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प्रशांत अवमानना मामला: पूर्व चीफ जस्टिस लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा- ऐसी भी क्या जल्दी थी?

सुप्रीम कोर्ट को लेकर ट्वीट करने के मामले में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को दोषी करार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दूसरी सुनवाई के बाद कहा कि प्रशांत भूषण ने अदालत की अवमानना की है। उनकी सजा पर 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई होनी है। प्रशांत भूषण ने अपने एफिडेविट में सुप्रीम कोर्ट के कई सीजेआई पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

इसके लिए उन्होंने कई केसों का जिक्र भी किया था। उन पर अवमानना के मामले का पहले ही काफी विरोध हो रहा था, लेकिन अब दोषी करार दिए जाने के बाद इसकी चतुर्दिक आलोचना हो रही है। भारत के पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने सवाल किया है कि एक महामारी के बीच एक आभासी अदालत के माध्यम से प्रशांत भूषण के खिलाफ मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इतनी जल्दी क्यों की ।

पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा है कि यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि इस तरह का मामला एक महामारी के दौरान उठाया गया है और जब अदालत में शारीरिक सुनवाई नहीं हो रही है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला तब उठाया जा सकता था जब अदालत भौतिक सुनवाई फिर से शुरू कर देती। यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाला है।
फैसले पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि अदालत द्वारा अवमानना की शक्ति के इस्तेमाल में यह भी जांचा जाना चाहिए कि इस मामले के जरिये कैसे उसके अधिकार को कम कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय अदालत के खुद के लिए न्यायोचित नहीं है। क्योंकि इसमें अदालत का अधिकार महज दो ट्वीट के जरिये आंका गया है। जनता का भरोसा और अदालत का अधिकार उससे अधिक मजबूत नींव पर टिका है।

विपक्षी दलों ने उस बात पर सवाल उठाया, जिसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना के लिए दोषी ठहराया था, जबकि संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने और कश्मीर में राजनीतिक नेताओं के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के मामले एक साल से अधिक समय से लंबित हैं।

सीपीआई-एम के महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट्स की एक श्रृंखला में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला खतरनाक है। उन्होंने कहा कि यह एक संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निभाई गई भूमिका की समकालीनता, द्वंद्वात्मक आलोचना के दायरे में लाता है। यह अपने दायरे में, अपने वर्तमान कामकाज और दृष्टिकोण की वास्तविक आलोचना भी लाता है। येचुरी ने प्रशांत भूषण पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चिंताजनक बताया।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि प्रशांत भूषण के ट्वीट्स की पूरी रूपरेखा से कोई सहमत है या नहीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इसके लिए उन्हें दोषी ठहराया जाना काफी चिंताजनक है। ये सुप्रीम कोर्ट जो कि एक संवैधानिक अथॉरिटी है उसके काम को लेकर की गई आलोचना के संवैधानिक अधिकार को भी अवमानना की सीमा में लाता है। उन्होंने ये भी कहा कि ऐसे फैसलों से भारत का लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।

सीपीआई महासचिव डी राजा ने आश्चर्य व्यक्त किया कि सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उच्चतम न्यायालय के कामकाज पर सवाल उठाया, तो क्या वह भी अवमानना थी? जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, तब आरक्षण कानूनों को कमजोर किया जा रहा था।

एनसीपी नेता और एक वरिष्ठ वकील मजीद मेमन ने ट्वीट किया कि न्यायालयों और न्यायाधीशों को घोटाले से बचाने के लिए 1971 के अधिनियम की अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है क्योंकि यह सर्वोच्च और अंतिम अदालत है, इसलिए नहीं कि यह अचूक है या गलत नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस के सांसद महुआ मोइत्रा ने एससी पर निर्देशित एक ट्वीट में पूछा कि सीएए, 370 और हैबियस कॉर्पस याचिकाओं जैसे मुद्दे महीनों के लिए खराब होने पर आपकी शक्ति और ऐसे त्वरित निपटान के योग्य नहीं हैं?

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि प्रशांत भूषण पर अवमानना का जो आदेश आया है, उस पर अगर हम कुछ कह सकते हैं तो ये कि एक महान संस्थान खुद को नीचा दिखा रहा है।

इतिहासकार पुष्पेश पंत ने भी प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्विटर पर इसे एक भयानक फैसला बताया। उन्होंने लिखा, प्रशांत भूषण के खिलाफ कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट को लेकर जो आतंकित कर देने वाला फैसला आया है। उसके बाद तमिल फिल्म ‘मैं चुप रहूंगी’ का हिंदी रीमेक बनाया जा सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कानून को चुनौती देने वाले एन राम ने इस फैसले को लेकर कहा कि ये हमारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के लिए एक काला दिन है, जो हमारे लोकतांत्रिक संविधान और आज़ादी के संघर्ष की देन है।

प्रशांत भूषण के खिलाफ जारी इन मामलों को लेकर स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव पहले से ही सवाल उठाते आए हैं। लेकिन जब कोर्ट की तरफ से प्रशांत भूषण को दोषी करार दिया गया तो योगेंद्र यादव ने ट्विटर पर लिखा है कि ये तो होना ही था। इसके अलावा उन्होंने एक दूसरे ट्वीट में नाट्यकर्मी मंजुल भारद्वाज के हवाले से लिखा है कि ‘प्रशांत भूषण सुनो! सत्य सूली पर चढ़ेगा, यह सुकरात काल है ! जिनके न्याय के लिए लड़ रहे हो। वो विकास के लिए खामोश रहेंगे। मुर्दा समाज बोलता नहीं है’!

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी इस मामले को लेकर ट्विटर पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे खुद का कद नीचे किया है। उन्होंने लिखा है कि इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और लोकतंत्र को नीचा दिखाया है। ये भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है।

जाने माने इतिहासकार इरफान हबीब ने प्रशांत भूषण को दोषी ठहराए जाने की तुलना ब्रिटिश हुकूमत से की। उन्होंने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्रता दिवस की शाम को प्रशांत भूषण को दोषी करार दिया। मुझे नहीं लगता है कि ब्रिटिश काल में भी किसी विरोध या आलोचना करने वाले वकीलों, कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों को इस तरह सजा दी गई हो।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on August 15, 2020 10:56 am

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