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20 लाख करोड़ के पैकेज से भी है भुखमरी की लड़ाई!

20 लाख करोड़ का पैकेज सामने आ जाने के बाद मजदूरों का घर लौटना बंद हो जाएगा? रोजगार छिन जाने की प्रतिकूल स्थिति का सामना कर रहे मजदूरों को क्या बड़ी राहत मिल गयी है? क्या उन्हें दोबारा रोजगार मिलने की गारंटी मिल गयी है? या फिर उन्हें कुछ महीने की सैलरी ही एडवांस में मिलने वाली है? क्या बेरोजगार हो चुके इन मजदूरों के लिए भूख से मरने की स्थिति अब नहीं रहेगी? इनमें से एक भी सवाल का जवाब अगर ‘हां’ है तो यह माना जा सकता है कि 20 लाख करोड़ के पैकेज का एलान गरीब मजदूरों के जख्मों पर मरहम लगाने वाला है।

8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को अगले दो महीने तक मुफ्त में राशन देने की घोषणा की गयी है। सुनकर बहुत अच्छा लगता है। मगर, इसकी सच्चाई भी समझिए। सरकार मुफ्त राशन देने पर 3500 करोड़ खर्च करेगी। अगर हिसाब लगाएं तो 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों के लिए दो महीने में प्रति व्यक्ति खर्च 437.5 रुपये आता है। मतलब ये कि 218.75 रुपये का अनाज इन प्रवासी मजदूरों को एक महीने में मिलेगा। अगर ‘हम दो हमारे दो’ के हिसाब से देखें तो चार आदमी वाले परिवार में प्रति व्यक्ति 54 रुपये 68 पैसे का अनाज प्रति व्यक्ति प्रति महीना मिलेगा। क्या यह भूख मिटाने के लिए पर्याप्त है?

रुपये को छोड़ भी दें और केवल अनाज की मात्रा की बात करते हैं। प्रति व्यक्ति 5 किलो गेहूं या चावल और एक किलो चना दिया जाना है। यानी कुल 6 किलो अनाज। तीन समय भोजन के हिसाब से 30 दिन में 90 बार भोजन का अवसर आता है। इस तरह 66.66 ग्राम भोजन एक व्यक्ति को एक समय में नसीब होता है। यह उस मजदूर वर्ग के साथ क्रूर मजाक है जो राष्ट्र निर्माता हैं, उद्योगों का आधार हैं।

प्रवासी मजदूरों के इस वर्ग को एक देश एक राशनकार्ड का फायदा भी संकट की इस घड़ी में नहीं मिलने वाला है। यह योजना मार्च 2021 से लागू होगी। अगस्त तक 83 प्रतिशत आबादी को इस दायरे में लाया जाना है। यह पूर्व निर्धारित योजना है न कि कोरोना संकट को देखते हुए अपनायी गयी योजना। इस वक्त 67 करोड़ लोगों के पास राशनकार्ड हैं।

अगर प्रवासी मजदूरों को स्ट्रीट वेंडर की तरह 10 हजार रुपये का स्पेशल क्रेडिट दिया जाता, तो उनमें जान वापस लौट सकती थी। मगर, सरकार ने उनके लिए यह प्रावधान नहीं किया। मोदी सरकार 50 लाख स्ट्रीट वेंडरों पर 5 हजार करोड़ खर्च करने को तैयार है, मगर प्रवासी मजदूरों को पूरे महीने में 218.75 रुपये का अनाज देने से ज्यादा कुछ भी देने को तैयार नहीं है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के बारे में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिसंबर 2019 में संसद में जानकारी दी थी “मार्च 2019 तक प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की करीब 17,251 करोड़ रुपये की रकम एनपीए हो गई थी। यह राशि मुद्रा योजना के तहत बांटे गए कुल लोन का 2.86 फीसदी है।” यह आंकड़ा तब का है जब 6.04 लाख करोड़ रुपये बांटे जा चुके थे। एक बार फिर मुद्रा लोन लेने वालों पर केंद्र सरकार 1500 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है ताकि उन्हें ब्याज में छूट दी जा सके। मुद्रा लोन असुरक्षित लोन है और इसके लिए कोई गारंटी तक देनी नहीं होती है। सवाल ये उठता है कि मुद्रा लोन लेने वालों पर अगर 1500 करोड़ रुपये कोरोना संकट के दौर में लुटाया जा सकता है तो प्रवासी मजदूरों ने क्या बिगाड़ा है कि उनके लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं?

एक दिन पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कुटीर व लघु उद्योगों के लिए 3 लाख करोड़ रुपये के लोन की घोषणा की थी। इससे इस श्रेणी के औसतन इकाई को 6 से 6.5 लाख रुपये का कर्ज मिलेगा। प्रश्न ये है कि एमएसएमई के लिए पूंजी जरूरी है तो क्या श्रम जरूरी नहीं है? भूखे पेट श्रमिक किस तरह काम कर पाएगा? कोरोना काल के दौरान नौकरी छूटने और तनख्वाह नहीं मिलने के लिए मजदूर खुद तो जिम्मेदार नहीं हैं! जब उद्योग को कर्ज दिया जा सकता है कारोबार को खड़ा करने के लिए, तो मजदूर को जिन्दा रहने के लिए क्या चार महीने की तनख्वाह नहीं दी जा सकती थी? यही बात तो एन रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्री उठा रहे थे!

प्रवासी मजदूरों के नाम पर किराए में मकान की योजना लेकर आ रही है सरकार। इस योजना के शुरू होने और पूरा होने में पूरा साल निकल जाएगा। क्या प्रवासी मजदूरों को तत्काल इसका फायदा मिलेगा?  क्या मकसद है इस योजना के लाने का? प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप में किराए पर अफोर्डेबल हाउस की यह स्कीम प्रवासी मजदूरों के लिए फिलहाल किसी काम की नहीं। अच्छा होता मुंबई जैसे शहरों में अनसोल्ड यानी नहीं बिके हुए मकानों में कोरोना संकट रहने तक मजदूरों के रहने की व्यवस्था कर दी जाती। ऐसा देश के बाकी हिस्सों में भी किया जा सकता है। मुनाफाखोरी के लिए छोटे मकान नहीं बनाने वाले बिल्डरों को कोरोना काल में यह सही सबक भी होता।

20 लाख के पैकेज में अब तक घोषित योजनाओं में मजदूरों के लिए कोई और उल्लेखनीय बात नजर नहीं आती। जाहिर है इस पैकेज के बाद भी मजदूरों के सड़क पर पैदल चलने की घटनाएं थमने वाली नहीं हैं। आने वाले समय में उल्टे मजदूर वर्ग से ही कुर्बानी मांगी जाने वाली है। पैकेज का फायदा सुविधाभोगी वर्ग को ही मिलेगा और संकट की घड़ी में 12 घंटे काम की उम्मीद मजदूरों से की जाएगी। यही है 20 लाख करोड़ का मतलब मजदूरों के लिए!

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों के पैनल में उन्हें बहस करते देखा जा सकता है।)

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This post was last modified on May 15, 2020 8:25 am

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