Thu. Apr 2nd, 2020

न्यायपालिका पर मंडराता खतरा उसकी अपनी पहचान का संकट है!

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वार एंड पीस तथा बांबे हाईकोर्ट

सेवानिवृत्ति के दो दिन पहले अनायास ही, बिना किसी आधार के, पी चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया मामले में घूसख़ोरी और रुपयों की हेरा-फेरी का प्रमुख अपराधी घोषित करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज सुनील गौड़ ने कल खुद सरकार से घूस के तौर पर एक अपीलेट ट्राइबुनल के अध्यक्ष का पद लिया है। चिदंबरम मामले में सरकार के रुख को देख कर तो लगता है कि वह उन्हें अंत में ‘राष्ट्र के अस्तित्व के लिये ख़तरनाक’ कह कर भी जेल में बंद रखेगी, जैसा कि देश के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों को रखे हुए है । थोथी प्रक्रियाओं की जंजीरों से बंधा न्याय अपने सत्व को गंवा कर कोरे कुतर्क की श्रेणी में पहुंच जाता है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में हमेशा की तरह क़ानून अपनी अंधता का प्रदर्शन करेगा ।

मुंबई हाईकोर्ट के एक जज सारंग कोतवाल ने एलगार परिषद – भीमा कोरेगांव मामले में सामाजिक कार्यकर्ता वेरोन गोनसाल्वे से इस बात की सफ़ाई मांगी है कि उनके घर पर तालस्ताय के विश्व क्लासिक ‘वार एंड पीस’ की प्रति क्यों पड़ी हुई थी !

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सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्र ने अभिव्यक्ति की आज़ादी की तरह के नागरिक के मूलभूत संवैधानिक अधिकार को भी शर्त-सापेक्ष बताया है। वे अमित शाह के बेटे जय शाह के द्वारा ‘द वायर’ पर किये गये मुक़दमे के एक प्रसंग में ‘द वायर’ की याचिका को स्वीकारते हुए भी ‘द वायर’ को धमका कर प्रकारांतर से अमित शाह को आश्वस्त रहने का संकेत भेज रहे थे ।

और, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सीताराम येचुरी को कश्मीर जाने की अनुमति देते हुए भी उनकी नागरिक स्वतंत्रता को अनुलंघनीय मानने से इंकार किया और उस पर भी कुछ शर्तें लाद दी है ।

एक दिन में भारतीय न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तरों से पतन के इतने लक्षणों का सामने आना किसी भी न्याय-प्रेमी भारतवासी के कान खड़े कर देने के लिये काफी है। चंद रोज़ पहले कोलकाता की अदालत के एक मजिस्ट्रेट ने शशि थरूर की गिरफ़्तारी का वारंट इसलिये जारी कर दिया क्योंकि उन्होंने खुद उपस्थित हो कर अपनी उस बात पर सफ़ाई नहीं दी कि वे भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ नहीं देखना चाहते हैं !

बहरहाल, यह एक वाजिब सवाल हो सकता है कि हमारे लोकतंत्र के स्तंभ माने जाने वाले विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका अथवा प्रेस का ही अपना खुद का सत्य क्या होता है? क्या हमारे लोकतंत्र की दुनिया की सच्चाई के बाहर भी इनके जगत का अपना-अपना कोई स्वतंत्र, स्वाधीन सत्य भी होता है ?

जब भी हम किसी चीज की विशिष्टता की चर्चा करते हैं, वह विशिष्टता आखिरकार इस दुनिया के बाहर की कोई चीज नहीं होती । वह इस दुनिया के तत्वों से ही निर्मित होती है । वह अन्य चीजों से कितनी ही अलग या पृथक क्यों न हो, उनमें हमेशा एक प्रकार की सार्वलौकिकता का तत्व हमेशा मौजूद रहता है । उनकी विशिष्टता या पृथकता कभी भी सिर्फ अपने बल पर कायम नहीं रह सकती है । इसीलिये कोई भी अपवाद-स्वरूप विशिष्टता उतनी भी स्वयंभू नहीं है कि उसे बाकी दुनिया से अलग करके देखा-समझा जा सके ।

यही वजह है कि जब कोई समग्र रूप से हमारे लोकतंत्र के सार्वलौकिक सत्य से काट कर उसके किसी भी अंग के अपने जगत के सत्य की पवित्रता पर ज्यादा बल देता है तो कोरी प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है । इनकी अपवाद-स्वरूपता में भी हमेशा लोकतंत्र के सत्य की सार्वलौकिकता ही किसी न किसी रूप में व्यक्त होती है । इसीलिये जब एक ओर तो लोकतंत्र मात्र का ही दम घोट देने की राजनीति चल रही हो और दूसरी ओर उसके संघटक तत्वों के अपने जगत की स्वतंत्रता और पवित्रता का जाप किया जाता हो — यह मिथ्याचार नहीं तो और क्या है !

वर्नान गोंसाल्वे

न्यायपालिका हो या इस दुनिया के और क्षेत्रों के अपने जगत का सत्य, वह उसी हद तक सनातन सत्य होता है जिस हद तक वह उसके बाहर के अन्य क्षेत्रों में भी प्रगट होता है । अर्थात जो तथ्य एक जगत को विशिष्ट या अपवाद-स्वरूप बनाता है, उसे बाकी दुनिया के तथ्यों की श्रृंखला में ही पहचाना और समझा जा सकता है। इनमें अदृश्य, परम-ब्रह्मनुमा कुछ भी नहीं होता, सब इस व्यापक जगत के तत्वों को लिये होता है ।

यह सच है जीवन के हर क्षेत्र के अपने-अपने जगत के सत्य अपनी अलग-अलग भाषा में सामने आते हैं । साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र के अपने भाषाई रूप होते हैं तो कानून के क्षेत्र के अपने, राजनीति के क्षेत्र के अपने । अर्थात, अपने को अन्यों से अलगाने के लिये वे अपनी खास भाषा पर निर्भर करते हैं, जिसका उन जगत में प्रयोग किया जाता है और निरंतर विकास और संवर्द्धन भी किया जाता है । लेकिन जिसे जीवन का सत्य कहते हैं — यथार्थ — वह तो सर्व-भाषिक होता है । वह एक प्रकार का जरिया है जिससे आप प्रत्येक विशिष्ट माने जाने वाले क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । वही सबको आपस में जोड़ता है । अन्यथा सच यह है कि किसी भी क्षेत्र की अपनी खुद की खास भौतिक लाक्षणिकताएं बाकी दुनिया के लिये किसी काम की नहीं होती हैं । उनसे उस क्षेत्र की अपनी तार्किकता, उनके होने की संगति भी प्रमाणित नहीं होती ।

इन लाक्षणिकताओं से सिर्फ यह जाना जा सकता है कि बाहर की दुनिया के सत्य ने उस जगत विशेष को किस हद तक प्रभावित किया है । इनसे उस जगत की अपनी क्रियाशीलता या कार्य-पद्धति का अनुमान भर मिल सकता है । इस दुनिया में जिस काम को पूरा करने के लिये उन्हें नियोजित किया गया है, उसे हम इन लक्षणों से देख सकते हैं । लेकिन इनका कुछ भी अपना नैसर्गिक या प्रदत्त नहीं होता । इनका सत्य अपने संघटक तत्वों को एक क्रम में, अपनी क्रियाशीलता की एक श्रृंखला में जाहिर करता है । न्यायपालिका के आचरणों की श्रृंखला दुनिया में उसकी भूमिका को जाहिर करती है । इस प्रकार एक लोकतांत्रिक दुनिया के अखिल सत्य के एक अखंड राग में ये सारी संस्थाएं महज बीच-बीच के खास पड़ावों की तरह हैं, अपनी एक खास रंगत के बावजूद उसी राग का अखंड हिस्सा ।

इकबाल का शेर है — ‘मौज है दरिया में / वरु ने दरिया कुछ भी नहीं ।’

सत्य को असीम और खास प्रजातिगत,  दोनों माना जाता है । उसकी खास क्षेत्र की विशिष्टता उसके अपवाद-स्वरूप पहलू को औचित्य प्रदान करते हैं, और बहुधा उस क्षेत्र के कारोबारियों के विपरीत एक नई समकालीन आस्था और विश्वास की जमीन तैयार करने का काम भी करती है । लेकिन हर हाल में वह इस व्यापक दुनिया के सच को ही प्रतिबिंबित करती है ।

यही वजह है कि मार्क्स अपने दर्शनशास्त्रीय विश्लेषण में समाज में संस्कृति, न्याय, कानून और विचार के तत्वों के ऊपरी ढांचे को उसके आर्थिक आधार से द्वंद्वात्मक रूप में जुड़ा हुआ देखने पर भी अंतिम तौर पर आर्थिक आधार को ही समाज-व्यवस्था का निर्णायक तत्व कहने में जरा सा भी संकोच नहीं करते । इसे दुनिया के इतिहास ने बार-बार प्रमाणित किया है ।

हमारे यहां न्यायपालिका के सच को हमारी राजनीति के सच से काट कर दिखाने की कोशिश को इसीलिये हम मूलतः अपने लोकतंत्र के सत्य को झुठलाने की कोशिश ही कहेंगे । आरएसएस की तरह की एक जन्मजात वर्तमान संविधान-विरोधी शक्ति के शासन में सरकार के द्वारा संविधान की रक्षा की बातें मिथ्याचार के सिवाय और कुछ नहीं हो सकती हैं !    

सचमुच, आज न्यायपालिका के संभलने का समय आ गया है । उसकी चारदीवारियों में अब हर जगह सांप्रदायिक फ़ासिस्टों की विवेकहीन विक्षिप्तता की गूंज-अनुगूंज सुनाई देने लगी है । यह इसी प्रकार, अबाध रूप से जारी रहा तो कब हमारी न्यायपालिका भी राज्यपाल सत्यपाल मलिक की तरह के बेवक़ूफ़ और बड़बोले, थोड़ी से सत्ता पर फुदकने वाले सत्ता के दलालों का एक बड़ा जमावड़ा बन कर रह जायेगी, पता भी नहीं चलेगा ।

यह समय है जब न्यायपालिका को नये सिरे से संविधान के प्रति अपनी निष्ठा को दोहराते हुए अपने सच्चे कर्त्तव्यों की सुध लेनी चाहिए ।

इन नकारात्मकताओं के साथ ही इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में धारा 370, 35ए, कश्मीर के राज्य के दर्जे की समाप्ति, उसका बंटवारा, नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन, प्रेस की स्वतंत्रता आदि से जुड़े सभी सवालों को संविधान पीठ को सौंप कर भारतीय संविधान के मूलभूत जनतांत्रिक और संघीय ढांचे की रक्षा की एक नई संभावना पैदा की है। देखना है कि सुप्रीम कोर्ट फासीवादी सत्ता का कोई प्रतिरोध कर पाता है या नहीं !

तंत्रालोक में अभिनवगुप्त लिखते हैं :

स्वात्मन: स्वात्मनि स्वात्मक्षेपो वैसर्गिकी स्थिति :

(स्वयं में स्वयं के द्वारा स्वयं का क्षेप ही विसर्ग है ।)

यह सुप्रीम कोर्ट की अपनी पहचान की रक्षा की परीक्षा का समय है ।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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