कोरोना राहत पैकेज : दूसरे देशों के वितरण का तरीका और भारत का जुमला शास्त्र

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प्रधानमंत्री जी द्वारा कोरोना संकट से उबरने के लिए घोषित 20 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज अगर जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर देखा जाए तो दुनिया के देशों द्वारा घोषित ऐसे पैकेजों में पांचवें नंबर का सबसे बड़ा पैकेज है। इस पैकेज की घोषणा काफी धमाकेदार अंदाज में खुद प्रधानमंत्री जी ने अपने चिर-परिचित विशिष्ट अंदाज में किया। इस घोषणा के समय 2015 के बिहार चुनावों से पहले उनके द्वारा बिहार के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा का दृश्य याद आ गया। हालांकि उस घोषणा के समय वे रैली में जनता से पूछ रहे थे कि “इतना दे दूं?”, “या इतना दे दूं?” और कुछ हजार करोड़ रुपये से शुरू करके नीलामी की बोली लगाने के अंदाज में एक लाख पचीस हजार करोड़ रुपये तक ले गए थे। हालांकि आज तक बिहार के उस पैकेज में से कितना बिहार तक पहुंचा इसके बारे में ज्यादा किसी को पता नहीं। प्रधानमंत्री जी कभी भी अपने श्रोताओं और दर्शकों को हैरत में डालने के अवसर चूकते नहीं हैं।

इस बार भी उन्होंने 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा बहुत गर्व के साथ किया और बताया भी कि यह भारत के जीडीपी का 10 प्रतिशत है। जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत का पैकेज पांचवां सबसे बड़ा पैकेज है। जापान ने अपने जीडीपी का 21 प्रतिशत, अमरीका ने 13.3 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया ने 10.8 और जर्मनी ने 10.7 प्रतिशत खर्च की घोषणा की है। इसके बाद भारत के 10 प्रतिशत का स्थान है। इसी तरह से सिंगापुर और हांगकांग के राहत पैकेज भी जीडीपी के 10 प्रतिशत के लगभग हैं।

दुनिया में जितने भी पैकेज दिए गए हैं उनमें से 30.7 प्रतिशत नगद मदद वाली योजनाएं हैं। कई देशों में ढेरों नई योजनाएं शुरू की गई हैं तो कई जगहों पर पुरानी योजनाओं में भी नगद हस्तांतरण की राशि बढ़ा दी गई है। जर्मनी में स्वरोजगार, फ्रीलांसर और छोटे बिजनेसमैन को तीन महीने तक 15000 यूरो (यानि 12.5 लाख रु.) तक मिल रहे हैं। इसके लिए जर्मनी की सरकार 50 अरब यूरो (4 लाख करोड़ रु.) खर्च कर रही है। बाल-बच्चों वाले ऐसे माता-पिता जिनकी आमदनी बंद हो गई है उन्हें सितंबर तक प्रति बच्चा प्रति माह 185 यूरो (15500 रु.) दिए जा रहे हैं। जर्मनी में बनाए गए एक नए कानून के मुताबिक कोई बिजनेस बंद होने के बावजूद कंपनी का मालिक छह हफ्ते तक कर्मचारी को वेतन देगा। यह पैसा सरकार कंपनी को दे देगी। इस दौरान 60 प्रतिशत वेतन ही मिलेगा, अगर कर्मचारी के बच्चे हैं तो 67 प्रतिशत मिलेगा। अब यह राशि बढ़ाकर 80 प्रतिशत कर दी गई है। इस तरह 12 महीने तक वेतन दिया जाता रहेगा। नियोक्ता को कर्मचारी का बीमा जारी रखना होगा, प्रीमियम सरकार देगी।

अमरीका में 1930 के दशक की ऐतिहासिक महामंदी से ज्यादा बेरोजगारी इस वक्त हो गई है। वहां ढाई करोड़ लोग बेरोजगार हैं। वहां फूड कूपन पर खाना खाने वालों की संख्या काफी बढ़ गई है। अमरीका ने अपने बेरोजगारों तथा नौकरीशुदा लोगों की राहत के लिए अपने जीडीपी का 13.3 प्रतिशत दिया है। यह राशि 27 खरब डॉलर (2070 खरब यानि 207 लाख करोड़ रु.) होती है। वहां सभी वयस्कों को 1200 डॉलर (92000 रु.) और हर बच्चे को 500 डॉलर (38000 रु.) दिए जा रहे हैं। यह पैसा 75000 डॉलर (57 लाख रु.) की सालाना से कम आमदनी वाले हर वयस्क को मिला है। 75000 डॉलर से ज्यादा आमदनी वालों को भी यह मदद मिली है लेकिन उनकी आमदनी जितनी ज्यादा है उसी अनुपात में उनका हिस्सा कम होता गया है। यह पैसा शरणार्थियों और ग़ैर-नागरिकों को भी एक बार दिया गया है।

यह पैसा सबके खाते में बिना कोई फॉर्म भरवाए डाल दिया गया है। वहां की प्रांत सरकारों को अधिकृत किया गया है कि स्कूल जा रहे बच्चों को स्कूल में ही मुफ्त या कम क़ीमत में खाना दिया जाए। जो बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं उनके मां-बाप को 12 हफ्ते की छुट्टी दी जाए। इस छुट्टी का वेतन नहीं कटेगा। इस दौरान वेतन का 67 प्रतिशत मिलेगा। बीमार होने पर दो हफ्ते का पूरा वेतन मिलेगा। अमरीका में वेतनभोगी वर्ग की नौकरी बचाने के लिए 30 खरब डॉलर (2300 खरब यानि 230 लाख करोड़ रु.) के एक और राहत पैकेज की तैयारी चर्चा में है।

जापान ने अपने जीडीपी के 21 प्रतिशत का राहत पैकेज दिया है, जो 11 खरब डॉलर (843 खरब यानि 84.3 लाख करोड़ रु.) है। वहां हर नागरिक के खाते में 930 डॉलर (71000 रु.) डाले गए हैं, जो जीडीपी का 2 प्रतिशत है। छोटे और मझोले उद्योगों में जितने दिन काम बंद रहेगा उतने दिनों के वेतन का दो तिहाई सरकार देगी। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले सभी छात्रों को मुफ्त भोजन दिया जा रहा है।

ब्रिटेन में 15 प्रतिशत लोग स्वरोजगार करते हैं। ऐसे लोगों को उनके पिछले तीन सालों के औसत मुनाफे का 80 प्रतिशत राशि उन्हें दी जा रही है। कई मामलों में यह राशि 2500 पाउंड (2 लाख 38 हजार रु.) है। इस नीति के कारण 38 लाख कामगारों को ब्रिटेन में सरकार से पैसे मिले हैं। वहां होटलों को 25000 पाउंड, छोटे रेस्टोरेंटों को 10000 पाउंड तथा  ऐसी जगहों पर काम करने वालों को उनके वेतन का 80 प्रतिशत दिया गया है। स्वरोजगार करने वालों के लिए भी अलग पैकेज है।

डेनमार्क सरकार अपने यहां कंपनियों के कर्मचारियों के वेतन का 75 प्रतिशत खुद भुगतान कर रही है। थाईलैंड सरकार ने अपने यहां अस्थायी मजदूरों, संविदा मजदूरों और स्वरोजगार में लगे लोगों को वित्तीय मदद के लिए 18 अरब डॉलर की व्यवस्था किया है।

कनाडा में जिसने भी पिछले साल 52 हफ्तों में 5000 डॉलर का काम किया था उसको घर बैठे 2000 डॉलर (107500 रु.) प्रति माह दिए जा रहे हैं। जिनके बिजनेस का नुकसान हुआ है उन्हें भी मदद दी गई है। वहां उन विद्यार्थियों को भी 1250 डॉलर (67000 रु.) प्रति माह दिए जा रहे हैं।

हांगकांग तो 18 साल से ऊपर के हर स्थायी निवासी को 10 हजार डॉलर (99000 रु.) दे रहा है। अल्जीरिया ने सुविधा दी है कि जब भी जितने पैसे की जरूरत हो उतना पैसा आप ले सकते हैं। आर्मीनिया में बुजुर्गों को घर पर कैश पहुंचाया जा रहा है।

दुनिया भर में बीमार लोगों, बुजुर्गों और बेरोजगार हुए लोगों को कैश उपलब्ध कराने के अलग-अलग अनेक कार्यक्रम चल रहे हैं। भारत में सीधे आर्थिक मदद के बहुत कम कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कुछ राज्यों में भवन-निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों को 1 हजार रुपये दिए गए हैं। दिल्ली में 5 हजार रुपये दिए गए हैं। दिल्ली में टैक्सी चलाने वालों को भी 5 हजार रुपये दिए गए हैं।

भारत में घोषित 20 लाख करोड़ के पैकेज को बड़ा दिखाने के लिए पहले से चली आ रही योजनाओं को भी इसी में शामिल कर लिया गया है। जैसे कि 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 मार्च को ही किया था, वह भी इसमें जोड़ा जाएगा। इसका भी काफी बड़ा हिस्सा अभी खर्च ही नहीं हुआ है। किसान सम्मान योजना पिछले साल के बजट प्रावधानों के तहत जारी योजना है, लेकिन उसका पैसा भी इसी में शामिल कर लिया गया है। इस घोषणा में से भी अगले तीन महीनों में कुल मिला कर मात्र 61380 करोड़ ही खर्च होने हैं। इनमें से 10000 करोड़ महिला जन धन खातों में, 3000 करोड़ विधवा, वृद्ध तथा दिव्यांगों के खातों में 17380 करोड़ किसानों तथा 31000 करोड़ भवन एवं निर्माण क्षेत्र के मजदूरों के खातों में। शेष राशि के खर्च की अभी कोई योजना नहीं है।

प्रधानमंत्री जी द्वारा राहत पैकेज की घोषणा के बाद इसका विस्तृत विवरण दैने के लिए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण नियमित तौर पर पैकेज के अलग-अलग हिस्सों के बारे में विस्तार से बता रही हैं। अति लघु, लघु एवं मझोले उद्योगों (MSME) के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के लिए सरकार ने 3 लाख करोड़ रुपये के बैंक ऋण का प्रावधान किया है। लेकिन इसी सेक्टर का केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और सरकारी कंपनियों पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपये बकाया है। इसका जिक्र इस विभाग के मंत्री नितिन गडकरी ने भी एक साक्षात्कार में किया था और इस स्थिति को काफी चिंताजनक बताया था। यह इन छोटे उद्योगों का अपना पैसा है जो सरकार नहीं चुका पा रही है और संकट की इस घड़ी में उनके घावों पर ऋण के प्रस्ताव का नमक मल रही है।

भारत के इस 20 लाख करोड़ के पैकेज में लगभग 8 लाख करोड़ तो रिजर्व बैंक द्वारा घोषित लिक्विडिटी है जो बैंकों को ऋण देने पर रिजर्व बैंक के नियंत्रण में ढील होती है। जब अर्थव्यवस्था सामान्य होती है तो ऐसी ढील निवेश बढ़ाने में मददगार होती है। लेकिन जब सब कुछ ठप है तो इस लिक्विडिटी का कोई मतलब नहीं रह जाता, क्योंकि कंपनियां ऐसे माहौल में ऋण लेने में कोई दिलचस्पी भी नहीं ले रही हैं और बैंक भी बढ़ते एनपीए के कारण किसी कंपनी से बिना आश्वस्त हुए ऋण देने के मामले में सहमे हुए हैं।

लिक्विडिटी से समर्थन देना और राजकोषीय खर्च, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। अर्थव्यवस्था जब खराब हालत में हो तो राजकोषीय खर्च से ही बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ाकर और मांग पैदा करके उसे सहारा दिया जा सकता है। नगदी से लोगों की क्रय-शक्ति बढ़ती है जिससे कंपनियां लिक्विडिटी के इस्तेमाल के बारे में सोच सकती हैं। इसके लिए आवश्यक है कि राजकोषीय घाटे का रास्ता अपनाते हुए सार्वजनिक खर्च बढ़ाया जाए और मुद्रास्फीति आधारित नीतियां अपनायी जाएं।

अमरीका के कांग्रेसनल बजट ऑफिस (CBO) के अनुमान से अमरीका का राजकोषीय घाटा 2020 में 1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 3.7 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। इसका अर्थ है कि अमरीका को 2020 में 2.7 ट्रिलियन डॉलर का राजकोषीय घाटा होगा। यही वह राशि है जो अमरीका के जीडीपी का 13.3 प्रतिशत है और जो अमरीका ने राहत पैकेज के तौर पर घोषित की है। जब भी वास्तविक नगदी खर्च होगा तो वह बजट घाटे के रूप में दिखेगा।

इस संकट के समय में अर्थव्यवस्था को केवल राजकोषीय घाटे से बटाया जा सकता है ऋण-आधारित वित्तीय प्रावधानों से नहीं। लेकिन सरकार के अर्थशास्त्री लगातार वास्तविक खर्च से बचने का रास्ता निकाल रहे हैं, जिसका नतीजा बेहिसाब मानवीय त्रासदी के रूप में देश भुगत रहा है और न जाने कितनी तबाहियों, मौतों और सिसकियों को झेलेगा।

यह समय दुनिया के अन्य देशों से सबक लेते हुए अधिक से अधिक नगद मदद करने का समय है ताकि इस पैसे से बाजार में मांग का सृजन हो सके और अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ सके। तभी कंपनियां निवेश के बारे में भी सोच सकती हैं।

भारत का राजकोषीय घाटा 2019-20 में 7.7 लाख करोड़ रुपये था जो जीडीपी का 3.8 प्रतिशत था। 1 फरवरी को पेश बजट में 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का अनुमान 8 लाख करोड़ रुपये लगाया गया है। अब इसमें कितनी बढ़ोत्तरी होती है, उसी से वास्तविक खर्च पता चलेगा। हाल ही में 12 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी की घोषणा की गई है। इससे तो यही अनुमान लगता है कि घोषित राहत पैकेज का वास्तविक खर्च वाला हिस्सा मात्र 4 लाख करोड़ रहने वाला है, जो जीडीपी का केवल 2 प्रतिशत है। 

अगर सच्चाई यही है, या इसी के आसपास रहने वाली है तो इतने तामझाम के साथ 20 लाख करोड़, और जीडीपी के 10 प्रतिशत खर्च की भारी-भरकम घोषणा की जरूरत क्या थी? 2 प्रतिशत तो ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ जैसा होगा। लेकिन सरकार ब्रांडिंग के महत्व को अच्छी तरह से जानती है। उसे यह भी पता है कि समाज की स्मृति अल्पकालिक होती है। हर बार प्रदर्शन की एक नई खुराक पुरानी स्मृति को पोंछ देती है। हमारा समाज मृग-मरीचिकाओं के अनवरत सिलसिले में जीने का अभ्यस्त है। 

(शैलेश का लेख।)

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