कर्नाटक ने दिखाया राष्ट्रीय विनाश के फासीवादी राज के अंत का रास्ता

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सत्ता समर्थक विश्लेषकों, संपादकों-एंकरों ने यह साबित करने में पूरा जोर लगा दिया है कि कर्नाटक चुनाव का 2024 पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यही इस बात को दिखाने के लिए पर्याप्त है कि relatively मध्यम आकार के- महज 28 सीटों वाले- दक्षिणी राज्य में हुई पराजय से पैदा दहशत कितनी गहरी है।

पूरी कोशिश हो रही है कि ब्रांड मोदी को किसी तरह बचा लिया जाय, यह साबित कर दिया जाय कि हिंदुत्व की अपील अक्षुण्ण है, उसका आधार बरकरार है, कि डबल इंजन में एक इंजन बिल्कुल सही सलामत रफ्तार पकड़े है, उसकी लाभार्थी योजनाओं आदि का असर बदस्तूर कायम है।

तरह तरह की कवायद हो रही है कि कैसे हार का ठीकरा स्थानीय नेतृत्व की नाकामी और उनकी आपसी सिर-फुटव्वल पर मढ़ दिया जाय। सबसे खतरनाक यह कि अपनी पराजय को कांग्रेस के पक्ष में ‘खतरनाक’ मुस्लिम ध्रुवीकरण से कैसे जोड़ दिया जाय।

परोक्ष रूप से अफ़सोस जाहिर किया जा रहा है कि मुसलमान एकजुट हो गए, लेकिन हिन्दू polarise नहीं हुए, जातियों में बंटे रह गए। कहा जा रहा है कि ऐसा कर्नाटक की विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक जमीन के कारण हुआ, जाहिर है इसमें यह provocation और suggestion है कि अन्य जगहों पर विशेष कर उत्तर भारत में ऐसा नहीं होना चाहिए।

यह साबित करने की कोशिश है कि मोदी जी की लाभार्थी योजनाओं के विपरीत कांग्रेस ने मोदी जी के शब्दों में जो “रेवड़ियों” का वायदा किया उससे गड़बड़ हुई है, उन्हें वह पूरा नहीं कर पायेगी, अंततः लोग उसके खिलाफ हो जाएंगे और यह “रेवड़ी कल्चर” देश की अर्थव्यवस्था के साथ भी खिलवाड़ है।

जाहिर है ये सारे तर्क मनगढ़न्त हैं, इनका तथ्यों से कोई लेना देना नहीं है, यह कर्नाटक चुनाव से निकले असल विस्फोटक सन्देश से ध्यान हटाकर फर्जी नैरेटिव सेट करने की कवायद है और वह सन्देश यह है कि ब्रांड मोदी खत्म हो चुका है।

कर्नाटक चुनाव से निकले इस मूल सन्देश को छिपाने के लिए कैसे-कैसे हास्यास्पद तर्क गढ़े जा रहे हैं, इसकी एक बानगी देखिए
एक बड़े राष्ट्रीय दैनिक के सम्पादक, जिन्होंने अपनी विराट प्रतिभा के बल पर पूर्वांचल- प्रयाग से दिल्ली तक की दूरी तय की है, यह तर्क दिया है कि मोदी जी के रोड शो से कैसे बंगलोर में भाजपा ने जीत के झंडे गाड़ दिए। सच्चाई यह है कि वहां कांग्रेस को 13 और भाजपा को 15 सीट मिली हैं।

दरअसल यह 2019 के बाद करवाये गए दलबदल के बाद की सीट टैली जैसी ही है। महानगरीय बंगलौर जहां की विशिष्ठ वर्ग-वर्ण संरचना के कारण भाजपा पहले से एक बड़ी ताकत है, वहां महज 2 सीटों के अंतर के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि मोदी जी ने अपने को साबित कर दिया और मोदी मैजिक जिंदा है। मोदी को बचाने की बदहवाशी, desperation में ऐसा लचर तर्क देकर वे मोदी की कोई मदद तो नहीं ही कर पाएंगे उल्टे अपनी जग हंसाई करवा रहे हैं।

अगर यह तर्क उचित है तो मोदी ने जो 20 रैलियां कीं उनमें भाजपा 15 जगह हार गई, मात्र 5 ही जीत पाई, इसका ‘श्रेय’ किसे मिलेगा?

सबसे बड़ी बात यह कि कर्नाटक में मोदी की भूमिका को क्या महज उन सीटों के नतीजों तक सीमित किया जा सकता है जहां उन्होंने रोड शो या सभा की?

सच्चाई यह है कि यह पूरा चुनाव ही मोदी ने अपने नाम पर, अपने “राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और विकास” का उद्घोष करते हुए, अपनी केंद्रीय योजनाओं के नाम पर लड़ा। मोदी द्वारा अपने को दांव पर लगाकर लड़े गए इस चुनाव में भाजपा की crushing defeat ने उस मोदी मैजिक के मिथक को चकनाचूर कर दिया है जो कॉरपोरेट-मीडिया द्वारा भारी निवेश करके गढ़ा गया था। आने वाले चुनाव इसे confirm करेंगे। इस चुनाव का सबसे बड़ा सन्देश (takeaway) यही है।

स्वयं उनके अपने भविष्य के लिए निर्णायक महत्व के इस चुनाव में वह भाजपा की कोई मदद नहीं कर सके, उल्टे उनके गलत मूल्यांकन और बजरंगबली के नाम पर उन्मादी प्रचार ने भाजपा-विरोधी सेकुलर मतों का consolidation करके भाजपा का नुकसान ही किया है।

बताया जा रहा है कि संघ-भाजपा के शीर्ष स्तर पर चिन्हित किया गया है कि जनता के साथ चुनाव-प्रचार का connect न बन पाना पराजय का बड़ा कारण बना। आखिर उसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या प्रधान सेनापति उसकी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? प्रचार की कमान तो उन्हीं के हाथ में थी।

जो लोग मुस्लिम ध्रुवीकरण को भाजपा की पराजय के लिए खलनायक बना रहे हैं, उनकी धूर्तता को समझने के लिए यह देखना ही पर्याप्त है कि कर्नाटक के सभी अंचलों में कांग्रेस के मतों और सीटों में वृद्धि हुई है और भाजपा को हर जगह पराजय का मुंह देखना पड़ा है। इसमें एकमात्र अपवाद बंगलौर है जहां कमोबेश यथास्थिति बनी रही।

यहां तक कि भाजपा के मुख्य सामाजिक आधार और सबसे बड़े वोट बैंक लिंगायत समुदाय के प्रभुत्व वाले मुंबई/किट्टूर और सेंट्रल कर्नाटक में कांग्रेस का मत 5.9% बढ़ गया और सीटें 64 में 44 पर पहुंच गईं, जबकि भाजपा का मत 4.5% गिर गया और उसे मात्र 18 सीटें मिलीं।

वोक्कालिगा प्रभुत्व वाले दक्षिण कर्नाटक में कांग्रेस का मत 6.5% बढ़ गया और उसे 73 में 47 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा 9 से घटकर 6 सीट पर सिमट गई।

ST आरक्षित सीटों पर उसके मत में 9.8% की तथा SC सीटों पर 5.5% की भारी गिरावट हुई। ST रिजर्ब सीटों पर तो भाजपा का खाता भी नहीं खुल पाया। ठीक इसी तरह जैसे SC, ST आरक्षित सीटों पर कांग्रेस का मत प्रतिशत और सीटें बढ़ीं हैं, उसी तरह सामान्य सीटों पर भी उसके मत प्रतिशत और सीटों में इजाफा हुआ।

यह साफ है कि across regions and communitues भाजपा की गिरावट का एक सेक्युलर ट्रेंड रहा। कर्नाटक में उसकी सर्वांगीण और निर्णायक (comprehensive and decisive) पराजय हुई है।

मोदी-शाह-योगी-हिमंता चौकड़ी द्वारा ध्रुवीकरण का उन्मादी प्रयास उनकी नैया पार लगाने में विफल रहा, उल्टे कांग्रेस के पक्ष में सेकुलर मतों का consolidation बढ़ गया। यहां तक कि तटवर्ती इलाके में जहां भाजपा ने ध्रुवीकरण से सर्वाधिक उम्मीद पाली थी, वहां भी उसकी सीटें पहले से घट गईं।

यह अनायास नहीं है कि हिंदुत्व के नए पोस्टर ब्वॉय, आक्रामक बुलडोजर मॉडल के उनके उभरते सितारे योगी आदित्यनाथ भी बेअसर साबित हुए। उन्होंने कर्नाटक के मंड्या ज़िले में धुआंधार रैली की थी। लेकिन वहां की 8 विधान सभा सीटों में भाजपा का खाता भी नहीं खुल सका, वहां 6 सीटें कांग्रेस ने जीत लीं, 1 JDS ने और 1 कांग्रेस समर्थित SKP ने।

सच्चाई यह है कि मोदी अपने उभार के समय हिन्दू हृदय सम्राट ही नहीं “अच्छे दिन” के मसीहा भी थे, अब उनका 9 साला राज हर मोर्चे पर राष्ट्रीय विनाश, क्रूर फासीवादी दमन, जनता की चौतरफा तबाही, सभी हाशिये के तबकों के लिए हर तरह के अन्याय का प्रतीक बन चुका है। व्यापक जनता का, जिसकी विराट बहुसंख्या हिन्दू है, पेट सांप्रदायिकता से भर चुका है। आक्रामक हिंदुत्व से होने वाले लाभ पर अब law of diminishing return लागू हो रहा है।

कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्र में जहां कांग्रेस का मत 6.2% बढ़कर 43.2% पर पहुंच गया और भाजपा 3.6% गिरकर 36.9% पर आ गयी, वहीं अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस 6.6% बढ़कर 44.3% पर पहुंच गई जबकि भाजपा मात्र .7 % वृद्धि के साथ मात्र 28.7% पर रह गयी।

ठीक इसी तरह राज्य के (प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से) 5 सबसे गरीब जिलों में कांग्रेस का मत 2.9% बढ़कर 44.8% पर पहुंच गया, जबकि भाजपा का मत 3.5% घटकर 38.4% रह गया।

जाहिरा तौर पर ग्रामीण व अर्ध ग्रामीण क्षेत्र के किसानों, गरीबों, मजदूरों का भाजपा से अलगाव इस चुनाव का प्रमुख निर्णायक तत्व बना। कांग्रेस की 5 प्रतिज्ञाओं तथा सामाजिक न्याय पर वायदों ने लोगों को कांग्रेस की ओर आकर्षित किया। भाजपा के शहरी गढ़ों में भी गरीबों, अल्पसंख्यकों और युवा मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा से छिटककर कांग्रेस के पक्ष में गया और उसका मत-प्रतिशत बढ़ा।

सच्चाई यह है कि कर्नाटक के नतीजे “डबल इंजन” सरकार की “डबल एन्टी-इनकंबेंसी” का परिणाम हैं। ये भाजपा राज की विनाशकारी नीतियों-महंगाई, बेकारी, भ्रष्टाचार और चौतरफा तबाही- के ख़िलाफ़ जनसमुदाय के सभी तबकों के बहु-आयामी आक्रोश की cumulative अभिव्यक्ति है।

जिन तबकों पर कॉरपोरेट लूट की अर्थनीति, सामाजिक अन्याय और नफरती राज की मार जितनी ज्यादा पड़ी है, उनकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से उतनी ही तीखी है। यह मुख्यतः ग्रामीण इलाकों, गरीबों, हाशिये के तबकों, महिलाओं, युवाओं, अल्पसंख्यकों के जबरदस्त backlash का नतीजा है। ऐसे संकेत भी हैं कि 1st टाइम वोटर समेत युवा मतदाता 2014 के बाद पहली बार भाजपा के खिलाफ होने लगे हैं।

कर्नाटक ने राष्ट्रीय विनाश के फासीवादी राज के अंत का रास्ता दिखा दिया है। क्या जनान्दोलन की ताकतें तथा एकजुट विपक्ष 2024 में इसे अंजाम तक पहुंचाएगा?

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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