Tuesday, March 5, 2024

पेसा कानून नहीं बनाने की वजह से केंद्र ने ओडिशा के फंड में की कटौती, झारखंड पर भी खतरा

रांची। अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पेसा कानून (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज एक्ट) को बने 27 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस कानून के तहत 10 राज्यों- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना- को पेसा नियम बनाना था, लेकिन अभी भी छत्तीसगढ़ और ओडिशा दो ऐसे राज्य हैं जहां पेसा नियम नहीं बना है।

दरअसल ग्रामीण इलाकों में स्वशासन को बढ़ावा देने के लिए 1992 में 73वां संविधान संशोधन लाया गया था। इस संशोधन के जरिए त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्था को कानूनी जामा पहनाया गया, लेकिन अनुसूचित और आदिवासी क्षेत्रों के लिए इसमें कोई प्रावधान नहीं था। इसके लिए 1995 में भूरिया कमेटी ने सिफारिशें दी और 1996 में पेसा कानून आया जो अनुसूचित क्षेत्रों को स्वशासन की शक्तियां देता है।

तब पंचायती राज व्यवस्था में अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार करते हुए पेसा कानून की शुरुआत हुई। जिसमें- जल, जंगल और जमीन का अधिकार मुख्य है। इस कानून के जरिए जमीन के अधिकार को सशक्त बनाया गया है। भूमि के इन अधिकारों के तहत आदिवासियों को मजबूत बनाने की बात कही गई है।

  • पेशा कानून का मुख्य उद्देश्य है ग्राम सभा को शक्तियां देकर आदिवासी समुदाय को सशक्त बनाना। जिसके तहत ग्रामसभा इन शक्तियों का आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के विकास के लिए इस्तेमाल करे और उनके हक की रक्षा कर सके।
  • आदिवासी क्षेत्रों में जनजातियों के स्वशासन के अधिकारों का स्पष्टीकरण करना, जिनका उल्लंघन अथवा जिनमें हस्तक्षेप करने की ताकत राज्यों के पास भी न हो।
  • ग्राम सभाओं (ग्राम विधानसभाओं) को सभी गतिविधियों का केंद्र बनाने का प्रयास करना। उच्च स्तर की पंचायतों को निचले स्तर की ग्राम सभा अथवा ग्राम विधानसभा की ताकत एवं उनके अधिकारों को छीनने से रोकना।
  • पेसा के नियमों में जल-जंगल-जमीन, श्रमिक और संस्कृति संरक्षण को भी शामिल किया गया है।

खबर के मुताबिक केंद्र सरकार ने पेसा कानून नहीं बनाने की वजह से ओडिशा की ग्राम पंचायतों को दी जाने वाली राशि में कटौती कर दी है। इससे झारखंड को भी चालू वित्तीय वर्ष 2023-24 में मिलने वाली राशि में कटौती का खतरा है। हालांकि ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (टीएसी) की बैठक में पंचायती राज विभाग द्वारा तैयार पेसा रूल के प्रारूप पर सहमति नहीं दी गयी है। काउंसिल ने इस पेसा रूल के मुद्दे पर लोगों से और सुझाव मांगने का निर्देश दिया है।

टीएसी के इस फैसले से राज्य में फिलहाल पेसा कानून अधिसूचित करने का मामला उलझ गया है। केंद्र सरकार ने पांचवीं अनुसूची में शामिल सभी राज्यों को पेसा कानून अधिसूचित करने का निर्देश दिया था। साथ ही कानून नहीं बनाने वाले राज्यों को 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित राशि नहीं देने की चेतावनी दी थी।

केंद्र ने पेसा कानून की समीक्षा के दौरान पाया था कि पांचवीं अनुसूची में शामिल 10 राज्यों (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना) में से झारखंड और ओडिशा ने केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद पेसा कानून अधिसूचित नहीं किया है। समीक्षा के दौरान इन दोनों राज्यों द्वारा शीघ्र ही पेसा रूल बना कर अधिसूचित करने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन इन दोनों राज्यों में से किसी ने भी पेसा रूल तैयार कर उसे अधिसूचित नहीं किया।

इस स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग की अनुशंसा में ओडिशा के पंचायतों को मिलने वाली अनुदान की राशि में कटौती कर दी है। केंद्रीय पंचायती राज विभाग के उप सचिव द्वारा ओडिशा सरकार को लिखे गये पत्र में कहा गया है कि राज्य में पेसा रूल अधिसूचित नहीं किये जाने की वजह से 1918 अनुसूचित ग्राम पंचायतों (पेसा पंचायत) के बदले सिर्फ 4876 गैर-अनुसूचित ग्राम पंचायतों (नन-पेसा) के लिए 175.53 करोड़ रुपये विमुक्त किया गया है।

केंद्र सरकार के इस कदम से झारखंड को मिलनेवाली अनुदान राशि में भी कटौती का खतरा पैदा हो गया है। 15 वें वित्त आयोग की अनुशंसा पर वित्तीय वर्ष 2023-24 में झारखंड के ग्राम पंचायतों को कुल 1,307 करोड़ रुपये मिलना है। राज्य की कुल 4,345 ग्राम पंचायतों में 2,066 ग्राम पंचायत अनुसूचित क्षेत्र के हैं।

बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा 15 वें वित्त आयोग की अनुशंसित राशि देर से विमुक्त किये जाने की वजह से ग्राम पंचायतों का कामकाज फिलहाल वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए मिली राशि से चल रहा है। वित्तीय वर्ष 2022-23 की दूसरी किस्त के रूप में 646.50 करोड़ रुपये राज्य सरकार को अक्टूबर 2023 में मिला है।

झारखंड में बनाये गये पेसा कानून पर अभी विवाद कायम है। इसका विरोध करने वालों का कहना है कि पेसा एक्ट 1996 के आलोक में बनाया जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने पंचायत राज अधिनियम 2001 के तहत पेसा रूल के प्रारूप का गठन किया है। दूसरी तरफ सरकार का मानना है कि राज्य में पंचायत राज अधिनियम 2001, पेसा एक्ट 1996 के अनुरूप बना है। सैमुएल सुरीन व अन्य ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका (2549/2010) दायर कर झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 को चुनौती दी थी।

साथ ही यह भी कहा था कि पेसा एक्ट 1996 की धारा 4 (ओ) के तहत झारखंड के अनुसूचित क्षेत्र में इसे लागू नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद झारखंड पंचायती राज अधिनियम 2001 को संवैधानिक और पेसा 1996 के अनुरूप करार दिया।

हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य के अनुसूचित क्षेत्र के पंचायतों के लिए पंचायती राज अधिनियम 2001 के अनुरूप पेसा कानून बनाने के मुद्दे पर विवाद कायम है।

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने कहा है कि पेसा कानून के 27 सालों बाद भी पेसा नियमावली का अधिसूचित नहीं होना 5वीं अनुसूची इलाकों के साथ एक संवैधानिक अन्याय है। इससे राज्य के 13 जिले के स्थानीय पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इन इलाकों में अफसर और बिचौलिये मिलकर बेतहाशा आर्थिक शोषण व उत्पीड़न कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों और पंचायत ने ग्राम सभाओं को तोड़ने व बिखेरने का काम किया है।

जेम्स बताते हैं कि देश के 10 राज्य अनुसूचित इलाके के अंतर्गत आते हैं। इनमें से 8 राज्यों ने अपने राज्य की पेसा नियमावली अधिसूचित कर ग्राम सभाओं को संवैधानिक अधिकार सौंपे हैं। सिर्फ झारखण्ड और उड़ीसा दो ही ऐसे राज्य हैं जहां पेसा नियमावली को अधिसूचित नहीं किया गया है। इससे ग्राम सभाओं को प्रशासनिक कार्यों को संपन्न करने में कठिनाईयां पैदा होती रही है।

(विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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