9 दिसंबर, 2025 संसद के इतिहास में एक खास दिन रहा। इस दिन एसआईआर और चुनाव सुधार पर संसद में गरमागरम बहस हुई, जिस पर पक्ष-विपक्ष के कई नेताओं ने अपनी बात रखी। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा ,’ सरकार और चुनाव आयोग मिलकर एसआईआर के बहाने अन्दर ही अन्दर एनआरसी वाला काम कर रहे हैं। यूपी के सीएम कह रहे हैं कि हम डिटेंशन सेंटर बना रहे हैं। जो ये खुलकर नहीं कह सकते हैं वो एसआईआर के बहाने कर रहे हैं।’ उन्होंने ईवीएम की जगह बैलेट से मतदान कराने का सुझाव देते हुए कहा कि जब जापान- अमेरिका जैसे उन्नत देश बैलेट से चुनाव करा रहे हैं तो भारत में क्या दिक्कत है! टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि एसआईआर वोट डिलीट करने का टूल बनकर रह गया है।
चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अथॉरिटी नहीं है। चुनाव आयोग कह रहा है कि पांच लाख वोटर डिलीट, छः लाख वोटर डिलीट और बीजेपी जश्न मना रही है। लेकिन इस चर्चा में राहुल गांधी का संबोधन ऐतिहासिक रहा। अब तक सभा- सेमिनारों में लोग कहते रहे हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार ने तमाम संवैधानिक संस्थानों पर कब्जा जमा कर लोकतंत्र को अपहृत कर लिया है, किन्तु यह बात संसद में पहली बार 9 दिसंबर को कही गई और इसका श्रेय राहुल गांधी को जाता है। राहुल गांधी ने बहस में भाग लेते हुए अपने 28 मिनट के संबोधन में कहा कि आरएसएस और बीजेपी देश की संस्थाओं पर कब्ज़ा कर रही हैं।
इनमें चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, आईबी, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट शामिल हैं। इससे साफ़ है कि बीजेपी चुनाव आयोग को कंट्रोल और निर्देशित कर रही है। इससे लोकतंत्र को नुकसान हो रहा है। उन्होंने इस स्थिति में सुधार के लिए तीन मांगे रखीं। पहला, मशीन रीडेबल वोटर लिस्ट सभी राजनीतिक दलों को चुनाव से एक महीना पहले दी जानी चाहिए। दो, सीसीटीवी फुटेज डिस्ट्रॉय करने का नियम बदला जाना चाहिए और तीन, चुनाव के बाद ईवीएम देखने के लिए दी जाए । वोट चोरी से बड़ा कोई एंटी नेशनल काम नहीं है।सरकार चुनाव सुधार नहीं चाहती!उन्होंने चुनाव आयोग को चेतावनी देते हुए कहा कि कानूनी कवच से बच नहीं पाएंगे चुनाव आयुक्त, कानून बदलकर हम ढूंढ निकालेंगे !
आरक्षण के बाद भाजपा का अगला निशाना वोटाधिकार है
बहरहाल विपक्ष लाख प्रयास कर ले मोदी सरकार न तो ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने जा रही है और न ही एसआईआर(विशेष गहन पुनरीक्षण) के जरिये वोट चोरी जैसे देशद्रोह के काम से बाज आने वाली है। जिस तरह लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के सामाजिक न्यायवादी एजेंडे के समक्ष हारते – हारते बची भाजपा को हरियाणा, महाराष्ट्र और खासकर बिहार में एसआईआर के जरिये उसे इकतरफा विजय मिली है, उससे तय है कि वर्तमान में 12 राज्यों में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के जरिये वह भविष्य में भारत के लोकतंत्र को चीन, रूस, पाकिस्तान जैसे चुनावी निरंकुशता वाले देशों में तब्दील कर देना चाहती है, जहाँ चुनाव महज औपचारिक बनकर रह गए हैं।
एसआईआर के जरिए हिन्दुत्ववादी भाजपा अपनी तानाशाही की जो परिकल्पना कर रही है, उससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे दलित, आदिवासी और पिछड़े, जिनका राजनीति में योगदान हिन्दू धर्म में अधर्म घोषित किया गया है। स्मरण रहे भारत में दलित – बहुजनों के दो सबसे बड़े अधिकार रहे हैं, आरक्षण और वोट का अधिकार ,जो संविधान के जरिये मिले। ये दोनों ही अधिकार हिन्दू धर्म में अधर्म घोषित रहे हैं। आरक्षण से दलित, आदिवासी, पिछड़ों और महिलाओं को उन पेशे/कर्मों को अपनाने का अधिकार मिल गया, जो हिन्दू धर्म के प्रावधानों के जरिये सिर्फ अपर कास्ट के पुरुषों के लिए अधिकृत रहे।
आरक्षण से हिन्दू धर्म को हानि पहुंचती है, इसलिए हिंदुत्ववादी भाजपा का पितृ संगठन संघ पूना पैक्ट के ज़माने से ही आरक्षण के खात्मे की ताक में रहा, और जब बीसवीं सदी के शेष में सत्ता भाजपा के हाथ में आई, उसने तरह-तरह के हथकंडे अपना कर आरक्षण को कागजों की शोभा बना दिया। एक समय आरक्षण वंचितों की प्रगति के साथ, उनकी एकता का आधार था। वे आरक्षण के नाम पर सहजता से संगठित हो कर अपनी मांगें मंगवा लेते थे। अब भाजपा सरकारों ने इसमें इतना विभाजन कर दिया है कि आरक्षित वर्ग आपस में ही लड़ रहे हैं और उनकी एकता अतीत का विषय बन गई है। इसी आरक्षण के खात्मे के लिए भाजपा ने बेरहमी से सरकारी उपक्रमों को बेचने के साथ संविधान की कमर तोड़ दिया है। अब वही भाजपा आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के साथ एसआईआर के जरिये उनके वोटाधिकार के खात्मे में जुट चुकी है।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर के शब्दों में- ‘एसआईआर एक तरह का रक्तरहित राजनीतिक नरसंहार है। वे खून नहीं कर रहे हैं, शरीर की हत्या नहीं कर रहे हैं, बस लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर का उनकी नागरिकता को मार रहे हैं!’एसआईआर के जरिये वोटाधिकार पर हमले के बाद दलित-बहुजन राजनीतिक रूप से मुसलमानों की भांति अप्रासंगिक हो जायेंगे। यही नहीं बहुजनों का वोटाधिकार कमजोर होते ही भाजपा हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की स्थिति में आ जाएगी, जिसके फलस्वरूप जहाँ शक्ति के समस्त स्रोतों पर अपर कास्ट का एकाधिकार हो जायेगा, वहीं दलित, आदिवासी, पिछड़े पूरी तरह गुलामों की स्थिति में आने के लिए विवश होंगे। इस स्थिति को देखते हुए जरुरत इस बात की है कि कांग्रेस गाँव-गाँव में दलित, आदिवासी और पिछड़ों के मध्य चौपाल लगाकर भाजपा की खतरनाक साजिश से अवगत कराने का अभियान छेड़े। यही नहीं जिस कांग्रेस पर भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने की जिम्मेवारी आन पडी है, उस कांग्रेस का राष्ट्र के पुनर्निर्माण और दलित, आदिवासी, पिछड़ों के उत्थान में क्या योगदान है, यह बताने के लिए भी चौपाल लगाना जरुरी है।
इसलिए ज़रूरी है गांव-गांव में चौपाल लगाना
मोदी- राज में चौपाल लगाने की ज़रूरत खुद कांग्रेस भी महसूस करती रही है और उसने सरकार की साजिशों के पर्दाफाश के लिए कई बार इसकी घोषणा भी की पर, अपेक्षित सक्रियता न दिखा सकी। लोकसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए लखनऊ में 2023 के संविधान दिवस पर घोषणा हुआ था कि पार्टी 8000 गांवों में चौपाल लगाकर जानने की कोशिश करेगी कि उनकी सरकार से क्या अपेक्षा है; उनके मन में समाज के हित में क्या विचार आ रहे हैं और उनके उत्थान के लिए क्या पहल की जरुरत है।लेकिन 2023 की वह घोषणा ठीक से परवान न चढ़ सकी। उसके बाद जब 2024 के दिसंबर में अमित शाह ने राज्यसभा में बोलते हुए बाबा साहेब आंबेडकर का अपमान किया था तब, लखनऊ के कांग्रेस मुख्यालय में उसका विरोध करते हुए घोषणा किया गया था कि हम गांवों में चौपाल के जरिये भाजपा की दलित विरोधी सोच का पर्दाफाश करेंगे पर, यह घोषणा भी परवान न चढ़ सकी थी।
हाल के दिनों में इस आशय की घोषणा लखनऊ में 12 नवम्बर को कांग्रेस के ओबीसी और एससी विभाग की ओर से की गई, जिसकी मीडिया में काफी चर्चा हुई। उस दिन दोनों विभागों के राष्ट्रीय अध्यक्षों : डॉ. अनिल जय हिन्द और राजेंद्र पाल गौतम ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस करके बताया था कि कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में 26 नवम्बर से हर गाँव में चौपाल लगाकर दलितों के साथ संविधान पर चर्चा करेगी। पार्टी बताएगी कि कांग्रेस के शासन में दलितों को क्या-क्या मिला, जो भाजपा की सत्ता में उनसे छीना जा रहा है! लेकिन इस घोषणा पर भी अपेक्षित मात्रा में अमल न हो सका।
लेकिन अब जबकि आरक्षण के बाद भाजपा एसआईआर के जरिये दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का वोट अधिकार छीनने की दिशा में जोर-शोर से आगे बढ़ रही है, ज़रूरी हो गया है कि पूरे देश में न सही, जिस यूपी से देश की राजनीति की दिशा तय होती है, वहां के गाँव-गाँव में चौपाल लगाकर बताया जाए कि कांग्रेस के शासन में दलितों को क्या-क्या मिला, जो भाजपा की सत्ता में उनसे छीना जा रहा है! स्मरण रहे यहाँ खुद चुनाव आयोग के अधिकारियों द्वारा 2.91 करोड़ वोट काटे जाने की आशंका जाहिर की गई है। जो कुल वोट का 18.84 % होगा।
यही नहीं आज बहुजनवादी दलों से निराश होकर भारी संख्या में दलित-पिछड़े कांग्रेस से जुड़ते जा रहे हैं। लेकिन वर्षों से उन दलों के द्वारा कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाये जाने के कारण लोगों को ठीक से पता नहीं कि देश के पुनर्निर्माण में कांग्रेस का क्या योगदान है और उसने दलित-वंचितों के लिए क्या किया! जबकि सच्चाई यह है कि आजाद भारत में देश के नवनिर्माण तथा दलित, आदिवासी और पिछड़ों के उत्थान में प्रायः 90% योगदान अकेले कांग्रेस पार्टी का है।इसलिए यह बताने के लिए हर हाल में कांग्रेस गाँव-गाँव में चौपाल लगाकर देश व बहुजन हित में अपने योगदान को बताये!
आजादी के बाद कांग्रेस को मिला था ऐसा बदहाल भारत
अंग्रेजों ने लूट-खसोट कर जिस भारत की बागडोर कांग्रेस को सौंपी थी, 1947 तक उस देश में सुई तक नहीं बनती थी: सारा देश राजे-रजवाड़ों के झगड़ों में बंटा हुआ था। देश के मात्र 50 गांवों में बिजली थी: किसी गाँव में नल नहीं थे। सीमाओं पर मात्र कुछ हजार सैनिक और चार विमान तथा बीस टैंक थे। देश की सीमाएं चारों ओर से खुली थीं और खजाना खाली था। ऐसे बदहाल भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के बाद अपने योग्य नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेस ने देखते ही देखते कुछ ही दशकों के अंतराल में विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति तैयार कर दी! हजारों विमान- हजारों टैंक, अनगिनत फैक्टरियां खड़े करने के साथ लाखों गाँवों में बिजली , सैकड़ों बाँध , लाखों किमी सड़कों का निर्माण, परमाणु बम , हर हाथ में फोन , हर घर में मोटर सायकिल वाला मजबूत देश बनाकर दिखा दिया।
यही नहीं देश में असंख्य स्कूल – कॉलेज- विश्वविद्यालय , अस्पताल , अनुसन्धान केंद्र सरकारी उपक्रम खड़े करने एवं हरित के साथ श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड ) घटित करने के बाद, जिस तरह राजाओं के प्रिवी पर्स के खात्मे , बैंकों, कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण इत्यादि का साहसिक काम अंजाम दिया , उससे कुछ ही दशकों के अंतराल में देश की शक्ल ही बदल गई। यह अपने आप में भारतीय उपमहाद्वीप की एक अद्भुत घटना रही, जिसका वर्तमान के धरातल पर खड़े होकर दुराग्रह मुक्त भाव से सिंहावलोकन करें तो उन लोगों पर हंसी आयेगी जो कहते हैं कांग्रेस ने आजादी के बाद क्या किया?
आजादी के बाद कांग्रेस की नीतियों से सर्वाधिक लाभान्वित हुए : दलित- बहुजन
भारतीय समाज विश्व का सर्वाधिक विषमतापूर्ण समाज है, जिसके लिए जिम्मेवार रही है हिन्दू-धर्म का प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था। धर्म के आवरण में लिपटी वर्ण-व्यवस्था सदियों ही शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक) के वितरण – व्यवस्था में क्रियाशील रही है। इसमें बहुत ही सपरिकल्पित रूप से अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य , भूस्वामित्व, राज्य-संचालन, सैन्य-वृत्ति, उद्योग-व्यापार इत्यादि सहित शक्ति के स्रोत ही सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के मध्य वितरित हुए। स्व-धर्म पालन के नाम पर कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता के फलस्वरूप वर्ण- व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया, जिसे हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था कहा जाता है।
हिन्दू-आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत ही सिर्फ और सिर्फ सवर्णों के लिए आरक्षित रहे: दलित- बहुजनों को रत्ती भर भी इसमें हिस्सेदारी नहीं मिली। हिन्दू आरक्षण के कारण ही देश में सदियों पूर्व सामाजिक अन्याय की धारा प्रवाहमान हई। इस कारण ही सवर्ण समाज जहां चिरकाल क सशक्त तो दलित, आदिवासी और पिछड़े अशक्त व गुलाम बनने के लिए अभिशप्त हुए। लेकिन दुनिया के दूसरे गुलामों की तुलना में भारत के गुलामों की स्थिति इसलिए कल्पनातीत रूप से बदतर हुई, क्योंकि उन्हें वर्ण-व्यवस्था उर्फ हिन्दू-आरक्षण में आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों के साथ शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों तक से पूरी तरह बहिष्कृत रखा गया। ऐसा दुनिया में और कहीं नहीं हुआ।
दुनिया के किसी भी देश के गुलामों को शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों से हजार साल तक महरूम नहीं रखा गया। भारत के गुलामों सबसे बदतर स्थिति दलितों(अछूतों) की रही। वे गुलामों के गुलाम रहे।भारत के अन्य गुलाम समुदायों की भांति इन्हें भी शक्ति क समस्त स्रोतों से तो बहिष्कृत किया ही गया, पर इनके साथ अस्पृश्यता जुड़ी होने के कारण उच्च वर्णों के साथ-साथ वर्ण-व्यवस्था के गुलाम पिछड़े (ओबीसी) तक इनकी मानवीय सत्ता को अस्वीकृत करने के साथ इनके स्पर्श से दूरी बरतते रहे। इन्हें अच्छा नाम रखने और अपने दुःख मोचन के लिए मंदिरों में प्रवेश कर ईश्वर की कृपा लाभ तक का अधिकार नहीं था।
इनके जैसे अधिकार-विहीन मानव समुदाय की विद्यमानता पूरी दुनिया के किसी भी अंचल में नहीं रही। हिन्दू- धर्म द्वारा इन अधिकारविहीन लोगों को मानवेतर में तब्दील कर दिया गया था। इन्हीं गुलामों के गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की चुनौती डॉ। आंबेडकर के समक्ष आई, जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज में निर्वाह किया। अगर जहर की काट जहर हो सकती है तो हिन्दू आरक्षण की काट किसी वैकल्पिक आरक्षण से ही हो सकती थी, जो आंबेडकरी आरक्षण से हुई!
आंबेडकर के संघर्षों से पूना पैक्ट से जो आरक्षण वजूद में आया तथा परवर्तीकाल में जिसकी भारतीय संविधान में स्थाई व्यवस्था हुई, उस आरक्षण के फलस्वरूप जिन मानवेतरों के लिए विगत साढ़े तीन हजार सालों से कल्पना करना दुष्कर था; वे झुण्ड के झुण्ड एमएलए, एमपी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर,आईएएस-आईपीएस इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे। आंबेडकरी आरक्षण से उनका हजारों साल से चला आ रहा शक्ति के स्रोतों से बहिष्कार का दूरीकरण होने लगा।
लेकिन आंबेडकर के प्रयासों से दलितों के जीवन में जो चमत्कारिक बदलाव आया, वह कतई मुमकिन नहीं होता, यदि आजाद भारत में कांग्रेस सरकारों ने जमीदारी उन्मूलन के साथ भूरि-भूरि स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल और सरकारी उपक्रम नहीं खड़े किये होते। इन स्कूल, कॉलेज राष्ट्रीयकृत बैंक, कोयला खदान, बीमा क्षेत्र और नवरत्न कंपनियों सहित कांग्रेस राज में स्थापित की गयी अन्य सैकड़ों सरकारी कंपनियों में जॉब पाकर ही दलित शक्ति के उन स्रोतों में हिस्सेदारी पाने लगे, जिनसे हिन्दू-आरक्षण के तहत वे सदियों से बहिष्कृत रहे। दलित और आदिवासी कांग्रेस राज में उपलब्ध अवसरों का सदुपयोग कर सकें, इसके लिए खुद कांग्रेस नेताओं द्वारा विशेष अभियान चलाया गया।
इस मामले में काबिले मिसाल रहा इंदिरा गांधी का प्रयास! इंदिरा गांधी के प्रयास से आपातकाल के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर आरक्षण के लिए सहमति दी। श्रीमती गांधी ने उसी समयावधि में केन्द्रीय विद्यालयों में अनुसूचित जाति जनजाति के बच्चों को आरक्षण देने का निर्णय लिया। आपातकाल के दौरान ही उनके लिए आईआईटी के द्वार खुले। इसी समय में ठोस दलित मध्यम वर्ग की जड़े गहरी हुई। अन्य मुद्दों जैसे न्यायालयों में उच्च स्तर पर अनुसूचित जाति / जनजाति के न्यायधीशों की नियुक्ति की समस्या को इंदिरा गांधी ने ही सुलझाया। इंदिरा गाँधी के विशेष प्रयासों का देखते ही देखते चमत्कारिक परिणाम आने लगा!
बहरहाल कांग्रेस राज में सृजित िअवसरों से दलित, आदिवासी समाजों से भूरि-भूरि सांसद-विधायक, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर्स, प्रोफेसर इत्यादि निकलने लगे तो यह हिंदुत्ववादी भाजपा को रास नहीं आया। क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्रों में दलितों के लिए लोहे के गहनों, जूठे-भोजन, दूसरों के छोड़े फटे-पुराने वस्त्रों पर जीवन- यापन करना ही धर्म बताया गया है: जिनके लिए मंदिरों में प्रवेश व हथियार स्पर्श के साथ शिक्षा-ग्रहण दंडनीय अपराध व अधर्म घोषित किया गया, वैसे समाज के लोग जब आजादी के बाद कांग्रेस-राज में आंबेडकरी आरक्षण के जरिये एमएलए–डॉक्टर प्रोफेसर, इंजीनियर, आईएएस-पीसीएस, लेखक इत्यादि बनने लगे, तब हिंदुत्ववादी संघ और जनसंघ से भाजपा बना उसका राजनीतिक संगठन ‘आरक्षण’ को धर्म पर हमले के रूप में लेने लगे। आरक्षण से हिन्दू धर्म की ऐसी हानि होते हिंदुत्ववादी मन ही मन घुटते तथा सही मौके की तलाश में लगे रहे। और 7 अगस्त ,1990 को अंततः मंडल रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद उन्हें उस आरक्षण के खात्मे का अवसर मिल गया!
वाजपेयी- मोदी ने बहुजनों के साथ किया वर्ग- शत्रु जैसा सलूक
7अगस्त,1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही भारत के इतिहास में एक नया मोड़ आ गया। क्योंकि इससे सदियों से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमाये विशेषाधिकारयुक्त तबकों का वर्चस्व टूटने की स्थिति पैदा हो गयी। मंडल ने जहां हिन्दुओं के सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित कर दिया, वहीँ इससे दलित,आदिवासी। पिछड़ों की जाति चेतना का ऐसा लम्बवत विकास हुआ कि सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हो गए।
कुल मिलाकर मंडल से एक ऐसी स्थिति का उद्भव हुआ जिससे वंचित वर्गों की स्थिति अभूतपूर्व रूप से बेहतर होने की सम्भावना उजागर हो गयी और ऐसा होते देख मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ भाजपा के एलके अडवाणी ने 25 सितम्बर, 1990 से सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ- यात्रा निकाल दी। परवर्तीकाल में राम मंदिर आन्दोलन से भाजपा का सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हुआ और देश की बागडोर पहले वाजपेयी और फिर नरेंद्र मोदी के हाथ में आई। ये दोनों ही उस संघ से प्रशिक्षित पीएम रहे, जिसका एकमेव लक्ष्य हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग (मुख- बाहु- जंघे) से जन्मे लोगों का हित-पोषण रहा है।
अतः संघ प्रशिक्षित इन दोनों प्रधानमंत्रियों ने सवर्ण वर्चस्व को स्थापित करने में देश-हित तक की बलि चढ़ा दी। इन दोनों ने आरक्षण पर निर्भर दलित बहुजनों को वर्ग शत्रु में देखा और उनके सफाए के लिए राजसत्ता का भयावह इस्तेमाल किया। संघ प्रशिक्षित वाजपेयी और मोदी ने अपने वर्ग शत्रुओं को तबाह करने के लिए जो गुल खिलाया, उसके फलस्वरूप आज देश काफी हद तक बिक कर निजी हाथों में चला गया है और बहुजन विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच चुके हैं। कारण, जिस आरक्षण पर बहुजनों की उन्नति व प्रगति निर्भर है, भाजपा राज में वह लगभग कागजों की शोभा बना दिया गया है।
सामाजिक न्याय के खिलाफ मंदिर आन्दोलन चला कर भाजपा बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुँचाने का अभियान चलाया, वहीं इनको गुलामी के दलदल से निकालने के लिए कांग्रेस ने 2023 के अपने रायपुर अधिवेशन से सामाजिक न्याय का पिटारा खोला। उसके बाद सामाजिक न्याय की राजनीति के नए आइकॉन के रूप में उभरे राहुल गांधी शक्ति के समस्त स्रोतों में जितनी आबादी- उतना हक़ के जरिये सामाजिक न्याय की राजनीति को इतना बुलंदी प्रदान कर दिया कि अब भाजपा के लिए चुनाव जीतना प्रायः नामुमकिन हो गया।
वैसी स्थिति में वह चुनाव आयोग के जरिये वोट- चोरी पर निर्भर रहने के लिए मजबूर हुई और एसआईआर के जरिये बिहार में कल्पनातीत विजय का स्वाद चखने के बाद अब देश के 12 राज्यों में इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी है। विपक्ष द्वारा एसआईआर के खतरे को गंभीरता से न लिए जाने के कारण अब लोकतंत्र को बचाने और सामाजिक न्याय को बुलंदी प्रदान करने की जिम्मेवारी राहुल गांधी पर आन पड़ी है!
एक ऐसे समय में जबकि भाजपा ने एसआईआर के जरिये ‘रक्तरहित राजनीतिक नरसंहार’ की शुरुआत कर दी है, कांग्रेसियों का गांव-गाँव में जाकर दलित- आदिवासी और पिछड़ों के बीच चौपाल लगाकर उपरोक्त बातें पहुंचाना इतिहास की एक बड़ी ज़रूरत बन गई। इस काम में अच्छे वक्ताओं की फ़ौज तो उतारनी ही होगी, एक-एक विधानसभा में हजारों की तादाद में ऐसी किताबें कार्यकर्ताओं को सुलभ करानी होगी, जो राष्ट्र के पुनर्निर्माण और दलित, आदिवासी, पिछड़ों के उत्थान में कांग्रेस के योगदान के साथ राहुल गांधी के ‘जितनी-आबादी उतना हक़’ के विषय में भरपूर जानकारी सुलभ कराती हों!
(एचएल दुसाध लेखक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(ओबीसी विभाग)के एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं।)
