Tuesday, December 7, 2021

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जींद में दलितों का बहिष्कार नहीं, लोकतंत्र का क़त्ल हो रहा है: फैक्ट फाइंडिंग टीम

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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(दिल्ली की केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे समाज के सबसे उत्पीड़ित और वंचित तबके का महीनों से सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार चल रहा है लेकिन न तो सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं को उसकी फिक्र है और न ही बात-बात पर स्वत: संज्ञान लेने वाले सुप्रीम कोर्ट की उस पर नजर। यह घटना बताती है कि आधुनिक लोकतंत्र के भीतर किस तरह से मध्ययुगीन बर्बर प्रथाएं न केवल जिंदा हैं बल्कि अपने वीभत्स रूप में जमीन पर काम कर रही हैं। भारतीय समाज की जाति सबसे सच्चाई है और उससे बड़ी सच्चाई दलितों के साथ छुआछूत, भेदभाव और उत्पीड़न की है। सत्ता जब उत्पीड़कों की संरक्षक बन जाए तो कानून कैसे बौना हो जाता है उसकी जीती जागती मिसाल हरियाणा का छातर गांव है। पुलिस को पता है। केस भी दर्ज है। लोग नामजद हैं। लेकिन एक भी कार्रवाई नहीं हुई और न ही सामाजिक बहिष्कार को खत्म किया जा सका। जमीनी सच्चाई क्या है इस हकीकत को जानने के लिए मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों, मीडियाकर्मियों, एडवोकेट्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक दल ने इलाके का दौरा किया। पेश है इस फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट-संपादक)

गांव छातर, जिला जींद हरियाणा में उच्च जातीय पंचायत द्वारा 200 दलित परिवारों का सामाजिक आर्थिक बहिष्कार करने की घटना पर विभिन्न सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों द्वारा 14/10/2021 को गांव का दौरा करने के बाद जारी की गई संयुक्त जांच पड़ताल रिपोर्ट:

जांच पड़ताल का मुख्य उद्देश्य –

1.   गांव में दलितों पर थोपे गये सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की ठोस जांच करना।

2.   सामाजिक बहिष्कार जैसी अमानवीय करतूत के प्रमुख आरोपियों की पहचान करना।

3.   स्थानीय पुलिस और प्रशासन की भूमिका की जांच करना।

4.   गांव में शांति और भाईचारा कायम करना।

5.   सामाजिक आर्थिक नाकेबंदी के शिकार दलितों के पुर्नवास के लिये दबाव बनाना।

गांव छातरः सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि

हरियाणा के जींद जिले के छातर गांव में लगभग एक महीने से गांव के 200 दलित परिवारों का गांव की उच्च जातीय पंचायत ने सामाजिक आर्थिक बहिष्कार किया हुआ है। छातर उचाना तहसील का एक बड़ा गांव है। 2011 की जनगणना के अनुसार गांव की कुल जनसंख्या 12095 में से 1465 अनुसूचित जातियों की थी, जो कि कुल जनसंख्या का 12.11 प्रतिशत बनती है। गांव में खेती की जमीन केवल उच्च जातियों के पास है। पिछड़ी जातियों के पास नाम मात्र की जमीन है। गांव की दलित जातियां भूमिहीन हैं और वे अपनी आजीविका के लिये तथाकथित उच्च जातियों की कृषि भूमि पर निर्भर करती हैं। पंचायती जमीनों में से 16 एकड़ जमीन अनुसूचित जातियों के हिस्से आती है। गांव की पंचायत ने दलितों को जमीन से वंचित करने के लिये इस जमीन पर गौशाला का निर्माण करवा दिया है।

अनुसूचित जातियों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं सहित, केवल 6-7 लोग ही सरकारी नौकरियों में हैं। अनुसूचित जातियों के लोग दिहाड़ी मजदूरी करने के लिये, गांव से 16 किलोमीटर दूर, उचाना कस्बे में भी जाते हैं। उचाना जिला जींद का नवगठित उप मंडल तथा राज्य विधान सभा का एक पूराना निर्वाचन क्षेत्र है। राज्य के वर्तमान उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चैटाला इस निर्वाचन क्षेत्र से आते हैं, जो खुद जाट जाति के हैं। उप मंडल उचाना के एसडीएम, डीएसपी तथा थाना प्रभारी सभी जाट जाति से आते हैं।

हालांकि हरियाणा सरकार द्वारा उचाना को तहसील बनाये कई साल हो चुके हैं। फिर भी उचाना तहसील के लिये कृषि गणना 2015-16 के आंकड़े अलग से नहीं दिये गये हैं। शायद यह गणना पुरानी तहसील नरवाना की गणना में ही की गई है। कृषि गणना 2015-16 के अनुसार नरवाना तहसील में दलितों के पास मात्र 1183 कृषि जोतें थीं। ये कुल 37934 जोतों का मात्र 3 प्रतिशत बनता है। नरवाना तहसील के दलितों के पास कुल 201467 एकड़ कृषि भूमि में से केवल 2507 एकड़ यानि 1.2 प्रतिशत जमीनें हैं। 50000 बीघे कृषि भूमि वाले छातर गांव के सभी दलित परिवार भूमिहीन हैं। इनके पास कोई और रोजगार का साधन नहीं है। वे अभी भी अपनी आजीविका के लिये प्रभुत्वषाली जाट जाति की जमीनों पर आश्रित हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिला जींद में दलितों की जनसंख्या 21 प्रतिशत है। नरवाना तहसील के दलित केवल 1.2 प्रतिशत जमीन के मालिक हैं।

वर्तमान किसान आंदोलन और दलितः

पंजाब, हरियाणा और यूपी के किसान मोदी सरकार द्वारा पारित किये गये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर नवंबर 2020 से आंदोलन कर रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा अपने सभी मंचों से मजदूर किसान एकता का नारा बुलंद कर रहा है। इसके अलावा मोर्चे ने देश की व्यापक मेहनतकश जनता को इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भाग लेने का आह्वान किया है। इस आह्वान पर पंजाब, हरियाणा व अन्य राज्यों से दलित समुदायों ने भी बड़ी संख्या में इस आंदोलन में भाग लिया है।

छातर गांव के दलितों ने भी किसान आंदोलन में अपनी भागीदारी की है। जांच दल को गांव के दलितों ने बताया कि उन्होनें भी गांव की अन्य जातियों की तरह घर-घर से किसान आंदोलन के लिये चंदा इकट्ठा किया था। जब भी किसान मोर्चे ने आर्थिक चंदा इकट्ठा करने की अपील की, मांगु मोहल्ले के हर बार 20 हजार रूपये चंदा इकट्ठा करके आंदोलन में भेजा। इसके साथ ही गांव के दलित युवक किसान आंदोलन के प्रति एकजुटता प्रकट करने के लिये कई कई दिनों तक टीकरी बोर्डर पर किसानों के साथ रुके। उन्होंने राजधानी की सड़कों पर 26 जनवरी, 2021 को निकली ऐतिहासिक किसान परेड में भी भाग लिया। गांव के दलित युवक किसान आंदोलन के नजदिकी केंद्र खटकड़ टोल पर आमतौर पर जाते रहते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक किसी भी किसान नेता ने दलितों के विरुद्ध होने वाले इस उत्पीड़न की घटना पर संज्ञान नहीं लिया है जो कि किसान यूनियनों के उच्च जातीय चरित्र को उजागर करता है।

छातर गांव में दलितों पर सामाजिक-आर्थिक बंदी का फरमान जारी करने वाला पूर्व सरपंच ईश्वर सिंह जाट जाति से संबंध रखता है तथा वह गांव में किसान आंदोलन का नेता भी है। वर्तमान किसान आंदोलन में भाग लेते हुये प्रत्येक संगठन व शुभचिंतक का यह भी फर्ज बनता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों पर हो रहे जातीय अत्याचारों के खिलाफ भी आवाज बुलंद करे। यह राज्य के किसान मोर्चे व उसके नेतृत्व का दायित्व बनता था कि वे गांव छातर में 200 दलित परिवारों पर लगाई गई सामाजिक-आर्थिक बंदी की अमानवीय घटना में समय पर हस्तक्षेप करते। मोर्चा की एक टीम को इस जातीय विवाद का समाधान करने के उद्देष्य से प्रभावित दलित बस्ती का दौरा करना चाहिये था। अन्यथा मोर्चा की स्टेजों पर बुलंद होने वाला मजदूर किसान एकता का नारा फर्जी और खोखला साबित होगा।

जांच दल का गांव में प्रवेश:

गांव में घुसते ही टीम के एक सदस्य ने सामाजिक आर्थिक बंदी का शिकार दलित बस्ती का रास्ता पूछने के उद्देश्य से एक स्थानीय युवक को अपनी तरफ बुलाया लेकिन स्थानीय युवक ने दलित बस्ती का रास्ता बताने से यह कहते हुये मना कर दिया कि यदि उसने ऐसा किया तो गांव की पंचायत उस पर 11000 रुपये का जुर्माना लगा देगी। दोपहर 12 बजे के आस पास जांच दल दलित मोहल्ले में पहुंच गया। यहां पर अनुसूचित जाति चमार से संबधित 100 से ज्यादा परिवार गांव की स्थापना के समय से निवास कर रहे हैं।

इस बगड़ के कुछ परिवार गांव के अन्य स्थानों पर भी बसे हुये हैं। ये सब दलित हरियाणा विलेज कॉमन लैंड एक्ट 1966 में दी गई परिभाषा के अनुसार गांव के स्थायी निवासी हैं। गांव के सारे सामुदायिक संसाधनों पर इनका भी बराबर का हक है। जांच दल ने गांव छातर के मांगु मोहल्ले के भीतर जाकर उच्च जातीय पंचायत द्वारा दलितों पर लगाये गये सामाजिक आर्थिक प्रतिबंध के बारे में तथ्यों की गहनता से जांच की तथा पीड़ितों के साक्षात्कार लिये। टीम के साथ मौजूद मीडिया कर्मी साथियों ने इस पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की। जांच टीम ने पाया कि दलितों की सुरक्षा के लिये केवल 4 पुलिस कर्मी दलित बस्ती के प्रवेश द्वार पर तैनात थे।

वर्तमान सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की पृष्ठभूमिः

दिनांक 01/08/2021 को रात्रि लगभग 10 बजे, जब दलित युवक गुरमीत, सचिन और कई लोगों के साथ अपने बस्ती के चबूतरे पर बैठे थे। तभी शराब के नशे में धुत जाट जाति के साहिल पुत्र लीलू राम, अनिल पुत्र शिवा, सोनू पुत्र मांगे राम, लीलू पुत्र प्रेम व प्रेम पुत्र सुच्चा राम वहां पर आ गये और दलित युवकों को ढेड, चमार बुलाकर उनकी मां- बहनों आदि को जाति सूचक गाली देने लगे। दलित युवकों व बुजुर्गों ने उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। उन्होंने दलित युवकों पर ईंट व पत्थरों से हमला कर दिया तथा हाथापाई करने लगे। दलित युवक अपने घरों में भाग गये और अंदर से दरवाजे बंद कर लिये। हमलावरों ने अपने पक्ष के अन्य लोगों को भी बुला लिया। इस बारे में जींद पुलिस ने एक मुकदमा संख्या 242 दिनांक 02/08/2021 अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धाराओं 3(1)(आर), 3(1)(एस), 3(2)(वीए) के तहत उपरोक्त दोषियों के खिलाफ उचाना थाना में दर्ज कर लिया। गांव की पंचायत ने सचिन पर दबाव डालकर इस मुकदमा में समझौता करवा दिया। जिससे गुरमीत सहमत नहीं था।

उच्च जातियों के युवक गुरमीत को सबक सिखाने की फिराक में थे। 9 सितंबर को गुरमीत नजदीक के गांव घोघड़ियां में कबड्डी के खेल देखने गया था। वहां पर उच्च जाति के युवक पहले से गये हुये थे। उच्च जाति के राजेश व अन्य बदमासों ने वहां पर दलित युवक गुरमीत के साथ मारपीट की तथा उसको सरेआम जातिसूचक गालियां देकर अपमानित किया। और कहा कि उसकी इस खेल उत्सव में आने की हिम्मत कैसे हुई? उसी दिन पीड़ित गुरमीत ने एक लिखित शिकायत पुलिस थाना उचाना में दी। अगले दिन पूर्व सरपंच ईश्वर सिंह पंचायत लेकर पीड़ित गुरमीत के घर आया और शिकायत वापस लेने के लिए कहने लगा। इसलिये पीड़ित युवक ने थाना प्रभारी से अपील की कि वह दो दिन तक कोई कारवाई न करे, वह दोषियों के पंचायत में राजीनामा करने का प्रयास कर रहा है।

परन्तु उसी दिन दोषी राजेश व उसके भाई ने पीड़ित गुरमीत को उसके घर आकर धमकाया कि वह शिकायत वापस ले ले या फिर अंजाम भुगतने के लिये तैयार हो जाये। दलित युवक ने इसकी शिकायत राजीनामा करवाने वाले पंचायतियों से करने के लिये संपर्क किया कि दोषीगण उसको जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं परन्तु उच्च जातीय पंचायत का कोई व्यक्ति पीड़ित गुरमीत की बात सुनने नहीं आया। आखिरकार पंचायत के जवाब का इंतजार करने के बाद, पीड़ित ने उचाना थाना में जाकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने को कह दिया। उच्च जातीय युवकों ने फोन पर धमकियां देकर व अन्य तरीकों से पीड़ित पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। एक दोषी के नजदीकी रिश्तेदार पूर्व सरपंच ईश्वर सिंह ने भी पीड़ित को जान से मारने की धमकी देनी शुरू कर दी। उसने भी सरेआम पीड़ित गुरमीत को जातिसूचक गालियां बकी।

दिनांक 26/09/2021 को पूर्व सरपंच ने दलितों के 200 घरों के खिलाफ सामाजिक आर्थिक नाकेबंदी की घोषणा करने के लिये ब्राह्मण चैपाल में एक जाति पंचायत का आयोजन किया क्योंकि वे, जैसा कि उच्च जाति पंचायत का आदेश था, पीड़ित परिवार को राजीनामा करने के लिये सहमत या बाध्य करने में असफल रहे थे। समस्त दलित समाज को कड़ा सबक सिखाने के लिये सामाजिक आर्थिक बंदी थोप दी गई। उच्च जाति पंचायत के फरमान के अनुसार जो कोई भी ग्राम निवासी मांगु मोहल्ले के 200 दलित परिवारों के साथ किसी भी प्रकार का लेन-देन या सम्बन्ध रखेगा, उसको 11000 रुपये का जुर्माना अदा करना पड़ेगा।
सामाजिक आर्थिक बहिष्कार का स्वरूपः

  1. गांव का कोई भी दुकानदार मांगु बगड़ के दलितों को कोई भी सामान नहीं बेचेगा।
  2. कोई भी नाई इस मोहल्ले के दलितों के बाल नहीं काटेगा।
  3. कोई भी दूधिया दलित मोहल्ले में दूध बेचने नहीं जायेगा।
  4. मांगु मोहल्ले के दलितों पर गांव के खेतों में घुसने पर रोक है, उनको न तो काम पर रखा जायेगा और न ही घास आदि काटेने दिया जायेगा।
  5. मांगु मोहल्ले के दलितों पर गांव के सामुदायिक कुओं-नलकों से पानी भरने पर रोक है।
  6. ये शहरों में जाने वाले गांव के किसी भी निजी वाहन- ऑटो, जीप व अन्य गाड़ी में नहीं चढ़ सकते।
  7. गांव का कोई भी व्यक्ति इन दलितों के साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रख सकता।

घटनाक्रम की गहन जांच पड़ताल में यह तथ्य सामने आया कि दलितों का सामाजिक आर्थिक बहिष्कार करने में पूर्व सरपंच ईश्वरसिंह मुख्य रूप से जिम्मेदार है। वह गांव में जाटों का प्रभावशाली नेता है व उसकी एक आपराधिक पृष्ठभूमि है। उक्त पूर्व सरपंच अपने भतीजे के खिलाफ दर्ज अत्याचार के मुकदमे में राजीनामा करवाने के लिये दबाव बना रहा है। मौजूदा विवाद के पिछे एकमात्र यही कारण है। पीड़ित दलितों ने जांच दल को बताया कि वह आजकल जेल से परोल पर रिहा किया गया है। वह किसान यूनियन का नेता भी है।

पीड़ित पक्ष से बातचीतः

पीड़ित दलितों ने सामाजिक व आर्थिक बंदी के कारण पेश आ रही विकट परेशानियों के बारे में जांच दल को बताया। बंदी का दंश झेल रहे लोगों ने जांच दल को बताया कि उनको गांव में किसी भी काम में लगाने पर पाबंदी है। गांव की अन्य जातियों ने पीड़ित चमारों के साथ सभी प्रकार के सम्बन्ध काट दिये हैं। गांव के किसी भी गैर दलित व्यक्ति को चमारों के साथ किसी भी प्रकार का संवाद व सामाजिक आर्थिक सम्बन्ध बहाल करने की आज्ञा नहीं है। यहां तक कि बहिष्कार के दायरे से बाहर रखे गये दलित भी बहिष्कृत बस्ती से सम्बन्ध नहीं रख रहे। अनुसूचित जाति के लोगों को उनकी खुद की वे दुकानें भी नहीं खोलने दी जा रही हैं जो उन्होनें उच्च जातीय मालिकों से किराये पर ले रखी हैं।

उनको दुकानें दूसरी जगहों पर भी सिफ्ट नहीं करने दी जा रहीं। दलितों की सभी दुकानें बंद पड़ी हैं। दलित छात्र-छात्राओं को स्कूल, कॉलेज व यूनिवर्सिटी में दाखिलों के लिये जरूरी कागजातों पर सरपंच व नम्बरदार अपने हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं। इस बंदी के कारण दलित बच्चों की पढ़ाई बूरी तरह प्रभावित हुई है। बहुत से कोचिंग आदि लेने वाले छात्र-छात्रायें बंदी के कारण शहरों में नहीं जा पा रहे हैं। हालांकि दलित मोहल्ले के ठीक सामने वाली मुख्य गली के दुकानदारों ने बताया कि गांव में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है, केवल दो दिन तक ही पाबंदी थी, अब कोई रोक नहीं है। ये सब उच्च जाति के दुकानदार थे।

गांव में दूध की डेरियां आम तौर पर उच्च जाति वालों की हैं। ये डेरी मालिक दलितों को दूध नहीं बेच रहे। एक दलित महिला ने जांच दल को बताया कि दूध की कमी के कारण उनके छोटे बच्चे भुखे रह रहे हैं। हम शुरू में पड़ोस के गांव कुचराना से दूध खरीद कर लाते थे लेकिन गांव की उच्च जातीय पंचायत ने वहां से भी हमारा दूध बंद करवा दिया। अब हमें 15 किलोमीटर दूर स्थित जिला कैथल के गांव मटोर से दूध लाना पड़ रहा है, दलित महिला ने जांच दल को बताया। दलित नौजवान सुशील कुमार ने बताया कि वह गांव में एक प्लंबर का काम करता है। बंदी के कारण उसके द्वारा किये गये काम के करीब 2 लाख रुपये रुके हुए हैं। उसने जिनका काम किया हुआ है, वे कह रहे हैं कि अपना सामान उठा कर ले जाओ। पैसा मांगने के लिये फोन करता हूं तो मेरा फोन भी नहीं उठाते। डर और तंगी की वजह से बच्चों को रिश्तेदारी में भेज दिया है, सुशील कुमार ने अपना दर्द ब्यान करते हुये कहा।

मांगु मोहल्ले के एक अन्य व्यक्ति दलबीर ने जांच दल को बताया कि वह उचाना कस्बे में मोची का काम करता है लेकिन बंदी के कारण गांव के निजी वाहनों के मालिक उसे अपने वाहनों में नहीं बैठने देते इसलिये वह कई दिन से घर में ही है। गांव के चैधरियों ने खेतों में घुसने पर रोक लगा रखी है। दलबीर ने बताया कि उसने अपनी एक-एक लाख से ज्यादा कीमत की भैंसें 29-29 हजार में बेचने को मजबूर होना पड़ा है। गांव के चौधरियों ने कई साल पहले नाईयों का बहिष्कार किया था, आज हमारा बहिष्कार कर दिया है। एक विधवा, जो कि गांव में कॉस्मेटिक सामान की दुकान चलाती है, ने जांच दल को बताया कि इस दुकान के अलावा उसका व उसके बच्चों का कोई और सहारा नहीं था, वह भी गांव के जाटों ने बंद करवा दी है। गांव की एक खेतिहर मजदूर मामो देवी ने बताया कि उनको खेतों में काम करने के लिये पड़ोस के गांव में जाना पड़ रहा है, क्योंकि अब गांव के खेतों में घुसने पर रोक लगा दी गई है। लगभग सभी दलित परिवार पशु रखते हैं। सामाजिक आर्थिक बंदी के कारण पशुओं के लिये हरे चारे की किल्लत खड़ी हो गयी है।

एक बुजुर्ग महिला मिनरो ने बताया कि गाम के जाटों ने ‘खेतों में जाण पर बंदी ला राख्खी सै, हम पड़ोस के गाम करसिंधु म्हं कपास चुगण जाते है’। वे परिवार सहित पूरे दिन में केवल 200 रूपये की कपास चुग पाती हैं, अब उन्हें इसी से गुजारा करना पड़ता है। 70 वर्षीय बुजुर्ग राजकुमार ने बताया कि म्हारै खुद के खूड कोनी, ज्यांतै ये चौधरी धौंस जमावै सैं, जे म्हारे धोरै भी आपणे खेत होंदे तो इनकी हिम्मत ना पड़दी बंदी लगाण की। यू सारा रौळा जमीन का सै। पीड़ितों ने जांच दल को यह भी बताया कि बंदी की घोषणा होने के बाद इस दलित मोहल्ले के पंजीकृत मजदूरों को मनरेगा के तहत मिलने वाला काम भी नहीं दिया जा रहा।

जांच दल के सामने कृषि कानून रद्द करवाने के लिये खटकड़ टोल पर धरनारत आंदोलनकारियों ने भी छातर गांव के सिर्फ एक बगड़ पर सामाजिक-आर्थिक बंदी लगाये जाने की बात स्वीकार की। गांव में किसी अन्य दलित मोहल्ले पर पाबंदी नहीं है। जांच में यह भी सामने आया कि उच्च जाति के कुछ परिवार भी बंदी पर सवाल उठाये थे, और दलितों की मदद के लिये आगे आये थे। लेकिन उच्च जाति पंचायत द्वारा उनको भी धमकाया गया है। छातर गांव की उच्च जाति पंचायत द्वारा दलितों पर पाबंदी लगाये जाने के बावजूद पड़ोसी गावं करसिंधु के जाटों ने पीड़ित दलितों की मदद की जो कि एक सराहनीय कदम है।

जांच दल ने आरोपी पक्ष से भी बात करने की कोशिश की तथा निष्पक्ष तरीके से जांच पड़ताल की। उच्च जाति के लोगों के अनुसार गावं में सब कुछ ठीक है, किसी का कोई सामाजिक बहिष्कार नहीं है। गांव में सब कुछ सामान्य है। किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गांव के कुछ असामाजिक तत्व भाईचारे को बिगाड़ना चाहते हैं। जांच दल के सामने ही उच्च जाति के लोग सारा दोष दलितों पर लगा रहे थे और दलित जातियों के लिये अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी कर रहे थे। ये दलित जातियों के बारे में यह कहकर दुष्प्रचार कर रहे हैं कि इनको एससी-एसटी एक्ट के रूप में ब्रह्मास्त्र मिल गया है, जिसका दुरूपयोग अब हमारे खिलाफ किया जा रहा है।

उच्च जाति के लोगों ने जांच दल को या तो घुमा फिराकर जवाब दिया, या वे जवाब देने से बचे। एक सेवानिवृत अध्यापक, जयसिंह ने कहा कि सबका बहिष्कार नहीं किया गया है, कुछ परिवारों पर जरूर पाबंदी है। उसने कहा कि ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती। दलितों की भी गलती है। उच्च जाति के युवक रणदीप का कहना था कि हमारे बुजुर्गों ने इनके सामने पगड़ी तक रख दी लेकिन वह (पीड़ित गुरमीत) मानने को तैयार नहीं है, ये लोग ज्यादा ही हवा ले रहे हैं, बंदी करने के बाद भी नहीं माने तो यहां पर मिर्चपुर से भी बड़ा कांड हो जायेगा। मिर्चपुर वाले तो बच गये थे लेकिन ये नहीं बचने वाले।

सामाजिक आर्थिक बहिष्कार पर कानून की अवस्थितिः

एससी-एसटी एक्ट में सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार की स्थिति से निपटने के लिये पर्याप्त व स्पष्ट प्रावधान किये गये हैं। आर्थिक बहिष्कार को परिभाषित करते हुये एक्ट की धारा 2(1)(बीसी) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति के साथ सौदा करने, काम पर रखने व व्यापार आदि करने से इंकार करना आर्थिक बहिष्कार की श्रेणी में आता है। इसके अलावा, करार संबंधी सेवाओं सहित किसी को पैसे के बदले उपलब्ध कराई जाने वाली सेवायें देने से इंकार करना, सामान्य व्यवहार के अनुसार होने वाली अन्य गतिविधियों से इंकार करना तथा ऐसे पेशागत व व्यावसायिक संबंध, जो एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के साथ रखता है, बनाने से मना करना भी आर्थिक बहिष्कार की श्रेणी में आते हैं। एक्ट की धारा 2(1)(इबी) के अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्तियों को प्रदान की जाने वाली या उनसे प्राप्त की जाने वाली किसी परंपरागत सेवा से इंकार करना या किसी के साथ सामाजिक संबंध बनाने से इंकार करना सामाजिक बहिष्कार कहलाता है।

धारा 3(1)(जेडसी) में सामाजिक आर्थिक बहिष्कार के जुर्म की सजा का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है, जो कोई भी गैर अनुसूचित जाति-जनजाति का व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति, एक परिवार व समूह के खिलाफ सामाजिक आर्थिक बहिष्कार का जुर्म करता है या करने की धमकी देता है तो ऐसे व्यक्ति को जुर्माना सहित कम से कम 6 महीने या अधिकतम 5 साल तक की सजा देने का प्रावधान है।

पुलिस की भूमिकाः

जहां तक दलितों पर घटित होने वाली अत्याचार की वारदातों का सम्बन्ध है, अत्याचार के पीड़ितों के प्रति पुलिस की भूमिका बहुत ही नकारात्मक और गैर-जिम्मेदाराना रहती है। सर्वप्रथम तो पुलिस मुकदमा ही दर्ज नहीं करती। यदि मुकदमा दर्ज भी कर लिया जाये, तो पुलिस पीड़ितों पर उच्च जातीय दोषियों के साथ राजीनामा करने के लिये दबाव बनाना शुरू कर देती है। जांच अधिकारी दोषियों को गलत लाभ देने की मंशा से जानबूझ कर गलत जांच करते हैं। एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार जिला कैथल में वर्ष 2013-18 के दौरान दर्ज एसी-एसटी एक्ट के मुकदमों में से 40 प्रतिशत मुकदमे थाना स्तर पर ही रद्द कर दिये गये हैं। छातर गांव में भी जांच दल को पीड़ितों ने बताया है कि वर्ष 2019-21 के दौरान उचाना थाना में 8-9 दलित उत्पीड़न की घटनायें दर्ज हुई थीं जिनको उच्च जाति पंचायत के दबाव व पुलिस की मिलीभगत के कारण रद्द कर दिया गया है।

26/09/2021 को गांव छातर की उच्च जाति पंचायत द्वारा गैर कानूनी तरीके से दलितों का सामाजिक आर्थिक बहिष्कार कर दिया गया था। अनुसूचित जाति के लोगों ने प्रभुत्वशाली जाति पंचायत के खिलाफ थाने में बार बार शिकायत दर्ज करवाई परन्तु 200 दलित परिवारों पर सामाजिक आर्थिक बंदी थोप एससीएसटी एक्ट की धज्जियां उड़ाने वाली उच्च जाति पंचायत के खिलाफ जींद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। स्वयंभू पंचायतियों द्वारा बंदी की घोषणा 26/09/2021 को कर दी गयी थी लेकिन पुलिस द्वारा मुकदमा 13/10/2021 को दर्ज किया गया। इसका क्या मतलब लगाया जाये? यह मुकदमा 17 दिन की देरी से दर्ज किया गया है। जबकि एससी-एसटी एक्ट की धारा 18ए में बिना प्रारम्भिक जांच के ही तुरन्त मुकदमा दर्ज करके दोषियों को जेल मे डालने का प्रावधान है तथा एक्ट के अनुसार जांच अधिकारी द्वारा मुकदमा की जांच में कोताही को दंडनीय अपराध बनाया गया है।

पुलिस ने आधिकारिक रूप से 13/10/2021 को सामाजिक आर्थिक बंदी का गैर कानूनी फरमान सुनाने वाले पूर्व सरपंच ईश्वर सिंह सहित कुल 23 स्वयंभू पंचायतियों – प्रवीण इंसल, राकेश बंसल, अनिल, प्रेम, लीलू, बलवान, साहिल, सोनू, राजसिंह, कृष्ण, प्रदीप, नफिया, नेशू, कालू पंडित, राजेश, कुलदीप, राम मेहर ठेकेदार, सुभाष, सीता, कर्मपाल व ईश्वरके विरुद्ध मुकदमा संख्या 352 थाना उचाना में दर्ज कर लिया है। अभी तक किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

जांच दल ने डीएसपी उचाना से मुलाकात करने की कोशिश की गयी लेकिन वे ऑफिस में हाजिर नहीं थे। उनकी गैर हाजिरी में सब इंस्पेक्टर राम मेहर ने जांच दल के एक सवाल का जवाब देते हुये कहा कि अभी आरोपियों की पहचान की जा रही है। इसके बाद पुलिस कानूनी कार्रवाई करेगी। जांच दल ने मांग की कि जल्द से जल्द दोषियों को गिरफ्तार किया जाये तथा पीड़ित परिवारों को समुचित सुरक्षा मुहैया करवाई जाये ताकि पीड़ित परिवार सुरक्षित महसूस कर सकें। दलित मोहल्ले में नियमित पुलिस पैट्रोलिंग की जाये ताकि उच्च जाति के दबंग लोग अलग अलग तरीकों से अत्याचार न कर सकें।

विरोध की आवाजः

उच्च जातीय पंचायत द्वारा 26 सितंबर को बंदी का ऐलान करने के बाद न्याय की उम्मीद में गुरमीत व गांव के दलित, सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर 28-29-30 सितंबर को डीएसपी व थाना प्रभारी उचाना से मिले। लेकिन पुलिस अधिकारियों द्वारा कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। जब बहुत से दलित अधिकार कार्यकर्ताओं ने सामाजिक आर्थिक बंदी की मार झेल रहे दलित मोहल्ले का दौरा किया और पीड़ितों की आपबीती के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने लगे तो 13 अक्तूबर को मजबूरन 23 उच्च जातीय पंचायतियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करना पड़ा। जिस पर आज तक कोई कारवाई नहीं की गई है।

निष्कर्ष:

इस जांच पड़ताल के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि छातर में उच्च जाति पंचायत द्वारा एक दलित मोहल्ले का पूर्ण रूप से सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार किया हुआ है। यह भी सच है कि छातर गांव में 200 दलित परिवारों का बहिष्कार घिनौने रूप से आज भी जारी है और पूर्व सरपंच ईश्वरसिंह इस अमानवीय कृत्य में प्रमुख भुमिका निभा रहा है। जांच में शामिल सभी मानवाधिकार व सामाजिक संगठन बहिष्कार झेल रहे पीड़ित दलितों के साथ सहानुभूति व एकजुटता प्रकट करते हुये, उच्च जाति पंचायत की इस अमानवीय हरकत की निंदा करते हैं तथा जिला प्रशासन से मांग करते हैं कि बहिष्कार का फरमान जारी करने वाले आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार किया जाये।

ऽ पूर्व सरपंच ईश्वरसिंह सहित सभी आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार किया जाये।
ऽ दलित मोहल्ले पर लगायी गयी तमाम सामाजिक आर्थिक पाबंदियां तुरन्त हटाई जायें।
ऽ बहिष्कार का दंश झेल रहे छातर गांव के 200 दलित परिवारों को एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता तुरन्त प्रदान की जाये। दलितों की मूलभूत आवष्यकतायें पूर्ण करवाई जायें।
ऽ एसी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमों में नामजद दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई नहीं करने वाले दोषी जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय व न्यायिक कार्रवाई की जाये।
ऽ मांगु मोहल्ले में सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जाये। वहां पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाये। असामाजिक तत्वों पर नजर रखी जाये।
ऽ गांव की पंचायती जमीनों में से अनुसूचित जाति के हिस्से की जमीन दलितों को आवंटित की जाये।

उप मंडल मुख्यालय उचाना के सामने जांच दल

हम तमाम मीडियाकर्मियों, न्यायप्रिय संगठनों, मानवाधिकार संगठनों से दलित समुदाय के लिये न्याय की मांग करने और इस मामले की ओर व्यापक जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिये एक साथ आने का आग्रह करते हैं।

जांच दल में शामिल संस्थाओं व व्यक्तियों का विवरणः
छात्र एकता मंच, हरियाणा से मनीशा, नरेश, अंकित, शहजाद व अजय
भगत सिंह छात्र एकता मंच, दिल्ली से रविन्द्र कुमार, लिखिता और हुजैफा खान
क्रांतिकारी युवा संगठन, नरवाना से प्रवीण और कुलदीप
भारतीय मजदूर किसान यूनियन के अध्यक्ष दिलशेर मांडी कलां
संविधान बचाओ मोर्चा से कृष्ण माजरा
राष्ट्रीय मजदूर किसान मंच के टोहाना से साथी धीरज गाबा व पंचकूला से राजेंद्र परोचा
राष्ट्रीय मजदूर मोर्चा से हरपाल सिंह
मानवाधिकार संगठन एनसीएचआरओ से संदीप
मानवाधिकार संगठन एचआरएलएन से राकेश खानपुर, रजनी व मनीशा मशाल
मीडियाकर्मी- आकाशदीप (हरियाणा ब्रेकिंग न्यूज)
सुमेधा (पत्रकार जन आवाज)
उदय (पत्रकार, जनचौक)
सतीष कुमार, सरपंच, ग्राम पंचायत, जमावड़ी हांसी
सोहन लाल यादव, जमावड़ी, हांसी
रमेश कुतुबपुर, दलित अधिकार कार्यकर्ता, कैथल
राजेश कापड़ो, अधिवक्ता, कैथल
सुरेन्द्र बीबीपुर, अधिवक्ता, जींद
राजकुमार तर्कशील, नरवाना

डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा।

सामाजिक बहिष्कार हिंदुओं के हाथ में खतरनाक हथियार है। बहिष्कार को आपराधिक बनाकर ही दलितों को हिंदुओं का दास बनने से बचाया जा सकता है। सामाजिक बहिष्कार पूरे भारत की सच्चाई है, जिसका प्रयोग अनुसूचित जातियों के अलावा अन्य समुदायों पर भी किया जाने लगा है।
-बाबा साहब डॉ. भीम राम अम्बेडकर

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