क्या कहती है अडानी पर ‘हिंडनबर्ग रिपोर्ट’?

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आज हम अपनी दो साल की जांच के निष्कर्षों को, सबूतों के साथ पेश कर रहे हैं कि कैसे भारत का अडानी समूह पिछले कई दशकों से स्टॉक और अकाउंट धोखाधड़ी की मदद से 17.8 ट्रिलियन रुपये (218 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के हेरफेर में लिप्त है।

अडानी समूह के संस्थापक और अध्यक्ष, गौतम अडानी ने मोटे तौर पर 120 बिलियन डॉलर का मुनाफा अर्जित किया है, जो पिछले 3 वर्षों में 100 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। समूह की 7 प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के स्टॉक वैल्यू में 819% की वृद्धि की है।

हमने अपने इस शोध में अडानी समूह के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों सहित दर्जनों व्यक्तियों के साथ बात की, हजारों दस्तावेजों की समीक्षा की और लगभग आधा दर्जन देशों का दौरा किया है। 

अगर आप हमारी जांच के निष्कर्षों को नजरअंदाज करते हैं और अडानी समूह द्वारा दिए गए वित्तीय आंकड़ों को सही मान भी लेते हैं फिर भी आप इसकी 7 प्रमुख कंपनियों के शेयर के दामों में आई अचानक और अभूतपूर्व तेजी से इनकार नहीं कर सकते। 

अडानी की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों ने एक बड़ी मात्रा में ऋण लिया है जिसमें ऋण के लिए अपने बढ़े हुए स्टॉक के शेयरों को गिरवी रखा गया है। ऐसे में पूरे समूह को अनिश्चित वित्तीय स्थिति (precarious financial footing) में डाल दिया गया है। स्टॉक मार्किट में अडानी समूह 7 प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों में से 5 में ‘वर्तमान अनुपात'( Current Ratio) 1 के नीचे है। यह किसी भी समूह के Near liquidity (वित्तीय संकट) को दर्शाता है।

अडानी समूह के शीर्ष 22 पदों में 8 पदों पर अडानी परिवार के सदस्य हैं, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो पूरे समूह की वित्तीय बागडोर कुछ मुठ्ठी भर लोगों के हाथों में है जो एक ही परिवार के सदस्य हैं। हमसे बात करते हुए समूह के एक पूर्व कार्यकारी ने अडानी समूह को “एक पारिवारिक व्यवसाय” के रूप में वर्णित किया।

अडानी समूह पर अब तक अनुमानित रूप से 17 बिलियन अमेरिकी डॉलर के मनी लॉन्ड्रिंग, करदाताओं के धन की चोरी और भ्रष्टाचार के मामले में जुड़े चार धोखाधड़ी के आरोप लग चुके हैं और समूह सरकारी जांच के दायरे में रहा है।अडानी परिवार के सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से मॉरीशस, यूएई और कैरेबियन द्वीप समूह जैसे टैक्स-हेवन ऑफशोर शेल संस्थाओं को बनाने में सहयोग किया, नकली/अवैध कारोबार उत्पन्न किये और इनकी मदद से अपनी सूचीबद्ध कंपनियों में हेराफेरी से पैसा निकालने के लिए जाली आयात/निर्यात दस्तावेज तैयार किए।

गौतम अडानी के छोटे भाई, राजेश अडानी पर राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) द्वारा 2004-2005 के आस-पास हीरा व्यापार आयात/निर्यात योजना में केंद्रीय भूमिका निभाने का आरोप लगा था। केवल यही नहीं जालसाजी और कर धोखाधड़ी के अलग-अलग आरोपों में राजेश को कम से कम दो बार गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें अडानी समूह के प्रबंध निदेशक के रूप में पदोन्नत किया गया।

गौतम अडानी के बहनोई, समीर वोरा पर राजस्व खुफिया निदेशालय DRI द्वारा उसी हीरा व्यापार घोटाले के सरगना होने और नियामकों को बार-बार झूठे बयान देने का आरोप लगाया गया था। बाद में उन्हें  अडानी ऑस्ट्रेलिया डिवीजन के कार्यकारी निदेशक के रूप में पदोन्नत किया गया।

गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी को मीडिया द्वारा “एक मायावी व्यक्ति” (an elusive figure) के रूप में वर्णित किया गया है। विनोद अडानी कई बार सरकार की जांच के घेरे में आ चुके हैं। उन पर  कथित रूप से ऑफशोर शेल कम्पनियों की मदद से वित्तीय घोटाले करने के आरोप लग चुके हैं । 

हमने अपने शोध के लिए पूरे मॉरीशस कॉर्पोरेट रजिस्ट्री को डाउनलोड किया, उनको सिलसिलेवार और सूचीबद्ध कर पाया कि विनोद अडानी और उनके कई करीबी सहयोगी ऑफशोर शेल संस्थाओं की एक विशाल भूलभुलैया का संचालन/प्रबंधन करते हैं।

हमने विनोद अडानी या करीबी सहयोगियों द्वारा नियंत्रित मॉरीशस की 38 शेल संस्थाओं की पहचान की है। इसके अलावा हमने साइप्रस, यूएई, सिंगापुर और कई कैरिबियाई द्वीपों में विनोद अडानी द्वारा गुप्त रूप से नियंत्रित ऑफशोर शेल संस्थाओं की भी पहचान की है।

हमने विनोद अडानी या करीबी सहयोगियों द्वारा नियंत्रित 38 मॉरीशस शेल संस्थाओं की पहचान की है। हमने ऐसी संस्थाओं की पहचान की है जो साइप्रस, यूएई, सिंगापुर और कई कैरिबियाई द्वीपों से परिचालित हैं और जो विनोद अडानी द्वारा गुप्त रूप से नियंत्रित हैं।

यद्यपि हमें विनोद अडानी से जुड़ी कई संस्थाओं के संचालन के कोई स्पष्ट सबूत  जैसे किसी कर्मचारी का नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल आईडी वगैरह नहीं मिले हैं परन्तु इसके बावजूद, हमें इस बात के सबूत मिले हैं कि उन्होंने अरबों डॉलर भारत में अडानी के सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध और निजी संस्थाओं में स्थानांतरित किए हैं। केवल यही नहीं इस लेन देन के बारे में कभी भी आवश्यक दस्तावेजों को देना जरूरी नहीं समझा गया। 

हमने अपने शोध में पाया कि कुछ शेल कम्पनियों के वास्तविक परिचय को छिपाने/ढकने के प्रयास किए गए। उदाहरण के लिए, विनोद अदानी से जुड़ी संस्थाओं के लिए 13 वेबसाइटें बनाई गईं। इनमें से कई संदिग्ध रूप से एक ही दिन में बनाए गए थे। इन वेबसाइट में केवल स्टॉक से जुड़े फोटो थे। न किसी कर्मचारी का नाम था और न ही कोई और जानकारी थी। व्यवसाय के प्रकृति के बारे में “विदेश में खपत” और “वाणिज्यिक उपस्थिति” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था जिसका कोई अर्थ नहीं बनता ।

ऐसा लगता है कि विनोद अडानी अपने इन गुप्त ऑफशोर शेल कंपनी के पैसे की मनी लॉन्ड्रिंग कर स्टॉक पार्किंग / स्टॉक हेरफेर करते रहे हैं और इस तरह से समूह के भारत में सूचीबद्ध कंपनियों की बैलेंस शीट की अनियमितता को ठीक करते रहे हैं जिससे बाजार में समूह की वित्तीय साख बनी रहे।  

भारत में सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियां उन नियमों के अधीन हैं जिनके लिए सभी प्रमोटर होल्डिंग्स (यूएस में इनसाइडर होल्डिंग्स के रूप में जाना जाता है) का खुलासा किया जाना आवश्यक है। नियमों के अनुसार यह भी आवश्यक है कि हेरफेर और अंदरूनी व्यापार को कम करने के लिए सूचीबद्ध कंपनियों के पास गैर-प्रवर्तकों ( नॉन प्रोमोटर) के पास कम से कम 25% फ्लोट हो। अडानी की सूचीबद्ध कंपनियों में से कम्पनियां इन नियमों को न मानने के चलते आज डीलिस्टिंग सीमा के कगार पर हैं।

हमारा शोध इंगित करता है कि अडानी समूह से जुड़े ऑफशोर कंपनी और फंड में अडानी स्टॉक के सबसे बड़े “सार्वजनिक” (नॉन प्रोमोटर) शामिल हैं। भारतीय प्रतिभूति नियामक (सेबी) के नियमों के अनुसार यह गैरकानूनी है और इस आरोप के सही पाए जाने पर कंपनी को डीलिस्टिंग किया जा सकता है ।

हमने अपने शोध में अडानी समूह के कथित “पब्लिक” फंड में कई अनियमितताओं को पाया इनमें कई “पब्लिक” फंड दरअसल मॉरीशस या किसी दूसरे देशों में ऑफशोर शेल कम्पनियां थीं। इनमें कई कंपनियों के वास्तविक मालिक का नाम छिपा दिया गया और उसकी जगह कुछ नामांकित निदेशकों के नाम दिए गए। 

हमें सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मिली कि अडानी समूह द्वारा धड़ल्ले से ऑफशोर शेल कंपनियों के कामकाज पर समय-समय पर न केवल जांच एजेंसियों बल्कि पिछले डेढ़ साल से संसद में भी सवाल उठाये गए हैं।एलारा एक ऑफशोर फंड है। इसके एक पूर्व ट्रेडर ने हमें बताया कि इस ऑफशोर फंड के पास अडानी के शेयरों की लगभग 3 बिलियन डॉलर की कंसन्ट्रेटेड होल्डिंग है। ऐसे ही एक दूसरे ऑफशोर फंड में अडानी के शेयरों में -99% केंद्रित है। जाहिर है यह ऑफशोर फंड अडानी शेयरों को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने बताया कि इन ऑफशोर फंड की मदद से असली मालिक की पहचान को छिपाया जाता है।

लीक हुए ईमेल से पता चलता है कि एलारा के सीईओ धर्मेश दोशी के साथ सौदों पर काम करते थे। पेशे से अकाउंटेंट धर्मेश दोशी एक भगोड़ा है। कभी यह केतन पारेख नामक एक कुख्यात दलाल के साथ स्टॉक हेरफेर का काम करता था। ईमेल से पता चलता है कि एलारा के सीईओ ने दोशी के साथ स्टॉक डील पर काम किया था। किसी तरह से वह गिरफ्तारी से बच गया था और उसके बाद वह अब भगोड़े के रूप में जाना जाता था।

Legal Entity Identifier (एलईआई) और Indian exchange data ( आईईडी) , मॉन्टेरोसा इन्वेस्टमेंट होल्डिंग्स नामक एक अन्य फर्म पांच स्वतंत्र फंडों को नियंत्रित करती है। इन पांच फंड के INR 360 बिलियन (4।5 बिलियन डॉलर) अडानी समूह के सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में लगे हैं ।

मॉन्टेरोसा के अध्यक्ष और सीईओ ने एक भगोड़े हीरा व्यापारी के साथ 3 कंपनियों में निदेशक के रूप में काम किया, जिसने कथित तौर पर भारत से भागने से पहले 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर चुरा लिए थे। विनोद अडानी की बेटी ने उसी भगोड़े हीरा व्यापारी के बेटे से शादी की।

कॉर्पोरेट रिकॉर्ड के अनुसार, कभी अडानी से जुड़े इकाई ने मॉन्टेरोसा फंड में से एक में भारी निवेश किया। यह निवेश अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी पावर में होना था। यह निवेश अडानी समूह और संदिग्ध ऑफ शोर कंपनी के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है।

जून-सितंबर 2021 तक न्यू लीना इन्वेस्टमेंट्स नामक एक अन्य साइप्रस-आधारित ऑफशोर कंपनी के पास अडानी ग्रीन एनर्जी शेयरों में 420 मिलियन डालर से अधिक का स्वामित्व था। यह राशि इस ऑफशोर शेल कंपनी के कुल संपत्ति का लगभग 95% हिस्सा है। संसदीय रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कंपनी ने अडानी की दूसरी सूचीबद्ध कम्पनियों में भी निवेश किया।

न्यू लीना नाम की इस ऑफशोर कंपनी को एक एनी कंपनी इनकॉर्पोरेशन सर्विसेज फर्म (एमिकॉर्प) द्वारा संचालित किया जाता है। एमिकॉर्प ने कम से कम सात अडानी प्रमोटर संस्थाओं का गठन किया। इसके अलावा और विनोद अडानी से जुड़ी कम से कम 17 ऑफशोर शेल कंपनी। इसके अलावा मारीशस की तीन ऑफशोर शेल कंपनी का भी गठन किया जिसने बाद में अडानी स्टॉक में निवेश किया है।

एमिकॉर्प ने 1एमडीबी अंतरराष्ट्रीय घोटाले (1Malaysia Development Berhad scandal) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1 मलेशिया वित्तीय घोटाले मलेशियाई करदाताओं से 4.5 बिलियन डालर डूब गए थे। स्कैंडल पर रिपोर्ट करने वाली पुस्तक ‘बिलियन डॉलर व्हेल’ के अनुसार, एमिकॉर्प ने इस घोटाले में एक तथाकथित ‘इन्वेस्टमेंट फंड’ की स्थापना की। किसी “म्यूचुअल फंड की तरह दिखने वाले इस ‘इन्वेस्टमेंट फंड’ की मदद से लाखों लोगों के पैसे को बाद में डकार लिया गया।

किसी औद्योगिक समूह में होने वाले निवेश के प्रवाह (investment flows) को जानने के लिए ‘डिलीवरी वॉल्यूम’ एक अनूठी व्यवस्था है। ‘डिलीवरी वॉल्यूम के विश्लेषण में हमने पाया कि अडानी की कई सूचीबद्ध कंपनियों में संदिग्ध ऑफशोर संस्थाओं की वार्षिक ‘डिलीवरी वॉल्यूम’ का परिमाण 30% -47% तक है। यह एक स्पष्ट अनियमितता है जो यह दर्शाता है कि अडानी के स्टॉक में संदिग्ध ऑफशोर शेल कम्पनियों से बड़े पैमाने पर निवेश और पैसों का हेरफेर हो रहा है ।

अडानी सूचीबद्ध कंपनियों में स्टॉक हेरफेर कोई नयी बात नहीं है। SEBI ने अडानी एंटरप्राइजेज के स्टॉक और अडानी के प्रवर्तकों सहित 70 से अधिक संस्थाओं और व्यक्तियों पर वर्षों से जांच की है और अपराधी पाए जाने पर उन पर मुकदमा चलाया है। अपने 2007 के SEBI के एक फैसले में कहा गया है कि “अडानी के प्रमोटरों के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हुए हैं और पाया गया है कि केतन पारेख की मदद से अडानी के शेयरों में हेरफेर की गयी है। केतन पारेख शायद भारत के सबसे कुख्यात स्टॉक मार्केट मैनिपुलेटर हैं। केतन पारेख के अडानी समूह की संस्थाओं के साथ काम करने के चलते SEBI द्वारा प्रतिबंधित तक किया गया था। लेकिन बाद में अडानी समूह पर जुर्माना लगा दिया गया था और प्रतिबन्ध हटा लिया गया। यह कदम साफ़ तौर पर दिखता है कि अडानी समूह के प्रति सरकार की उदार और नर्म रवैया रखती है। कालांतर में अडानी समूह के प्रति सरकारी उदारता का एक दशक लंबा पैटर्न बन गया।

SEBI ने 2007 की अपनी जांच में पाया कि अडानी ने अपनी 14 निजी कम्पनियों (private entities) के शेयर कुख्यात केतन पारेख की कंपनी को हस्तांतरित किए। केतन पारेख तब बाजार में जबरदस्त हेरफेर में लगे हुए थे। SEBI द्वारा उठाये इस आरोप के जवाब में अडानी समूह ने यह तर्क दिया कि उसने अपने शेयर केतन पारेख के साथ मुंद्रा बंदरगाह पर अपने संचालन की शुरुआत के लिए पैसे उगाहने के लिए किया। इससे यह प्रतीत होता है कि स्टॉक हेरफेर के माध्यम से शेयर बिक्री को तब तक एक वैध रूप मिल चुका है।

हमारी जांच के हिस्से के रूप में, हमने एक ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लिया जिसे मॉरीशस स्थित संदिग्ध ऑफशोर फंड के माध्यम से शेयर बाजार में हेरफेर करने की कोशिश करने पर उसे भारत में व्यापार करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। उसने हमें बताया कि वह केतन पारेख को व्यक्तिगत रूप से जानता है। उसने हमें जानकारी दी कि “पिछले सभी ग्राहक अभी भी केतन के प्रति वफादार हैं और अभी भी केतन के साथ काम कर रहे हैं”।

स्टॉक को पार्क करने के लिए ऑफ शोर शेल कंपनी के पैसे का उपयोग करने के अलावा, हमने अपने शोध में अडानी के सूचीबद्ध कंपनियों और ऑफशोर शेल कंपनी के बीच पैसे के लेन-देन के कई उदाहरण देखे।

ऐसा लगता है कि उक्त धन का उपयोग अडानी समूह में न केवल एकाउंट्स के हेरफेर करने में बल्कि समूह के वित्तीय घोटालों को छिपाने, कम्पनियों को अधिक क्रेडिट योग्य बनाने के लिए भी किया जाता है और इस पूंजी का इस्तेमाल अडानी साम्राज्य के अन्य हिस्सों में चला जाता है जहां पूंजी की जरूरत है।

हमने सूचीबद्ध और निजी दोनों कंपनियों द्वारा कई अघोषित लेन-देन की भी पहचान की, जो भारतीय प्रकटीकरण कानूनों Indian disclosure laws का खुला उल्लंघन है। ऐसा एक से अधिक बार किया गया। मसलन विनोद अडानी-नियंत्रित मॉरीशस की एक ऑफशोर शेल कंपनी ने एक अडानी की एक प्राइवेट एंटिटी को 11.71 बिलियन रुपये ‘उधार’ देती है। अडानी की जिस कंपनी ने यह ‘उधार’ लिया उसने कभी भी इसे उधार के रूप में शो नहीं किया। बाद में उस प्राइवेट एंटिटी ने अडानी एंटरप्राइजेज सहित अडानी के अन्य सूचीबद्ध संस्थाओं को 9.84 बिलियन रुपये धन उधार दिया।

एक कंपनी है ‘इमर्जिंग मार्केट इन्वेस्टमेंट’ डीएमसीसी। यह विनोद अडानी द्वारा नियंत्रित है। लिंक्डइन पर इस कंपनी का कोई कर्मचारी सूचीबद्ध नहीं किया है, और न ही उसकी कोई ऑनलाइन उपस्थिति है। उसने कोई ग्राहक या सौदे की घोषणा नहीं की है। संयुक्त अरब अमीरात का एक अपार्टमेंट इसका ऑफिस का पता है। इस कंपनी ने अडानी पावर की सहायक कंपनी को 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज दिया।

ऐसा लगता है कि इस ऑफशोर शेल कम्पनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल कमाई में हेरफेर के लिए भी किया जाता है। अपने खोज के दौरान हमें अडानी के एक सूचीबद्ध कंपनी और एक संदिग्ध ऑफशोर शेल कम्पनियों के बीच लेन-देन का पता मिलता है। ऑफशोर शेल कम्पनी विनोद अडानी द्वारा परिचालित और नियंत्रित है। इन लेन देन का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं ।विनोद अडानी द्वारा नियंत्रित सिंगापुर की इस प्राइवेट एंटिटी को सूचीबद्ध अडानी एंटरप्राइजेज की एक सहायक कंपनी से संपत्ति स्थानांतरित की गई थी। हमने पाया की उक्त प्राइवेट एंटिटी के खाते में उस पैसे के आते ही वह ‘नष्ट’ हो जाती है। संभवतः ऐसा उस कंपनी के वित्तीय गड़बड़ी को छिपाने के लिए ऐसा जानबूझकर किया गया। 

अडानी समूह की जानबूझकर किये जा रहे इन गैरकानूनी कामकाज से स्पष्ट है की वित्तीय नियंत्रणों से जुड़े कानून शायद अब बस नाममात्र के रह गए हैं । 

अडानी समूह में मुख्य वित्तीय अधिकारी (Chief Financial Officer) की भूमिका भी संदेहास्पद प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, अडानी एंटरप्राइजेज में पिछले आठ वर्षों में अब तक पांच मुख्य वित्तीय अधिकारी बदले गए जो अपने आप में संदेह पैदा करता है ।

अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी टोटल गैस के लिए स्वतंत्र ऑडिटर शाह धंधारिया नामक एक छोटी सी फर्म है। लगता है शाह धंधारिया की कोई मौजूदा वेबसाइट नहीं है। इसकी वेबसाइट के आर्काइव से पता चलता है कि इसके केवल 4 भागीदार और 11 कर्मचारी थे। रिकॉर्ड बताते हैं कि यह ऑडिटिंग फ़ार्म 32000 रुपये कमरे के किराये के रूप में ऐडा करता है। इसके अलावा एक और जानकारी मिलती है कि इसका ऑडिट लगभग 170 मिलियन रुपये का बाजार पूंजीकरण है।

शाह धंधारिया मुश्किल से ही जटिल लेखा परीक्षा कार्य में सक्षम प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए अकेले अडानी एंटरप्राइजेज की 156 सहायक कंपनियां और कई संयुक्त उद्यम और सहयोगी कंपनियां हैं। इसके अलावा, अडानी की 7 प्रमुख सूचीबद्ध संस्थाओं में सामूहिक रूप से 578 सहायक कंपनियां हैं और बीएसई के खुलासों के अनुसार अकेले वित्त वर्ष 2022 में कुल 6,025 अलग-अलग संबंधित-पार्टी लेनदेन में शामिल हैं।

शाह धंधारिया के ऑडिट पार्टनर, जिन्होंने क्रमशः अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी टोटल गैस के वार्षिक ऑडिट पर हस्ताक्षर किए, जब उन्होंने ऑडिट को मंजूरी देना शुरू किया, तब उनकी उम्र 24 और 23 वर्ष थी। वे अनिवार्य रूप से स्कूल से बाहर नए थे, शायद ही देश की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों की वित्तीय जांच करने और उनके सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक द्वारा चलाए जाने की स्थिति में थे।

गौतम अडानी ने एक साक्षात्कार में दावा किया है कि “आलोचना के प्रति बहुत खुले दिमाग का है…हर आलोचना मुझे खुद को सुधारने का अवसर देती है।” इन दावों के बावजूद, अडानी ने बार-बार सरकार और नियामकों पर सवाल उठाने वालों का पीछा करने के लिए अपनी अपार शक्ति का उपयोग करते हुए आलोचनात्मक पत्रकारों या टिप्पणीकारों को जेल में डालने या मुकदमेबाजी के माध्यम से चुप कराने की मांग की है।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट में ऐसा क्या है

हमारा मानना है कि अडानी समूह बड़े पैमाने पर दिन दहाड़े धोखाधड़ी करने में सक्षम रहा है। निवेशक, पत्रकार, नागरिक और यहां तक कि राजनेता प्रतिशोध के डर से उसके खिलाफ बोलने से डरते हैं।

हमने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में 88 प्रश्नों को शामिल किया है। यदि गौतम अडानी वास्तव में पारदर्शिता को अपनाते हैं, जैसा कि वे दावा करते हैं, तो उन्हें उत्तर देने के लिए आसान प्रश्न होने चाहिए। हम अडानी की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं।

(सीमा आजाद की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।) 

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