Saturday, January 22, 2022

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भीमा कोरेगांव में सुधा भारद्वाज को जमानत तो मिली पर जल्दी रिहाई में बाधा

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एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जमादार की खंडपीठ ने बुधवार 1 दिसंबर को सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज को 2018 भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद जाति हिंसा मामले में डिफॉल्ट जमानत दे दी। लेकिन सुधा भारद्वाज की जेल से रिहाई फिलहाल लटकी रहेगी क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 दिसंबर को सुधा भारद्वाज को स्पेशल एनआईए कोर्ट के सामने पेश करने के आदेश दिए हैं। इसी दिन उनकी जमानत की शर्तें तय की जाएंगी। अब 8 दिसंबर को स्पेशल एनआईए कोर्ट जो शर्तें तय करेगा उसे पूरा करने पर सुधा भारद्वाज की जमानत पर रिहाई हो सकेगी।

दरअसल जमानत देने का फैसला सुनाए जाने के बाद, एनआईए ने इस पर दो सप्ताह के लिए रोक लगाने की मांग की थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह उच्चतम न्यायालय के समक्ष आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकती है।इसी लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 दिसंबर को सुधा भारद्वाज को स्पेशल एनआईए कोर्ट के सामने पेश करने के आदेश दिए हैं। प्रक्रियात्मक शर्तों को पूरा करने में 10 से 15दिन लग सकता है। इस बीच एनआईए को उच्चतम न्यायालय में जाने के लिए भी पर्याप्त समय मिल जायेगा ।  

बॉम्बे हाईकोर्ट ने आठ अन्य आरोपियों सुधीर धावले, डॉ पी वरवर राव, रोना विल्सन, एडवोकेट सुरेंद्र गाडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, महेश राउत, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा को जमानत देने से इनकार कर दिया। सभी को जून-अगस्त 2018 के बीच गिरफ्तार किया गया था। खंडपीठ ने जमानत की शर्तें तय करने के लिए आठ दिसंबर को सुधा भारद्वाज को स्पेशल एनआईए कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है।

भारद्वाज अगस्त 2018 से जेल में हैं, जब उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार किया गया और मुंबई ले जाया गया जहां उन्हें रखा गया है।भारद्वाज, एक वकील और सामाजिक  कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदायों और अन्य लोगों के अधिकारों के लिए काम किया है, गिरफ्तारी के समय दिल्ली के प्रतिष्ठित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ा रही थीं। भीमा कोरेगांव में यह पहली डिफॉल्ट जमानत है।

गौरतलब है कि इस केस में बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख  किया गया, जहां उच्चतम न्यायालय ने देखा था कि यूएपीए के तहत सभी अपराध, चाहे एनआईए द्वारा या राज्य सरकार की जांच एजेंसियों द्वारा जांच की जाती है, उनमें एनआईए एक्ट के तहत स्थापित विशेष न्यायालयों द्वारा विशेष रूप से मुकदमा चलाया जा सकता है। जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा था कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43-डी (2) (बी) में पहले प्रावधान के तहत अकेले विशेष न्यायालय के पास 180 दिनों तक समय बढ़ाने का अधिकार क्षेत्र है।

गौरतलब है कि भीमा कोरेगांव हिंसा की साजिश रचने और नक्सलवादियों से संबंध रखने के आरोप में पुणे पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों से वामपंथी विचारक गौतम नवलखा, वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वरनोन गोंजालवेस आदि को  गिरफ्तार किया था। पुणे पुलिस के मुताबिक, 31 दिसंबर 2017 को पुणे में यलगार परिषद की सभा के दौरान भड़काऊ भाषण दिए गए थे, जिसके चलते जिले में अगले दिन (एक जनवरी 2018) भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक पर जातीय हिंसा भड़क गई थी।

एनआईए द्वारा भीमा कोरेगांव हिंसा में 16 आरोपियों के खिलाफ मुख्य सबूत के रूप में प्रयोग 24 फाइलों में से 22 फाइलों को हिंसा के बाद प्लांट किया गया था। यह बात अमेरिकी डिजिटल फॉरेंसिक कंपनी आर्सेनल की दूसरी जांच रिपोर्ट में सामने आई है। इससे पहले फरवरी 2021 में आर्सेनल द्वारा भीमा कोरेगांव हिंसा के सबूतों की जांच पर पहली रिपोर्ट आई थी। उसके अनुसार हैकर ने किसी सॉफ्टवेयर की मदद से हिंसा के बाद रोना विल्सन के कंप्यूटर में 10 फाइलों को प्लांट किया था।

कोर्ट ऑर्डर के बाद रोना विल्सन के वकील को पुलिस द्वारा नवंबर 2019 में विल्सन के कंप्यूटर की इलेक्ट्रॉनिक कॉपी दी गई थी। उसके बाद उन्होंने इसे जांच के लिए अमेरिकी फॉरेंसिक कंपनी आर्सेनल को दिया था। विल्सन के कंप्यूटर में मौजूद 24 फाइलों के आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) ने 16 लोगों (जिसमें शिक्षाविद, वकील और कलाकार शामिल थे )पर भीमा कोरेगांव हिंसा को प्रायोजित करने का आरोप लगाया था।

एनआईए के अनुसार यह 24 फाइलें यह सिद्ध करती हैं कि ये आरोपी प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवाद) के सदस्य हैं और इन्होंने आपस में फंड ट्रांसफर, संगठन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने, सरकार द्वारा दमन और माओवादी गुरिल्ला लड़ाकू के तस्वीर साझा किए थे।

दूसरी रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि प्राइमरी इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस फैब्रिकेटेड है क्योंकि 24 में से 22 फाइलों को हिंसा के बाद प्लांट किया गया है। इस कारण उनका प्रयोग कोर्ट में सबूत के रूप में नहीं हो सकता क्योंकि विल्सन के कंप्यूटर को टैम्पर्ड किया गया था।परंतु इससे पहले जब आनंद तेलतुंबडे, आरोपियों में से एक, के वकील द्वारा आर्सेनल की पहली रिपोर्ट के आधार पर स्पेशल कोर्ट में बेल की मांग की गई थी तब एनआईए ने यह कहा था कि हम आर्सेनल की रिपोर्ट नहीं मान सकते क्योंकि वह ऑथेंटिक नहीं है।दूसरी रिपोर्ट के अनुसार ये 22 फाइलें कभी भी विल्सन (या जिसने भी विलसन के कंप्यूटर को हैंडल किया था) के द्वारा बनाया, खोला या इस्तेमाल नहीं किया गया था। बल्कि हैकर ने एक सॉफ्टवेयर के माध्यम से उसे प्लांट किया था।

आर्सेनल कंसल्टिंग अमेरिका की डिजिटल फॉरेंसिक पर काम करने वाली कंपनी है। इस फर्म ने अपनी जांच में पाया है कि एक्टिविस्ट रोना विल्सन की गिरफ्तारी के पहले ही अटैकर्स ने उनके लैपटॉप में मालवेयर के जरिए छेड़छाड़ की और कम से कम 10 डॉक्यूमेंट हिडेन फाइल बनाकर सेव कर दिए। इसके बाद पुलिस ने जब ये लैपटॉप सीज किया तो इसमें मिलने वाले इन डॉक्यूमेंट को भीमा कोरेगांव केस में चार्जशीट के प्राथमिक सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया गया।इसी डॉक्यूमेंट में वो लेटर भी शामिल है जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया है कि विल्सन ने ये लेटर माओवादी मिलिटेंट्स को लिखा था और प्रतिबंधित संगठन से निवेदन किया था कि वो पीएम मोदी की हत्या कर दें। रिपोर्ट में ये पता चला है कि विल्सन के लैपटॉप में ये लेटर हिडेन फोल्डर में सेव किए गए थे और तो और विल्सन ने इन्हें कभी खोला तक नहीं था।

रिपोर्ट में सेंधमारी करने वाले अटैकर का पता तो नहीं चल पाया है, लेकिन ये बात पुख्ता तौर पर सामने आई है कि इस तरह के अटैक के शिकार सिर्फ विल्सन ही नहीं थे।अटैकर ने इसी तरह के सर्वर्स और आईपी एड्रेस को दूसरे आरोपियों तक पहुंचाया था और ये सब 4 साल तक होता रहा। भारत के दूसरे हाईप्रोफाइल मामलों में भी आरोपियों को इसी तरह से टारगेट किया गया।रिपोर्ट के मुताबिक विल्सन के लैपटॉप पर करीब 22 महीनों तक सेंधमारी होती रही। अटैकर्स का प्राथमिक लक्ष्य था कि लैपटॉप का सर्विलांस किया जाए और कुछ डॉक्यूमेंट को सेव किया जाए। डिजिटल फॉरेंसिक फर्म आर्सेनल का कहना है कि फर्म ने टेंपरिंग के जितने भी मामलों का अध्ययन किया है, उसमें से ये अब तक का सबसे गंभीर केस था।विल्सन के वकील के निवेदन पर लैपटॉप की इलेक्ट्रॉनिक कॉपी मिली। इसके बाद फर्म आर्सेनल ने इसका विश्लेषण किया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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