Thu. Apr 2nd, 2020

दिल्ली चुनाव : साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की परतें

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केजरीवाल, शाह और सोनिया गांधी।

दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का दिन (8 फ़रवरी 2020) आ गया है। भाजपा ने अपने चुनाव अभियान में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और कांग्रेस को कोसने की रणनीति बदस्तूर जारी रखी है। हालांकि पब्लिक डोमेन में और भाजपा-विरोधी बुद्धिजीवियों की ओर से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की चर्चा पर ही जोर बना रहा। कांग्रेस के बारे में ऐसा प्रचार हुआ है कि वह एक निपट चुकी पार्टी है। इसका असर बहुत-कुछ कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा है। साथ ही कुछ हद तक उन मतदाताओं पर भी जो लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस की तरफ लौटे थे। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 22 प्रतिशत वोट मिले थे और वह भाजपा, जिसे 56 प्रतिशत वोट मिले, के बाद दूसरी स्थान पर थी। आप 18 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे स्थान पर थी।

दिल्ली में भाजपा कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी रही है। 2013 और 2015 के विधानसभा चुनावों में उसका मत प्रतिशत क्रमश: 45 और 32 के कुछ ऊपर रहा है। यह आम आदमी पार्टी (आप) की आंधी का दौर था। लिहाज़ा, यह कहना गलत है कि भाजपा ने आप को मिलने जा रही 70 में से 65 सीटों से भयभीत होकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का दांव चला है। भाजपा पहले से फाइट में थी। लोकसभा चुनाव में उसे तीसरे स्थान पर धकेल देने वाली कांग्रेस बीच में सिर न उठा ले, इसलिए आप ने यह हवा उड़ाई कि दिल्ली में उसके मुकाबले कोई नहीं है।

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और भाजपा ने वह हवा उड़ने दी, क्योंकि वह जानती थी कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के पक्के प्रहार से वह आप को पीछे धकेल देगी। कांग्रेस को पहले से धकेला ही हुआ है। भाजपा से भयभीत मुसलामानों को अपनी झोली में मान कर आप पिछले छः सालों से तरह-तरह की युक्तियों से हिंदुओं को रिझाने में लगी हुई थी। यह भाजपा की हिंदू-राष्ट्र की योजना में फिट बैठता है कि अन्य पार्टियां/नेता और उनके समर्थक बुद्धिजीवी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के आस-पास चक्कर काटें। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर जीत की बाज़ी वह अपने हाथ में रखना जानती है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयोग काफी आगे बढ़ा है। भाजपा यह चुनाव जीते या न जीते, उसने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में स्थापित कर दिया है। केजरीवाल ने अपने भाषणों और विज्ञापनों में मतदाताओं से लगातार जोर देकर कहा कि वे बेशक भाजपा में रहें, लेकिन दिल्ली के चुनाव में उन्हें वोट करें। यानी केंद्र की सत्ता में मोदी को स्थापित रखें और दिल्ली की सत्ता में उन्हें स्थापित रखें। कहने की जरूरत नहीं कि 2013 से ही ‘केंद्र में मोदी दिल्ली में केजरीवाल’ भाजपा और आप का साझा नारा है। सेकुलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की सांस इसी मीजान में अटकी है; कि केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ मोदी को जिताने वाले मतदाता दिल्ली में वैसे ही पूर्ण बहुमत से केजरीवाल को जिता दें!    

साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की यह परत दर परत देखने लायक है। देश को फासीवाद से बचाने का दिन-रात आह्वान करने वाले केजरीवाल को जिताने के लिए भाजपा/मोदी की जीत को मान्यता देते हैं। वे कभी इस कभी उस क्षत्रप के सहारे संविधान की रक्षा और फासीवाद के नाश का बीड़ा उठाते हैं। यह सिलसिला शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे तक जा पहुंचा है। भाजपा ने महाराष्ट्र में सत्ता खोई है, लेकिन साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की दूरगामी जीत भी हासिल की है। कट्टर इस्लामवाद के पैरोकार और आरएसएस/भाजपा अथवा उनसे सम्बद्ध व्यक्ति-विशेष को अपशब्द कहने वाले साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ जुटे हुए हैं। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के चारों ओर यह जुटान बना रहेगा तो आरएसएस/भाजपा की मज़बूती भी बनी रहेगी।

मेरी एक विदुषी परिचित ने तीन-चार दिन पहले ‘द वायर’ में अंग्रेजी में प्रकाशित एक आलेख भेजा – ‘फॉर द सेक ऑफ़ इंडिया आई बिलीव अरविंद केजरीवाल मस्ट बी रिइलेक्टेड इन डेल्ही’ (मेरा विश्वास है भारत की खातिर दिल्ली में केजरीवाल का फिर से चुना जाना अनिवार्य है)। आलेख में हद दर्जे की चिंता जताते हुए केजरीवाल को जिता कर भारत को बचा लेने की गुहार लगाई गई है। ऐसा लगता है लेखक का ‘भारत’ कहीं अक्षुण्ण अवस्था में मौजूद है, जिसे बचाए रखने के लिए वे केजरीवाल की जीत अपरिहार्य मानते हैं। लेखक को जैसे पता ही नहीं है कि भारत में संवैधानिक मूल्यों और संस्थाओं का बड़े पैमाने पर हनन किया जा चुका है, पूरे सार्वजनिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र में तब्दील किया जा रहा है, राष्ट्रीय परिसंपत्तियों, संस्थानों, धरोहरों और सेवाओं को धड़ाधड़ बेचा जा रहा है, हर क्षेत्र में विदेशी अथवा निजी निवेश के बेलगाम फैसले हो रहे हैं … और न जाने क्या-क्या।

दरअसल, इस तरह की अराजनीतिक चिंता बहुत-से भले लोग प्रकट करते हैं। लेकिन वे यह नहीं समझते, समझना चाहते कि भारत को बचाने की लड़ाई राजनीतिक है, जो एक नई वैकल्पिक राजनीति का निर्माण करके जीती जा सकती है। इसके लिए थोड़ा ठहर कर विचार करने की जरूरत है। हमेशा तेजी और आवेग से भरे ये भले लोग शायद यह भी नहीं समझ पाते कि जिस आरएसएस को नेस्तनाबूद करने के लिए वे हमेशा सन्नद्ध बने रहते हैं, वह आरएसएस उनके भीतर सक्रिय रहता है।

(लेखक प्रेम सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं।) 

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