यतिन ओझा के आरोपों पर गुजरात हाईकोर्ट में बवंडर, स्वत:संज्ञान अवमानना का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा भ्रष्ट आचरण किया जा रहा है। हाई-प्रोफाइल उद्योगपति, तस्करों और देशद्रोहियों को अनुचित फेवर दिया जा रहा है। हाईकोर्ट प्रभावशाली और अमीर लोगों और उनके वकीलों के लिए काम कर रहा है। अरबपति हाईकोर्ट के आदेश से दो दिनों में मुक्त हो जा रहे हैं, जबकि गरीब और गैर-वीआईपी को कष्ट उठाना पड़ रहा है। यदि वादकर्ता हाईकोर्ट में किसी भी मामले को दायर करना चाहता है तो वह या तो श्री खंभाटा हो या बिल्डर या कंपनी हो। यह गम्भीर आरोप ‘जनचौक’ नहीं लगा रहा बल्कि गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन  के अध्यक्ष यतिन ओझा ने लगाया है, जिस पर गुजरात हाईकोर्ट में तूफान उठ गया है और इसकी तपिश उच्चतम न्यायालय तक में महसूस की जा रही है।

स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन आरोपों पर गुजरात हाईकोर्ट ने स्वत:संज्ञान लेकर आनन फानन में मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता और गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष यतिन ओझा के खिलाफ फेसबुक पर एक लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस के ‌दर‌म्यान हाईकोर्ट और उसकी रजिस्ट्री के खिलाफ ‘अपमानजनक टिप्पणी’ करने के आरोप में आपराधिक अवमानना नोटिस जारी कर दिया है। उधर गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष यतिन ओझा ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा जारी स्वत: संज्ञान की आपराधिक अवमानना को गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे दी ।  

घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए गुजरात हाईकोर्ट की जस्टिस सोनिया गोकानी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा था कि जैसा कि बार अध्यक्ष ने अपनी निंदनीय अभिव्यक्तियों और अंधाधुंध और आधारहीन बयानों से हाईकोर्ट की प्रतिष्ठा और महिमा को गंभीर नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया है और इस प्रकार स्वतंत्र न्यायपालिका को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। इस तरह से उन्होंने पूरे प्रशासन की छवि को भी नीचा दिखाने का प्रयास किया है और प्रशासनिक शाखा के बीच निराशाजनक प्रभाव पैदा किया है। यह कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर प्रथम दृष्ट्या उन्हें न्यायालय अवमानना अधिनियम की धारा 2 (सी) के अर्थ में कोर्ट की आपराधिक अवमानना के लिए जिम्मेदार मानती है और उक्त अधिनियम की धारा 15 के तहत उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना का संज्ञान लेती है।

गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन  के अध्यक्ष यतिन ओझा ने स्वत:संज्ञान अवमानना के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। यतिन ओझा ने कहा है कि गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने पहले से ही उनके खिलाफ मन बना लिया है यतिन ओझा ने कहा है कि गुजरात उच्च न्यायालय के इस आदेश का दुष्परिणाम यह होगा कि यह न केवल उनकी (ओझा) प्रतिष्ठा और कैरियर को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि उनकी संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी को भी नष्ट कर देगा।

ओझा की ओर से अधिवक्ता पुरविश जितेंद्र मलखान के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि गुजरात उच्च न्यायालय ने “संज्ञान लेने और न्यायालय के अवमानना नियम (गुजरात उच्च न्यायालय), 1984 के नियम 11 का पालन किए बिना एक नोटिस जारी करने में गंभीर त्रुटि की है। इस नियम के अनुसार कोर्ट केवल कारण को रिकॉर्ड कर सकते हैं और फिर मुख्य न्यायाधीश को इसे संदर्भित कर सकते हैं, जो रोस्टर के अनुसार खंडपीठ को निर्धारित करेंगे ।

ओझा का तर्क है कि गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश से पता चलता है कि कैसे न्यायाधीशों ने “याचिकाकर्ता के खिलाफ अपना मन बना लिया है और उसके बचाव  की गुंजाइश नहीं छोड़ी है।
ओझा ने तर्क दिया है कि फेसबुक लाइव में उनके बयानों को गलत समझा गया और स्वत:संज्ञान लेकर भेजी गयी अवमानना नोटिस “कानून के अनुसार नहीं है। पूरी रिकॉर्डिंग को देखा जा सकता है, इससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जायेगा कि याचिकाकर्ता ने न्यायपालिका अथवा गुजरात के उच्च न्यायालय जैसे पवित्र और गौरवशाली संस्थान के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया है। याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय के किसी माननीय न्यायाधीश के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया है।

ओझा ने न्यायमूर्ति अकील कुरैशी के उदाहरण देते हुए कहा है कि वह अतीत में न्यायाधीशों के पक्ष में खड़े होते रहे हैं, जिनकी मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति उस समय कानून मंत्रालय द्वारा विलंबित की जा रही थी। उन्होंने कहा कि जब इस माननीय उच्च न्यायालय के एक माननीय न्यायाधीश के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा था और उन्हें राजनीतिक एजेंडे का शिकार बनाया जा रहा था तो याचिकाकर्ता ने इस के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए वह डट कर खड़ा हो गया था ।

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फेसबुक लाइव में ओझा ने कहा था कि जहां कुछ वकील महीने भर से अधिक समय से अपने मामले को सूचीबद्ध कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग हैं, जिनके मामलों की तुरंत सुनवाई हो रही है और पलक झपकते ही निर्णय पढ़े जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें 100 से अधिक वकीलों ने संदेश भेजा है कि उन्होंने कई सप्ताह पहले मामले फाइल किए ‌थे लेकिन अब तक सुनवाई नहीं हुई।

हाईकोर्ट की पीठ ने ओझा के बयान को ‘गैर जिम्मेदाराना, सनसनीखेज और घबराहट वाला’ मानते हुए कड़ा विरोध किया और कहा कि ओझा ने तुच्छ आधार पर और असत्यापित तथ्यों की ‌बिना पर, हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को निशाना बनाया है और हाईकोर्ट प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। हाईकोर्ट ने माना कि वर्चुअल कोर्ट का कामकाज कई स्थानों पर लोकप्रिय नहीं रहा है, हाईकोर्ट प्रशासन वास्तविक शिकायतों की जांच कर रहा है, हालांकि बार एसोसिएशन के अध्यक्ष का बयान लापरवाही भरा रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ओझा ने यह दावा कर कि कुछ वकील अपने मामलों को तीनों अदालतों में प्रसारित करने में सफल हो रहे हैं और उन्हें आदेश भी मिल रहे हैं, अप्रत्यक्ष रूप से हाईकोर्ट के कुछ जजों पर अंगुली उठाई है। कोर्ट ने मामले को फुल कोर्ट के हाथों में विचार करने के लिए चीफ ज‌स्टिस के समक्ष रखा है। अपने आदेश में पीठ ने यह भी कहा है कि ओझा पर एक बार उच्चतम न्यायालय  की अवमानना का आरोप लग चुका है। उस समय उच्चतम न्यायालय ने ओझा की बिना शर्त माफी स्वीकार कर ली थी और उम्मीद जताई कि वह खुद को बदलेंगे। पीठ ने कहा कि हालांकि अब तक कुछ भी बदला नहीं है।

याचिकाकर्ता ओझा ने उच्चतम न्यायालय से अंतरिम रूप से उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने और उक्त आदेश की वैधता को मुख्य प्रार्थना के रूप में स्थगित करने का आग्रह किया है। ओझा ने याचिका में भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बड़े जनहित में अदालतों और प्रशासन की रजिस्ट्री में व्यवस्थागत कमियों और घपलेबाजियों  की आलोचना करने का अधिकार है या नहीं  जैसे संवैधानिक सवाल उठाए हैं?”

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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