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Thursday, August 5, 2021

सरकारी कंपनियों की बिक्रीः कारपोरेट गणतंत्र बनाम लोकतंत्र

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दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों के चारों ओर सीमेंट के कांटेदार अवरोध खड़े कर दिए गए हैं, कांटे के बाड़ लगा दिए गए हैं, इंटरनेट बंद कर दिया गया है, और इन्हें पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। ठीक उसी समय संसद में पेश इस साल के बजट में सरकारी कंपनियों को बेच देने की घोषणा की गई है। आम लोगों को शायद ही इन दो घटनाओं में कोई सीधा संबंध दिखा होगा। उन्होंने इसे भी नजरअंदाज कर दिया होगा कि किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रहे मनदीप पुनिया को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया और राजदीप सरदेसाई समेत कई पत्रकारों पर जगह-जगह  देशद्रोह के मुकदमे ठोक दिए गए हैं।

लेकिन इन घटनाओं को लेकर उनके मन में जिस उबाल के पैदा होने की जरूरत थी, वह दिखाई नहीं दे रही है। इसका क्या अर्थ है? क्या वजह है कि देश के मध्य वर्ग को इन बातों को लेकर खास बेचैनी नहीं हो रही है? क्या लोकतंत्र का आसान अर्थ भी लोगों के जेहन से निकल गया है? उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि विरोध का अधिकार तथा अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र के बुनियादी तत्व हैं। इन्हें बचाना जरूरी है। लेकिन वे तो पूरी तरह मीडिया-प्रचार की गिरफ्त में हैं।

यह अचरज की बात है कि भारत जैसे मुल्क में लोग इस बात की परवाह नहीं कर रहे हैं कि हवाई अड्डा, बंदरगाह,  सड़क, रेल और सरकारी जमीन जैसी संपत्तियां बेची जा रही हैं। अमीर देशों के विपरीत भारत में ये संपत्तियां पूंजीपतियों के पैसे से नहीं बल्कि गरीबों के पैसे से खड़ी हुई हैं। गरीबों पर होने वाले खर्च से काट कर इन संपत्तियों को बनाने पर खर्च किया गया है। लोगों ने सालों-साल बीमारी तथा भुखमरी सह कर इन संपत्तियों को बनने दिया है। जीवन बीमा निगम तथा बैंक तो सीधे-सीधे जनता के पैसों पर खड़े हैं। निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग ने जीवन की असुरक्षा को ध्यान में रख कर बीमा में अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा लगाया है और जीवन बीमा निगम ने उन पैसों को देश के विकास के उन कामों में लगाया जिसमें यहां के पूंजीपति पैसा नहीं लगाते हैं।

इसी तरह बाकी कपनियां भी खड़ी हुई हैं। सरकारी कंपनियों को इनके कामगारों ने अपनी मेहनत से लाभ में पहुचाया है। इन कंपनियों पर आम लोगों और मजदूरों का बराबर का हक है, सरकार का नहीं। इसके बावजूद लोग इन्हें बिकते कैसे देख रहे हैं? आखिर इस बेबसी की वजह क्या है? सरकारी संपत्तियों को बेच देने और अर्थ-व्यवस्था को देशी कारपोरेट के हाथ में सौंपने की हिम्मत मोदी सरकार ने कहां से जुटाई है?

इन सवालों के जवाब कठिन नहीं हैं। इनके जवाब सिर्फ उन रटे-रटाए नारों में नहीं मिलेंगे जिन्हें राजनीतिक दलों ने बनाए हैं या उनके नेतृत्व में बने ट्रेड यूनियन लगातर दोहराते रहे हैं। इस बात का जवाब तो इन ट्रेड यूनियनों को भी देना पड़ेगा कि सरकारी कंपनियों को बिकने से रोकने के लिए कर्मचारी अपनी जान क्यों नहीं लगा रहे हैं? उन्हें इस बात का भी जवाब देना पड़ेगा कि आम लोगों को यह क्यों नहीं महसूस कराया जा सका सरकारी संस्थान के असली मालिक वे हैं? राजनीतिक दलों, खास कर कांग्रेस को यह जवाब देना पड़ेगा कि आम लोगों को क्यों नहीं लगता है कि सड़क, बंदरगाह और हवाई अड्डा उनकी संपत्ति है? उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि इनके मालिक राजनेता और नौकरशाह हैं?

असल में, आजादी के बाद जो राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है, वह गुलामी के मूल्यों से ही प्रभावित रही है। देश के विकास में देश की बहुसंख्यक आबादी के योगदान को कभी सामने नहीं लाया गया। देश की जनता को किसी ने भी नहीं समझाया कि किसानों की जमीन, मजदूरों का श्रम तथा आम लोगों के टैक्स से सड़क, पुल या सरकारी कारखाने बने हैं। इस सच्चाई पर राजनीतिक दलों ने कभी जोर नहीं दिया।

ट्रेड यूनियनों ने भी मजदूरों को अपने कारखानों पर हक जताना नहीं सिखाया और न ही उन्हें यह सिखाया कि यह आम लोगों की संपत्ति है और उन्हें यह महसूस करना चाहिए। बैंक या रेल जैसी जगहों पर लोगों के साथ किए जाने वाले व्यवहार ने आम लोगों को  दूर ही किया। इस दूरी का असर ऐसा हुआ कि ज्यादा खर्च करके भी लोग निजी कंपनियों की तरफ मुड़ने लगे। सरकारी कंपनियों को बेहतर चलाने की जिम्मेदारी वाले मंत्री ही तर्क देने लगे कि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा देने के लिए निजीकरण जरूरी है।  
 

यूनियनों ने मजदूरों को सिर्फ ज्यादा तनख्वाह के लिए लड़ना सिखाया है। यही वजह है कि रेलवे जैसे ताकतवर यूनियन वाले संस्थान में धड़ाधड़ निजीकरण हो रहा है, स्टेशन से लेकर तथा पटरियों तथा ट्रेन को बेचा जा रहा है, लेकिन चुप्पी का माहौल है। बिक रहे संस्थानों के कर्मचारी मोटा पैसा लेकर संस्थान को विदा कहने को तैयार हैं। पहले सरकार ने इन संस्थानों को घाटे में लाया और कर्मचारियों के आत्म विश्वास को तोड़ा, अब इन्हें औने-पौने दाम पर चहेते पूंजीपतियों के हाथ बेचने में लगी है।

इसके कई उदाहरण हैं। बीएसएनएल के नेटवर्क का फायदा लेकर निजी कंपनियों ने लाभ कमाया और धीरे-धीरे सरकारी नीतियों ने उसे प्रतिस्पर्धा से ही बाहर कर दिया। अब वह समस्याओं से घिरी कंपनी है जहां के कर्मचारियों को वेतन भी नसीब नहीं है। अपने नेटवर्क और अपने सामान का उपयोग निजी कंपनियों को नहीं करने देने और निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीति के विरेाध की लड़ाई उन्होंने उस समय लड़ी होती तो यह नौबत नहीं आती। अगर उन्होंने उपभोक्ताओं को साथ रखा होता तो आज निजी कंपनियां उन्हें बाजार में धक्के नहीं दे पातीं।

सरकारी कंपनियों ने आजादी के भारत में सामाजिक गैर-बराबरी दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई है। दलित और आदिवासियों का मध्य वर्ग खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। ओबीसी आरक्षण के बाद इन तबकों को भी इन संस्थानों में प्रतिनिधित्व मिलने लगा है। गरीबी तथा सामाजिक गैर-बराबरी के शिकार इन तबकों को सरकारी संस्थानों के निजीकरण से भारी नुकसान होगा। लेकिन अभी तक सामाजिक न्याय की आवाज बुलंद करने वाली पार्टियों की तरफ से विरोध का असरदार स्वर नहीं उभरा है।

प्रतीकात्मक फोटो।

अगर विचारधारा के स्तर पर देखें तो वामपंथी पाटियों को छोड़ कर किसी ने भी इसके खिलाफ मजबूती से आवाज नहीं उठाई है। कांग्रेस भी विरोध में उठ खड़ी हुई है। लेकिन सच्चाई यही है कि निजीकरण के आधार उसी ने तैयार किए हैं। कांग्रेस को अपने आर्थिक दर्शन को बदलना पड़ेगा। उसे नेहरूवादी विचारधारा की ओर लौटना होगा। भाजपा ने आजादी के आंदोलन और उसके बाद हासिल विचारों को ध्वस्त करने का काम बाबरी मस्जिद को ढहाने के साथ शुरू कर दिया था, वह अब एक नंगे पूंजीवाद तथा कारपोरेट गणतंत्र की ओर बेहिचक आगे बढ़ रही है। उसे रोकने के लिए कम्युनिस्टों, समाजवादियों, गांधीवादियों तथा अंबेडकरवादियों के सुयुक्त मोर्चे की जरूरत है।
किसानों ने कारपोरेट गणतंत्र के खिलाफ मोर्चा खोला है और दमन तथा चालाकियों का बखूबी सामना किया है। उनके साथ ट्रेड यूनियनों ने एक मंच बनाया है।

उन्होंने कारपोरेट गणतंत्र को संचालित करने वाले दो महत्वपूर्ण कारोबारी घरानों-अडानी तथा अंबानी को अपना निशाना भी बनाया है। लेकिन सरकारी कंपंनियों के कर्मचारियों का सक्रिय समर्थन नजर नहीं आ रहा है। किसान नेता भी सरकारी कंपनियों को बेचने के फैसले को मुद्दा नहीं बना रहे हैं। वे तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने के मुद्दे तक ही सीमित रहना चाहते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि ये तीन कानून भी देश के संसाधन और उत्पादों को कारपोरेट को सौंपने के कार्यक्रम के हिस्से हैं। ये कानून भी कारपारेट गणतंत्र के अभियान से ही निकले हैं। यह गणतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाने तथ दमन के रास्ते पर ही चलेगा। लोकतंत्र बचाने की बड़ी लड़ाई ही किसानों की मुक्ति का रास्ता बना सकती है और जनता की संपत्ति बचा सकती है।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)    

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