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Friday, September 24, 2021

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अर्नब प्रकरण के बहाने भारतीय मीडिया पर एक टिप्पणीः मीडिया उद्योग का गहराता अंधेरा, सत्ता और पत्रकारिता की उम्मीदें

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बीते कुछ घंटों से देश के मीडिया और राजनीति में मुंबई पुलिस द्वारा एक न्यूज चैनल के प्रधान की गैर-पत्रकारीय मामलों में गिरफ्तारी को लेकर विवाद मचा हुआ है। यह मामला है-दो लोगों की आत्महत्या का। प्राथमिकी में न्यूज चैनल के प्रधान अर्नब गोस्वामी को उन दोनों व्यक्तियों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। ये व्यक्ति हैं-अन्वय नाइक और उनकी मां कुमुद नाइक। आरोप है कि अर्नब ने अन्वय नाइक से अपने नये चैनल के स्टूडियो का निर्माण कराया और उन्हें पैसे का भुगतान नहीं किया। आर्थिक तंगी और पैसा फंसने के फ्रस्ट्रेशन में बेटे-मां ने आत्महत्या कर ली। मामला 2018 का है। यह भी कहा जा रहा है कि तत्कालीन भाजपा-नीत सरकार ने मामले को आगे नहीं बढ़ने दिया और दबा दिया गया। अब अर्नब के रवैये से नाराज मौजूदा शिवसेना-नीत सरकार ने उस रफा-दफा हुए मामले को फिर से जीवित किया और ‘कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए’ अर्नब गोस्वामी की 4 नवम्बर को मुंबई में गिरफ्तारी हुई। 

मैं कानूनी मामलों का जानकार नहीं हूं, लेकिन एक आम आदमी के तौर यह समझना कठिन नहीं कि अर्नब और उनके चैनल ने महाराष्ट्र की सेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार, मुख्यमंत्री ठाकरे और उनके परिवार पर बीते कई महीने से जिस ढंग से गुटीय-राजनीति से प्रेरित होकर निशाना साधा और ‘शत्रुतापूर्ण बर्ताव’ किया, उसके चलते सरकार भी उन्हें लेकर तैयारी में थी। अर्नब की भाषा, जुमले और शब्दों से भी उनके बर्ताव का सबूत मिलता है। प्रशासन को अर्नब के खिलाफ जैसे ही यह मामला दिखा, उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता बन गया। अर्नब और उनके चैनल के खिलाफ कुछ अन्य मामले भी मुंबई पुलिस के समक्ष अभी लंबित हैं।

जैसा मैंने पहले कहा, कानूनी मामलों में मेरी सिद्धहस्तता नहीं है। इसलिए पूरे प्रकरण को मीडिया-परिप्रेक्ष्य से देखने और समझने की कोशिश करूंगा। सबसे पहले तो मैं साफ कर दूं कि बीते कई वर्षों से अर्नब गोस्वामी और उनके चैनल को मैं पत्रकारिता के दायरे में नहीं रखता। अर्नब और उनके चैनल सत्ता या सियासत के किसी खास खेमे के फूहड़ प्रचारक और प्रोपगेंडा फोरम हैं। लेकिन अर्नब इससे पहले कई वर्षों तक पत्रकारिता में रहे हैं। उनसे हमारी यदा-कदा मुलाकात भी होती रही। उनके पहले वाले और मौजूदा चैनल की तरफ से मुझे कई बार चैनलों के पैनल में आमंत्रित भी किया गया। अच्छा पारिश्रमिक का आश्वासन भी था। इसके बावजूद मैंने उनके चैनल के आमंत्रणों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार किया।

एक बार तो मुंबई भी बुलाया गया। दोनों तरफ के एयर-टिकट के साथ बहुत अच्छा पारिश्रमिक और किसी सितारा होटल में रुकने का इंतजाम भी था। पर मैंने इंकार किया। एक मामूली फ्रीलांसर होने के बावजूद मैंने विनम्रतापूर्वक इंकार किया क्योंकि अर्नब को बीते कई सालों से मैं पत्रकार के रूप में नहीं देख पाता। भाजपा-आरएसएस से सहानुभूति रखने वाले दो दर्जन से ज्यादा पत्रकारों से मेरे निजी ताल्लुकात हैं। इनमें कुछ हमारे साथ काम भी कर चुके हैं। निवेदन करने पर इनमें कुछ हमारे पैनल-डिस्कशन में भी आते रहे हैं। हमारी एक-दूसरे से असहमतियां होती हैं पर हम लोग एक-दूसरे को पत्रकार के रूप में ही देखते हैं। पर अर्नब या उन जैसे तीन-चार ऐसे नाम इन दिनों अक्सर चर्चा या विवाद में उभरते रहते हैं, जो सत्ता के गलियारे में बड़ी हैसियत तो रखते हैं पर जब कभी इन वर्षों का वस्तुपरक मीडिया इतिहास लिखा जायेगा, वह निश्चय ही ऐसे लोगों को पत्रकार के रूप में नहीं दर्ज करेगा। कांग्रेस-जमाने के कई ‘केंचुआ-कोटि’(आडवाणी जी के एक मशहूर वाक्य से अर्जित विशेषण) के पत्रकारों को भी इतिहास कहां याद करता है!

इसके बावजूद मेरा मानना है कि अर्नब गोस्वामी के साथ महाराष्ट्र में कानूनी प्रक्रिया के नाम पर जिस तरह की पुलिसिया कार्रवाई हुई है, वह निस्संदेह बदले की भावना से प्रेरित है। अगर पूर्व की देवेंद्र फणनवीस सरकार (भाजपा-सेना गठबंधन की) ने 2018 में इसी मामले में अर्नब के खिलाफ दायर मामले को रफा-दफा कराया या दबा दिया तो उस वक्त सरकार में शामिल शिव सेना ने क्यों नहीं सवाल उठाये थे कि कानून का पालन करते हुए अर्नब पर दर्ज मामले की पूरी पड़ताल हो! पर शिव सेना की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार ने आज उसी रफा-दफा मामले को खोलकर आगे की कार्रवाई के लिए रास्ता तैयार किया है।

अगर आज की कार्रवाई कानूनी रूप से सही भी हो तो एक बात तो आइने की तरह साफ है कि महाराष्ट्र सरकार, खासतौर पर शिवसेना और अर्नब के बीच रिश्तों की ऐसी तनातनी (जिसमें पत्रकारिता का कोई पहलू नहीं है!) नहीं होती तो मामला इस हद तक नहीं पहुंचता! यह सब इसलिए भी हुआ कि अर्नब ने अपने चैनलों के जरिये शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसे प्रहार भी किये, जो पत्रकारीय होने के बजाय पूरी तरह दलीय-प्रतिद्वन्द्विता से प्रेरित थे। 

अर्नब प्रसंग पर केंद्रीय सत्ताधारी दल, सरकार और उसके साथ खड़े पत्रकारों का बड़ा हिस्सा आज इसे ‘चौथे खंभे’ पर प्रहार मान रहा है। इमरजेंसी की याद दिलाते हुए अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने वाला कदम बता रहा है। मैं स्वयं भी कह रहा हूं कि इस मामले में महाराष्ट्र सरकार का दामन बहुत साफ नहीं है। अगर आत्महत्या के मामले में चैनल संपादक की किसी भूमिका की जांच करानी थी तो उसकी अलग प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। जांच-पड़ताल के नतीजे के बाद तदनुरूप कार्रवाई होती। पर हमारे देश में इन दिनों चारों तरफ से प्रतिशोध, नफरत और गुटीय प्रतिद्वन्द्विता से प्रेरित कार्रवाइयों का अंधड़ सा बह रहा है। जिन लोगों को 4 नवम्बर को अचानक मार्टिन निमोलर की विश्वप्रसिद्ध कविता याद आने लगी, उन्हें क्या मालूम नहीं कि मौजूदा में देश के विभिन्न हिस्सों में 55 से ज्यादा पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है या उन्हें किसी न किसी मामले में फंसाया गया है। ऐसे ज्यादातर मामले निजी या वैचारिक प्रतिशोध या नफरत से प्रेरित हैं।

किसी ने कई ट्वीट किया, उस पर प्राथमिकी, किसी ने कोई ‘अप्रिय’ सच्चाई बताई तो फौरन गिरफ्तारी! क्या ऐसे लोग भूल गये कि वरिष्ठ पत्रकार और ‘इकोनामिक एंड पोलिटिकट वीकली’ जैसी बेहद प्रतिष्ठित पत्रिका के एसोसिएट एडिटर रहे गौतम नवलखा इस वक्त भी जेल में हैं। उन्हें भीमा-कोरेगांव से जुड़े एक मनगढ़ंत मामले में फंसाया गया है। ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, हिमाचल के विशाल आनंद, ओम शर्मा, अश्विनी सैनी, दिल्ली की सुप्रिया शर्मा (द स्क्रॉल), दिल्ली के ही प्रशांत कनौजिया, दिल्ली से हाथरस मामले को कवर करने गये मलयालम के पत्रकार सिद्दीक कप्पन, यूपी के रवींद्र सक्सेना, आशीष अवस्थी और मनीष पांडे सहित ऐसे अनेक पत्रकार हैं, जिन्हें या तो मामलों में फंसाया गया या गिरफ्तार किया गया। इनमें कुछ अभी भी जेल में हैं, कुछ को जमानत मिली है। श्री नवलखा तो कई महीनों से जेल में हैं। पूर्वोत्तर में कई पत्रकारों को बार-बार गिरफ्तार किया गया है और वह भी किसी गैर-पत्रकारीय कथित आपराधिक कारण से नहीं, सिर्फ उनकी रिपोर्ट या सोशल मीडिया पर टिप्पणी के चलते!

अर्नब-प्रसंग के बहाने आज मैं मीडिया के मौजूदा परिदृश्य और पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य पर कुछ बातें रखना चाहता हूं। मुझे लगता है, हमारे मीडिया में इन मुद्दों पर बात होनी चाहिए। 

हमारा मानना है कि पत्रकार को पत्रकारिता का होना चाहिए, भाजपा या कांग्रेस का नहीं, किसी धर्म-संप्रदाय या जाति-खाप का नहीं! पर अपने देश की बड़ी सच्चाई है कि यहां पत्रकारों का बड़ा हिस्सा गुटीय-राजनीतिक खेमों और अन्य संकीर्ण दायरों में बंटा दिखता है। इसमें कुछ विचार के आधार पर बंटे होंगे तो ज्यादातर अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि, पूर्व राजनीतिक-सम्बद्धताओं के आधार पर या फिर निहित स्वार्थ के चलते! 

इसका बड़ा कारण है कि हमारे यहां आज़ादी के बाद जिस तरह की पत्रकारिता सामने आई, उसमें पत्रकारिता की संस्थागत स्थिति, मूल्यवत्ता और पेशेवराना प्रतिबद्धता का बड़े पैमाने पर विस्तार या सुदृढ़ीकरण नहीं हुआ। उसने सामाजिक-विविधता को पूरी तरह नज़रंदाज़ किया। इससे संस्था, मूल्य या पेशे के स्तर पर पत्रकारिता का स्वरूप और चरित्र एकरंगी और बहुत ढीला-ढाला होता गया। पिछली शताब्दी के सातवें से नवें दशक के बीच पत्रकारिता और उसके संस्थानों के आधुनिकीकरण, पेशेवराना और बेहतर बनाने की कुछ अच्छी कोशिशें हुईं। पर वैसी कोशिशें अंग्रेजी में ही ज्यादा हुईं। हिंदी में आधा-अधूरे प्रयास ऐसे कुछ संस्थानों में भी हुए, जहां एक साथ अंग्रेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं के प्रकाशन होते थे। बाद के दिनों में वह प्रक्रिया ठप हो गयी। उसका न तो विस्तार हुआ और न ही सुदृढ़ीकरण। बची-खुची कसर नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों ने निकाल दी। उसने पत्रकारिता और उसके संस्थानों का जैसा ध्वंस किया, वह अलग कहानी है। 

पत्रकारिता के मौजूदा पतनोन्मुख परिदृश्य की कहानी के और भी कई बड़े आयाम और कारक हैं। इस पृष्ठभूमि में ही आज की स्थिति को समझने की कोशिश हो सकती है। यह महज संयोग नहीं कि हमारे मीडिया में आज कभी कोई पत्रकार के रूप में दिखता है फिर वह स्वयं ही कॉरपोरेट या कारपोरेट-मैनेजर बन जाता है, कभी सैफोलाजिस्ट नजर आता है तो कभी सत्ता से जुड़ा बड़ा ओहदेदार या बहुत बड़ा उपक्रमी हो जाता है, कभी नफ़रत फैलाने का औजार तो कभी दलाल या निहित स्वार्थ का कारोबारी बन जाता है। फिर वह कभी माननीय भी हो जाता है।

हमारा मानना है कि भारतीय पत्रकारिता की मूल समस्या उसके पेशेवराना कार्य-पद्धति के अभाव और स्वामित्व के चरित्र में है। इसकी अनेक रूपों में अभिव्यक्ति होती है। उसकी वैचारिकी और सामाजिकी में भी गंभीर समस्या नजर आती है। मीडिया की नियुक्तियों में सुसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया का इसीलिए यहां सख्त अभाव है। जेनुइन पत्रकार -प्रशिक्षण, योग्यता-मूल्याकंन, समझदारी-ईमानदारी, पेशेवराना मिज़ाज और जन-सरोकार के लिए मुख्यधारा के हमारे मीडिया संस्थानों में कोई जगह ही नहीं है। यही कारण है कि पत्रकारों का बड़ा हिस्सा समाज और सच्चाई से जुड़ने की बजाय सियासत या सत्ता के इस या उस खेमे की तरफ झुक जाता है। पत्रकारों के स्वतंत्र और वस्तुपरक होने या बने रहने की गुंजाइश ही बहुत कम है। गिने-चुने पत्रकार ही इन प्रतिकूलताओं के बीच एक पत्रकार के तौर पर वस्तुपरक हो पाते हैं। जिस समाज में पत्रकार के लिए सच, ज्ञान और सरोकार के कोई मायने नहीं हैं, वह चैनल चलाये या अखबार, वह मर्सीडिज में चले या रॉल्स रॉयस में, वह कारपोरेट-धन्नासेठों की तरह चमचमाते बंगलों में रहे या करोड़ों के गगनचुंबी जादुई फ्लैटों में, वह और कुछ भी हो सकता है पर पत्रकार नहीं! 

पर मीडिया उद्योग के इस गहराते अंधेरे में उम्मीद की रोशनियां भी हैं। निराशाजनक मीडिया परिदृश्य में आशा की झिलमिलाती तस्वीरें भी हैं। कुछ बहुत अच्छे अपवाद हैं और वो देश के हर हिस्से में मिल जायेंगे। अफसोस कि न्यूज़ चैनलों में ऐसे अपवाद अब उंगलियों पर गिनने लायक रह गये हैं। वे तेजी से लुप्त हो रहे हैं। प्रिन्ट और वेबसाइटों में ही ऐसे अपवाद दिखते हैं। खुशी की बात है कि युवाओं में उनकी संख्या बढ़ रही है। अंधेरे में आशा के द्वीप की तरह!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं आप राज्य सभा टीवी के संस्थापक एग्जीक्यूटिव एडिटर रह चुके हैं।)

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