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अमेरिका में राजनीतिक-सामाजिक संकट और भारत के लिए सबक

अमेरिका में जो कुछ भी हो रहा है, उसे सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता की हवस और बदमाशी के रूप में देखना इस संकट का सतहीकरण और सरलीकरण करना होगा। ट्रंप चुनाव प्रचार के दौरान भी कहते रहे कि यदि वे चुनावों में पराजित होते हैं, तो कोई जरूरी नहीं है कि सत्ता छोड़ें और स्पष्ट तौर पर चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। ट्रंप के इन कृत्यों पर रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश नेता और सांसद-सीनेटर चुप रहे, जबकि किसी भी लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आधारों में यह भी होता है कि चुनाव हारने वाला अपनी हार स्वीकार करे और सहज तरीके से चुनाव जीतने वाले या वालों को सत्ता हस्तांतरण करे।

ट्रंप द्वारा चुनाव हारने के बाद भी सत्ता न छोड़ने की बात करना, हार के बाद भी हार न स्वीकार करना, येन-केन तरीके से सत्ता में बने रहने की कोशिश करना और अब समर्थकों के उत्पात और हिंसा के दम पर सत्ता में कायम रहने की कोशिश करना इस बात का सबूत है कि अमेरिकी लोकतंत्र गहरे संकट में है और इस लोकतंत्र को खुली चुनौती देने वाले व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह को अमेरिकी जनता के आधे से थोड़े ही कम जनता का समर्थन प्राप्त है। इसका निहितार्थ यह है कि चुनावों में हार-जीत को दरकिनार करके भी अपने मनचाहे नेता को सत्ता में बनाए रखने की विचारधारा ने अमेरिका में एक मजबूत आधार बना लिया है। यह सब कुछ अमेरिकी समाज में गहरे स्तर पर हुए ध्रुवीकरण का नतीजा है।

ट्रंप ने इसी ध्रुवीकरण को बढ़ाया और राष्ट्रपति चुनाव जीत गए। उसके बाद वे लगातार इस ध्रुवीकरण को तेज करते रहे और अपनी लोकप्रियता कायम रखने की कोशिश की। ट्रंप ने हर अवसर का इस्तेमाल ध्रुवीकरण के लिए किया। उन्होंने कोरोना जैसी महामारी को ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया। यह सारा ध्रुवीकरण नफरत पर आधारित था। वह नफरत चाहे कालों के प्रति हो, अप्रवासियों के प्रति हो, मुसलमानों के प्रति हो, महिलाओं के प्रति हो या दुनिया के अन्य देशों के प्रति। ट्रंप ने पर्यावरण के विनाश पर भी ध्रुवीकरण किया।

इस सब कुछ को रिपब्लिक पार्टी चुपचाप देखती रही, इसके खिलाफ रिपब्लिकन के बीच से इक्के-दुक्के लोगों ने ही आवाज उठायी। इसका कारण यह था कि ट्रंप ध्रुवीकरण करने में माहिर थे और वे इस ध्रुवीकरण से पैदा हुई लोकप्रियता का इस्तेमाल रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को चुनाव जिताने के लिए कर रहे थे और कर सकते थे। चुनाव जीतने की यानि सत्ता में बने रहने की इस लालच ने रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश नेताओं के मुंह पर ताला लगा दिया। ट्रंप के नफरत आधारित ध्रुवीकरण और उसका रिपब्लिकन नेताओं द्वारा समर्थन या चुप्पी की कीमत आज अमेरिका चुका रहा है। अमेरिकी लोकतंत्र ने कल रात की घटना के बाद अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।

यह सच है कि अमेरिका में लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि वे इस स्थिति को संभाल सकती हैं और अमेरिकी उदारवादी लोकतंत्र को बचा सकती हैं, लेकिन उसका मुखौटा तो उतर ही गया। आज अमेरिका सामाजिक और राजनीतिक तौर पर नफरत के आधार पर एक ध्रुवीकृत समाज बन चुका है और इसकी कीमत अमेरिका के साथ दुनिया को भी चुकानी होगी।

प्रश्न यह है कि अमेरिका के वर्तमान घटनाक्रम का भारत के लिए सबक क्या है? शायद ही कोई इस तथ्य से इंकार कर सके कि भारत आज पूरी तरह से सामाजिक-राजनीतिक तौर पर ध्रुवीकृत हो चुका है। इस ध्रुवीकरण का मूल आधार भारत में हिंदू-मुसलमान का ध्रुवीकरण है। भारत की सारी राजनीति इसी ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। भाजपा को कौन कहे, विपक्षी पार्टियों ने भी इसके सामने समर्पण कर दिया है। आज का भारत भीतर से एक बंटा हुआ भारत है। यह बंटवारा सिर्फ हिंदू-मुस्लिम के आधार पर नहीं हैं, सामाजिक तौर पर भारत पहले से बंटा हुआ है, यह बंटवारा भी खत्म होने की जगह और गहरा हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नफरत आधारित ध्रुवीकरण के आधार पर ही करीब 14 वर्षों तक गुजरात में शासन किया और अब वे उसी मॉडल को पूरे देश में दोहरा रहे हैं। 2014 के चुनाव और 2019 के चुनाव में उन्होंने ध्रुवीकरण के विभिन्न कार्डों का बखूबी इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने ट्रम्प की तरह भक्तों की एक बहुत बड़ी टोली तैयार कर ली है, जो उन्हें आजीवन शासन करते देखना चाहती है। इसी ध्रुवीकरण का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में किया जा रहा है।

इस ध्रुवीकरण से पैदा होने वाली अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल मोदी जी चुनाव जीतने और अपने लोगों को चुनाव जिताने के लिए करते हैं। उनके पार्टी के भीतर ध्रुवीकरण के दम पर चुनाव जिताने की उनकी क्षमता के चलते कोई उनके खिलाफ चूं तक नहीं कर सकता है। अमेरिका के विपरीत भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं इस ध्रुवीकरण का उपकरण बन गई हैं, जिसमें केंद्रीय एजेंसियों के साथ चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट भी शामिल हो गया है। मीडिया तो मोदी का बाजा ही बजा रही है। भारत में कार्पोरेट भी खुलकर मोदी के साथ है।

दुनिया भर में पूंजीवादी उदारवादी लोकतंत्र गहरे संकट में है। इसकी मूल जड़ है-बढ़ती आर्थिक असमानता, बेरोजागारी और कार्पोरेट घरानों की मुनाफे की हवस। वित्तीय पूंजी और कार्पोरेट नियंत्रित पूंजीवाद जनता को कुछ भी नहीं देना चाहता है, सिर्फ और सिर्फ उसे अपने मुनाफे के लिए निचोड़ना चाहता है। ऐसी स्थिति में वित्तीय पूंजी और कार्पोरेट घरानों को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो जनता के बुनियादी मुद्दों से इतर ध्रुवीकरण करके चुनाव जीत सकते हों और सत्ता और पूंजीवादी तंत्र की लूट को बैधता प्रदान कर सकते हों। ऐसे ही नेता के रूप में डोनाल्ड ट्रंप उभरे थे और उनकी एक अलग तरह की कॉपी नरेंद्र मोदी हैं।

अमेरिकी लोकतंत्र का संकट यह बता रहा है कि पूंजीवादी उदारवादी लोकतंत्र गहरे संकट में हैं, जिसका उसके पास कोई समाधान नहीं है। अमेरिकी लोकतंत्र से भी गहरे संकट में भारतीय लोकतंत्र हैं। अमेरिका में इसके सूत्रधार डोनाल्ड ट्रंप थे। भारत में इसके सूत्रधार नरेंद्र मोदी हैं। जनतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों को पूंजीवादी जनतंत्र का विकल्प खोजना होगा। जनता का वास्तविक जनतंत्र कायम करने के रास्ते की तलाश करनी होगी। तभी ट्रंप और मोदी जैसे लोगों से मुक्ति मिल सकती है, जो नफरत आधारित ध्रुवीकरण की खेती करके चुनावी फसल काटते हैं।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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This post was last modified on January 7, 2021 6:46 pm

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