भूल न करे कांग्रेस, शिवसेना की सरकार बनाए

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सोनिया गांधी, उद्धव ठाकरे और शरद पवार।

महाराष्ट्र में क्या कांग्रेस गलती कर रही है? क्या सही है और क्या गलत है, इसे तय करने का वक्त भी नहीं है। वक्त निकल गया, तो गलती के आकलन से भी कोई फायदा नहीं होने वाला है। अफसोस ही हाथ लगेगा। ऐसे में कांग्रेस को क्या करना चाहिए? निश्चित रूप से शिवसेना की सरकार बनाने में योगदान करना चाहिए- इससे संकोच कर कांग्रेस बीजेपी की ही मदद करेगी।

शिवसेना से कांग्रेस का राजनीतिक विरोध है। दुनिया जानती है। मगर, शिवसेना को बीजेपी से दूर करने का, एनडीए को कमजोर करने का यह अवसर है, यह कांग्रेस को समझना होगा। कांग्रेस से अधिक शिवेसना को चिंता होगी कि वह कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की सोच रही है। जब शिवसेना जोखिम ले रही है तो कांग्रेस क्यों नहीं? शिवेसेना को सत्ता मिलेगी, कांग्रेस को क्या?- यह सवाल महत्वपूर्ण है। वास्तव में इसी सवाल के जवाब में कांग्रेस की रणनीति राह खोज रही है।

कांग्रेस मुक्त भारत का मिथक टूटेगा

कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाले लोग कांग्रेस से समर्थन मांग रहे हैं- यह बात स्थापित हो जाएगी। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा औपचारिक स्तर पर खत्म हो जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का मनोबल इससे बढ़ेगा। अब तक राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा कांग्रेसजनों को डराता रहा है। यह कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा होगा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।

शिवसेना की सरकार बनाना शिवसेना का साथ देना कतई नहीं है। महाराष्ट्र को नयी सरकार देने की यह विवशता और दायित्व दोनों है। कांग्रेस के इससे बच निकलने का मतलब राजनीतिक जिम्मेदारी को पीठ दिखाना होगा। वैकल्पिक सरकार देने के लिए बीजेपी जब जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से हाथ मिला सकती है और अपने कदम को प्रांत के विकास से जोड़ सकती है तो कांग्रेस ऐसा क्यों नहीं कर सकती?

शिवसेना कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी की विरोधी

यह भ्रम है कि शिवसेना सिर्फ कांग्रेस का विरोध करती रही है। शिवसेना ने कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी का विरोध किया है। जब कांग्रेस् ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगा रही थी तब इस नारे का उद्घोष महाराष्ट्र में किसने किया था? यह उद्धव ठाकरे ही थे जिन्होंने राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाया था। इसलिए यह मिथक तोड़ देने का अवसर है कांग्रेस के पास कि शिवसेना और कांग्रेस धुर विरोधी हैं।

कांग्रेस के भीतर इस बात को लेकर चर्चा है कि शिवेसना के साथ हाथ मिलाने पर मुसलमान नाराज़ हो जाएंगे। इसके उलट कांग्रेस को राजनीति इस सोच के साथ करनी चाहिए कि मुसलमान विरोधी राजनीति को वह कमजोर कर रही है। शिवसेना की सरकार बनाना वास्तव में मुस्लिम विरोध की सियासत की पराजय है।

खुद कांग्रेस जिस हिन्दुत्व की सियासत को ओढ़ना चाहती थी, उसके लिए भी यह बड़ा अवसर है। मंदिर-मंदिर घूमने से जो छवि कांग्रेस अपने लिए नहीं गढ़ सकी, वह छवि वह शिवसेना की सरकार बनाकर कांग्रेस गढ़ सकती है। हिन्दुत्व पर बीजेपी की ठेकेदारी को चुनौती देने का यह अवसर पैदा करती है। कांग्रेस को यह मौका इसलिए भी नहीं चूकना चाहिए।

कांग्रेस के पास चलकर आया है ‘अवसर’

महाराष्ट्र की सियासत में सत्ता की चाबी कांग्रेस के पास आएगी, ऐसा कांग्रेस ने हाल के दिनों में कभी नहीं सोचा होगा। यह अवसर खुद उसके पास चलकर आया है। बीजेपी को सत्ता से दूर रखकर और खुद सत्ता के करीब पहुंचकर कांग्रेस को संजीवनी बूटी हाथ लग सकती है। जो नुकसान अनमने तरीके से चुनाव लड़कर हुआ है, उसकी भरपाई का अवसर है यह।

कांग्रेस अगर शिवेसना की सरकार बनवाती है तो यह अवसरवादिता नहीं कहलाएगी क्योंकि यह अवसर कांग्रेस ने पैदा नहीं किया है। कांग्रेस के पास किंगमेकर बनने का अवसर खुद पास आया है। यह अवसर हाथ से कतई जाने नहीं देना चाहिए। महाराष्ट्र को एक सरकार की आवश्यकता है और चुनाव इसीलिए होते हैं। आम लोग भी इसे इसी रूप में लेंगे।

चुप्पी नहीं है रास्ता

कांग्रेस ने अगर पहले ही साफ कर दिया होता कि चाहे कुछ हो वह शिवसेना की सरकार बनाने में योगदान नहीं करेगी, तो बात अलग थी। यह राजनीतिक फैसला भी नहीं लिया गया। बीते दो हफ्तों में कांग्रेस ने वास्तव में कोई फैसला ही नहीं लिया। ऐसे में उसकी चुप्पी को शिवेसना की सरकार बनाने की कोशिश के साथ सहयोग के तौर पर ही जनता ने देखा है। अब वक्त आने पर मुंह मोड़ लेने से कांग्रेस पर अवसरवादिता का आरोप लगेगा।

यह संदेश भी जाएगा कि कांग्रेस राजनीतिक किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में है। मतलब ये कि वह कोई फैसला ही नहीं कर पा रही है। सिर्फ मूकद्रष्टा बनी हुई है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए खतरनाक साबित होगी। शिवसेना के साथ सरकार बनाना है या नहीं बनाना है, इस बारे में स्थिति साफ करनी होगी। अन्यथा महाराष्ट्र की सियासत में उसकी भूमिका कहीं दिखाई ही नहीं देगी।

एनसीपी से सीख ले कांग्रेस

कांग्रेस के मुकाबले एनसीपी ने अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है। वह शिवसेना के साथ सरकार बनाना चाहती है यह इच्छा जाहिर की है। क्या एनसीपी को शिवसेना से राजनीतिक विरोध नहीं रहा है? क्या एनसीपी को शिवसेना के मुसलमान विरोधी होने की बात नहीं पता है? मगर, एनसीपी भी जानती है कि उस पर निर्भर रहने वाली सरकार को इतनी आजादी नहीं होगी कि वह अपने एजेंडे चला सके। ऐसे में कांग्रेस को एनसीपी से सीख लेने की जरूरत है। शिवसेना की सरकार बनाने में संकोच दिखाना कांग्रेस को भारी पड़ेगा। अगर कांग्रेस इस रुख में जल्द बदलाव नहीं करती है तो यह उसकी बड़ी राजनीतिक भूल होगी।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल उन्हें विभिन्न चैनलों की बहसों में देखा जा सकता है।)

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