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जनादेश को अनहुआ करने की युक्तियां

भाजपा ने गुजरात में राज्यसभा की चार में से तीन और मध्य प्रदेश में तीन में से दो सीटें जीत ली हैं। दोनों राज्यों में उसे विपक्षी खेमे में तोड़-फोड़ की हालिया आक्रामकता से एक-एक सीटों का फायदा हुआ है। राजस्थान में नहीं हुआ। वहां उसके दूसरे प्रत्याशी ओंकार सिंह लाखावत को पराजय देखनी पड़ी, जैसे मध्य प्रदेश में कांग्रेस के दूसरे प्रत्याशी फूल सिंह बरैया को। मध्य प्रदेश में तो खेल पहले ही हो चुका था, मार्च में ही। ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कांग्रेस के 22 विधायकों के विद्रोह, कमलनाथ सरकार के पतन और फिर से शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के साथ लॉकडाउन से पहले ही भाजपा का दो सीटें जीतना तय हो चुका था। बल्कि कहते तो यह भी हैं कि इस खेल की खातिर ही 24 मार्च तक लॉकडाउन मुल्तवी रहा।

यह खेल न होता तो कांग्रेस और भाजपा – दोनों ही केवल एक-एक सीटें जीतने को लेकर आश्वस्त हो सकती थी। भाजपा को मिली दूसरी सीट मार्च के इस खेल का बोनस है, असली मकसद तो नवम्बर 2018 के राज्य विधानसभा चुनावों में मिले जनादेश का सब्वर्शन, उसका विध्वंस ही था – ठीक वैसे, जैसे कर्नाटक में मई 2018 के चुनावों के बाद सत्तारुढ़ कांग्रेस- जनता दल (एस) के 15 विधायकों के इस्तीफे के बाद हुआ था। राज्य सभा के इन चुनावों में भाजपा को कर्नाटक में उसका लाभ नहीं मिला। लक्ष्य यह था भी नहीं। विधानसभा चुनावों में 224 सीटों वाले सदन में भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और यह राज्य सभा के इन चुनावों में दो सीटें जीतने के लिये काफी था। उसके दो ही प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित भी हुये और सत्ता से बाहर होने के बाद भी कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे और जद (एस) के शीर्ष नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा ऊपरी सदन में पहुंचने में कामयाब रहे।

गुजरात के मुख्यमंत्री रूपानी वोट डालते हुए।

गुजरात में जरूर कामयाबी बड़ी है – केवल तीन सीट जीतने के कारण नहीं, बल्कि भरत सिंह सोलंकी को हराने के कारण भी। दिसम्बर 2017 के चुनाव नतीजों के आधार पर तो गुजरात में भी भाजपा दो ही सीटें जीत पाती। आखिर अभी मार्च तक कांग्रेस के 73 विधायक तो थे ही कांग्रेस के पास और एन.सी.पी. के एकमात्र विधायक और निर्दलीय जिग्नेश मेवानी के तयशुदा समर्थन के साथ 2 सीटें जीतना उसके लिये मुश्किल नहीं था। लेकिन पहले 26 मार्च और फिर 19 जून से पहले कांग्रेस के कुल 8 विधायकों के इस्तीफे ने राज्यसभा चुनावों का गणित बदल दिया।

रही सही कसर कैबिनेट मंत्री भूपेन्दर सिंह चुडास्मा के मतदान और ट्राइबल पार्टी के विधायक पिता-पुत्र छोटू भाई वसावा और सुरेन्द्र के ‘एब्सटेंशन’ ने पूरी कर दी। अहमदाबाद हाईकोर्ट ने अभी पिछले ही महीने ‘मालप्रैक्टिस और मैनीपुलेशन’ के जुर्म में चुडास्मा का निर्वाचन रद्द कर दिया था और इस आदेश के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। शायद अकेले गुजरात है, जहां विपक्षी दलों में तोड़-फोड़ का सबब सत्ता परिवर्तन नहीं, राज्यसभा चुनाव भी होता है।

यह जो नयी भाजपा है, उसके लिये लॉकडाउन काल में देश भर में सड़कों पर करोड़ों प्रवासी मजदूरों-कामगारों की दुर्दशा शर्मनाक नहीं होती, खुद गुजरात में कोरोना संक्रमित लोगों की अत्यधिक उच्च दर भी शर्मनाक नहीं होती, पर राज्य में छोटी से छोटी राजनीतिक या कहें चुनावी हार शर्मनाक होती है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की राज्यसभा चुनावों में हार सुनिश्चित करने के लिये यों ही सारे घोड़े नहीं खोल दिये थे। वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस छोड़ दी थी और उनके खासमखास दो विधायकों राघवजी पटेल और भोलाभाई गोहेल ने पार्टी से विद्रोह कर भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान भी कर दिया था।

गुजरात में बीजेपी के एक विधायक को स्ट्रेचर पर वोट के लिए ले जाते लोग।

अगर अहमद पटेल के सतर्क चुनाव एजेंट ने राघवजी और भोलाभाई पर अपना वोट भाजपा को दिखाने के असंवैधानिक कृत्य का आरोप लगाकर पूरी प्रक्रिया बाधित नहीं कर दी होती तो उनकी हार तय ही थी। लेकिन तब केन्द्रीय सत्ता पर नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा केवल दो-ढाई साल पुरानी थी और पतन की रपटीली राह पर संवैधानिक निकायों की दौड़ अभी शुरुआती चरण में ही थी। सो सात-साढ़े सात घंटे की कानूनी उठा-पटक के बाद आखिरकार चुनाव आयोग ने दोनो विद्रोही विधायकों का वोट रद्द कर, अहमद पटेल को विजयी घोषित कर दिया था।

इत्तफाक कि अभी हाल में जब राजस्थान सरकार के चीफ ह्विप महेश जोशी डीजीपी, एंटी-करप्शन ब्यूरो को जाने-पहचाने लोगों पर, सरकार गिराने के लिये कांग्रेसी और निर्दलीय विधायकों को प्रलोभन देने का आरोप लगा रहे थे, उसी समय मध्य प्रदेश में सीएम शिवराज सिंह चौहान का एक ऑडियो टेप वायरल था, जिसमें वह इंदौर रेसीडेंसी में सांवेर विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुये कह रहे थे कि ‘केंद्रीय नेतृत्व ने तय किया कि सरकार गिरनी चाहिए। …. आप बताओ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और तुलसी भाई के बिना सरकार गिर सकती थी क्या‌?’ सांवेर वही क्षेत्र है, जहां से ज्योतिरादित्य समर्थक तुलसीराम सिलावट कांग्रेस के टिकट पर जीत कर कमलनाथ सरकार में मंत्री बने थे। वह 10 मार्च को असेम्बली से इस्तीफा देने वालों में एक थे, अब शिवराज सरकार में मंत्री हैं और अगर उपचुनाव हुये तो अब उन्हें भाजपा के टिकट पर असेम्बली पहुंचने-पहुंचाने की चुनौती होगी। पता नहीं, वह बेंगलुरु में येदुरप्पा सरकार की मजबूत किलेबंदी में आराम फरमाने वाले कांग्रेसी विधायकों में शामिल थे या नहीं, पर बेंगलुरु तो अब है।

अब का आशय यह कि विपक्ष और आम तौर पर कांग्रेस के विद्रोही विधायक अब बेंगलुरु में सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। पिछले साल जुलाई में कर्नाटक में येदुरप्पा की सत्ता नहीं थी, तो यह शरण-स्थली भी नहीं थी। तब स्वयं कर्नाटक में सत्तारुढ़ कांग्रेस- जनता दल (एस) गठबंधन के 15 विधायकों को मुम्बई में शरण लेनी पड़ी थी – देवेन्द्र फडणवीस के महाराष्ट्र में। मई 2018 के चुनावों में 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी तो भाजपा ही थी। कांग्रेस 80 और जनता दल-एस 37 के साथ आ जाने पर भी बीएस येदुरप्पा ने सीएम की शपथ भी ले ली थी, और राज्यपाल वाजूभाई वाला ने उन्हें विश्वास मत साबित करने या जुटा लेने के लिये 15 दिन का वक्त भी दे दिया था। पर फिर सुप्रीम कोर्ट की दखल।

शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी कांग्रेस के नेता और प्रत्याशी।

बहुमत बनाने का पर्याप्त वक्त नहीं मिल पाने से येदुरप्पा सरकार को आखिरकार केवल तीन दिन में इस्तीफा देना पड़ा था, वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की तमाम सदिच्छाओं के बावजूद पिछले साल के अंत में फडनवीस सरकार का प्रयोग केवल तीन दिन में फेल हो गया था। फिर सत्ता के लिये येदुरप्पा को करीब 10 महीने प्रतीक्षा करनी पड़ी – तब तक, जब तक कि 15 विधायकों के इस्तीफे से विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या कम कर 104 को पूर्ण बहुमत में नहीं बदल दिया गया। लक्ष्य जनादेश को सबवर्ट करना था और वह हुआ भी, वैसे ही जैसे अभी मध्य प्रदेश में हुआ। अन्ततः एचडी कुमारस्वामी की गठबंधन सरकार गिर गयी और बीएस येदुरप्पा की अगुआई में फिर भाजपा सरकार बन गयी। अब तो खैर, उस विद्रोह से खाली हुई सीटों पर उपचुनावों में 15 में से 12 सीटों पर जीत कर येदुरप्पा सरकार 224 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में 116 सदस्यों के साथ बहुमत को पुख्ता भी कर चुकी है।

तो बागियों को अब मुम्बई जाने की कोई मजबूरी नहीं। वह सुरक्षित आशियाना रहा भी नहीं, पर बेंगलुरु तो अब तक बदस्तूर है। सरजापुर-ह्वाइटफील्ड टेक कॉरीडोर के वे बंगले भी होंगे ही, जहां पिछले मार्च में ही ज्योतिरादित्य-समर्थक 10 कांग्रेसी विधायकों को ले जाकर सुरक्षित रखा गया था। और बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने माना नहीं, और जनवरी के अंतिम हफ्ते में कई राज्यों में कोरोना की दस्तक के बावजूद वह पहले ‘नमस्ते ट्रम्प’ और फिर ऑपरेशन एमपी में व्यस्त रहा, ये और बात है, पर तब तो पैर पसारते कोरोना संक्रमाण को थाम लेने की जिम्मेदारी भी थी। अब तो कोरोना संक्रमण से बचाने की कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। वह तो पर्याप्त फैल चुका है। चार लाख से कुछ अधिक संक्रमितों के साथ हम दुनिया में शायद चौथी पायदान पर पहुंच चुके हैं और मौतों के लिहाज से आठवीं पर। और आत्मनिर्भर होने की मसीहाई घुट्टी देकर इस सब से पल्ला भी झाड़ा जा चुका है।

प्रयोग तो दो और भी किये गये – एक तो बिहार में और दूसरे, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में। ‘बिहार एक्सपेरिमेंट’ पर अमल की तो गुंजाइशें ही अत्यल्प हैं, जहां भाजपा के साथ मई 2014 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 40 में से 31 सीटें जीत लेने के बमुश्किल छह महीने बाद 243 सदस्यों वाली प्रदेश विधानसभा के चुनावों में नीतीश कुमार के जनता दल (यू) ने राज्य विधानसभा के चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महा गठबंधन बनाकर भाजपा को 53 और उसकी अगुआई वाली एनडीए को 58 पर समेट दिया था। महागठबंधन ने 178 सीटें जीत ली थी और नीतीश फिर सीएम। लेकिन केवल 20 महीने बाद नीतीश अपनी पूरी पार्टी लेकर भाजपा से जा मिले थे और जुलाई 2017 में जनादेश को दुरुस्त कर दिया गया था।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ वोट डालने के लिए जाते हुए।

और उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में, आप जानते हैं, जनादेश के अपहरण के प्रयोगों को सुप्रीम कोर्ट ने ही नाकाम कर दिया था। उत्तराखंड में तो हुआ यह कि विधानसभा के बजट सत्र में विनियोग विधेयक ध्वनिमत से पारित होते ही सत्तारुढ़ कांग्रेस के नौ विधायक, मत विभाजन की भाजपा की मांग के साथ हो गये और स्पीकर ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। यह 18 मार्च, 2016 की बात थी। अगले दिन राज्यपाल केके पॉल ने उन्हें 28 मार्च को सदन में विश्वास मत लेने का निर्देश दिया। इसी बीच, विद्रोही विधायकों को रिश्वत देने की पेशकश करते हुये तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक रीजनल चैनल के संपादक-पत्रकार उमेश कुमार का स्टिंग वायरल हुआ और विश्वास मत लेने का मौका दिये बिना एक दिन पहले ही, राज्यपाल की सिफारिश पर उन्हें बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। प्रसंगवश ये वही उमेश कुमार हैं, जिन्हें 2017 के चुनावों में जीत के साथ बनी भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का ‘स्टिंग कर सरकार के लिये राजनीतिक संकट पैदा करने की कोशिश करने के आरोप में’ 28 अक्टूबर 2018 को देहरादून में गिरफ्तार कर लिया गया था।

बहरहाल, अप्रैल के अंतिम सप्ताह में उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ और न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की पीठ ने राष्ट्रपति शासन को रद्द कर दिया और फिर मई के दूसरे सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसके इस आदेश का अनुमोदन कर दिया। कम से कम जस्टिस जोसफ को ‘राष्ट्रपति राजा नहीं है और उससे भी भारी गलती हो सकती है’ की टिप्पणी के साथ राष्ट्रपति राज खत्म कर देने के फैसले का खामियाजा भी भुगतना पड़ा और जब कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिये उनके नाम की सिफारिश की तो केन्द्र ने पहले कई हफ्ते इस पर चुप्पी साधे रखी, फिर उसे पुनर्विचार के लिये कॉलेजियम को वापस कर दिया और अंत में उनकी नियुक्ति भी हुई तो सीनियॉरिटी के एक बड़े पेंच के साथ।

बावजूद इसके, जब अरुणाचल प्रदेश में नवम्बर 2015 में मुख्यमंत्री नाबाम तुकी की सरकार के खिलाफ सत्तारुढ़ कांग्रेस के 21 विधायकों के विद्रोह को देखते हुए उनसे राय मशविरे के बिना विधानसभा का सत्र 14 जनवरी 2016 की बजाय 16 दिसम्बर 2015 को ही बुला लेने के राज्यपाल जेपी राजखोवा के फैसले और सदन को नाबाम रेबिया के स्थान पर किसी अन्य को स्पीकर चुनने के उनके निर्देश, राज्यपाल के आदेश के अनुसार मेकशिफ्ट सदन में सत्र बुलाकर रेबिया पर महाभियोग लगाये जाने और अगले ही दिन तुकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास करने और तुकी सरकार में मंत्री रहे कालिखो पुल को कांग्रेस के 20 विद्रोही और भाजपा के 11 विधायकों के दल का नेता चुन लिये जाने, राजनीतिक उथल-पुथल के मद्देनजर 24 जनवरी 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिये जाने और 19 फरवरी को अंततः कालिखो पुल की सरकार के गठन का मामला जस्टिस जेएस खेहर की संविधान पीठ के विचारार्थ पहुंचा तो पीठ ने एक राय से राज्यपाल के सभी आदेशों को असंवैधानिक, कालिखो पुल सरकार को अवैध और राज्य में 15 दिसम्बर 2015 की स्थिति बहाल करने का आदेश दे दिया। ये और बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब ये फैसले दिये, तब केन्द्र में मोदी सरकार को बमुश्किल दो साल हुये होंगे।

मेघालय, गोवा और मणिपुर के ‘एक्सपेरिमेंट्स’ को हद से हद कर्नाटक-मध्य प्रदेश तजुर्बे का विस्तार माना जा सकता है, इस मामूली बदलाव के साथ कि इन्हें ठीक चुनाव नतीजों के बाद अंजाम दिया गया, कांग्रेस को आउटविट करते हुये, जबकि इन तीनों राज्यों में वही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। ऐसे में जिन प्रयोगों को दुहराया जा सकता है, वे कर्नाटक-मध्य प्रदेश के ही प्रयोग हैं। राजस्थान में तो यह संभव भी है। वहां भी सचिन पायलट कुछ खास संतुष्ट तो नहीं होंगे, वैसे ही जैसे मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया। डिप्टी सीएम ही तो हैं, दावा तो मुख्यमंत्री होने का था। ज्योतिरादित्य की ही तरह। बल्कि राजस्थान की 200 सदस्यों वाली असेम्बली में अपने दम बहुमत पा लेने के बाद ही उन्हें सीएम बनाने के लिये कांग्रेस आलाकमान पर दबाव डालने के लिये उनके समर्थकों ने बाकायदा प्रदर्शन भी किया था।

एमपी में बसों में सवार बीजेपी के विधायक ।

अपने मन से किया होगा, स्वतःस्फूर्त – यह समझना बेवकूफी होगी। बेवकूफी कहना सख्त लगे तो भोलापन कह लें। प्रदर्शन करनेवाले आखिर सचिन के अपने ही लोग तो रहे होंगे, सचिन के खास, जैसे ज्योतिरादित्य के अपने खास लोग थे। वैसे ही थोड़े राहुल गांधी को दिसम्बर 2018 में अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार अशोक गहलोत को राज्य की कमान सौंपने से पहले कई-कई दिन मगजपच्ची करनी पड़ी थी। बहुत सारी समझाइश और बैकरूम मेनुएवरिंग भी। तब वह पार्टी अध्यक्ष थे और छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश की ही तरह राजस्थान के भी नव-निर्वाचित विधायकों ने नेता के नाम का अंतिम फैसला करने के लिये उन्हें अधिकृत कर दिया था।

राजनीति में ये जो घोड़ों की खरीद-फरोख्त होती है, ये कोई नयी परिघटना नहीं है। पहले भी होती थी। बस पहले वफादारियां बदलने का एक मौसम होता था। आप चाहिये तो विचारधारा और वैचारिक निष्ठाएं बदलने का मौसम भी कह सकते हैं और यह चुनावों के आसपास बहुतायत में होता था। नयी राजनीति में सत्ता और शक्ति का संचय और बरखिलाफ गये हर जनादेश को अनहुआ कर देने की नित नूतन युक्तियों का एक्सपेरिमेंटेशन भी एक सतत प्रक्रिया है। निष्ठाएं बदलने के लिये मंत्री, मंत्रालय और नाम पहले भी दिये जाते थे। नया बस ये है कि नाम दसियों लाख से पचासों-सैकड़ों करोड़ तक पहुंच गये हैं। इलेक्टोरल बांड्स का खेल तो जनवरी 2018 में शुरु हुआ, कहते हैं कि नोटबंदी के बाद ही इतनी औकात केवल बीजेपी की बच गयी थी।

आखिर जब नोटबंदी ने हर कैपिटल-इन्टेंसिव काम पर लगभग ब्रेक लगा दिया था, तब अगस्त 2016 से फरवरी 2017 के बीच केवल 18 महीने के रिकार्ड समय में भाजपा ने दिल्ली में डेढ़-पौने दो लाख स्क्वैयर फीट का छह-सात सौ करोड़ रुपये का विशाल मुख्यालय बनाया ही था- एक वक्त के चाणक्य, तब के अध्यक्ष जी और इस समय के सरदार पटेल साहब के अनुसार अपने विस्तार में दुनिया भर की तमाम राजनीतिक पार्टियों के हेडक्वार्टरों में नंबर एक। फिर ‘कैचन्यूज डॉट कॉम’ ने 25 नवम्बर 2016 को बिहार के भाजपा विधायक संजीव चौरसिया के हवाले से ‘नवम्बर के पहले सप्ताह तक कई्र जगह कई एकड़ जमीन खरीदे जाने’ की खबर भी दी थी।

कोरोना के सारे एहतियातों को धता बताते हुए जीत का जश्न।

और विपक्षी तो विपक्षी, नोटबंदी से 24 घंटे पहले बंगाल में 2.5 करोड़ रुपये जमा कराने, राजस्थान से भी इसी तरह की खबरें आने और बिहार के दसियों जिलों में जमीनों की खरीद का जिक्र करते हुये खुद जनता दल यू के प्रवक्ता केसी त्यागी तक ने उसी दिन कहा था कि अगर पीएम स्वयं इस पर स्पष्टीकरण नहीं देंगे तो वे उच्च-स्तरीय जांच की मांग करेंगे। ये और बात है कि पीएम ने सफाई नहीं ही दी और छह-सात महीने बाद ही केसी त्यागी की पार्टी ने बीजेपी के साथ सरकार बना ली।

तब क्या राज्यसभा चुनावों के सम्पन्न हो जाने पर भी खेल चालू रहेगा और निशाने पर अब राजस्थान होगा? संभव है, महाराष्ट्र भी। वहां तो शिवसेना के साथ चौथाई सदी का साथ भी रहा है। फिर गोवा जैसे राज्यों में तो कांग्रेस ने साबित भी किया है कि ऐसे मामलों में वह अपेक्षाकृत सुस्त है और मूर्ख भी, जैसे औरंगजेब के तीनों भाई। इब्ने इंशा ने ‘उर्दू की आखिरी किताब’ में औरंगजेब का जिक्र करते हुए कहा है कि ‘उसने अपने भाइयों – दारा, शूजा और मुराद का कत्ल करवाकर सल्तनत पाई। उसके तीनों भाई जाहिल थे वरना पहले पहल कर औरंगजेब का ही कत्ल नहीं करवा देते!’

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूएनआई में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)

This post was last modified on June 21, 2020 5:18 pm

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