा… हम कानून नहीं समझ रहे। और वो जो वहां पर मुसलमानों की मस्जिदों में घुस-घुसकर वार किया है? घरों में घुस-घुसकर औरतों-बच्चों-बुर्जुगों पर मार पिटाई की है? उनका सामान तोड़ा, बाहर किया है ये क्यों किया है उसने?

जैसे देश चल रहा है वैसे चलने दे। ये अपनी अलग-अलग कानून क्यों छांट रहा है। कभी तो ये नोटबंदी करवाता है। चलो हो गया उसका भी मसला। अब ये वाला कानून ले आया। कल को ये कहेगा कि तुम नंगे होकर घूमो। अपना मजहब छोड़ दो। तो क्या हम नंगे होकर फिरेंगे, अपना मजहब छोड़ देंगे इसके कहने से?

वीना: आपने पढ़ाई की है?

महसूल बानो: थोड़ी बहुत हूं पढ़ी-लिखी। इतनी जाहिल भी नहीं हूं।

वीना: कतना पढ़ी हैं?

महसूल बानो: येई… आठवीं।

वीना: आप कुछ काम करती हैं या घर ही में रहती हैं?

महसूल बानो: सिलाई करती हूं। टेलर हूं मैं। पब्लिक इतनी परेशान है जब से इसने नोटबंदी कराई है। बहुत ही ज़्यादा रोज़गार से परेशान है। बजाय तरक्की लाने के सारी जो भी तरक्की थी देश की वो भी ख़त्म कर दी इसने। भद्द पीट दी इसने देश की। ऐसा प्रधानमंत्री नहीं करते। प्रधानमंत्री देश की रक्षा करते हैं और ये सारे में दंगा फैलवा रहा है।  बलात्कार भी इसी की वजह से हो रहे हैं। पहले इतने बलात्कार नहीं होते थे।

वीना: कैसे? इसकी वजह से कैसे हो रहे हैं?

महसूल बानो: कभी कोई सुनने में आ जाता था। अब तो हर दिन बलात्कार रहते हैं देखो।

और क्या बताऊं मैं… क्या तारीफ़ करूं इसकी… इतनी तारीफ़ कर दूं मैं इसकी कि इसे बर्दाश्त ही ना होवे। ये गद्दी छोड़ कर भाग लेवे अपनी। हमें ऐसा प्रधानमंत्री नहीं चाहिये। इसे देश चलाना नहीं आता बिल्कुल भी।

वीना: ये तो कहते हैं हमने इतना बढ़िया काम कर दिया। मुस्लिम औरतों को तीन तलाक से बचा दिया।

महसूल बानो: ये खुद उनसे पैसे दे-देकर बुलवाता है। कोई आम मुसलमान औरत उसके पास नहीं जाएगी। जो पैसे खाएगी दलालनी होगी वो जाएगी। ये अपने नियम खुद बना रहा है। खुद कहलवा रहा है।

वीना: तीन तलाक से आप लोग खुश नहीं हैं?

महसूल बानो: नहीं, हमारा मजहब अलग है। अपने नियम से चल रहा है ये। चार आदमियों में ही निकाह होता है, चार आदमियों में ही तलाक होता है। ऐसे तलाक नहीं होता। जब तक चार आदमी सुन नहीं लेते तलाक नहीं होती। ये हमारे इस्लाम पर कलंक लगा रहा है। सच्चा मजहब है, अच्छा मजहब है। इसका क्या मजहब है इससे पूछ लो पहले। 

वीना: हिंदू कहते हैं वो तो अपने आप को।

महसूल बानो: ये तो हिंदू भी नहीं है।

वीना: कैसे?

(बीच में खांसी आ गई महसूल बानो को, गला खुश्क हो गया।)

महसूल बानो: मेरी तबियत कई दिन से ख़राब है। बुखार आ रहा है मुझे। खांसी है।

वीना: फिर भी यहां आई हो!

महसूल बानो: फिर भी आई हूं मैं यहां। क्योंकि ये जो इसने पुलिस के रूप में अपने गुंडे घर में घुसाएं हैं और जो मारपीट करवाई है ये इसने बहुत ग़लत किया है।

वीना: उत्तर प्रदेश में?

महसूल बानो: हां यूपी में। पुलिस की वर्दी में इसके गुंडे उतरे हुए हैं। आतंकवाद फैला रखा है इसने। ये सबसे बड़ा आतंकवादी है। 

वीना: आपको कैसे पता कि पुलिस की वर्दी में गुंडे हैं?

महसूल बानो: उनके ये नहीं लगा हुआ यहां पर (कंधे की तरफ इशारा करते हुए)

वीना: आपको कैसे पता?

महसूल बानो: हमने खुद देखा है।

वीना: आप थीं वहां पर?

महसूल बानो: वहां नहीं थी, वीडियो में देखा है। इसके लिए एक ने सवाल भी किया है। 

वीना: ये हिंदू कैसे नहीं हैं ये बताईये।

महसूल बानो: हिंदू में भी ईमानदारी होती है। वो भी अपना मज़हब सही से लेकर चलता है। ये तो उस लायक भी नहीं है। ये ना हिंदू है ना मुसलमान है। इसे देश से निकालो, हटाओ इसे। हमें नहीं चाहिये ऐसा प्रधानमंत्री। हम इससे दुखी हो लिये बहुत। खुद तो ये एक-एक करोड़ की लंगोटी बांधता है। और देश इसने खाली करवा दिया नोटबंदी करवाकर।

किसी के पास कुछ भी नहीं है, सब भूखे मर रहे हैं। किसी को नहीं पूछता किसी के पास काम है, नहीं है। देश में क्या तरक्क़ी आनी चाहिये। क्या होना चाहिये। फालतू के नियम ला रहा है। इससे देश नहीं चलाना आता तो ये नेता बना क्यों? इसे नेता बनने का हक़ नहीं है बिल्कुल भी।

वीना: ये तो कहते हैं मैंने दुनिया में भारत का नाम रौशन कर दिया। भारत को विश्व गुरु बना दिया।

महसूल बानो: क्या बना दिया?

वीना: विश्वगुरु।

महसूल बानो: कुछ भी नहीं बना। भद्द पीट दी इसने देश की। बेड़ा गरक कर दिया, नास पीट दिया बिल्कुल देश का इसने।

(मुझे समझाते हुए)

वीना: बाप अपने बच्चों के लिए सब कुछ करते हैं। बच्चों की माननी पड़ती है। जब कोई प्रधानमंत्री बन जाता है तो हम भी एक तरह से देश वाले भी इसके बच्चे ही हैं। तो ये अपने बच्चों की बात क्यों नहीं मान रहा? ये गां… अपनी बात क्यों चला रहा है, हयं। इसे समझ में नहीं आ रही। समझ में नहीं आ रही इसे बिल्कुल भी। कि मैं अपनी बात ना चलाऊं। जिससे वोट लेता है ये, जिससे जीत के बैठा है उनकी ही ये ऐसी काट कर रहा है, बताओ। और क्या कहूं मैं इसके बारे में… और क्या कहूं… बताओ।

प्रूफ हम देंगे इसे। प्रूफ ये मांग रहा है ना। हम दे देंगे प्रूफ। ले प्रूफ। भा… कहीं के… ले प्रूफ तू। बिल्कुल बेकार कर दिया सारा कुछ।

वीना: आप तो मुसलमान हो इसलिए ऐसा कह रही हो।

महसूल बानो – हिंदू भी परेशान हैं… उनका भी रोज़गार ठप्प हो रहा है। जो झगड़ालू हैं, जो इसके गुंडे हैं वो ही झगड़ा चाह रहे हैं। हिंदू लोग भी झगड़ा नहीं चाहते। जो अपने करने-खाने में लगे हैं, अच्छे इंसान हैं वो भी झगड़ा नहीं चाहते। समझ गई बात। ये देश ऐसे ही चलता आया है। हिंदू-मुसलमान सब एकता है। और इसे ये ऐसे ही चलने दे… इसे दो टुकड़ों में न बांटे। और अगर इससे नेतागिरी नहीं चलती, प्रधानमंत्री तो ये इस्तीफ़ा दे सकता है… चला जाए यहां से बस। इसी में इसकी भलाई है। इसकी इतनी भद्द पिट गई, इतनी जलालत इसने अपनी करवा ली, चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जा। इसमें थोड़ी बहुत शरम हो तो। लेकिन इसमें वो भी नहीं है… इसकी तो सारी उतर गई शरम भी। ख़त्म ही, शरम का नाम तो बिल्कुल इसका। समझ गई।

(वीना जनचौक दिल्ली स्टेट की हेड हैं।)

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