Wednesday, May 18, 2022

लूट का मनरेगा: झारखंड में चबूतरे से होगा बाढ़ का मुकाबला, भले बाढ़ का दूर-दूर तक न हो अंदेशा

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ऐतिहासिक मनरेगा कानून भ्रष्टाचार का केंद्र बन गया है जिसके चलते उसकी अवधारणा और प्रारदर्शिता दोनों सवालों के घेरे में है। और यह बात किसी से छुपी भी नहीं है क्योंकि इससे जुड़ी अनियमितताएं नियमित तौर पर अखबारों की सुर्खियां बनी रहती है। इन्हीं सुर्खियों के बीच एक मामला है झारखण्ड के साहेबगंज जिले के तालझारी प्रखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र का, जहां निवास करती हैं पहाड़िया जनजाति। 

उनकी कई पीढ़ियों को आज तक कभी भी बाढ़ का सामना नहीं करना पड़ा है। यहां की रहने वाली पहाड़िया जनजातियों को पेयजल और दूसरे तरह के घरेलू एवं कृषि कार्यों के लिए घोर जल संकट का सामना करना पड़ता है। लेकिन विडंबना यह है कि इस क्षेत्र में पेयजल व सिंचाई के लिए पानी पर योजनागत कार्य करने की बजाय प्रखण्ड और जिला प्रशासन पानी रोकने की योजना पर कर रहा है। इसके लिए चबूतरे का निर्माण का निर्माण कराया जा रहा है जिससे बाढ़ को नियंत्रण किया जा सके। अब इससे ज्यादा अतार्किक व हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है? उससे भी बड़ी बात यह है कि इस काम को मनरेगा के तहत अंजाम दिया जा रहा है।

मनरेगा अधिनयम में श्रम व सामाग्री का अनुपात 60:40 निर्धारित है। लेकिन तालझारी प्रखण्ड में जनवरी और फरवरी पिछले दो महीने में जिस रफ़्तार से बाढ़ नियंत्रण के नाम पर छोटे-छोटे बरसाती नालों और उन नालों के आस-पास पक्के चेकडैम, पक्की सिंचाई नाली निर्माण, झरना कूप निर्माण, सड़कों के किनारे गार्डवाल का निर्माण किया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि अधिकारियों द्वारा जान बूझ अधिनियमों की अनदेखी की जा रही है और  ठेकेदार, बिचौलियों के जरिये सरकारी फण्ड को जमकर लूटा जा रहा है।  

बता दें कि तालझारी प्रखण्ड में कुल 13 ग्राम पंचायतें हैं, जिसमें से सिर्फ मोतीझरना, मस्कालिया और बड़ी भगियामारी पंचायतों के कुछ ही भौगोलिक हिस्से गंगा के तटीय क्षेत्र में आते हैं। शेष पंचायतों के अधिकांश हिस्से पहाड़ी इलाके में हैं। इन्हीं दुर्गम इलाके के 10 पंचायतों के क्षेत्र का दौरा करने तथा मनरेगा वेबसाइट के अध्ययन से पता चला कि वित्तीय वर्ष 2021-22 में कुल 441 योजनायें बाढ़ नियंत्रण की ली गई हैं, जिनमें 182 योजनायें चबूतरा निर्माण की हैं। जो कुल चयनित बाढ़ नियंत्रण योजनाओं का 41 फीसदी है। यह किसी विडंबना से कम नहीं है कि चबूतरा निर्माण का बाढ़ नियंत्रण से क्या सम्बन्ध है, समझ से परे है। 

चबूतरा निर्माण की प्राकल्लित राशि 1.47 लाख से 1.76 लाख तक है। इसी प्रकार बाढ़ नियंत्रण की सभी योजनाओं में सामाग्री मद में 80 फीसदी और मजदूरी मद में 20 फीसदी खर्च हो रहा है। जो अधिनियम में किये गए प्रावधान 60:40 अनुपात के बिल्कुल विपरीत है। ये सभी योजनायें पिछले वित्तीय वर्ष के अंतिम अर्थात जनवरी-फरवरी में ली गई अथवा क्रियान्वित की गई। 

प्रखण्ड के कई पहाड़ी गांव ऐसे हैं जहां दोपहिया वाहन से भी जाना कठिन है। इन दुर्गम इलाकों में अधिकांश पहाड़िया आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं। इनके सामने रोजगार का संकट सालों भर बना रहता है। 

ऐसे अभावग्रस्त इलाकों में मनरेगा जैसी रोजगार परक योजनाओं को न लेकर सामग्री आधारित योजनाओं के क्रियान्वयन से साफ पता चलता है कि स्थानीय ठेकेदारों, वयवसायी वर्ग और प्रशासनिक गठजोड़ कितना मजबूत है। एक तरह से ये परिस्थितियां सरकारी मशीनीकृत लूट का प्रमाण हैं। तालझारी प्रखण्ड के गांवों में साफ देखा गया कि किसी भी परिवार या मजदूर के पास रोजगार नहीं है। लोगों के काम मांगने पर काम मिल सकता है, इस बारे में भी यहां के लोगों को बिल्कुल भी जानकारी नहीं है। 

दूसरी तरफ सरकारी वेबसाइट में दर्ज सूचनाओं पर नजर डालने पर पता चलता है कि तालझारी प्रखण्ड की किसी भी पंचायत में काम की कमी नहीं है। प्रखण्ड के दुर्गापुर में इस वित्तीय वर्ष में अकेले 2 करोड़ 7 लाख से अधिक सिर्फ मजदूरी मद में खर्च हुए हैं। लेकिन उसी पंचायत के अत्तरभीठा गांव के सभी पहाड़िया मजदूर बताते हैं कि वे मनरेगा की योजनाओं में काम नहीं किये हैं। जबकि उनके नाम से 50 से अधिक कार्य दिवस विभिन्न योजनाओं में दर्ज है। इन योजनाओं में कार्य करने के सवाल पर उनका कहना है कि ये सब ठेकेदार लोगों का काम है। हम लोगों को कहां काम मिलता है? 

मतलब साफ है कि इन मनरेगा मजदूरों को यह भी नहीं पता है कि मनरेगा के तहत उनको काम की गारंटी है, वे काम की मांग भी कर सकते हैं। ठेकेदारों व दलालों का वर्चस्व ऐसा है कि मजदूर यह नहीं समझते कि उक्त काम उनका अधिकार है। वे ठेकेदारों व दलालों को ही अपना मालिक समझते हैं।

प्रखण्ड के मनरेगा अधिकारियों से बातचीत के क्रम में यह भी तथ्य सामने आया कि वे अभावग्रस्त मजदूरों के द्वारा किये गए कार्य के एवज में मजदूरी भुगतान के लिए बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं हैं। उनके वक्तव्यों की मनरेगा वेबसाइट के इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों से भी पुष्टि होती है। पूरे वित्तीय वर्ष में मजदूरों के कार्य दिवस भरने के लिए तालझारी प्रखण्ड में जो मस्टर रोल सृजित किये गए, वह 14 कार्य दिवसों का है। जबकि कंप्यूटर प्रणाली में 7 दिन का भी सृजित करने का विकल्प है। लगातार 14 दिनों के मस्टर रोल सृजित होने से पहले सप्ताहांत कार्य करने वाले मजदूरों को कभी भी क़ानूनी प्रावधान के हिसाब से 15 दिनों के अंदर मजदूरी भुगतान नहीं की जा सकती है। क्योंकि कार्यस्थल से मस्टर रोल ही एक सप्ताह बाद प्रखंडों तक पहुंच पा रहा है। इसके कारण भी ग्रामीणों में मनरेगा के प्रति मोहभंग हो रहा है और ठेकेदारी प्रथा धड़ल्ले से फल-फूल रही है।

दूसरी तरफ मनरेगा मार्गदर्शिका 2013 के अध्याय 8.5 में मजदूरी भुगतान हेतु 7 दिनों का मस्टर रोल सृजित करने का सुझाव भारत सरकार ने दिया है। लेकिन तालझारी प्रखण्ड में पूरे वित्तीय वर्ष के दौरान सभी मनरेगा योजनाओं का 14 दिनों का मस्टर रोल सृजित किया गया। जिसके कारण जानबूझ कर मजदूरों को मजदूरी भुगतान देरी से की गई। यह भी इन गरीब श्रमिकों के लिए किसी अन्याय से कम नहीं है। देरी से भुगतान के कारण मजदूर उन्हीं ठेकेदारों के रहमोकरम पर रहते हैं जो उन्हें समय पर और नगद भुगतान दे सकें।

इस बाबत नरेगा वॉच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज ने उप विकास आयुक्त सह जिला कार्यक्रम समन्वयक, जिला साहेबगंज को एक पत्र भेजकर क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग करते हुए कहा है कि “हम आपसे अपेक्षा करते हैं कि तत्काल अनावश्यक और अनुपयोगी योजनाओं पर रोक लगाई जाए। जो भी अधिकारी/कर्मी इसके लिए दोषी हैं उन पर विभागीय कार्रवाई एवं मनरेगा अधिनियम की धारा 25 के तहत दण्ड निर्धारित किया जाए। इसके अतिरिक्त मजदूरों का ससमय मजदूरी भुगतान हेतु भारत सरकार द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में सभी कार्यों का 7 कार्य दिवसों का ही मस्टर रोल सृजित किया जाए।”

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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