पहला पन्ना

मोदी जी! यूपी कोरोना से लड़ाई नहीं, तबाही का मॉडल है

पीएम मोदी ने बनारस यात्रा में कोरोना से लड़ने के मामले में यूपी को मॉडल प्रदेश बताया है और इसके लिए सीएम योगी की जमकर तारीफ की है। अब अगर गंगा में उतराती लाशें और रेत में दफ्न कब्रों का कारवां पैदा करने वाला सूबा ही मॉडल है तो समझा जा सकता है कि सत्ता पक्ष जनता से और कितनी बड़ी तबाही पचा जाने की अपेक्षा रखता है। जबकि हकीकत यह है कि महामारी के दौरान योगी आदित्यनाथ किसी गुफा में घुस गए थे और एक बार दिखे भी तो प्रशासन और जरूरी सामानों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की जगह भगवान की मूर्ति को मास्क लगाते हुए। यानी सब कुछ उन्होंने ऊपर वाले के हाथ में ही छोड़ दिया था। जिसका नतीजा यह निकला कि सूबे के कैबिनेट मंत्रियों तक को अस्पतालों में बेड मयस्सर नहीं हुए और आम लोग एंबुलेंस और आक्सीजन के इंतजार में अपनी जान दे दिए। कैबिनेट समेत सत्ता पक्ष के कई नेताओं तक का रोष नहीं छुपा और उन्होंने खुलेआम चिट्ठियां लिखकर उन्हें जाहिर किया।

मोदी के इस बयान से यह बात साफ हो गयी है कि उन्हें देश में हुई लाखों मौतों से कोई फर्क नहीं पड़ा है। और कोरोना की दूसरी लहर की तबाहियां उनके लिए किसी परेशानी का सबब नहीं हैं। और वैसे भी व्यक्तिगत तौर पर और उनके अपने सांगठनिक जीवन में इस तरह की लाशें बिछती रही हैं। गोधरा से लेकर अहमदाबाद के दंगों के वह जिंदा कर्ताधर्ता हैं। और ज्यादा स्पष्ट रूप से कहें तो उससे भी बड़े मंजर को देखने के लिए वह सपने पालते रहे हैं। बहरहाल यह कोई पीएम का व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह पूरे देश और उसके बाशिंदों के जीवन से जुड़ा हुआ मसला है। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल बनता है कि अगर पीएम मोदी दूसरी लहर की इन तबाहियों को महसूस नहीं कर पाए हैं और उसकी पीड़ा का उन्हें अहसास नहीं है तो भला उससे वह क्या सबक लेंगे? और किसी तीसरी लहर और उससे होने वाली बड़ी तबाहियों को रोकने की दिशा में वह कैसे आगे बढ़ेंगे?

बहरहाल मोदी जी जानते हैं कि वह झूठ बोल रहे हैं। लेकिन यह इस समय उनकी राजनीति की जरूरत है। यूपी में चुनाव होने हैं और उसमें सरकार को हर मोर्चे पर सफल दिखाना है। लिहाजा उन्होंने गोयबेल्सियन फार्मूले को अपनाया। और इस सिलसिले में जितना बड़ा झूठ हो सकता है उसे बोल दिया। अब यह झूठ चुनाव तक बार-बार दोहराया जाएगा। और एक दिन सच के मानिंद खड़ा कर दिया जाएगा। फासिस्ट सत्ताएं इसी रह से काम करती हैं।

जबकि सच्चाई यह है कि यूपी की योगी सरकार हर मोर्चे पर पूरी तरह से नाकाम रही है। समाज के कमजोर तबकों का सम्मान से जीना मुश्किल हो गया है। दलितों और महिलाओं के लिए मानो पूरा सूबा यातनागृह में तब्दील हो गया है। पंचायत चुनावों के दौरान लखीमपुरखीरी में महिला की सरेआम खींचती साड़ी की तस्वीर सालों-साल लोगों के जेहन में बसकर उन्हें परेशान करती रहेगी। जिसे हम महाभारत के द्रौपदी प्रकरण की कल्पित कहानियों में ही सुने थे उसे इस योगी सत्ता में असलियत बनते देख रहे हैं। अब इसके बाद भी अगर किसी को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि यह कोई रामराज्य नहीं बल्कि दुशासन राज है। जिसमें कम से कम महिलाओं की इज्जत और आबरू तो कतई सुरक्षित नहीं है। शाहजहांपुर का नित्यानंद प्रकरण हो या फिर उन्नाव की घटना जिसमें बीजेपी विधायक सेंगर ने बच्ची के साथ न केवल बलात्कार किया बल्कि उसके पिता समेत पूरे खानदान को तबाह कर दिया। शाहजहांपुर में बीजेपी के पूर्व गृहमंत्री नित्यानंद ने एक बच्ची के साथ जो किया वह कलंक बीजेपी के माथे का स्थाई हिस्सा बन गया है। इस घटना में पीड़िता का मुंह बंद करा दिया गया और नित्यानंद जमानत पर छूट कर फिर से अपने धर्म और धंधे के कारोबार में जुट गए हैं।

दलितों के लिए सूबा अपमान और अंधकार का कुंआ साबित हुआ है। शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब किसी न किसी दलित को इसमें न डूबना पड़ा हो। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में इंसान से भी कमतर समझे जाने वाले इस तबके को मौजूदा शासन में अपनी इज्जत और आबरू भी बचानी मुश्किल पड़ रही है। सत्ता के संरक्षण में जगह-जगह दबंग सवर्णों के हमले हो रहे हैं। आजमगढ़ में घटित दो घटनाएं दलित उत्पीड़न के काले इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। पलिया और गोधौरा में जो हुआ है पिछले सत्तर सालों में उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। पलिया में न केवल दलितों के घर तोड़े गए बल्कि एक अफसर की पत्नी की इज्जत को खाकीधारियों ने खुलेआम नीलाम कर दिया। उस महिला का वीडियो जब पूरे देश में वायरल हो गया तब जाकर सरकार चेती और फिर उसने कुछ प्रशासनिक कदम उठाए। इस मामले में कांग्रेस की भूमिका भी बेहद सराहनीय रही जिसने न केवल इसको मुद्दा बनाया बल्कि प्रशासन के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाया। लेकिन गोधौरा के पीड़ितों को अभी भी न्याय नहीं मिला।

गोधौरा की घटना तो भूतो न भविष्यत सरीखी है। शायद ब्रिटिशर भी इस तरह से जनता के साथ कभी पेश होने की हिमाकत नहीं किए होंगे जैसा कि आजमगढ़ के जिला प्रशासन ने किया। पीड़ितों ने जनचौक के रिपोर्टर के सामने पूरी कहानी बयान की है। आधी रात को 250 से ज्यादा पुलिसकर्मियों ने सूबे के एसपी के नेतृत्व में गांव को घेर लिया और फिर अंधाधुंध फायरिंग करने के बाद पूरे अमले ने गांव पर हमला बोल दिया। उसके बाद उन्होंने जो तबाही मचायी है उसको बताने के लिए शब्द कम पड़ जाएंगे। लोगों के घर तोड़े गए। गाड़ियां तोड़ दी गयीं। टीवी से लेकर आल्मारी तक कुछ भी सबूत नहीं छोड़ा गया। दरवाजे तक उखाड़ दिए गए। और बात यहीं तक सीमित नहीं रही खाकी के भेष में पहुंचे लोगों ने चंबल के डाकुओं को भी मात दे दी और जमकर घरों में लूटपाट की। इसमें गहनों से  लेकर नकदी सब कुछ शामिल था। लोगों की पिटाई का तो कोई हिसाब ही नहीं रहा। हालांकि गांव वाले सीधे नहीं बता रहे हैं लेकिन इशारों में उन्होंने जरूर बताया कि किस तरह से गांव की बेटियों और बहुओं की इज्जत लूटी गयी। ऊपर से 302 को छोड़कर शायद ही कोई धारा बची हो जिसे गांव वालों पर तामील न कर दी गयी हो। जिसमें 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया और इसमें तीन साल के मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया और उन्हें तीन दिनों तक थाने में बैठाए रखा गया और खाने और भोजन के नाम पर महज एक जून की रोटी मयस्सर हुई।

मोदी जी जिस बनारस में भाषण दे रहे थे उससे यह जगह महज 50 किमी दूर है। ऐसा नहीं है कि मोदी जी को इस घटना के बारे में पता न हो। या फिर देश की इंटेलिजेंस एजेंसियां इतनी कमजोर हो गयी हैं कि उन्हें इसकी सूचना न हो जो उनके रूटीन रिपोर्टिंग के कर्तव्य में शामिल है। इस घटना का पूरा ब्योरा पीएम के पास होगा। इस बात को 100 फीसदी दावे के साथ कहा जा सकता है। लेकिन दौरा करने को कौन कहे आजमगढ़ शब्द भी उनकी जुबान पर नहीं आया। और ऊपर से हर बात के लिए वह योगी आदित्यानाथ की पीठ ही थपथपाते रहे।

अनायास ही नहीं लोग अब ऐसा कहने लगे हैं कि अगर यही रामराज्य है तो हमें हमारा पुराना ‘रावणराज्य’ ही लौटा दिया जाए। अपने इस कथित रामराज्य में इन संघियों और भाजपाइयों ने राम तक को नहीं बख्शा। राम मंदिर के लिए इकट्ठा किए गए चंदे की बंदरबाट के जो किस्से सामने आ रहे हैं उसकी इस देश में कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। अभी तक मंदिर के चंदों में साधुओं और पुजारियों के बीच बंटवारे और उसको लेकर होने वाले विवादों की खबरें आती थीं। यह पहली बार हो रहा है जब भक्तों ने भी उसमें हिस्सेदारी शुरू कर दी है। और यह पूरा लूट के हद तक जा पहुंची है। अयोध्या में दो करोड़ को किस तरह से 18 करोड़ किया गया। वह अभी भी रहस्य ही बना हुआ है।

बीजेपी और संघ भी जान गए हैं कि सूबे में कोरोना की तबाही जिस स्तर की रही है और उसमें समाज के कमजोर तबकों को जिस तरह से दबाया गया है उससे चुनाव की बिल्कुल उल्टी तस्वीर बन रही है और अगर कुछ अलग नहीं किया गया तो हार बिल्कुल तय है। लिहाजा इनके पास एक ही दांव है। जिसको वो बार-बार दोहराते रहे हैं। वह है सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। फिर क्या था एटीएस को इशारा किया गया और उसने रातों-रात अलकायदा को लखनऊ में उतार दिया। इसको भौतिक रूप देने के लिए उसने राजधानी में स्थित तीन मुस्लिम घरों पर छापे डाले और अलग-अलग जगहों से तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया। किसी के घर से विस्फोटक के तौर पर कूकर मिला तो किसी के घर पर कोई नक्शा। जो उन्हें आतंकी साजिशकर्ता साबित करने के लिए काफी था।

इसमें से कोई बैटरी रिक्शा चलाकर अपना पेट भरता है तो किसी के पास ढंग का घर भी नहीं है। लेकिन एटीएस की मानें तो इन सभी के तार अलकायदा से जुड़े हुए हैं। कोई इन्हें बता सकता है कि अलकायदा के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं। वह अपने लड़ाकों को कम से कम दौलत की कमी नहीं होने देता। बहरहाल इस देश की सरकार के अपने बयान हैं कि इस देश में अभी तक अलकायदा की कोई घुसपैठ नहीं है। उसकी तरफ से एक भी गतिविधि इस देश में संचालित नहीं की गयी है। ऐसे में यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि लखनऊ में अलकायदा को सिर्फ और सिर्फ योगी को जिताने के लिए लाया गया है।

दरअसल यूपी का चुनाव बीजेपी-संघ के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गया है। यूपी हारने का मतलब है 2024 आम चुनाव में हार। और संघ इस बात के लिए तैयार नहीं है। लिहाजा उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यह इसी बात से समझा जा सकता है कि मोदी और योगी के बीच के अंतरविरोध को संघ ने अपनी ताकत से दबा दिया है। यहां तक कि मोदी यह जानते हुए भी कि यूपी का चुनाव उनके नहीं योगी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा वह सार्वजनिक तौर पर उनकी तारीफ कर रहे हैं। जबकि यह बात ‘खुद एको अहम द्वितीयो नास्ति’ के उनके व्यक्तित्व के खिलाफ जाती है। बहरहाल यूपी का खेल इतना आसान नहीं होने जा रहा है। पंचायत चुनावों में जनता ने अपना ट्रेलर दिखा दिया है। यह बात अलग है कि अप्रत्यक्ष तौर पर होने वाले ब्लाक प्रमुखों और पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में सत्ता पक्ष का जोर रहा। लेकिन जब बारी जनता की आएगी तो वह एक बार फिर सत्ता पक्ष को पूरी पिक्चर दिखाने के लिए तैयार है। लिहाजा इसी अंदेशे को देखते हुए अभी यूपी में बहुत कुछ होना बाकी है। और एकबारगी अगर कहें तो सहानुभूति वोट हासिल करने के लिए वह किसी की शहादत लेने तक जा सकता है तो कोई अतिश्योक्ति बात नहीं होगी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on July 17, 2021 11:36 am

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